Showing posts with label शहीद्।. Show all posts
Showing posts with label शहीद्।. Show all posts

Monday, July 27, 2009

राजधानी मे बड़े बड़े विद्वान नक्सलवाद पर बहस कर रहे थे और बारसूर के जंगल मे जवान मौत से लड़ रहे थे!

राजधानी के सबसे बड़े होटल मे आज देश के जाने विद्वान कड़ी सुरक्षा मे नक्सलवाद पर बहस कर रहे थे।यंही बगल की धरमशाला मे कल ही शहीद एस पी विनोद चौबे को तेरहवी पर श्रद्धांजलि दी गई और शाम होते-होते खबर आई कि बारसूर के जंगल मे जवान मौत से लड़ रहे थे।नक्सलियो की बिछाई मौत ने उन्हे अपनी चपेट मे ले लिया था।सारे जवान ज़िंदा रहने के लिये ज़रूरी रोजमर्रा का सामान खरीद कर वापस लौट रहे थे।वो सामान जो अब उनके किसी काम नही आने वाला था।दो दर्जन से ज्यादा जवान नक्स्लियो के फ़ंदे मे फ़ंसे थे।

अब तो लगता है कि बस हम सब लाश गिनने वाले चीरघर के चौकीदार हो गये हैं।संजीत ने फ़ोन कर कहा कि भैया कुछ लिख रहे हो क्या?मैने कहा कि आखिर क्या होगा लिख कर भी?मुझे कल ,अब तो आज कहेंगे जबलपुर जाना है।संजीत ने ज़िद पकड़ ली कुछ तो लिखो।मैने कहा ठीक है,और इतना कहते ही बिजली गिल हो गई।बरसात शुरू थी।बेहद मनहूस और डरावना मौसम हो चला था।मैने फ़िर सजीत से फ़ोन कर कहा कि बिजली नही है।उसने कहा ठीक है जब आये तब लिख देना,मै सुबह पढ लूंगाऽब राके डेढ बजे बिजली आई है और मै लिखने बैठा हूं।सुबह ज़ल्दि उठना है और जबलपुर जाना है।घूमने का मज़ा अब कसैला सा हो गया है।

लिखने को बहुत कुछ है मगर हाथ कांप रहे है।अभी तेरह दिन पहले ही तो नक्सलियों ने तीन दर्ज़न से ज्यादा जवानो का शिकार किया थ।आज फ़िर दो दर्ज़न को निशाना बनाया है।गश्त करने वाले जवानो को पता ही नही चलता कब किस पेड की ओट से निकल कर मौत आ जाती है और उनका काम तमाम कर जाती है।हम रह जाते है स्तब्ध्।शहीद जवानो के लाश के लोथड़े बिनते और शहीदो की संख्या गिनते हुये श्रद्धांजलि सभा मे काले चश्मे के भीतर रोती हुई आंखो का नाटक करते हुये शहीदो की कुर्बानी व्यर्थ नही जाने देने का रटा रटाया डायलाग बोलने वाले मंझे हुये एक्टर की तरह।

क्या इस खून खराबे का कोई अंत है या किसी प्रधानमंत्री जैसे बड़े आदमी की शहादत के बाद आतंकवाद से निपटने का रिकार्ड दोहराने का इंतज़ार हो रहा है।रोज़ कोई मर रहा है किसी न किसी का बेटा खो रहा है तो किसी का सुहाग उजड रहा है,क्या ये सब उन नकसलियो को समझ मे नही आता या फ़िर उनके सीने मे दिल ही नही होता।आखिर किस अन्याय और शोषण की बात करते है वे।वे लोग जो कर रहे है क्या न्याय है?क्या ऐसे ही खून खराबे से बस्तर का विकास हो सकता है?पता नही आज बड़े बड़े नामधारी विद्वानो ने क्या -क्या कहा?मुझे भी जाना था लेकिन सुरक्षित कमरो मे बेसिरपैर की बक़वास सुनकर सिर्फ़ खून ही खौलता है,इस्लिये आज वंहा गया भी नही।सारे विद्वान अपने अपने विचार उंडेल कर शाम को और सुबह के हवाई जहाज से अपने शहर के लिये उड़ गये होंगे। अगले सेमिनार के लिये कुछ नये पाईंटस भी उन्हे यंहा मिल गय होंगे।उन्हे तो शहीद जवानो के घर ले जाना चाहिये।अंतिम यात्रा पर रवाना होने वाले जवानो का करूण क्रंदन उन्हे सुनाना चाहिये तब शायद वे अपना पक्ष ईमानदारी से रख सकें।पता नही सड़ी सड़ी बात पर मानवाधिकार के हनन का हल्ला मचाने वाले कंहा सो रहे हैं।शायद उनकी नींद किसी अल्पसख्यक या कश्मीर या फ़िर किसी पेज थ्री के प्रोटोकाल को मेंटेन कर रही है।बहुत रात हो रही है।लिखने को बहुत कुछ है।फ़िर कभी ,क्योंकि ये सिलसिला तो लगता है थमने वाला है नहीए प्रभू ण शहीदो को अपनी शरण मे लेना।उनके परिवार को इस असीम दुखः को सहने की शक्ति देना!

Monday, July 13, 2009

चिदंबरम के चश्मे का फ़र्क!लालगढ लाल दिखाई दिया मगर छतीसगढ नही?हां अगर ममता यंहा की होती तो और बात थी?

आये दिन छतीसगढ मे नक्सली हमले कर रहें है और पुलिस के जवान असमय काल के गाल मे समा कर शहीद हो रहे हैं।यही हाल उडीसा का भी है।मगर केन्द्र की यूपीए सरकार को ये सब नज़र नही आ रहा है।कल यंहा एस पी विनोद कुमार चौबे समेत 30 जवान नक्सली हमले मे शहीद हो गये तब चिदंबरम ने अपने चश्मे पर एसी कमरे से बाहर आने पर जमी नमी को थोडा साफ़ किया और उन्हे धुंदला सा कुछ नज़र आया और अब वे सीआरपीएफ़ के 600 जवान भेज रहे हैं हैं?क्या ये जवान विनोद चौबे और उनके साथ शहीद हुये तीस जवानो के परिवार का दुःख कम कर सकेंगे?क्या उनकी खुशियां लौटा सकेंगे?कया यंहा लालगढ की तरह कोई बडा आपरेशन नही चलाया जा सकता?क्या इसके लिये प्रदेश मे कांग्रेस या कांग्रेस के समर्थक दल की सरकार या उसका प्रभाव होना ज़रूरी है?

यूपीये कहिये या कांग्रेस उसकी नीयत पर तो सवाल उठना वाजिब है?जिस तरीके से लालगढ मे नक्सलियों के सफ़ाये के लिये अभियान चलाया गया,वो प्रशंसनीय है मगर जिस तरीके से भाजपा शासित छत्तीसगढ की नक्सली उत्पात के बावज़ूद उपेक्षा की गई वो भी सामने है।आम चुनावो मे ममता के साथ मिली ज़बरदस्त सफ़लता और आने वाले विधानसभा चुनाव मे सरकार बनाने की अपार संभावनाओं ने लालगढ के नक्सली गढ को ढहाने मे पूरी ताक़त झोंक दी और नतीज़ा भी शानदार सफ़लता के रूप मे सामने आया।

केन्द्र सरकार जब लालगढ का नक्सली आतंक खतम कर सकती है तो छ्त्तीसगढ का भी कर सकती है अगर वो चाहे तो?शायद इसिलिये कहा जाता है नक्सलवाद एक राजनैतिक समस्या है?जिसका हल राजनैतिक इच्छा शक्ति के बिना संभव ही नही है।यंहा भी अगर किसी चीज़ की कमी नज़र आती है तो सिर्फ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति की।इतने बडे हमले और हादसे के बाद भी यंहा सिर्फ़ 600 जवान भेजना कोई ठोस हल नही है।इसके लिये टुकडो मे नही पूरा ईलाज़ ज़रूरी है।ईलाका बडा और दुर्गम होने के कारण एक साथ नही सही मगर एक के बाद एक लगातार अलग अलग हिस्सों मे अभियान चला कर छतीसगढ को भी लालगढ जैसे ही मुक्त कराया जा सकता है।
सवाल फ़िर उसी बात का आता है कि छत्तीसगढ किस चश्मे से कैसा नज़र आता है?भाजपा के चश्मे से और कांग्रेस या चिदंबरम के चश्मे से जिस दिन एक जैसा नज़र आयेगा उस दिन ही छतीसगढ से नक्स्ल समस्या के अंत की शुरूआत हो जायेगी ?