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Tuesday, August 25, 2009

चाहे पूरी दुनिया को छुट्टी दे देना भगवान मगर मेरे घर की कामवालियों को छुट्टी मत देना

कल से घर मे तनाव सा लग रहा था जो आज सुबह होते-होते बढ गया।दोनो भाईयों के कमरे से आवाज़े बाहर आ रही थी।आई(माताजी)घर पर नही है इसलिये होगा शायद। ऐसा मैना सोचा, मगर मामला दूसरा ही निकला।मैने भाईयों से पूछा क्या बात है? तो दोनो ने एक ही जवाब दिया,हे भगवान चाहे पूरी दुनिया को छुट्टी दे देना, मगर घर की कामवालियों को छुट्टी मत देना ! दरअसल घर की दोनो कामवालिया त्योहार के कारण छुट्टी पर चली गई थी और दोनो बहुओं को बहुत दिनो बाद घर का काम करना पड़ रहा था!रविवार को छुट्टी का दिन होने के कारण इस आपात कालिन परिस्थिति का दुष्प्रभाव साफ़-साफ़ नज़र नही आया मगर कल से इसके संकेत मिलने शुरू हो गये थे।उन संकेतों को भांपने मे हम असांसारिक टाईप के मनुष्य से गलती हो गई मगर आज तो स्थति विस्फ़ोटक होती नज़र आई।

कल भी सुबह-सुबह दोनो भाईयों को एक एक करके अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते देखा था।ये ड्यूटी उन लोगो की नही है मगर मैने सोचा शायद पेरेण्ट्स मीट वैगेरह कुछ हो सकता है मगर आज फ़िर दोनो को जाते देखा तो अरहर की दाल उडद की दाल नज़र आई।इससे पहले मुझे डाऊट का कीड़ा परेशान करता दोनो के कमरे से आवाज़ बाहर आने लगी।ऐसा कभी होता नही था।फ़िर मैने सोचा की आई के ठाणे प्रवास पर होने के कारण घर मे आज़ादी का जश्न मनाया जा रहा हो।थोडी देर बाद किचन से भी खड-खड,खुड-खुड की आवाज़े तेज़ होने लगी।

तब तक़ चाय का इंतज़ार करते-करते थक़ चुका एक भाई उठा और थोडी देर बाद सबके लिये चाय लेकर आया।मैने उससे पुछा कुछ गड़बड़ है क्या?वो बोला जानो दो भैया आपको समझ नही आयेगा।मेरा दिमाग सरक गया।जिसे देखो वही कह देता है जाने दो भैया आपकी समझ मे नही आयेगा,आपके काम की चीज़ नही है।मैने उससे कड़क कर कहा कि क्या तुम लोग ही समझदार हो?अरे भैया आप बेमतलब नाराज़ हो रहे हैं,घरेलू प्राब्लम है?तो ?क्या मैं जंगल मे रहता हूं?घर से मेरा कोई लेना-देना नही है?

आप भी ना भैया बस्।क्या बस?अरे दोनो काम कर रही हैं इस्लिये चाय बनाने मे टाईम लगता सो मै खुद बना कर ले आया।मै तो अक्सर चाय बनाता हूं।आप तो जानते ही है खाना बनाने का भी शौक है मुझे।मुझे क्या तुम लोग मूर्ख समझते हो।अरे यार तू समझा। मामला छोटे पर टाल कर मंझला चाय पीने मे व्यस्त हो गया। अब छोटे ने अपना नम्बर आते देखा तो सीधे मुद्दे की बात पर आ गया।वो बोला आप घर पर ज्यादा समय रहते नही हो इसलिये………………मैने बात को काटते हुये कहा लम्बा मत खींच, समझे।बता तो रहा हूं।अपने यंहा की दोनो कामवालियां काम पर नही आ रही …तो?मैने बात कर कहा!उसने कहा यही तो मुसीबत की जड़ है।आई है नही सुबह झाड़ू पोछा से लकर रात के बरतन दोनो को साफ़ करना पड़ रहा है।फ़िर गणपति भी बैठे हैं।उनके लिये नैवेद्य भी बनाना पड़ रहा है और उसीके साथ सब्की चाय और नाश्ता,उसीके साथ -साथ बच्चों को तैयार करके स्कूल छोडना………मैने फ़िर उसे टोका,तो?क्या दुसरो के घर मे ये सब नही होता।वो बोला होता है लेकिन सब काम की टाईमिंग एक हो जाने के कारण गड़बड़ हो गई है।

मैने कहा तो इसमे चीड़-चीड़ करने की क्या बात है।वो बोला शादी कर लो फ़िर सब समझ मे आ जायेगा।मै बोला अब तू सीखायेगा?वो बोला सिखा नही रहा भैया,आप समझना ही नही चाह रहे हैं।काम करने की वजह से नही चीडचीडा रही है दोनो,सब काम सुबह एक साथ करना पर रहा है इसलिये टाईम मैनेजमेण्ट का प्राब्लम आ रहा है।बच्चो को ही देखो हम लोग छोड़ने जा रहे हैं।उनका रिक्शेवाला भी त्योहार मना रहा है।मैने उससे कहा कि तू तो ऐसे बता रहा कि सिर्फ़ अपने ही घर मे काम है?वो बोला सभी घरों मे ये हालत है आपसे इस टापिक कोई बात नही करता होगा इसलिये आपको पता नही ।मै बोला क्यों बात नही करेगा कोई?शादी कर लो फ़िर सब बात्…………मै बोला चल निकल तू।

वो शायद इसी डायलाग का इंतज़ार कर रहा था।पलक झपकते ही वो वंहा से खिसक लिया।दोनो बहयें तब तक़ दोनो भाईयों को सुना रही थी एक तो आई घर पर नही है ऊपर से काम वालियां पता नही कंहा मर गई है और आप लोगों को भी पूछने की फ़ुर्सत नही की किसी काम मे हाथ बटा दूं।मैने इस घरेलू समस्या के सर्वव्यापक होने की पुष्टि करने केलिये फ़ोन खड़खड़ाना शुरू किया।एक के बाद एक सभी ने कहा हमारे घर मे भी यही हाल है।सबका कहना वही था जो मेरे भाईयों ने कहा ,हे भगवान सबको छुट्टी देना मगर घर की कामवालियों को नही।

Sunday, June 21, 2009

तक़दीर वाला है यार वो, अपने नसीब मे ये सुख कंहा!

तक़दीर वाला है यार वो, अपने नसीब मे ये सुख कंहा!रात सब इक्कट्ठा हुये तो एक साथी बोला।मैने कहा क्या बात है।वो बोला महाराज आपके मतलब की बात नही है।मैने कहा तक़दीर और सुख,ये दोनो मेरे मतलब के नही है,ये क्या बकवास है।सब हंस पड़े बोले महाराज जाके पांव न फ़ंटी………वो सब मै जानता हूं डायरेक्ट बोलो डायरेक्ट,समझे।

और फ़िर जो बात सामने आई,मै सर पीट कर रह गया।तक़दीर वाला यार इसलिये अचानक तक़दीर वाला हो गया क्योंकी उसकी बीबी मायके चली गई थी,वो भी पूरे एक महिने के लिये।बस इसिलिये वो उसकी तक़दीर जाग गई थी सबकी नज़र में।मैने पूछा चलो मान लिया कि वो तक़दीर वाला है मगर अपने नसीब को तुम लोग क्यों कोस रहे हो।वो बोला काहे खाज़ को और खुजला रहे हो।मैने कहा नही क्लियर तो करना पड़ेगा। अबे यार तू पहले शादी कर ,फ़िर सब खुद ही समझ जायेगा।इस बार मैने भी पलट कर जवाब दिया कैंसर का इलाज करने के लिये कैंसर का मरीज तो नही होना पड़ता है ना।सारे के सारे एक साथ बोले काहे सब का मूड खराब कर रहा है,उसकी आज़ादी का जश्न मनाने चल रहे हैं उसके घर,वंही उससे पूछ लेना,वही बतायेगा तो ज्यादा ठीक रहेगा।

सब अपने दोस्त के घर पंहुचे।चोरी छुपे सिर्फ़ कम खुश्बू(बदबू कहुंगा तो सारे नाराज़ हो जायेंगे)वाली वोद्का के दो पैग मार कर दो बड़े-बड़े खुश्बुदार पान चबा कर घंटो इधर-उधर मटरगश्ती करने के बाद घर जाने वाला पहले से ही टुन्न हुआ बैठा है।मै हैरान था।मैने कहा महाराज क्या बात है आज तो गाड़ी फ़ुल स्पीड मे चल रही है।उसने ज़ोर से ठहाका लगाया और कहा आज स्पीड ब्रेकर भी तो नही है।आज अपुन आज़ाद हैं।इस्लिये तो घर पर ही जश्न मना रहे है।नही तो आप को मालूम ही है हाल हमारा। बीबी जी रहती है तो घर मे सरकार तो उन्ही की चलती है ना।तब यंहा पीना तो दूर पीकर आने से पहले कई बार सोचना पड़ता था।अबे ला बे,प्लेट-व्लेट,गिलास-फ़िलास ला।ज़ल्दि लाना बे,तेरी मालकिन का राज नही है समझा।सब हंसे बोले बहुत अकड़ के आर्डर दे रहे हो महाराज।ये स्टाइल तो सिर्फ़ दफ़्तर मे ही दिखाते थे। यंहा कभी-कभी मौका मिलता है।सब साले मैडम के चम्मच है हरामखोर महीने भर मे सब को ठीक कर दूंगा, अबे ला बे,मर गया क्या साले।

नौकर दौड़ता-गिरता-पड़ता सेवा मे लग गया।सबने पूछा देखा बे है ना अपना भाई तक़दीर वाला। अब महीने भर जब जिसको जी चाहे बिना पासपोर्ट और वीज़ा के यंहा आ सकता है।नो चेक पोस्ट,नो बैरियर,समझे।मैने कहा,वो तो मै देख ही रहा हूं।मगर तुम लोग की किस्मत क्या फ़ूटी हुई है जो रो रहे थे?अबे कभी जाते देखा है महिने भर के लिये मेरी बीबी को मायके।तो क्या हुआ? तू थोड़ा कम दिनों के लिये खुश होता होगा।अबे मूर्ख,तू तो जानता है ना मेरा ससुराल लोकल है।तो?तो क्या बे, सुबह जाती है मेरे दफ़्तर जाने के बाद और शाम को लौट आती है मेरे दफ़्तर से आने से पहले।क्यों?अबे ये भी क्या मैं बताऊं?तू तो आते जाते रहता है ना,देखा नही है क्या हमारे घर की कामवालियों को।वो अनुपमा नही बे?वो सब समझती है?वो नही चाहती है नज़र चुकी और एक और शाईनी तैयार्।

मै बोला साले कमीनो!अगर भाभी तुम लोगो पर नज़र रखती है तो किस्मत खोटी कहते हो। और मायके चली जाये तो खुद को आज़ाद कहते हो!इतना ही कष्ट था तो शादी ही क्यों की बे?इस बार डाक्टर बोला इसिलिये तो कह रहे है बे तू भी कर के देख ले।सब समझ मे आ जायेगा,लेकिन तेरी तो पहले से…अबे चुप।इसमे मेरी शादी का मामला कंहा से घुस आया।बेटा ये जो टांय-टांय करता रहता है न चौबीस घण्टे सब बंद हो जायेगा।बोलती बंद हो जाती है अच्छे अच्छों की।और घर जाने की हड़बड़ी करने वालो को जो तू कहता है ना अपन तो भैया जब मर्ज़ी तब घर जाते हैं किसी से डरते नही,ये डायलाग भूल जायेगा।साले हम तो ग्यारह बज़े तक़ टाईम निकाल लेते है तू तो दस बज़े भाग जायेगा।मैने कहा अबे मै तुम लोगो जैसा डरपोक नही हूं। अबे शुरू-शुरु मे सब भागते है घर की ओर बाद मे सब गीदड़ हो जाते हैं।

तभी महीने भर के लिये आज़ाद हुये साथी ने कहा यार ये किच-किच सुन कर तो ऐसा लग रहा है कि मेरी कोकिला घर पर ही है।अगर तुम लोगों को यही बकवास करके मुझे मैडम के डरावने सपने ही दिखाना है तो मुझे माफ़ करो मै अकेला ही पी लूंगा और जंहा चाहे लुड़क जाऊंगा।फ़िलहाल कोई प्राब्लम नही है।सब ने एक स्वर मे कहा इस मामले मे अब सिर्फ़ वही बात करेगा जिसकी शादी हो चुकी हो।फ़ाल्तू लोगों को इस सेंसेटिव्ह टापिक पर बात करने का कोई हक़ नही है।ये हुई ना बात।सब एक साथ चिल्लाये।अबे कंहा मर गया ज़ल्दी ला वीकनैस लग रही है,ला हमारा इलेक्ट्रोलाईट तो ला।मै सोच रहा था कि क्या वाकई बीबी का मायके जाना आज़ादी से कम नही होता।