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Tuesday, July 10, 2012
चिदम्बरम साब मिनरल वाटर पीने,आईसक्रीम खाने वालों की बात ही मत किजिये,उनकी तो टटटी तक 35 लाख के टायलेट के बीना नही उतरती
पागल है साली जनता!जबरन महंगाई पर हंगामा मचाती है.15 रुपये बोतल पानी पी लेते हैं,20 रू का आईसक्रीम कोन खा लेते हैं और एक रुपये किलो दाल चावल और गेंहू का दाम बढे तो बर्दाश्त नही होता.कमाल का बयान है चिदम्बरम का जिन पर एक लाख 76 हज़ार करोड रुपये के टू जी घोटाले के छींटे पडे हुये है.चिदम्बरम साब मिनरल वाटर पीने,आईसक्रीम खाने वालों की बात ही मत किजिये,उनकी तो टटटी तक 35 लाख के टायलेट के बीना नही उतरती.उन लोगों के बारे में सोचिये जिनके बारे में आपके हरामखोर लोग 27 रुपये दो टाईम के भोजन के लिये काफी समझते हैं.आम जनता जब रोज़ आईसक्रीम खाये और मिनरल वाटर ही पीये तब ये बयान समझ में आता है.सालो का भत्त्ता फत्ता खतम कर दिहाडी पर कुछ रोज़ कमाने खाने पर लगा दिया जाना चाहिये समझ में आ जायेगा दाल आटे का भाव.थू है साली सरकार की.
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Friday, December 16, 2011
हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट बडा या वकील/मंत्री?
हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट बडा या वकील/मंत्री?ये बेहद टेढा और कठीन सवाल आज उठ खडा हुआ है.जिस मामले को हाईकोर्ट ने खारिज़ नही किया,सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ नही किया,उसे एक वकील से मंत्री बने चिद्दू ने खारिज करने की सलाह दे डाली.इसे कहते है वकील फीस ली तो काम पूरा करके ही दम लिया.पूरी ईमानदारी से अपने मुव्वकिल को बचाने का हर संभव प्रयास किया.लोग चिढ रहे है.बेवजह हल्ला मचा रहे हैं.अब भला वकील साब मुवक्किल को नही बचायेगा तो क्या देश को बचायेगा?देखना अब अफज़ल गुरु और कसाब के केस भी चिद्दू भैया को ही मिलेंगे और जनहित मे देश के लोगों की जान लेने वाले भाईजानोम के केस भी जनहित में वापस हो जायेंगे.जय हो वकील चिद्दू भैया की.वकील हो तो ऎसा,मंत्री हो तो ऎसा.और उससे भी ज्यादा महान है कांग्रेस पार्टी,उसने तो चिद्दू भैया को बचाने के कसम खा ली है लगता है.उसका नारा भी बदल गया है,चिद्दू तुम लफडे करो हम तुम्हारे साथ है.जब तक़ कांग्रेस का राज रहेगा,चिद्दू तू अंदर नही,बाहर ही रहेगा.नियमो का,सिद्धांतो का कब्रिस्तान,फिर भी मेरा भारत महान.
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Thursday, September 29, 2011
बचपन की कहानियों में राक्षस की जान मिट्ठू में होती थी वैसे ही कांग्रेस की जान लगता है कि चिदम्बरम में है!
बचपन में अधिकांश कहानियों मे राक्षस हुआ करते थे.और राक्षस को मारने राजकुमार भी होते थे.राक्षस और राजकुमार में जब फायनल फाइट होती थी तो सब राक्षस की ताक़त से हैरान रह जाते थे.एक से एक तीर-तलवार के वार,गदा से गदागद और फिर भी राक्षस का बाल भी बांका नही होता था.राजकुमार भी पसीने-पसीने,हैरान-परेशान.फिर कोई धीरे से राजकुमार के कान में फुसफुसाता और राजकुमार राक्षस को छोड कर बगल के पेड पर लटके पिंजरे के मिट्ठू की गरदन मरोडता और उधर राक्षस टें बोल देता.मेरे खयाल से चिदम्बरम ही वो मिट्ठू है इसिलिये उसे बचाने में कांग्रेस पूरी ताक़त लगा रही है.
Wednesday, May 12, 2010
सेना नही भेजना है,मत भेजो मगर दुनिया को बताओ तो मत चिदंबरम जी
नक्सलियों से निपटने के मामले मे सेना का उपयोग करेंगे,ऐसा कहना है हमारे विद्वान गृहमंत्री चिदंबरम साहब का।उन्होने ऐसा करना नैतिकता के खिलाफ़ माना है।तो चिदंबरम जी नक्सली कौन सा नैतिक काम कर रहे हैं ये भी बता दिजिये।क्या घात लगाकर पुलिस या सीआरपीएफ़ के जवानों को बारूदी सुरंगो से उड़ा देना नैतिकता की श्रेणी मे आता है?क्या स्कूल,अस्पताल और सड़कें उड़ाना नैतिकता के उदाहरण है?क्या भरे बाज़ार निरीह,निहत्थे आदिवासियों की नृशंस हत्या करना नैतिकता का तक़ाजा है?आखिर नक्सलियों के खिलाफ़ सेना के इस्तेमाल से परहेज क्यों?जब ये समस्या आपको देश की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या लगती है तो इसके निराकरण मे इतनी देर क्यों?क्या सरकार एक छोटी सी फ़ुंसी को फ़ोड़े और फ़ोड़े को नासूर मे बदलते देख कर भी चेती नही है?क्या अभी भी लगता है कि इस समस्या को जड़ से मिटाने का सही वक़्त नही आया है?क्या आपको लगता है कि बस्तर मे जवानों की और बलि चढानी चाहिये?क्या आपको लगता है महुये की मादक खूश्बू से सराबोर रहने वाली बस्तर की वादियों मे अभी खून की बदबू कम फ़ैली है?क्या आपको लगता है कि हरा-भरा बस्तर निर्दोष लोगों के खून से और लाल होना चाहिये?आखिर चाह्ते क्या है आप?
एक तरफ़ आप कहते हैं नक्स्लियों से डरेंगे नही,झुकेंगे नही उन्हे बख्शेंगे नही और दूसरी तरफ़ आप उनके खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल नही करने का खुले आम ऐलान करते हैं।तो फ़िर जो स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल उनसे निपटने में अभी तक़ कामयाब नही हो पा रहा है,वो क्या करे?मरते रहे रोज़ उनके जवान वंहा?आप लिट्टे के खिलाफ़ सेना के इस्तेमाल करने वाले श्रीलंका के उदाहरण को साफ़-साफ़ नकार कर क्या साबित करना चाहते हैं चिदंबरम जी?क्या आपको अपनी अंतर्राष्ट्रीय छबि की चिंता तो नही हो रही है?
फ़िर एक बात समझ नही आती कुछ बातें अगर नही भी कही जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?अगर आपको नक्सलियों के खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल नही करना है मत करिये लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर बताईये तो मत?क्या आपका ये बयान सेना से खौफ़ खाने वाले नक्सलियों का मनोबल बढाने वाला नही है?क्या मदद के लिये सेना की ओर उम्मीद से देख रहे जवानो का मनोबल तोड़ने वाला नही है आपका बयान?
आप नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं और खुले आम बता रहे हैं कि हम सेना नही भेजेंगे!बहुत अच्छी बात है!आप की मर्ज़ी!आप राजा हैं,जैसा चाहे करिये!लेकिन ये बताईये क्या आपकी नैतिकता का असर उन नक्सलियों पर पड़ेगा क्या?क्या वे भी बता कर हमला करेंगे क्या?क्या वे छिप कर हमला करना बंद कर देंगे क्या?क्या सालों पहले बिछा कर रखी गई बारूदी सुरंगो का इस्तेमाल नही किया जायेगा?
पता नही कैसे इतना घातक बयान सत्ता मे बैठे लोग दे देते हैं।बिना इस बात की परवाह किये कि उसका असर क्या होगा?इतना तो बच्चे भी समझते हैं कि दुश्मन को अपनी रणनीति नही बताना चाहिये।गोपनीयता भी कुछ चीज़ है!
पता नही क्या चाहती है केन्द्र सरकार!छत्तीसगढ राज्य सरकार को अगर नक्सलियों से निपटने के मामले मे फ़ेल साबित करना ही अगर उसका उद्देश्य है तो इस सडियल राजनीतिक दांव-पेंच मे बहुत से लोगों को बेवजह अपनी जान गवानी पड़ रही है और गंवानी पड़ेगी।मत भेजो सेना!दुनिया को बताओ हम नही भेजेंगे सेना!दुनिया को क्या नक्सलियों को जाकर बता दो कि आप लोग निश्चित रहिये हम लोग नैतिकता के पुजारी है,हम सेना नही भेजेंगें?मरने दो पुलिस और सुरक्षा बल के जवानो को जंगल में।जिन्हे जंगल वार-फ़ेयर की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है वे सीमा पर तैनात है,पता नही कब युद्ध होगा और कब अपना कौशल दिखायेंगे और यंहा जिन्हे जंगलवार के बारे मे ऐबीसीडी नही पता वे लड़ रहे जान हथेली पर लेकर।
ऐसे समय मे जब नक्सलियों के हमले तेज़ हो गये हैं और जवानो के लगातार शहीद होने से राज्य सरकार भी हैरान-परेशान है तब केन्द्र सरकार के ज़िम्मेदार मंत्री का ऐसा बयान समझ से परे है।अगर छत्तीसगढ की जगह कांग्रेस शासित महाराष्ट्र मे नक्सली इतना उत्पात करते तो क्या तब भी चिदंबरम खामोश रहते?क्या लालगढ की तरह छत्तीसगढ मे नक्सलियों से निपटने के लिये कठोर कदम उठाने की ज़रुरत नही है?वैसे एक सवाल और छ्त्तीसगढ के बस्तर मे हाहाकार मचाने वाले आंध्रा कैडर के नक्सली आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र मे क्यों खामोश है?उन्हे अन्याय और शोषण क्या सिर्फ़ गैर कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ,उडीसा और झारखण्ड मे ही नज़र आता है?कहने को बहुत है मगर अफ़सोस है गंदी राजनीति के कारण बेगुनाह लोगों को बेवजह अपनी जान गंवानी पड़ रही है।पता नही कब जागेगी केन्द्र सरकार और कब पता चलेगा चिदंबरम साहब को कि नैतिकता की बातों से नक्सली समस्या का हल होने वाला नही है!
एक तरफ़ आप कहते हैं नक्स्लियों से डरेंगे नही,झुकेंगे नही उन्हे बख्शेंगे नही और दूसरी तरफ़ आप उनके खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल नही करने का खुले आम ऐलान करते हैं।तो फ़िर जो स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल उनसे निपटने में अभी तक़ कामयाब नही हो पा रहा है,वो क्या करे?मरते रहे रोज़ उनके जवान वंहा?आप लिट्टे के खिलाफ़ सेना के इस्तेमाल करने वाले श्रीलंका के उदाहरण को साफ़-साफ़ नकार कर क्या साबित करना चाहते हैं चिदंबरम जी?क्या आपको अपनी अंतर्राष्ट्रीय छबि की चिंता तो नही हो रही है?
फ़िर एक बात समझ नही आती कुछ बातें अगर नही भी कही जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?अगर आपको नक्सलियों के खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल नही करना है मत करिये लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर बताईये तो मत?क्या आपका ये बयान सेना से खौफ़ खाने वाले नक्सलियों का मनोबल बढाने वाला नही है?क्या मदद के लिये सेना की ओर उम्मीद से देख रहे जवानो का मनोबल तोड़ने वाला नही है आपका बयान?
आप नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं और खुले आम बता रहे हैं कि हम सेना नही भेजेंगे!बहुत अच्छी बात है!आप की मर्ज़ी!आप राजा हैं,जैसा चाहे करिये!लेकिन ये बताईये क्या आपकी नैतिकता का असर उन नक्सलियों पर पड़ेगा क्या?क्या वे भी बता कर हमला करेंगे क्या?क्या वे छिप कर हमला करना बंद कर देंगे क्या?क्या सालों पहले बिछा कर रखी गई बारूदी सुरंगो का इस्तेमाल नही किया जायेगा?
पता नही कैसे इतना घातक बयान सत्ता मे बैठे लोग दे देते हैं।बिना इस बात की परवाह किये कि उसका असर क्या होगा?इतना तो बच्चे भी समझते हैं कि दुश्मन को अपनी रणनीति नही बताना चाहिये।गोपनीयता भी कुछ चीज़ है!
पता नही क्या चाहती है केन्द्र सरकार!छत्तीसगढ राज्य सरकार को अगर नक्सलियों से निपटने के मामले मे फ़ेल साबित करना ही अगर उसका उद्देश्य है तो इस सडियल राजनीतिक दांव-पेंच मे बहुत से लोगों को बेवजह अपनी जान गवानी पड़ रही है और गंवानी पड़ेगी।मत भेजो सेना!दुनिया को बताओ हम नही भेजेंगे सेना!दुनिया को क्या नक्सलियों को जाकर बता दो कि आप लोग निश्चित रहिये हम लोग नैतिकता के पुजारी है,हम सेना नही भेजेंगें?मरने दो पुलिस और सुरक्षा बल के जवानो को जंगल में।जिन्हे जंगल वार-फ़ेयर की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है वे सीमा पर तैनात है,पता नही कब युद्ध होगा और कब अपना कौशल दिखायेंगे और यंहा जिन्हे जंगलवार के बारे मे ऐबीसीडी नही पता वे लड़ रहे जान हथेली पर लेकर।
ऐसे समय मे जब नक्सलियों के हमले तेज़ हो गये हैं और जवानो के लगातार शहीद होने से राज्य सरकार भी हैरान-परेशान है तब केन्द्र सरकार के ज़िम्मेदार मंत्री का ऐसा बयान समझ से परे है।अगर छत्तीसगढ की जगह कांग्रेस शासित महाराष्ट्र मे नक्सली इतना उत्पात करते तो क्या तब भी चिदंबरम खामोश रहते?क्या लालगढ की तरह छत्तीसगढ मे नक्सलियों से निपटने के लिये कठोर कदम उठाने की ज़रुरत नही है?वैसे एक सवाल और छ्त्तीसगढ के बस्तर मे हाहाकार मचाने वाले आंध्रा कैडर के नक्सली आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र मे क्यों खामोश है?उन्हे अन्याय और शोषण क्या सिर्फ़ गैर कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ,उडीसा और झारखण्ड मे ही नज़र आता है?कहने को बहुत है मगर अफ़सोस है गंदी राजनीति के कारण बेगुनाह लोगों को बेवजह अपनी जान गंवानी पड़ रही है।पता नही कब जागेगी केन्द्र सरकार और कब पता चलेगा चिदंबरम साहब को कि नैतिकता की बातों से नक्सली समस्या का हल होने वाला नही है!
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