Showing posts with label शराब. Show all posts
Showing posts with label शराब. Show all posts

Friday, March 26, 2010

जो दवा के नाम पे ज़हर दे?

इस देश मे नियम बनने के पहले ही उसके तोड़ ढूंढ लिये जाते हैं।और उसी तोड़ की आड़ मे बड़े-बड़े खेल किये जाते हैं मगर ये सब बड़े लोगों के लिये ही है,छोटे-मोटे लोग अगर वैसा कुछ ट्राई करते हैं तो तोड़ गायब और नियम सख्त हो जाते हैं।इसमे कोई शक़ नही जितना मज़ाक नियमों का इस देश मे उड़ाया जाता है उतना शायद ही कंही और उड़ाया जाता होगा।अब शराब को ही ले लिजिये।उसके विज्ञापन पर प्रतिबंध लगा हुआ है।तो क्या शराब का विज्ञापन नही होता इस देश में।शराब को सामाजिक बुराई और जाने क्या क्या कहा जाता है मगर जब बात रेवेन्यू की आती है तो सरकार खुद इसे बेचने का ठेका देती है और रहा सवाल उसके विज्ञापन पर प्रतिबंध का तो उसी नाम से दूसरे प्रोडक्ट का विज्ञापन कर दो कौन साला मना करेगा।मसलन हेवर्डस 5000 बीयर के नाम पर सोड़ा का विज्ञापन धड़ल्ले से दिखाया जा रहा है।इसी तरह मैक्डावल का सोड़ा और बीयर के लिये मशह्हूर ब्रांड किंगफ़िशर का ऐअरलाईन्स के नाम पर विज्ञापन दिखाया जा रहा है।सबको मालूम है कि किस नाम का सोड़ा बिकता है और किस नाम से बीयर।बेशर्मी की हद तो यंहा तक़ है कि आईपीएल की बेंगलूरू क्रिकेट टीम का नाम ही मशहूर शराब के ब्रांड रायल चैलेंज के नाम पर है।याने आपके पास रूपयों की ताक़त होना चाहिये,फ़िर आप जो चाहे दिखायें।चाहे तो दवा के नाम पर ज़हर का भी विज्ञापन दिखा दें।रोकने वाला है ही कौन्।समरथ को नही दोष गुसाईं।

Sunday, November 22, 2009

हे भगवान,अगले जनम मे तू मुझे सींधी या सरदार ही बनाना!अबे मुसलमान भी जोड ना,उसको क्यों छोड़ रहा है!

समीर लाल जी की एक पोस्ट ने और मेरी कल की पोस्ट पर शरद कोकास ने टिपण्णी ने मुझे ये पोस्ट लिखने पर मज़बूर कर दिया।समीर लाल जी की पोस्ट मे उनके सामने मदिरा का लबरेज़ समन्दर था और मेरे भतीजे को छुपा कर अंडा खिलाने पर थी वो पोस्ट थी जिस पर शरद जी ने कहा था कि अंडे का फ़ंडा तो बच्चे की समझ मे आ गया ,उसे क्या पता बड़े लोग छुप-छुप कर क्या करते हैं।वो बात सीधे-सीधे मेरे लिये ही थी।साफ़-साफ़ कहा जाये तो मेरे शराब पीने पर थी।बात बहुत ही खरी थी और इस बात से मैं और मेरे जैसे कुछ और भाई शुरू-शुरू मे बहुत परेशान रहते थे।उनमे से अधिकांश की शादी हो गई है और वे स्वतंत्र पारिवारिक इकाई भी बन गये है मगर वे परेशान आज भी रहते हैं।इस समस्या का हल,कालेज के और उसके बाद संघर्ष के दिनों मे खोजने की बहुत बार कोशिश हुई थी और एक बार नही कई बार ऐसे मौके आये जब इसका हल निकलता नज़र आया मगर उसका फ़ायदा तत्काल नही होने वाला था।

मुझे शरद भाई की बात बुरी नही लगी बल्कि उसने मुझे एक मज़ेदार किस्से को आपसे शेयर करने का मौका दे दिया।बुरा नही मानने वाली बात इसलिये कि मैं खुद ही कई बार बिना समझे निकल पड़ता हूं सिंग से निशाना लगाकर सिर नीचे किये हुये।खैर जाने दिजिये।हां तो मै क्या कह रहा था।हां बात कालेज के दिनो की है मदिरा,मैं मदिरा ही कहूंगा शराब नही,शराब थोड़ा चीप लगता है,तो हम लोगों ने उन दिनो छुप-छुप कर मदिरापान शुरू कर दिया था।कम्बाईन्ड स्टडी और हास्टल के कमरों मे धमा चौकडी भी होती थी और इसकी फ़्रिक्वेंसी भी क्लास बढने के साथ बढती चली गई।हास्टल मे इस लिये पीते थे कि वो पीने के बाद बस्साने(मदिरा का साईड इफ़ेक्ट,खुश्बू)के कारण पकड़ाने के रिस्क से बचाता था।मदिरा पान के बाद सब वंही सो जाते थे।

उन दिनो हास्टल मे सोकर उठ कर सुबह ज़ल्दी घर भागने की हड़बड़ी मे भी इस समस्या का बार-बार ज़िक्र होता था कि कब तक़ छुप-छुप कर मदिरा पान करना पडेगा?सब कालेज से विदा हो गये।घर से दूर एक और जो हमारा घर था हास्टल वो भी अब नही रहा था लेकिन मदिरा का प्रेम तो बढता जा रहा था।पीकर घर जाने से पहले घण्टो इधर-उधर भटकना,जाने से पहले बार-बार एक दूसरे को मुंह सुंघाना और पूछना देख तो भाई बता ना पता चल रहा है क्या?नही कहने पर फ़िर से एक बार चेक कर ले यार तू तो जानता है बाऊजी को डाऊट हुआ तो फ़टे तलक़ पडेगी।फ़िर से मुंह सुंघाना और घर जाने के बनते कोशिश की सीधे जाकर सो जाना या किसे से भी आमने सामने बात करने से बचना।अब क्या-क्या बताऊं इस मदिरा प्रेम मे क्या-क्या रिस्क नही उठाये ।

कालेज के बाद कुछ ने नौकरी पकड़ ली,कुछ ने नेतागिरी शुरू कर दी,कुछ व्यापार मे लग गये,कुछ ने वकालत शुरू कर दी और मैं एक अकेला पत्रकार हो गया।मदिरा अभी भी सबकी बिरादरी मे अपना महत्व बनाये हुये थी लेकिन हम दोस्तों मे अधिकांश के घर मे इसे वर्जित माना जाता था सिवाय बल्लू,दिलीप,लक्ष्मण,जिंदी,पाल या कह लिजिये सींधियों और सरदारों के।बल्लू तो घर मे डैड और बड़े भाई के साथ वो कभी-कभी बीयर पीकर अपने को कम पीने वाला साबित करता रहता था मगर दोस्तों के बीच टैंकर के नाम से मशहूर था।उसे घर मे कोई प्राब्लम नही थी मगर दोस्ती की खातिर वो भी हास्टल मे रुकता था।यही हाल दीलिप और लक्ष्मण का था,टीनू और टीटू चोपड़ा के भी घर मे ही बोतल खुला करती थी और उन सबकी बातें सुनकर और देखकर सिर्फ़ खून ही जला करता था।उनके यंहा परमीशन होने के बावज़ूद सभी अपनी नान-पीउ इमेज बनाने के चक्कर मे घर वालों की रिक्वेस्ट को मन मार कर ठुकराते थे।बारातों मे भी बिना पीये डांस नही करते थे लेकिन पीते तब भी छुपकर ही थे।
धीरे-धीरे सबका कोटा बढता जा रहा था और उसीके साथ घर मे पकड़ाने का रिस्क भी।

उन दिनो मेरे चाचा जी का एक मकान खाली पड़ा हुआ था उसे मैने काम्पिटिटिव एक्ज़ाम की तैयारियों के नाम पर ले लिया।अब तो सबकी निकल पड़ी थी।फ़िर से घर से दूर एक और घर वाले दिन आ गये थे और अब हास्टल के दिनो की तरह सुबह ज़ल्दी उठने के झंझट से भी फ़्री थे।शनिवार की रात की महफ़िल तो सच मे सैटर्डे नाईट फ़ीवर ही होती थी।इतवार की सुबह-सुबह ही कोई-कोई शुरू हो जाता था।

इस बीच दोस्तो की शादी होना भी शुरू हो गई थी।शकील ने तो एम एस सी फ़ायनल मे पढते हुये ही स्टेट बैंक की नौकरी लपक ली थी और बीच सेशन मे ही क्लास मे ही पढने वाली से शादी भी कर ली थी।जमकर हंगामा हुआ था,शहर मे तनाव भी बन गया था और सारे दोस्त घर मे हिट लिस्ट मे आ गये थे।तभी होटल मालिक सरदार बंटू की शादी तय हुई और बारात निकलने से पहले उससे पीने की व्यव्सथा होटल के कमरे मे करने के लिये कहा गया तो उसके छोटे भाई ने कहा क्या भैया बारात के साथ-साथ एक वैन मे स्टाक चलेगा,उसी मे पी लेना।तब कुछ दोस्तो ने उसे समझाया कि हम लोग सबके सामने नही पीते और अभी भी किसी को पता नही है कि हम लोग पीते हैं।तू बस इंतज़ाम ठीक-ठाक करवा देना।वो बोला इत्ते बड़े हो गये हो फ़िर भी।मैंने उससे कहा अबे तू वो कर जो कह रहें हैं।इत्ते क्या कित्ते भी बड़े हो जायें तो भी छुप कर ही पीना पड़ेगा शायद।
उसने मुझे हैरानी से देखा और पूछा ये क्या बात हुई।मैने कहा मेरे भाई हमारे घर मे शराब को बहुत खराब माना जाता है,समझा।जा भाग और देख इंतज़ाम बढिया होना चाहिये।वो चला गया और उसके बाद जब सब पीने बैठे तो उसकी बात फ़िर निकल आई।मैने कहा देखो यार छोटा भाई होकर क्या बढिया इंतज़ाम किया है,मैं अगर सुनील या सुशील को बोलूंगा तो पहले चिल्लायेगा आई देखो दादा क्या कह रहा है।साला ये जीना भी कोई जीना है।ये पीना भी कोई पीना है।कमरे मे छुप-छुप कर पी रहे हैं।पहले फ़ुल लोड़ होंगे तब तक़ बारात आधी दूर चली जायेगी।हमसे तो अच्छा वो छोटा भाई है मस्त डांस कर रहा होगा और थोड़ी-थोड़ी देर बाद पीछे जाकर सीप मार कर आ जाता होगा।मैने ठंड़ी सांस भरी तो लगा जैसे फ़ट्टू पीऊ गैंग़ रो पड़ेगी।शकील से लेकर चुन्नू तक़ एक सुर मे बोले सही कह रहा भाई तू।एकदम सही बात ये साला शराब को किसने खराब कह दिया उसका पता चले तो साले की वाट लगा देंगे।तब तक़ जिंदी बल्लू और दीलिप टनाटन ढकेल चुके थे।जिंदी बोला तो छुप कर पीते ही काहे को हो बे हमारे जैसे खुलकर पीओ और खुलक्र जीओ।इतना सुनकर मुझे गुस्सा तो बहुत आया मगर अपनी पोज़िशन ठीक नही थी सो मैनें सिर्फ़ एक ठड़ी आह भरी और कहा हे भगवान अगले जनम मे मुझे तू सींधी या सरदार ही बनाना।इससे पहले सब हंसते शकील और महमूद एक साथ बोले तो मुसलमान को क्यों छोड़ रहा है बेटा।मैने पूछा मुसलमानो के यंहा कंहा पीने की छूट है बे?तो दोनो बोले अबे तेरा क्या सिर्फ़ पीने का प्राब्लम है क्या?पढाई-लिखाई के नाम पर बचपन से घर मे मार खाते आया है।जब देखो तब बोलता था कि ये पढाई ज़िंदगी मे क्या काम आयेगी?तो?मैने सवाल किया।उन्होने कहा तो क्या बे,हम लोगो को देख कर नही बकता था तुन लोगो का ठीक है बे पढे तो ठीक नही पढे तो ठीक।कंही कबाडखाना खोल लिया नही तो कंही पंकचर बनाने बैठ गये।क्यों बोलता था ना।मै खामोश ही रहा।दोनो फ़िर बोले पीने के लिये सींधी बनेगा,सरदार बनेगा,व्यापार के लिये मारवाडी बनेगा,तो मुसलमान क्यों नही बनेगा बे।मै बोला अबे ढंग से इंसान बन जाये पहले फ़िर देखेंगे क्या बनना है।वो किस्सा आज भी सभी दोस्त दुहराते है और रात्रिकालीन सत्संग मे कभी पत्नी की लगातार काल से परेशान होकर इंडिपेंडेंट पति भी यही कहता है हे भगवान अगले जनम मे तू सींधी या सरदार ही बनाना।नोट ये पोस्ट किसी का दिल दुखाने या किसी को नीचा और ऊंचा दिखाने के लिये नही लिखी गई है।हां और एक खास बात ये सारी बातें सच है,झूठ ज़रा सा भी नही,ये भी नही कि मैं आज भी छुप-छुप कर ही पीता हूं।शहर मे गिनती के लोगों कोम पता है।शरद जी को इस लिये पता चल गया कि वो उस दिन साथ मे थे जब एक ब्लागर भाई के स्वागत मे हम दोस्तो ने मदिरा पार्टी दी थी और मैने बिना हिचक पहली बार मिल रहे भाईयों के सामने खुलकर पी ली थी।जिन दोस्तो को मेरी किसी भी बात का बुरा लगे एडवांस मे माफ़ी मांग रहा हूं उनसे क्योंकि ज़िंदगी मे सब कुछ है सिवाय प्यार के।सो प्यार बांटते चलो और पीते और जीते चलो।शरद भाई अगले जनम मे सींधी सरदार बना तो छुपकर नही पीऊंगा और अगर मुसलमान बना तो फ़िर मुश्किल है।वंहा भी शराब खराब ही नही मेरे खयाल से हराम भी है।तब तो शायद पीने ही नही मिलेगी।हा हा हा हा हा हा।समीर जी चीयर्स।

Friday, October 30, 2009

ये किसी मंदिर,धर्मस्थान या तीर्थस्थल का प्रवेश द्वार नही है,प्रेस क्लब है प्रेस क्लब्।

आज प्रेस क्लब पहुंचा तो काफ़ी भीड़ नज़र आई।मैं भी खुश हो गया कि चलो अपने भाई लोगों को प्रेस क्लब आ रहे प्रदेश के दो खिलाड़ियों का सम्मान करने की फ़ुरसत तो मिली।अंदर पहुंचा तो नज़ारा ही कुछ और था।नीचे के प्रेस कान्फ़्रेंस हाल के दरवाज़े पर जूतों का अंबार लगा था।मैं चौंक गया और पूछा क्या लफ़ड़ा है ये।बाहर खड़े साथियों ने बताया कि बाबा जी की प्रेस कांफ़्रेंस चल रही है।

ऐसा पहली बार देख रहा था मै कि किसी प्रेस कांफ़्रेंस मे पत्रकारों की फ़ौज़ बिना जुते के गई हो।वो तो पता नही था वर्ना बुश से लेकर चिदंबरम तक़ यंही प्रेस कांफ़्रेंस लेते और जूते की अनगाईडेड फ़्लाईट से बच जाते।खैर मैने पूछा कि ऐसे कौन से स्वामी जी आयें है जो सारे के सारे जूते उतार कर अंदर गये हैं।एक ने कहा कि भैया अहमदाबाद से आये है और उनका कहना है कि वे सभी दर्द,बीमारियों के साथ-साथ बुराईयों से भी मुक्ति दिला देंगे।मैने कहा कि चंगाई सभा का हिन्दूकरन हो रहा है क्या?वो बोला नही दादाबाड़ी मे है।मैने सभी साथियों ए पूछा कि प्रभूदीन है कि नही अंदर।सबने एक साथ कहा कि है भैया,आज वो भी अटैण्ड कर रहा है कांफ़्रेंस्।


आधा घण्टा चलने वाली कांफ़्रेंस एक घण्टे से ज्यादा चली।सभी तरह के सवाल हुये और दूसरों के बहाने अपनी तक़लीफ़ के निराकरण के उपाय भी पूछे गये।देर तक़ चलने के कारण दूसरे कार्यक्रम भी लेट होते चले गये।सबके बाहर आने के बाद मैने क्लब के सह सचिव दामू आम्बेडारे से पूछा कि तू क्या कर रहा था बे?तूझे क्या तक़लीफ़ है?साले तेरे कारण लोग तक़लीफ़ मे हैं,तेरे घर मे कलह होते होते बची है।तू अंदर क्या छुड़ावाने गया था?लंद-फ़ंद?अरे भैया आप भी ना,बस मेरे ऊपर ही डाऊट करते हो।तो,मैने कहा,और किस पर करूं,तू बता?ये आपका प्रभूदीन अंदर बैठ कर भी झूठ बोल रहा था।अब प्रभूदीन भड़क गया और बोला तू अपनी बात कर ना मेरे बारे मे क्यों बोल रहा है।खुद तो साले झूठ बोल रहा था।मै बोला कौन क्या झूठ बोला दोनो बताओ।दामू बोला स्वामी जी ने जब पूछा कि कौन कौन शराब पीता है तो ये चुप था,इसने हाथ खड़ा नही किया।और तू साले,ये रोज़ कभी-कभी क्या होता है बे?हैं,पीता रोज़ है और बता रहा था कभी-कभी।दोनो फ़िर उलझने लगे तो मैने टापिक बदला कुछ फ़ायदा-वायदा होगा बाबाजी से।


अब दामू ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा और प्रभूदीन की ओर देख कर बोला, बताऊं?बता ना मै क्या किया?कोई पाप थोड़े ही किया है।मै बोला बता दामू बता डर मत्।वो बोला भैया जब स्वामी जी बोले जिसको जंहा तक़लीफ़ हो वंहा हाथ रख कर बैठिये।तो,ये पेट पर और सर पर हाथ रख कर बैठा था।प्रभूदीन बोला और तू बे,तू भी तो अपनी टांग पर हाथ रख नही बैठा था।दोनो मे फ़िर तक़रार शुरू हो गई थी।इस बीच बाकी बोले भैया सभी कंही न कंही हाथ रख कर बैठे थे और जब स्वामी जी ने पूछा कि अब कैसा महसूस कर रहे हैं,तो सभी बोले ठीक लग रहा है,सुधार हो रहा है।अब मै बोला अच्छा हुआ स्वामी जी एक घण्टे मे चले गये वर्ना तुम लोग तो सालों कुत्ते की दुम से भी टेढे हो,तुम लोग तो सुधरते नही बल्कि स्वामी जी के बिगड़ जाने का खतरा ज्यादा था।सब एक साथ बोले सही बोले रहे हो भैया और हा हा ही ही का दौर शुरू हुआ जिस पर मैने विराम लगाया और खिलाड़ियों के सम्मान के कार्यक्रम मे सब लग गये।

Sunday, June 21, 2009

तक़दीर वाला है यार वो, अपने नसीब मे ये सुख कंहा!

तक़दीर वाला है यार वो, अपने नसीब मे ये सुख कंहा!रात सब इक्कट्ठा हुये तो एक साथी बोला।मैने कहा क्या बात है।वो बोला महाराज आपके मतलब की बात नही है।मैने कहा तक़दीर और सुख,ये दोनो मेरे मतलब के नही है,ये क्या बकवास है।सब हंस पड़े बोले महाराज जाके पांव न फ़ंटी………वो सब मै जानता हूं डायरेक्ट बोलो डायरेक्ट,समझे।

और फ़िर जो बात सामने आई,मै सर पीट कर रह गया।तक़दीर वाला यार इसलिये अचानक तक़दीर वाला हो गया क्योंकी उसकी बीबी मायके चली गई थी,वो भी पूरे एक महिने के लिये।बस इसिलिये वो उसकी तक़दीर जाग गई थी सबकी नज़र में।मैने पूछा चलो मान लिया कि वो तक़दीर वाला है मगर अपने नसीब को तुम लोग क्यों कोस रहे हो।वो बोला काहे खाज़ को और खुजला रहे हो।मैने कहा नही क्लियर तो करना पड़ेगा। अबे यार तू पहले शादी कर ,फ़िर सब खुद ही समझ जायेगा।इस बार मैने भी पलट कर जवाब दिया कैंसर का इलाज करने के लिये कैंसर का मरीज तो नही होना पड़ता है ना।सारे के सारे एक साथ बोले काहे सब का मूड खराब कर रहा है,उसकी आज़ादी का जश्न मनाने चल रहे हैं उसके घर,वंही उससे पूछ लेना,वही बतायेगा तो ज्यादा ठीक रहेगा।

सब अपने दोस्त के घर पंहुचे।चोरी छुपे सिर्फ़ कम खुश्बू(बदबू कहुंगा तो सारे नाराज़ हो जायेंगे)वाली वोद्का के दो पैग मार कर दो बड़े-बड़े खुश्बुदार पान चबा कर घंटो इधर-उधर मटरगश्ती करने के बाद घर जाने वाला पहले से ही टुन्न हुआ बैठा है।मै हैरान था।मैने कहा महाराज क्या बात है आज तो गाड़ी फ़ुल स्पीड मे चल रही है।उसने ज़ोर से ठहाका लगाया और कहा आज स्पीड ब्रेकर भी तो नही है।आज अपुन आज़ाद हैं।इस्लिये तो घर पर ही जश्न मना रहे है।नही तो आप को मालूम ही है हाल हमारा। बीबी जी रहती है तो घर मे सरकार तो उन्ही की चलती है ना।तब यंहा पीना तो दूर पीकर आने से पहले कई बार सोचना पड़ता था।अबे ला बे,प्लेट-व्लेट,गिलास-फ़िलास ला।ज़ल्दि लाना बे,तेरी मालकिन का राज नही है समझा।सब हंसे बोले बहुत अकड़ के आर्डर दे रहे हो महाराज।ये स्टाइल तो सिर्फ़ दफ़्तर मे ही दिखाते थे। यंहा कभी-कभी मौका मिलता है।सब साले मैडम के चम्मच है हरामखोर महीने भर मे सब को ठीक कर दूंगा, अबे ला बे,मर गया क्या साले।

नौकर दौड़ता-गिरता-पड़ता सेवा मे लग गया।सबने पूछा देखा बे है ना अपना भाई तक़दीर वाला। अब महीने भर जब जिसको जी चाहे बिना पासपोर्ट और वीज़ा के यंहा आ सकता है।नो चेक पोस्ट,नो बैरियर,समझे।मैने कहा,वो तो मै देख ही रहा हूं।मगर तुम लोग की किस्मत क्या फ़ूटी हुई है जो रो रहे थे?अबे कभी जाते देखा है महिने भर के लिये मेरी बीबी को मायके।तो क्या हुआ? तू थोड़ा कम दिनों के लिये खुश होता होगा।अबे मूर्ख,तू तो जानता है ना मेरा ससुराल लोकल है।तो?तो क्या बे, सुबह जाती है मेरे दफ़्तर जाने के बाद और शाम को लौट आती है मेरे दफ़्तर से आने से पहले।क्यों?अबे ये भी क्या मैं बताऊं?तू तो आते जाते रहता है ना,देखा नही है क्या हमारे घर की कामवालियों को।वो अनुपमा नही बे?वो सब समझती है?वो नही चाहती है नज़र चुकी और एक और शाईनी तैयार्।

मै बोला साले कमीनो!अगर भाभी तुम लोगो पर नज़र रखती है तो किस्मत खोटी कहते हो। और मायके चली जाये तो खुद को आज़ाद कहते हो!इतना ही कष्ट था तो शादी ही क्यों की बे?इस बार डाक्टर बोला इसिलिये तो कह रहे है बे तू भी कर के देख ले।सब समझ मे आ जायेगा,लेकिन तेरी तो पहले से…अबे चुप।इसमे मेरी शादी का मामला कंहा से घुस आया।बेटा ये जो टांय-टांय करता रहता है न चौबीस घण्टे सब बंद हो जायेगा।बोलती बंद हो जाती है अच्छे अच्छों की।और घर जाने की हड़बड़ी करने वालो को जो तू कहता है ना अपन तो भैया जब मर्ज़ी तब घर जाते हैं किसी से डरते नही,ये डायलाग भूल जायेगा।साले हम तो ग्यारह बज़े तक़ टाईम निकाल लेते है तू तो दस बज़े भाग जायेगा।मैने कहा अबे मै तुम लोगो जैसा डरपोक नही हूं। अबे शुरू-शुरु मे सब भागते है घर की ओर बाद मे सब गीदड़ हो जाते हैं।

तभी महीने भर के लिये आज़ाद हुये साथी ने कहा यार ये किच-किच सुन कर तो ऐसा लग रहा है कि मेरी कोकिला घर पर ही है।अगर तुम लोगों को यही बकवास करके मुझे मैडम के डरावने सपने ही दिखाना है तो मुझे माफ़ करो मै अकेला ही पी लूंगा और जंहा चाहे लुड़क जाऊंगा।फ़िलहाल कोई प्राब्लम नही है।सब ने एक स्वर मे कहा इस मामले मे अब सिर्फ़ वही बात करेगा जिसकी शादी हो चुकी हो।फ़ाल्तू लोगों को इस सेंसेटिव्ह टापिक पर बात करने का कोई हक़ नही है।ये हुई ना बात।सब एक साथ चिल्लाये।अबे कंहा मर गया ज़ल्दी ला वीकनैस लग रही है,ला हमारा इलेक्ट्रोलाईट तो ला।मै सोच रहा था कि क्या वाकई बीबी का मायके जाना आज़ादी से कम नही होता।