एक ज़िम्मेदार पत्रकार होने के नाते मुझे मालूम है क्या लिखना चाहिये और क्या लिखने से बचना चाहिये।जिस अयोध्या को लेकर उन्होने टिपण्णी की है उस समय मै दैनिक भास्कर मे महत्वपू्र्ण स्थान पर था और उस समय हम लोगो ने ऐसा कुछ भी नही लिखा जिससे रायपुर कानपुर बन जाता। हमे ये कहने मे गर्व होता है कि उस समय फ़िज़ा मे ज़हर को घुलने से पहले ही रोकने की तमाम कोशिशो मे हम लोग शामिल थे,और उअ समय भी छत्तीसगढ अमन और चैन का टापू बना रहा।
सलीम भाई मै आपको बता दूं की मेरा बचपन से लेकर जवानी तक़ का समय रायपुर के मौदहापारा नामक मुहल्ले मे बीता है,जो आपके यूपी के बांदा ज़िले के मौदहा इलाके के नाम पर है।यंहा सारे लोग मौधईया कहलाते हैं और वंहा रहने के कारण मुझे भी मौधईया कहा जाता था।मैने कभी इस बात पर ऐतराज़ नही किया ।मेरा बचपन का मित्र सत्तार खान आज भी वंहा रहता है उसे मै राजेन्द्र कह कर बुलाता था,बुलाता हूं और रहूंगा।उसे कोई ऐतराज़ नही है उसके घर वालो को कोई ऐतराज़ नही है,पूरे मुहल्ले वालो को कोई ऐतराज़ नही है।वो मेरे परिवार का सदस्य है और मै उसके परिवार का।
ये सब बताने की ज़रूरत नही है और मुझे धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफ़िकेट किसी की मुहर लगा हुआ चाहिये भी नही।सारा ईलाका मुझे जानता है कि मै कैसा इंसान हूं।रहा सवाल गणेश जी की मूर्तियों के उपहास का तो इस पर टोकना ज़रूरी हो गया था।सलीम भाईजान ने फ़िर कुछ फ़िल्मो के उदाहरण देकर टिपण्णी की है कि अमिताभ ने ये किया,फ़लाने ने वो किया,इस फ़िल्म मे वो हुआ,उस फ़िल्म मे वो हुआ?तो मेरा सलीम भाई से ये सवाल है कि जो कूछ् गलत हुआ तो उस गलती को जारी रखने की इज़ाज़त दिया जाना सही है या उस गलती को सुधारने की कोशिश करना?दुसरा सवाल ये है कि क्या एक फ़िल्म के गाने के बोल को लेकर मुसलमानो ने उस गीत को इस्लाम के खिलाफ़ करार देकर बोल बदलवाये थे,तो क्या वो सही था?अगर वो सही था तो मै क्यों गलत हूं?
अब सवाल ये उठता है कि आखिर क्या वज़ह थी कि मैने ऐसे विषय प लिखना ज़रूरी समझा जो किसी विवाद को जन्म दे सकती है?मुझे इस ब्लाग की दुनिया मे आये ज्यादा नही डेढ साल तो हो ही गये हैं।मैने इस दौरान कभी विवाद मे पडने की बजाय,चुपचाप अपनी बात सामने रखना ज़रूरी समझा और अभी तक़ वही करता आ रहा हूं।गंणेश जी को ग़ज़नी के आमिर खान का रुप देना उतना महत्व्पूर्ण सवाल नही था जितना उसकी आड़ मे आग लगाने वालो के मंसूबों को रोकने का था।
छत्तीसग़ढ मूल रूप से शांति का टापू कहलाता है और यंहा की शांति भंग करने की कई बार कोशिश हूई है।हर बार असफ़ल रहने के बावज़ूद विघ्नसंतोषी लोग फ़िर सक्रिय हैं और इस बार भी काफ़ी समय से यंहा की साम्प्रदायिक सद्भाव की हवा को ज़हरीली करने की साजिश रची जा रही है।कुछ समय पहले एक थियेटर के पास तालाब के किनारे बेंच के नीचे सुतली बम फ़ोडकर हवा खराब करने की कोशिश हुई थी।अभी इसी सप्ताह भाजपा कार्यालय के पास खड़ी एक बस मे सुतली बम फ़ोड़कर फ़िर कोशिश की गई।उसके बाद गणेश जी निशाने पर थे और उनकी आड लेकर फ़साद फ़ैलाने की कोशिश हुई।और अब टाटीबंध ईलाके के काशी विश्वनाथ मंदिर मे एक बछ्ड़े का सिर और टांग काट कर फ़ेका गया।ये भी उसी साजिश का हिस्सा है सलीम भाई।
अगर मेरे शहर मे आग लगेगी तो जलूंगा मै और मेरे भाई लोग्।सबकी चिता की राख पर रोने वाले रूदाली लोग उसकी आंच पर अपनी राजनैतिक रोटी सेकेंगे।उस समय किसी को बचाने के लिये कथित धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार और कथित मानवाधिकारवादी नही होंगे।बाद मे हम अपने हाथ देखेंगे तो उस पर लगे खून के निशान हम तमाम उम्र जीने नही देंगे।तब मुझे सत्तार उर्फ़ रज़्ज़ू जो हमारे लिये राजेन्द्र है माफ़ नही करेगा?उसकी बहन मेरी कलाई पर राखी बांधने से पहले मेरा हाथ काट लेने को सोचेगी।मै ये सब कहानी किस्से नही गढ रहा हूं।कभी भी आना रायपुर की मौधापारा मस्ज़िद के ठीक सामने रहता है आप लोगो का सत्तार।उसके घर जाकर आवाज़ लगाना राजेन्द्र ,राजेन्द्र। अगर अम्मा घर पर हुई तो अन्दर से ही कहेगी नही है बेटा राजेन्द्र घर पर्।सभी पाठको से क्षमा चाह्ते हुये कि इस घटिया मामले पर मैने पोस्ट क्यो लिख दी।दरअसल लिखना ज़रूरी था।सलीम भाई,उस मंदिर की तस्वीरे भी मेरे पास है लेकिन मै पोस्ट पर नही लगा रहा हूं,आपको विश्वास न आये तो कमेण्ट कर देना मै आपको मेल कर दूंगा।फ़िर से एक बार मुझको यारो माफ़ करना,मै गुस्से मे हूं।