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Friday, July 15, 2011
तो क्या सरकार को जगाने के लिये पाकिस्तान जैसे रोज़ धमाके होना ज़रूरी है?क्या इससे पहले कार्रवाई नही करेंगे राजा साब?
हमारे देश से ज्यादा तो पाकिस्तान में धमाके होते हैं।देखिये बयान एक पेपर टाईगर का।बेशर्मी और बेवकूफ़ी की मिसाल है ऐसी बयानबाज़ी।उदाहरण दिया तो किसका जिस पर हमारे देश के आतंकवादियों को शरण देने के आरोप हैं।आरोप इस्लिये कह रहा हूं ,कंही उन्हे बुरा न लग जाये कि और उन्हे ये ना लगे कि ये भी बिना ठोस सबूत के किसी मुस्लिम देश को बदनाम करने की भगवा साजिश है।क्या कहा जा सकता है इस देश के ज़िम्मेदार ठेकेदारों की लाचारी और चाटूकारिता पर्।अरे उदाहरण देना था तो देते अमेरिका का उदाहरण।कहते सीना ठोक कर कि हम घर में घुस कर मारेंगे दुश्मनों को।कहते कि मुम्बई में अब अगर दोबारा धमाका हुआ तो हम भी कई धमाके करवा देंगे।मगर अफ़सोस,देश की असंख्य जनता के ज़ख्मों पर मरहम लगाने की बजाय आपने अपने एक नेता को बचाने के लिये जनता के ज़ख्मों पर नमक-मिर्ची लगा दी।ठीक है कोई कुछ कह नही रहा है सबके सीने में धधक रहा गुस्सा ये कह रहा है कि अरे हिज़ड़ों,और कितना खून देखना है बहते हुये सड़को पर्?और कितनी लाशें गिनना है?मांस के लोथड़े देखने में मज़ा आता है क्या?क्या धमाकों के शिकार लोगों की चीखें,उनके रिश्तेदारों का रोना सुनकर शांति मिलती है क्या?क्या मुआवज़ा बांटने में ही आनंद आता है?और कितने धमाके होना चाहिये?और कितनी लाशें बिछ्ना चाहिये?और कितने परिवार उजड़ना चाहिये?और कितने बच्चे अनाथ और बहने विधवा होनी चाहिये?और कितनी जान की बलि चाहिये देश के ठेकेदारों,आप लोगों को?कब जागोगे?कब मारोगे?कब बचाओगे देश को?पकिस्तान जैसा हाल हो जायेगा तो फ़िर कौन बचा पायेगा?आयेगा अमेरिका जब मर्ज़ी घुस के मार के चला जायेगा।तब क्या तालियां बजाओगे?शर्म भी नही आती ऐसे गैर ज़िम्मेदाराना बयान देते हुये।और मुझे तो उन बेशर्मों से ज्यादा अपने ही भाई-बहनों पर शर्म आती है,कि आखिर वे इन कमीनो पर अपने तरकश में सज़े सवालों के तीर बरसाते क्यों नही?क्या एकाध राडिया केस और सामने आने वाला है?क्या कुछ बड़े पत्रकार और नंगे होने वाले हैं?क्यों नही सवाल करते उनसे जनता की आवाज़ बनकर?उन पांच बड़े लोगों की तो बात करना ही बेकार है जो देश के सबसे हीमैन-सुपरमैन-बैटमैन-रैटमैन प्रधानमंत्री से मिलकर आयें हैं।उन्होने तो इस बारे में शायद पूछा ही नही होगा।लेकिन जो मैदान में है उनको तो ऐसी बक़वास करने वालों को नंगा करना चाहिये,या फ़िर उनसे बात ही नही करनी चाहिये।काहे उनकी बक़वास सुनाते हैं जनता को?क्या वो पेड़ न्यूज़ है?क्यों जनता के ज़ख्मों पर मरहम की जगह चमचों की जली-कटी सुनाते हैं।ये भी समझ से परे है?क्या उनकी बक़वास के बिना काऊंटर बाईट नही मिलेगी?क्या अनाप-शनाप बक़वास दिखाने पर ही लोग टी वी देखेंगे?समझ में नही आता कि इस बात का क्या मतलब है,मुम्बई फ़िर दौड़ने लगी है?मुम्बई की हिम्मत की दाद देनी होगी?और दौड़ेगी नही तो क्या रुक जायेगी?हिम्मत नही दिखायेगी तो घर कैसे चलेगा?हिम्मत की दाद देना ही तो हमारे बेशर्म नेताओं के हिम्मत की दाद दो,जो बिना डरे सबके सामने बक़वास करते है,हमारे भाई सुनते हैं और फ़िर स्टूडियो जाकर सारे देश को सुनाते हैं।ऐसा लगता है कि ये उन निकम्मे नेताओं के नौकर हैं,बस और कुछ नही।उनकी भी ज़िम्मेदारी उतनी है जितनी सरकार के ज़िम्मेदार लोगों की।जिस दिन वे उन लोगों कू बेनक़ाब करना शुरू करेंगे तब कंही उनकी बक़वास पर लगाम लगेगी और शायद तब कुम्भकरण जागेंगे भी।वरना कह्ते रहेंगे नेता पाकिस्तान से तो अच्छे हैं।
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Wednesday, May 12, 2010
सेना नही भेजना है,मत भेजो मगर दुनिया को बताओ तो मत चिदंबरम जी
नक्सलियों से निपटने के मामले मे सेना का उपयोग करेंगे,ऐसा कहना है हमारे विद्वान गृहमंत्री चिदंबरम साहब का।उन्होने ऐसा करना नैतिकता के खिलाफ़ माना है।तो चिदंबरम जी नक्सली कौन सा नैतिक काम कर रहे हैं ये भी बता दिजिये।क्या घात लगाकर पुलिस या सीआरपीएफ़ के जवानों को बारूदी सुरंगो से उड़ा देना नैतिकता की श्रेणी मे आता है?क्या स्कूल,अस्पताल और सड़कें उड़ाना नैतिकता के उदाहरण है?क्या भरे बाज़ार निरीह,निहत्थे आदिवासियों की नृशंस हत्या करना नैतिकता का तक़ाजा है?आखिर नक्सलियों के खिलाफ़ सेना के इस्तेमाल से परहेज क्यों?जब ये समस्या आपको देश की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या लगती है तो इसके निराकरण मे इतनी देर क्यों?क्या सरकार एक छोटी सी फ़ुंसी को फ़ोड़े और फ़ोड़े को नासूर मे बदलते देख कर भी चेती नही है?क्या अभी भी लगता है कि इस समस्या को जड़ से मिटाने का सही वक़्त नही आया है?क्या आपको लगता है कि बस्तर मे जवानों की और बलि चढानी चाहिये?क्या आपको लगता है महुये की मादक खूश्बू से सराबोर रहने वाली बस्तर की वादियों मे अभी खून की बदबू कम फ़ैली है?क्या आपको लगता है कि हरा-भरा बस्तर निर्दोष लोगों के खून से और लाल होना चाहिये?आखिर चाह्ते क्या है आप?
एक तरफ़ आप कहते हैं नक्स्लियों से डरेंगे नही,झुकेंगे नही उन्हे बख्शेंगे नही और दूसरी तरफ़ आप उनके खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल नही करने का खुले आम ऐलान करते हैं।तो फ़िर जो स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल उनसे निपटने में अभी तक़ कामयाब नही हो पा रहा है,वो क्या करे?मरते रहे रोज़ उनके जवान वंहा?आप लिट्टे के खिलाफ़ सेना के इस्तेमाल करने वाले श्रीलंका के उदाहरण को साफ़-साफ़ नकार कर क्या साबित करना चाहते हैं चिदंबरम जी?क्या आपको अपनी अंतर्राष्ट्रीय छबि की चिंता तो नही हो रही है?
फ़िर एक बात समझ नही आती कुछ बातें अगर नही भी कही जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?अगर आपको नक्सलियों के खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल नही करना है मत करिये लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर बताईये तो मत?क्या आपका ये बयान सेना से खौफ़ खाने वाले नक्सलियों का मनोबल बढाने वाला नही है?क्या मदद के लिये सेना की ओर उम्मीद से देख रहे जवानो का मनोबल तोड़ने वाला नही है आपका बयान?
आप नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं और खुले आम बता रहे हैं कि हम सेना नही भेजेंगे!बहुत अच्छी बात है!आप की मर्ज़ी!आप राजा हैं,जैसा चाहे करिये!लेकिन ये बताईये क्या आपकी नैतिकता का असर उन नक्सलियों पर पड़ेगा क्या?क्या वे भी बता कर हमला करेंगे क्या?क्या वे छिप कर हमला करना बंद कर देंगे क्या?क्या सालों पहले बिछा कर रखी गई बारूदी सुरंगो का इस्तेमाल नही किया जायेगा?
पता नही कैसे इतना घातक बयान सत्ता मे बैठे लोग दे देते हैं।बिना इस बात की परवाह किये कि उसका असर क्या होगा?इतना तो बच्चे भी समझते हैं कि दुश्मन को अपनी रणनीति नही बताना चाहिये।गोपनीयता भी कुछ चीज़ है!
पता नही क्या चाहती है केन्द्र सरकार!छत्तीसगढ राज्य सरकार को अगर नक्सलियों से निपटने के मामले मे फ़ेल साबित करना ही अगर उसका उद्देश्य है तो इस सडियल राजनीतिक दांव-पेंच मे बहुत से लोगों को बेवजह अपनी जान गवानी पड़ रही है और गंवानी पड़ेगी।मत भेजो सेना!दुनिया को बताओ हम नही भेजेंगे सेना!दुनिया को क्या नक्सलियों को जाकर बता दो कि आप लोग निश्चित रहिये हम लोग नैतिकता के पुजारी है,हम सेना नही भेजेंगें?मरने दो पुलिस और सुरक्षा बल के जवानो को जंगल में।जिन्हे जंगल वार-फ़ेयर की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है वे सीमा पर तैनात है,पता नही कब युद्ध होगा और कब अपना कौशल दिखायेंगे और यंहा जिन्हे जंगलवार के बारे मे ऐबीसीडी नही पता वे लड़ रहे जान हथेली पर लेकर।
ऐसे समय मे जब नक्सलियों के हमले तेज़ हो गये हैं और जवानो के लगातार शहीद होने से राज्य सरकार भी हैरान-परेशान है तब केन्द्र सरकार के ज़िम्मेदार मंत्री का ऐसा बयान समझ से परे है।अगर छत्तीसगढ की जगह कांग्रेस शासित महाराष्ट्र मे नक्सली इतना उत्पात करते तो क्या तब भी चिदंबरम खामोश रहते?क्या लालगढ की तरह छत्तीसगढ मे नक्सलियों से निपटने के लिये कठोर कदम उठाने की ज़रुरत नही है?वैसे एक सवाल और छ्त्तीसगढ के बस्तर मे हाहाकार मचाने वाले आंध्रा कैडर के नक्सली आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र मे क्यों खामोश है?उन्हे अन्याय और शोषण क्या सिर्फ़ गैर कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ,उडीसा और झारखण्ड मे ही नज़र आता है?कहने को बहुत है मगर अफ़सोस है गंदी राजनीति के कारण बेगुनाह लोगों को बेवजह अपनी जान गंवानी पड़ रही है।पता नही कब जागेगी केन्द्र सरकार और कब पता चलेगा चिदंबरम साहब को कि नैतिकता की बातों से नक्सली समस्या का हल होने वाला नही है!
एक तरफ़ आप कहते हैं नक्स्लियों से डरेंगे नही,झुकेंगे नही उन्हे बख्शेंगे नही और दूसरी तरफ़ आप उनके खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल नही करने का खुले आम ऐलान करते हैं।तो फ़िर जो स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल उनसे निपटने में अभी तक़ कामयाब नही हो पा रहा है,वो क्या करे?मरते रहे रोज़ उनके जवान वंहा?आप लिट्टे के खिलाफ़ सेना के इस्तेमाल करने वाले श्रीलंका के उदाहरण को साफ़-साफ़ नकार कर क्या साबित करना चाहते हैं चिदंबरम जी?क्या आपको अपनी अंतर्राष्ट्रीय छबि की चिंता तो नही हो रही है?
फ़िर एक बात समझ नही आती कुछ बातें अगर नही भी कही जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?अगर आपको नक्सलियों के खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल नही करना है मत करिये लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर बताईये तो मत?क्या आपका ये बयान सेना से खौफ़ खाने वाले नक्सलियों का मनोबल बढाने वाला नही है?क्या मदद के लिये सेना की ओर उम्मीद से देख रहे जवानो का मनोबल तोड़ने वाला नही है आपका बयान?
आप नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं और खुले आम बता रहे हैं कि हम सेना नही भेजेंगे!बहुत अच्छी बात है!आप की मर्ज़ी!आप राजा हैं,जैसा चाहे करिये!लेकिन ये बताईये क्या आपकी नैतिकता का असर उन नक्सलियों पर पड़ेगा क्या?क्या वे भी बता कर हमला करेंगे क्या?क्या वे छिप कर हमला करना बंद कर देंगे क्या?क्या सालों पहले बिछा कर रखी गई बारूदी सुरंगो का इस्तेमाल नही किया जायेगा?
पता नही कैसे इतना घातक बयान सत्ता मे बैठे लोग दे देते हैं।बिना इस बात की परवाह किये कि उसका असर क्या होगा?इतना तो बच्चे भी समझते हैं कि दुश्मन को अपनी रणनीति नही बताना चाहिये।गोपनीयता भी कुछ चीज़ है!
पता नही क्या चाहती है केन्द्र सरकार!छत्तीसगढ राज्य सरकार को अगर नक्सलियों से निपटने के मामले मे फ़ेल साबित करना ही अगर उसका उद्देश्य है तो इस सडियल राजनीतिक दांव-पेंच मे बहुत से लोगों को बेवजह अपनी जान गवानी पड़ रही है और गंवानी पड़ेगी।मत भेजो सेना!दुनिया को बताओ हम नही भेजेंगे सेना!दुनिया को क्या नक्सलियों को जाकर बता दो कि आप लोग निश्चित रहिये हम लोग नैतिकता के पुजारी है,हम सेना नही भेजेंगें?मरने दो पुलिस और सुरक्षा बल के जवानो को जंगल में।जिन्हे जंगल वार-फ़ेयर की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है वे सीमा पर तैनात है,पता नही कब युद्ध होगा और कब अपना कौशल दिखायेंगे और यंहा जिन्हे जंगलवार के बारे मे ऐबीसीडी नही पता वे लड़ रहे जान हथेली पर लेकर।
ऐसे समय मे जब नक्सलियों के हमले तेज़ हो गये हैं और जवानो के लगातार शहीद होने से राज्य सरकार भी हैरान-परेशान है तब केन्द्र सरकार के ज़िम्मेदार मंत्री का ऐसा बयान समझ से परे है।अगर छत्तीसगढ की जगह कांग्रेस शासित महाराष्ट्र मे नक्सली इतना उत्पात करते तो क्या तब भी चिदंबरम खामोश रहते?क्या लालगढ की तरह छत्तीसगढ मे नक्सलियों से निपटने के लिये कठोर कदम उठाने की ज़रुरत नही है?वैसे एक सवाल और छ्त्तीसगढ के बस्तर मे हाहाकार मचाने वाले आंध्रा कैडर के नक्सली आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र मे क्यों खामोश है?उन्हे अन्याय और शोषण क्या सिर्फ़ गैर कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ,उडीसा और झारखण्ड मे ही नज़र आता है?कहने को बहुत है मगर अफ़सोस है गंदी राजनीति के कारण बेगुनाह लोगों को बेवजह अपनी जान गंवानी पड़ रही है।पता नही कब जागेगी केन्द्र सरकार और कब पता चलेगा चिदंबरम साहब को कि नैतिकता की बातों से नक्सली समस्या का हल होने वाला नही है!
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Sunday, November 29, 2009
पता नही ऐसा,कैसे कर लेते हैं लोग?
मोमबत्तियों वालो के पाखण्ड से खराब हुआ मूड अभी ठीक भी नही हुआ था कि एक और महापाखण्ड से सामना हो गया।लोगों का दोगलापन इतना ज्यादा ओरिजिनल था कि साले काले-काले ज़हरीले सांप भी उनके सामने लेट जाते और पूछते आखिर ऐसा कैसे कर लेते हैं आप लोग?मैं भी ऐसा ही सोचता रहा दिन भर और कुछ तबियत भी बिगड़नी शुरू हो गई थी सो चिडचिडापन बढता ही चल गया।
कल ईद थी।सुबह से लोगों ने इसे मनाने की तैयारियां शुरू कर दी थी।सिर्फ़ मुसलमान भाईयों ने ही नही घोर हिंदूओं ने भी।ईदगाह मे नमाज़ के बाद जो गले मिलने का सिलसिला चला वो सालों से वैसा ही चला आ रहा है।एक और कांग्रेस के नेताओं का झुण्ड तो दूसरी ओर भाजपाईयों का,और नई-नई पार्टियों के लोगो के साथ वे लोग भी हाज़िर थे जिनकी दुकान ही मुसलमानो को गालियां देने से चलती है।प्रेस फ़ोटोग्राफ़रों की भीड़ भी अपनी-अपनी पसंद के चेहरों को ईशारे से फ़्रेम मे आने की समझाईश देकर तब तक़ फ़्लैश चमकाते रही,जब तक़ उनको मन-माफ़िक मैनेज तस्वीर नही मिल गई।बच्चों को पहले से प्रोग्राम के मुताबिक़ सेट करके तैयार करके पहुंचे लोग,अजनबियों की भीड़ मे हैरान-परेशान बच्चों को जबरन मुस्कुराने के लिये मान-मनौव्वल से लेकर धमकी-चमकी तक़ देते लोग।आखिर कितनी मुस्किल से उन्होने अपने अपने बच्चों को कल किसी न किसी अख़बार मे फ़्रंट पेज पर दिखाने के लिये सेट किया था।
और सब कुछ वैसा ही हुआ।अखबार वैसे ही मैनेज तस्वीरों के साथ ईद के सोल्लास मनाये जाने की सूचना दे रहा था।एक अख़बार तो वर्दी मे सिख्ख और मुसलमान भाई की हंसते-खिलखिलाते गले मिलने की तस्वीर छाप कर शायद ये बताने की कोशिश कर रहा था कि कंही कोई गड़बड़ नही है।सब कुछ ठीक-ठाक है,यंहा भी वर्दीधारियों मे भी।लेकिन क्या ये तस्वीरें वही कहती नज़र आई जिसे बताने की गरज़ से उन्हे छापा गया?क्या इतना सब करने के बाद हम दिलों मे पनप रही नफ़रत की फ़सल को खतम करने मे सफ़ल हो पायें हैं?रटे-रटाये बयान,नेताओं से लेकर समाजसेवियो और सो काल्ड सोशलाईट्स के,क्या दिलों की बीच बढती दूरियां कम पा रहे हैं?क्या कि किसी वारदात के बाद ज़हर उगलते बयानों से कड़ुवी हुई खीर ऐसे फ़र्ज़ी-फ़ार्मल बयानों से मीठी हो सकती है?बहुत से सवाल कल से मेरे सर्दी,खांसी और सांस की तक़लीफ़ से बीमार हो चले दिमाग पर और ज़ोर डालते रहे।
कल मैने देखा था कट्टर धार्मिक नेताओं को हंस कर गले मिलते और तस्वीर खिंचवाते?क्या सच मे वे गले मिल रहे थे या एक ऐतिहासिक घटना की रिहर्सल कर रहे थे!क्या सिर्फ़ फ़ार्मेलिटी के लिये गले मिलने से दिल मिल सकते हैं?क्या गले मिलने से दिलों का मैल धुल सकता है?क्या ये गले मिलने कि प्रेक्टिस तनाव के दिनो मे दुहराई जा सकती है?पता नही ऐसा,कैसे कर लेते हैं लोग?
कल हम लोगों का दोपहर का भोजन डा जवाद नक़वी के घर पर था।शानदार खाने मे कंही भी गले मिलने जैसी बनावट नही थी।बिरयानी से लेकर दालचा-रायता के साथ नान-वेज की कई और डिश भी थी और हमारे लिये भी सवादिष्ट शुद्ध शाकाहारी खाना था लेकिन अलग नही, एक साथ लगा हुआ था।खाने वालों मे हिंदू ज्यादा थे।हमारे ग्रुप मे भी ब्राह्मणो की बहुतायत है लेकिन उनमे से ज्यादा मांसाहारी हैं।स्वाद से ज्यादा प्यार से तरबतर दावत का भरपूर आनंद लेकर हम लोग बाहर निकले थे कि गोपाल ने कहा भैया आज असलम ने घर बुलाया है।असलम उसका ड्राइवर है और मैं भी उसे अपने साथ जबलपुर ले जा चुका हूं।
सब एक बार मे तैयार हो गये और बोले थोड़ा रूक कर चलते हैं।कुछ देर बाद पूरा ग्रुप असलम के घर था।असलम सब को जानता ही था।उसके घर पंहुचते ही उसकी नन्ही सी प्यारी सी गुड़िया जैसी बिटिया आई और सीधे मेरे पैर पडने लगी।वो मेरे ग्राऊंड(बास्केट बाल)की स्टूडेंट भी है।मैने उससे कहा नही बेटा आप लोगों मे पैर नही पड़ते।मेरे इतना कह्ते ही असलम के साथ-साथ पर्दे के पीछे से भी आवाज़ आई नही सर हम लोग ये सब नही मानते।आप उसके सर हैं और वो आपका सम्मान कर रही है।उस समय मुझे लगा कि वंदे मातरम का विरोध करने वाले पढे-लिखे विद्वानों को कम पढे-लिखे मगर ज्यादा समझदार असलम के घर लाऊ और सब दिखाऊं।असलम ने भी जी भर कर इंतज़ाम किया था।उससे गले मिलते समय मुझे वो ऐतिहासिक दृष्य नज़र नही आया,जिसमे किसी के पंजे बाघ के थे तो किसी के खंजर जैसे।असलम से गले मिलते समय वैसा ही लगा जैसे बर्सों पुराना दोस्त गले मिल रहा हो।उसके घर के व्यंजनो मे भी उसी प्यार का सवाद मिला जो डा नक़वी के घर की सितारा दावत मे मिला था।
वंहा से निकल कर हमारा ग्रुप शहर मे और भी मुसलिम दोस्तों से मिलता रहा लेकिन कंही कोई फ़ोटो-शोटो नही।कंही कोई दिखावा नही।कंही कोई फ़ारमेलिटी नही।शुद्ध प्यार जो सिर्फ़ दिखावे के गले मिलने से कभी नही मिल सकता।शायद मै गलत हो सकता हूं पर मुझे तो ऐसा ही लगा,आपको कैसा लगा बताईगा ज़रूर्।दो लाईनो के साथ बात खतम करता हूं।
हमसे मत किजिये दुश्मनों का गिला,
हम तो हैं दोस्तों के सताये हुये,
फ़िर रहे हैं यंहा आज कुछ मेहरबां,
आस्तीनों मे खंजर छुपाये हुये॥
कल ईद थी।सुबह से लोगों ने इसे मनाने की तैयारियां शुरू कर दी थी।सिर्फ़ मुसलमान भाईयों ने ही नही घोर हिंदूओं ने भी।ईदगाह मे नमाज़ के बाद जो गले मिलने का सिलसिला चला वो सालों से वैसा ही चला आ रहा है।एक और कांग्रेस के नेताओं का झुण्ड तो दूसरी ओर भाजपाईयों का,और नई-नई पार्टियों के लोगो के साथ वे लोग भी हाज़िर थे जिनकी दुकान ही मुसलमानो को गालियां देने से चलती है।प्रेस फ़ोटोग्राफ़रों की भीड़ भी अपनी-अपनी पसंद के चेहरों को ईशारे से फ़्रेम मे आने की समझाईश देकर तब तक़ फ़्लैश चमकाते रही,जब तक़ उनको मन-माफ़िक मैनेज तस्वीर नही मिल गई।बच्चों को पहले से प्रोग्राम के मुताबिक़ सेट करके तैयार करके पहुंचे लोग,अजनबियों की भीड़ मे हैरान-परेशान बच्चों को जबरन मुस्कुराने के लिये मान-मनौव्वल से लेकर धमकी-चमकी तक़ देते लोग।आखिर कितनी मुस्किल से उन्होने अपने अपने बच्चों को कल किसी न किसी अख़बार मे फ़्रंट पेज पर दिखाने के लिये सेट किया था।
और सब कुछ वैसा ही हुआ।अखबार वैसे ही मैनेज तस्वीरों के साथ ईद के सोल्लास मनाये जाने की सूचना दे रहा था।एक अख़बार तो वर्दी मे सिख्ख और मुसलमान भाई की हंसते-खिलखिलाते गले मिलने की तस्वीर छाप कर शायद ये बताने की कोशिश कर रहा था कि कंही कोई गड़बड़ नही है।सब कुछ ठीक-ठाक है,यंहा भी वर्दीधारियों मे भी।लेकिन क्या ये तस्वीरें वही कहती नज़र आई जिसे बताने की गरज़ से उन्हे छापा गया?क्या इतना सब करने के बाद हम दिलों मे पनप रही नफ़रत की फ़सल को खतम करने मे सफ़ल हो पायें हैं?रटे-रटाये बयान,नेताओं से लेकर समाजसेवियो और सो काल्ड सोशलाईट्स के,क्या दिलों की बीच बढती दूरियां कम पा रहे हैं?क्या कि किसी वारदात के बाद ज़हर उगलते बयानों से कड़ुवी हुई खीर ऐसे फ़र्ज़ी-फ़ार्मल बयानों से मीठी हो सकती है?बहुत से सवाल कल से मेरे सर्दी,खांसी और सांस की तक़लीफ़ से बीमार हो चले दिमाग पर और ज़ोर डालते रहे।
कल मैने देखा था कट्टर धार्मिक नेताओं को हंस कर गले मिलते और तस्वीर खिंचवाते?क्या सच मे वे गले मिल रहे थे या एक ऐतिहासिक घटना की रिहर्सल कर रहे थे!क्या सिर्फ़ फ़ार्मेलिटी के लिये गले मिलने से दिल मिल सकते हैं?क्या गले मिलने से दिलों का मैल धुल सकता है?क्या ये गले मिलने कि प्रेक्टिस तनाव के दिनो मे दुहराई जा सकती है?पता नही ऐसा,कैसे कर लेते हैं लोग?
कल हम लोगों का दोपहर का भोजन डा जवाद नक़वी के घर पर था।शानदार खाने मे कंही भी गले मिलने जैसी बनावट नही थी।बिरयानी से लेकर दालचा-रायता के साथ नान-वेज की कई और डिश भी थी और हमारे लिये भी सवादिष्ट शुद्ध शाकाहारी खाना था लेकिन अलग नही, एक साथ लगा हुआ था।खाने वालों मे हिंदू ज्यादा थे।हमारे ग्रुप मे भी ब्राह्मणो की बहुतायत है लेकिन उनमे से ज्यादा मांसाहारी हैं।स्वाद से ज्यादा प्यार से तरबतर दावत का भरपूर आनंद लेकर हम लोग बाहर निकले थे कि गोपाल ने कहा भैया आज असलम ने घर बुलाया है।असलम उसका ड्राइवर है और मैं भी उसे अपने साथ जबलपुर ले जा चुका हूं।
सब एक बार मे तैयार हो गये और बोले थोड़ा रूक कर चलते हैं।कुछ देर बाद पूरा ग्रुप असलम के घर था।असलम सब को जानता ही था।उसके घर पंहुचते ही उसकी नन्ही सी प्यारी सी गुड़िया जैसी बिटिया आई और सीधे मेरे पैर पडने लगी।वो मेरे ग्राऊंड(बास्केट बाल)की स्टूडेंट भी है।मैने उससे कहा नही बेटा आप लोगों मे पैर नही पड़ते।मेरे इतना कह्ते ही असलम के साथ-साथ पर्दे के पीछे से भी आवाज़ आई नही सर हम लोग ये सब नही मानते।आप उसके सर हैं और वो आपका सम्मान कर रही है।उस समय मुझे लगा कि वंदे मातरम का विरोध करने वाले पढे-लिखे विद्वानों को कम पढे-लिखे मगर ज्यादा समझदार असलम के घर लाऊ और सब दिखाऊं।असलम ने भी जी भर कर इंतज़ाम किया था।उससे गले मिलते समय मुझे वो ऐतिहासिक दृष्य नज़र नही आया,जिसमे किसी के पंजे बाघ के थे तो किसी के खंजर जैसे।असलम से गले मिलते समय वैसा ही लगा जैसे बर्सों पुराना दोस्त गले मिल रहा हो।उसके घर के व्यंजनो मे भी उसी प्यार का सवाद मिला जो डा नक़वी के घर की सितारा दावत मे मिला था।
वंहा से निकल कर हमारा ग्रुप शहर मे और भी मुसलिम दोस्तों से मिलता रहा लेकिन कंही कोई फ़ोटो-शोटो नही।कंही कोई दिखावा नही।कंही कोई फ़ारमेलिटी नही।शुद्ध प्यार जो सिर्फ़ दिखावे के गले मिलने से कभी नही मिल सकता।शायद मै गलत हो सकता हूं पर मुझे तो ऐसा ही लगा,आपको कैसा लगा बताईगा ज़रूर्।दो लाईनो के साथ बात खतम करता हूं।
हमसे मत किजिये दुश्मनों का गिला,
हम तो हैं दोस्तों के सताये हुये,
फ़िर रहे हैं यंहा आज कुछ मेहरबां,
आस्तीनों मे खंजर छुपाये हुये॥
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