है कोई जो बता सके।ये सवाल हवा-हवाई नही बल्कि हक़ीक़त है।आज भी लोगों को दूसरे ज़िले से गैस सिलेण्डर मंगवाना पडता है।कलेक्टर का इस मामले मासूम सा जवाब है कि ज़ल्द ही कोई उपाय ढूंढ लेंगे। क्या कहा पहेली कठीन है?हिंत दे देता हूं।ये विचित्र किंतु सत्य गरीब लोगों की अमीर धरती का ही है।छत्तीसगढ का एक ज़िला ऐसा भी है जंहा एक भी गैस एजेंसी नही हैं।मुझे भी आज ही पता चला इस कडुवी सच्चाई का।क्या तरक़्क़ी का दावा करेंगे।ज़िला मुख्यालय का ये हाल है तो तहसिलो का आलम क्या होगा।भुक्तभोगियों के अलावा और शायद ही किसी को पता होगा,ऐसा मेरा अनुमान है। हो सकता है मैं गलत साबित हो जाऊ क्योंकी आजकल छत्तीसगढ सुर्खिया काफ़ी बटोर रहा है।चलिये जाने दिजिये मै ही बता देता हूं।वो ज़िला है बस्तर संभाग का नक्सल प्रभावित ज़िला बीजापुर्।ये हाल है । मगर मेरी हिम्मत देखिये मै फ़िर भी कहने से नही चूकूंगा्।
न धनिया न धान,
चुल्हे मे गया जनकल्यांण,
रोज़ मर रहे हैं जवान,
पलायन कर रहा किसान,
नेता हो रहे धनवान,
नशे मे द्युत नौजवान,
फ़िर भी मेरा छत्तीसगढ महान्।