हैरान हैं न आप सब। लेकिन ये सच है और ऐसा हुआ इतवार को अंग्रेजी दैनिक हितवाद के नए भवन के लोकार्पण समारोह में। सारे अतिथि नेता जब बोले तो ऐसा लगा कि देश में हितवाद के अलावा सच्चाई की राह पर चलने वाला और कोई अख़बार है ही नहीं। जिस शिद्दत से नेता हितवाद की तारीफ कर रहे थे, ऐसा लग रहा था कि इतनी तारीफ तो पत्रकार भी नेताओं की नहीं करते।
अंग्रेजी दैनिक हितवाद छत्तीसगढ़ में 8 साल पूरे कर रहा है और इन 8 सालों में उसने अपना भवन और अपनी प्रिंटिंग युनिट लगा ली। उससे पहले वो किराए के भवन में चल रहा था और दूसरे अख़बार की मशीन पर छप रहा था। सो हितवाद ने अपने लिए ऐतिहासिक इस समारोह को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के साथ-साथ कई बार केन्द्रीय मंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल को भी बुलाया। वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल और लोक स्वास्थ्य मंत्री केदार कश्यप भी विशिष्ट अतिथि थे। कुछ मंत्री पहुँच नहीं पाए। वैसे अतिथियों की लिस्ट काफी लंबी थी।
अपने अख़बार हितवाद की तारीफ करने में बनवारी लाल पुरोहित ने कोई कसर नहीं छोड़ी। ये उनका कर्तव्य भी था और अधिकार भी। लेकिन उसके बाद जो हितवाद की तारीफ का सिलसिला शुरू हुआ वो मक्खन बाजी की प्रतियोगिता जीतने की होड़ भी नज़र आई। हालाकि वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल बोलते-बोलते अख़बार को सेवा नहीं व्यापार कहने से नहीं चुके, लेकिन उसके साथ ही तत्काल ये भी कह दिया कि हितवाद एक अपवाद है।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण षुक्ल के तो हितवाद के परिवार से नागपुर से ही संबंध रहे हैं। उनके पिता स्वर्गीय पंडित रविशंकर शुक्ल सीपी एण्ड बरार के मुख्यमंत्री रहे हैं। इस बात का उल्लेख पुरोहित जी ने किया, तो विद्याचरण शुक्ल अपने पुराने संबंधों की खातिर हितवाद को ईमानदारी की राह पर चलने वाला एकमात्र अख़बार बता दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजों के खिलाफ जनता की आवाज़ उठाने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वो आज भी जारी है। धन्य हो शुक्ल जी। शुक्ल जी और तारीफ करते लेकिन उन्हें कहीं जाना था, सो मुख्यमंत्री से पहले बोलकर और इस बात के लिए क्षमा माँगकर अपने चेले-चपाटे के साथ निकल लिए।
लोक स्वास्थ्य मंत्री केदार कश्यप ने विद्याचरण शुक्ल को हितवाद की तारीफ करने में भरपूर टक्कर दी। उन्होंने तो यहाँ तक कह डाला कि वे अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए नियमित रूप से हितवाद पढ़ते हैं। वाह! ग़जब कर दिया गुरू। टाईम्स वाले हो सकता है अब हितवाद पढ़कर अंग्रेजी लिखें। तेज तर्रार वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने जब बोलना शुरू किया, तो ऐसा ज़रूर लगा कि अब हितवाद पुराण खत्म हुआ। उन्होंने पत्रकार और पत्रकारिता पर सीधे वार किया। उन्होंने कहा निगेटिव ख़बरें छापकर अख़बार समाज में निराशा फैला रहा है। सिर्फ स्याह पक्ष ही नहीं होता छापने के लिए, उजला पक्ष भी छापा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाज़ार वाद के इस दौर में अख़बार अब सेवा का माध्यम नहीं रहे, बल्कि विशुध्द रूप से व्यावसाय में बदल गए हैं। यहाँ तक ठीक था मगर ये क्या ? बृजमोहन जी भी अचानक कल्टी मार गए। वो भी चल पड़े पूर्व वक्ताओं की राह पर। तत्काल कहा कि हितवाद इसका अपवाद है। हितवाद हमेशा ईमानदारी से सच्चाई की राह पर चलता रहा है। आयें! ये क्या हो गया भैय्या। पहले तो कानों पे विश्वास ही नहीं हुआ, फिर बृजमोहन जी को उसी स्पीड से हितवाद पुराण वाचते देखा तो समझ में आया कि वे मक्खनबाजी में अपने से जूनियर केदार कश्यप से पीछे नहीं रहना चाहते थे।
आखिर में बोले डॉ. साहब! यानि मुख्यमंत्री रमन सिंह। उनको बुलाने के लिए जब उद्धोषक ने बोलना शुरू किया तो ऐसा लगा कि उनकी पार्टी का, उन्हीं के गुट का और उन्हीं के परिवार का सदस्य बोल रहा हो। आ.. हा .. हा ! देश के सबसे सफल मुख्यमंत्री, यहाँ तक तो ठीक था देश के सबसे खुबसूरत मुख्यमंत्री ! अब बताईए भला, है न रिकॉर्ड तोड़ मक्खनबाजी। खैर मुख्यमंत्री भी भला कैसे हार मान लेते पत्रकारों से, और अपने से पहले मक्खनबाजी में रिकॉर्ड बना चुके वक्ताओं से। वे तो नेता ही नहीं डॉक्टर भी हैं और समय की नब्ज़ अच्छी तरह जानते हैं। सो उन्होंने भी हितवाद को देश का एकमात्र ईमानदार और सच्चा अख़बार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
और क्या बताएँ आपको हितवाद पुराण। एक से बढ़कर एक महारथी, पूरी दमदारी और ईमानदारी से मक्खनबाजी में उन पत्रकारों को बीट कर गए, जो रोज उनको सरकार बढ़िया चल रही है कहकर मक्खन लगाने में वर्ल्ड रिकॉर्ड बना चुके हैं। हालाकि कुछ असंतुष्ट टाईप के पत्रकारों ने, जिनके हाथ थोड़े छोटे हैं और जिनके पास मक्खन थोड़ा कम हैं, मुझसे प्रोटेस्ट ज़रूर किया। मैं भी क्या कर सकता था ? सुनना और वो भी झूठ सुनना, अब लगता है अपनी डयूटी में शामिल हो गया है। नहीं जाओ तो विरोधी ठहरा दिए जाते हैं और जाओ तो चुप रहा नहीं जाता। अब लिख मारा है ब्लॉग में अगर किसी ने पढ़ लिया तो वो हरिराम (शोले फिल्म के जेलर का ख़बरी) ज़रूर हितवाद वालों को बता देगा। थोड़ी बहुत गुंजाइश एमरजेंसी में नौकरी की बची होगी तो वो भी खत्म। अब तो सिर्फ यही कहा जा सकता है जाने भी दो यारों।
अंग्रेजी दैनिक हितवाद छत्तीसगढ़ में 8 साल पूरे कर रहा है और इन 8 सालों में उसने अपना भवन और अपनी प्रिंटिंग युनिट लगा ली। उससे पहले वो किराए के भवन में चल रहा था और दूसरे अख़बार की मशीन पर छप रहा था। सो हितवाद ने अपने लिए ऐतिहासिक इस समारोह को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के साथ-साथ कई बार केन्द्रीय मंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल को भी बुलाया। वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल और लोक स्वास्थ्य मंत्री केदार कश्यप भी विशिष्ट अतिथि थे। कुछ मंत्री पहुँच नहीं पाए। वैसे अतिथियों की लिस्ट काफी लंबी थी।
अपने अख़बार हितवाद की तारीफ करने में बनवारी लाल पुरोहित ने कोई कसर नहीं छोड़ी। ये उनका कर्तव्य भी था और अधिकार भी। लेकिन उसके बाद जो हितवाद की तारीफ का सिलसिला शुरू हुआ वो मक्खन बाजी की प्रतियोगिता जीतने की होड़ भी नज़र आई। हालाकि वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल बोलते-बोलते अख़बार को सेवा नहीं व्यापार कहने से नहीं चुके, लेकिन उसके साथ ही तत्काल ये भी कह दिया कि हितवाद एक अपवाद है।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण षुक्ल के तो हितवाद के परिवार से नागपुर से ही संबंध रहे हैं। उनके पिता स्वर्गीय पंडित रविशंकर शुक्ल सीपी एण्ड बरार के मुख्यमंत्री रहे हैं। इस बात का उल्लेख पुरोहित जी ने किया, तो विद्याचरण शुक्ल अपने पुराने संबंधों की खातिर हितवाद को ईमानदारी की राह पर चलने वाला एकमात्र अख़बार बता दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजों के खिलाफ जनता की आवाज़ उठाने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वो आज भी जारी है। धन्य हो शुक्ल जी। शुक्ल जी और तारीफ करते लेकिन उन्हें कहीं जाना था, सो मुख्यमंत्री से पहले बोलकर और इस बात के लिए क्षमा माँगकर अपने चेले-चपाटे के साथ निकल लिए।
लोक स्वास्थ्य मंत्री केदार कश्यप ने विद्याचरण शुक्ल को हितवाद की तारीफ करने में भरपूर टक्कर दी। उन्होंने तो यहाँ तक कह डाला कि वे अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए नियमित रूप से हितवाद पढ़ते हैं। वाह! ग़जब कर दिया गुरू। टाईम्स वाले हो सकता है अब हितवाद पढ़कर अंग्रेजी लिखें। तेज तर्रार वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने जब बोलना शुरू किया, तो ऐसा ज़रूर लगा कि अब हितवाद पुराण खत्म हुआ। उन्होंने पत्रकार और पत्रकारिता पर सीधे वार किया। उन्होंने कहा निगेटिव ख़बरें छापकर अख़बार समाज में निराशा फैला रहा है। सिर्फ स्याह पक्ष ही नहीं होता छापने के लिए, उजला पक्ष भी छापा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाज़ार वाद के इस दौर में अख़बार अब सेवा का माध्यम नहीं रहे, बल्कि विशुध्द रूप से व्यावसाय में बदल गए हैं। यहाँ तक ठीक था मगर ये क्या ? बृजमोहन जी भी अचानक कल्टी मार गए। वो भी चल पड़े पूर्व वक्ताओं की राह पर। तत्काल कहा कि हितवाद इसका अपवाद है। हितवाद हमेशा ईमानदारी से सच्चाई की राह पर चलता रहा है। आयें! ये क्या हो गया भैय्या। पहले तो कानों पे विश्वास ही नहीं हुआ, फिर बृजमोहन जी को उसी स्पीड से हितवाद पुराण वाचते देखा तो समझ में आया कि वे मक्खनबाजी में अपने से जूनियर केदार कश्यप से पीछे नहीं रहना चाहते थे।
आखिर में बोले डॉ. साहब! यानि मुख्यमंत्री रमन सिंह। उनको बुलाने के लिए जब उद्धोषक ने बोलना शुरू किया तो ऐसा लगा कि उनकी पार्टी का, उन्हीं के गुट का और उन्हीं के परिवार का सदस्य बोल रहा हो। आ.. हा .. हा ! देश के सबसे सफल मुख्यमंत्री, यहाँ तक तो ठीक था देश के सबसे खुबसूरत मुख्यमंत्री ! अब बताईए भला, है न रिकॉर्ड तोड़ मक्खनबाजी। खैर मुख्यमंत्री भी भला कैसे हार मान लेते पत्रकारों से, और अपने से पहले मक्खनबाजी में रिकॉर्ड बना चुके वक्ताओं से। वे तो नेता ही नहीं डॉक्टर भी हैं और समय की नब्ज़ अच्छी तरह जानते हैं। सो उन्होंने भी हितवाद को देश का एकमात्र ईमानदार और सच्चा अख़बार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
और क्या बताएँ आपको हितवाद पुराण। एक से बढ़कर एक महारथी, पूरी दमदारी और ईमानदारी से मक्खनबाजी में उन पत्रकारों को बीट कर गए, जो रोज उनको सरकार बढ़िया चल रही है कहकर मक्खन लगाने में वर्ल्ड रिकॉर्ड बना चुके हैं। हालाकि कुछ असंतुष्ट टाईप के पत्रकारों ने, जिनके हाथ थोड़े छोटे हैं और जिनके पास मक्खन थोड़ा कम हैं, मुझसे प्रोटेस्ट ज़रूर किया। मैं भी क्या कर सकता था ? सुनना और वो भी झूठ सुनना, अब लगता है अपनी डयूटी में शामिल हो गया है। नहीं जाओ तो विरोधी ठहरा दिए जाते हैं और जाओ तो चुप रहा नहीं जाता। अब लिख मारा है ब्लॉग में अगर किसी ने पढ़ लिया तो वो हरिराम (शोले फिल्म के जेलर का ख़बरी) ज़रूर हितवाद वालों को बता देगा। थोड़ी बहुत गुंजाइश एमरजेंसी में नौकरी की बची होगी तो वो भी खत्म। अब तो सिर्फ यही कहा जा सकता है जाने भी दो यारों।