एहफ़ाज़ रशीद,पत्रकारिता के क्षेत्र में हमेशा संघर्ष के लिये जाना-पहचाना नाम।एकदम बिंदास और कल को हमेशा ठेंगे पे रखने वाला एहफ़ाज़ आज भी आने वाले से बेखौफ़,जबकी उसे हार्ट-अटैक के कारण एस्कार्टस अस्पताल मे भर्ती कराया गया है।उसके सुर में रत्ती भर भी फ़र्क़ नही आया है,अभी भी उसका अपने रोज़ के दोस्तो से यही कहना है कि कुछ नही होने वाला मुझे,बस ठीक हुआ और फ़िर देखना।खुदा करे उसे कुछ भी ना हो और खुदा उसे महफ़ूज़ रखे हर बला से।वैसे तो मुझे भगवान से भी यही मांग करना चाहिये और मैं करूगा भी,क्योंकि एहफ़ाज़ ने कभी भगवान और खुदा मे फ़र्क़ ही नही किया था।होली के त्योहार पर सबसे ज्यादा रंग खेलने वाले कुछ लोगों मे उसका भी नाम शुमार था।न केवल होली बल्कि सारे त्योहार वो उसी खुशी और उमंग से मनाता था जैसे ईद्।पता नही उसे किसकी बुरी नज़र लग गई कि उसे खेलने-कूदने की उम्र मे ही दिल का रोग लग गया।वैसे भी उसने दिमाग से ज्यादा दिल का ही इस्तेमाल किया था आजतक़।हर महत्वपूर्ण फ़ैसला वो दिल से किया करता था और शायद नौकरी छोड़ने-पकड़ने में वो मुझे भी टक्कर देता था।25 साल से ज्यादा पत्रकारिता के बाद भी उसका कोई पक्का ठौर-ठीकाना नही था।जब तक़ दिल लगा काम किया और जब मन नही माना निकल लिये नई नौकरी की तलाश में।इस मामले में कई बार मुझे लगता है कि उसका रिकार्ड मुझ्से भी खराब था। उम्र में वो मुझसे एकाध साल छोटा ही था मगर नौकरी यानी पत्रकारिता में मुझसे पहले आ गया था और शायद तीन साल सीनियर था।उससे पहली मुलाक़ात भी बहुत मज़ेदार थी।हम लोग एमएससी पास करके उन दिनो राजनीति में हाथ आज़मा रहे थे।एक मित्र संजय वर्मा के बड़े भाई दिलीप वर्मा के विवाह समारोह मे सब शामिल थे।एहफ़ाज़ संजय के छोटे भाई अनुपम उर्फ़ अंजू वर्मा के दोस्त था और बारात मे वो भी खूब नाच रहा था।हमारा बहुत बड़ा ग्रूप था और सभी नाचने में मस्त थे।अचानक़ पैरों मे घूंघरू बांध कर एक नौजवान बारात मे घुसा और नाचने लगा।इससे पहले कि हम लोग उसे कुछ कहते अनुपम सारा माज़रा समझ कर बीच में आया और खने लगा भैया ये पत्रकार है।हम लोग तब तक़ छुट्टे सांद ही थे।उससे जैसे ही हम लोगों ने कहा अबे भगा पत्रकार-फ़त्रकार…तो उसने बीच में ही बात काट कर कहा कि वो मेरा दोस्त है।इस पर सबका उससे परिचय हुआ।वो पहला परिचय था जो आज तक़ चला आ रहा है।कई बार उसने मेरा जमकर विरोध किया और मैंने कभी उसकी बात का बुरा नही माना और स्वभाव के अनुसार कुछ दिनो बाद वो खुद ही आकर मिलता और उससे रिश्ता कायम ही रहा। उससे पहली मुलाक़ात के कुछ साल बाद मैं भी इसी लाईन मे आ गया और फ़िर समबन्ध गहरे होते चले गये।नौकरी छोड़ना और पकड़ना शायद तब तक़ उसके लिये खेल बन गया था।दरअसल उसे समझौता पसंद नही था और लड़ना उसे हर किसी से पसंद से था,खासकर बड़े लोगों से।इसी आदत के कारण घूमते-फ़िरते वो भास्कर भी आया और इत्तेफ़ाक़ से मेरी ही डेस्क पर काम किया।खबरे जैसे उड़ कर आती थी उसके पास।जखीरा रहता था उसके पास्।एक दिन उसने मुझसे कहा कि मुझे एक बहुत बड़ी खबर हाथ लगी है इसे छपना है।खबर सुनकर मैने उससे कहा कि ये खबर तो संपादक ही क्लियर करेगा बाबू।उसने कहा कि ये छापना ज़रूरी है बहुत से लोगोम को मिली है मगर किसी ने छपने की हिम्मत नही की है।खबर शहर के बहुत बड़े औद्योगिक घराने के खिलाफ़ थी।वो ज़िद पर था कि इसे आज ही छपना चाहिये।मैने उससे कहा कि फ़िर रूक जा रात को सब के जाने के बाद सिटी एडिशन में लगा दूंगा।खबर तो छपी,हगामा भी हुआ और मुझे जमकर डांट भी पड़ी लेकिन वाह रे एहफ़ाज़ उसे कोई फ़र्क़ नही पड़ा।मैने कहा नौकरी जा सकती थी तो उसका जवाब था रोटी तो नही छीन सकता ना कोई ,नौकरी जाने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? किस्से तो एक से एक हैं उसके।एक रात मैं हमेशा की तरह ड्यूटी पर मस्त सोया हुआ था।अचानक़ ये कंही से आ टपकां।उसने आते ही पूछा अनिल भैया कंहा है।फ़िर वो ढूंढते हुये मेरे पास पंहुचा और ऊठाने लगा।मैं गहरी नींद में था।बार-बार हिलाने_डुलाने पर मेरी नींद टूटी और आधी नींद मे ही मैंने उससे बात की।उसने मुझे बताया कि मज़दूर नेता शंकर गुहा नियोगी का ह्त्यारा अस्पताल से फ़रार हो गया है।मैं अच्छी खासी नींद में था मैने उससे कहा बना दे छोटी-मोटी खबर और फ़िर सो गया तब तक़ उसका दिमाग खराब होम गया था,उसने चार लाईन मे उस खबर को निपटा दिया और चला गया बाद में मुहे स्टाफ़ ने उठाया और बताया कि बहुत बड़ी घटना हो गई है।जब मैने उनसे पूछा कि खबर किसने बनाई है तो एहफ़ाज़ का नाम बताया गया।मेरे हाथ के तोते-कौये सब ऊड़ गये।मैने उसे लाख ढूंढा तब तक़ एहफ़ाज़ रफ़ूचक्कर हो चुका था।उसे पता था कि मैं रात को सोता हूं और वो खबर छूटी तो नौकरी खतरे में पड़ सकती थी बस इसिलिये चला आया था मुझे खबर बताने। ऐसे एक नही कई किस्से हैं।होली तो जैसे उसके बिना हो ही नही सकती।टाइटल देने से लेकर लोगों के नाम रखने में उसका कोई सानी नही था। हमेशा हंसी-मज़ाक,बात-बात पे खी-खी उसके अलावा कोई काम नही।ऐसा लगता था कि हंसना-हंसना ही उसका मक़सद है।मगर आज वो खुद तो हंस रहा है मगर ना तो उसके दोस्त हंस पा रहे हैं और नाही मैं हंस पा रहा हूं।उसके रिश्तेदार,यार दोस्त,चाहने वाले सभी दुआ कर रहे हैं कि वो फ़िर सेहंसता बोलता अस्पताल स बाहर आये।और वो है कि उसे कुछ भी फ़र्क़ नही पड़ा उसका हंसना ज़ारी है।उसका बाय-पास होना है।ईश्वर करे वो इस इम्तेहान में भी पास हो जाये।आमीन्।
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Tuesday, July 5, 2011
Saturday, September 12, 2009
बैलगाडी के नीचे वाले कुत्ते,कभी न बदलने वाला सिस्टम और भ्रम मे जीते पत्रकार!
आज कुछ साथियों ने बड़े अख़बार की नौकरी छोड़ कर एक छोटे अख़बार मे नौकरी कर ली।उनमे से कुछ ने मुझसे सलाह भी ली थी और उनके इस फ़ैसले पर आज कुछ लोगो ने आश्चर्य जताया और कुछ ने नाराज़गी।कुछ ने तो मुझे ही जली कटी सुनाई और कहा कि आपने मरवा दिया उनको।मुझे समझ नही आया की छोटे अख़बार मे ज्यादा वेतन मिलना गलत है या ज्यादा बड़े अख्बार मे कम वेतन मिलना।
बेमतलब की बहस भी लगता है कि अब पत्रकारिता का हिस्सा हो गई है।या फ़िर लगता है कि आखिर पत्रकार अपने भीतर धधक रहे ज्वालामुखी को दबाये रखे भी तो कैसे?उसे अपना गुस्सा कंही न कंही उतारना होता है।घर मे तो बस चलता नही,दफ़्तर मे भी कमोबेश यही हाल है,खबर पर भारी विज्ञापन है और जब न घर और न दफ़्तर तो फ़िर बस एक ही जगह बचती है,वो दोस्तो की मह्फ़िल्।बस आज भी घर,बाहर और दफ़्तर से आये दबे-कुचले लोगो का गुस्सा फ़ट पड़ा था।
सबने मुझे घेरा और कहा कि आपने उन्हे रोका क्यों नही?क्या भविष्य है उस अख़बार का?मै भी अब तक़ भीतर के गुस्से को जुबां पर आने से रोकते-रोकते थक़ गया था।मेरा भी गुस्सा आखिर फ़ट पड़ा और मैने उनसे ही पूछा किसका भविष्य और कैसा भविष्य?पत्रकार साला सारी दुनिया मे हो रहे अन्याय के खिलाफ़ झंडा उठाये घूमता है और अपने लिये?क्या कर पाता है वो अपने और अपने परिवार के लिये?कुछ नही करता तो तुम लोग गाली बकते हो साला ईमानदारी मे मर गया और कुछ करने लगता है तो भी गालियां बकते हो साला दलाली मे मर गया।अब इन लोगो मे नौकरी छोड़ी तो तुम लोगो को तक़्लीफ़ की वर्षों की नौकरी क्यों छोड़ी ?और नही छोड रहे थे तो भी तुम लोगो को तक़्लीफ़ थी कि सालो से घिस रहे और जब देखो बाहर से लाकर सिर पर साहब बिठा दिया जाता है?
वेतन कम मिल रहा था तो भी तुम लोगों को तक़लीफ़ थी और अब ज्यादा वेतन मे दूसरी जगह गयें है तो भी तक़लीफ़ है।बात दरअसल वो नही है भैया,एक ने हिम्मत करके मुझे टोका।मैने पूछा तो क्या बात है?बात बड़े बैनर की है।बड़े बैनर की सुनवाई तो होती है,छोटे अख़बारो मे लिखी खबर का असर तो दूर उसका क्या हश्र होता…अच्छा तो ये बात है।मैने कहा कि कितने बड़े बैनरो ने सरकार के खिलाफ़ खुलकर लिखा है।फ़ुल पेज विज्ञापन के साथ-साथ हाफ़ पेज राईट-अप का पैकेज सुना है ना।अब तो संपादक भी जनसंपर्क विभाग की मरज़ी पर टिके हुये हैं।खबर पर विज्ञापन भारी है।और फ़िर किस बड़े बैनर के अख़बार के अलावा दूसरे धंदे नही है।किसी का कोल ब्लाक है,किसी का पावर प्लांट,किसी को रियायती मूल्य की जमीन पर कमर्शियल काम्प्लेक्स बनाना है तो किसी को बेहिसाब विज्ञापन चाहिये।
मालिक मोटी कमाई के पीछे लगा हुआ है।पत्रकार उसके लिये एक कलम से ज्यादा कुछ भी नही है।रूकी तो झटक कर देखता भी नही कि कंही कोई कचरा तो नही आ गया।तुरंत बदल देता है।मालिक प्रोफ़ेशनल है और तुम लोग यानी पत्रकार इमोशनल।ऐसे कैसे चलेगा?पत्रकार को अगर ज्यादा वेतन मिल रहा है तो उसे तत्काल अख़बार बदल लेना चाहिये।रहा सवाल गारंटी का तो वो तो ज़िंदगी की भी नही है।और बात बैनर की तो क्या बदला है आज तक़ इस देश मे।कब से निकल रहे हैं अख़बार्।ये तो गनिमत है कि आज़ादी की लड़ाई के समय आज के मालिको के अख़बार नही निकलते थे वरना सब के सब क्लेम कर देते की अंग्रेज़ बापू से नही उनसे डर कर भागे है। हर अख़बार अपनी खबर के असर का दावा करता।
सालो से अख़बार निकल रहे है,सब छप रहा है और सब कुछ वैसा का वैसा ही चल रहा हैं।न सडक बदली,न स्कूल और नही गरीबी हटी।सिस्ट्म जैसा था वैसा ही है और पत्रकार उसे तो लगता है भ्रम मे जीने की आदत पड गई है।ये बदल दूंगा,वो बद दूंगा,मोटर साईकिल के पुराने टायर तो बदल नही पाता और सिस्टम बदलने की बात करता है।एक बात जान लो जो कुछ होता है वो सिस्टम के मुताबिक होता है । बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते को देखा है ना उसे भ्रम रहता है कि बैलगाड़ी उसके दम पर चल रही है,मगर गाडी के आगे निकल जाने पर उसे हक़ीक़त का पता चलता है मगर हम लोगो को तो तब भी नही क्योंकी हम लोगो को भ्रम मे जीने की आदत पड़ गई है।
Tuesday, June 9, 2009
ये तो चमत्कार हो गया प्रभू!
आधी रात को नींद मे ऐसा लगा की कोई आवाज़ दे रहा है।मन का भ्रम जानकर मैने करवट बदली तो आवाज कुछ तेज हो गई और कुछ पल बीते नही कि ऐसा लगा कोई मुझे हिला रहा है।थोड़ा सा ड़र भी लगा मगर मेरी हिम्म्त देखिये मै बिना आंखे खोले चुप-चाप पड़ा रहा।फ़िर ऐसा लगा कि किसी ने जोर की लात मारी हो,और मैं चौक गया शादीशुदा तो हूं नही कि सुबह ज़ल्दी उठना है बच्चों को स्कूल छोड़ना है और दुनिया भर के लफ़्ड़े। अकेला सोता हूं फ़िर ये सब क्या हो रहा है।कंही भूत-प्रेत का चक्कर तो नही?अब तो मुझे पसीना आने लगा।पतली गली से सटकने का मै आंखे मूंदे प्लान बना ही रहा था कि फ़िर एक लात पड़ी और गरज़दार आवाज भी सुनाई दी,अबे उठ सच मे अलाल है तू।मै चमककर उठा और देखता क्या हूं कमरा हज़ार वाट की लाईट से भी ज्यादा चमक रहा था,और साम्ने देखा तो रूह कांप उठी।
सामने बर्फ़ सी सफ़ेद दाढी वाले कोयले से भी काले महाराज खड़े थे।पीले सोने के जेवरो से साऊथ के किसी मोटे रईस की तरह टाप टू बाटम ब्लैक एण्ड येलो।मै सहम गया फ़िर अचानक़ मुझे ख्याल आया अरे साला ये यमराज तो नही?कंही अपना आरएसी का टिकट कन्फ़र्म तो नही हो गया?कंही कोई क्म्प्लेन पर फ़ाईनल हियरिंग तो नही हो गई?अभी तो लाईफ़ शुरू भी नही और दी एण्ड?घबरा कर सीधे करिया(छत्तीसगढीमे काले को करिया कहते हैं) बाबा की ओर भागा।बाबा फ़ट से गायब्।मैने चैन की सांस ली और सोचा शायद डरावना सपना देख रहा हूंगा।पर ये क्या पीछे से आवाज आई लोग सही कहते थे तू मरखने सांड़ से कम नही हैं।सुबह फ़ोन लगाओ त्प गाली बकता है नींद से उठाओ तो चिड़चिड़ाता है मगर तू तो उससे भी ज्यादा खतरनाक निकला सीधे वार करने पर उतर आया।मेरे तो पैर के नीचे की टाईल्स,कांक्रिट उसके नीचे के फ़्लोर की टाईल्स और जाने क्या-क्या सब किसक गये।
मै बोला महाराज आप कन्फ़्यूस हो रहे है मै तो आपसे माफ़ी मांगने के लिये आ रहा था।करिया बाबा फ़िर गरजा,तू ढीठ है ये तो पता ही था मगर इतना ज्यादा होगा ये पता नही था। अब तक़ मै सम्भल चुका था स्कूल से भाग कर पकडाते समय गुरूजी लोगों के सामने चिरौरी करने मे कभी अपनी मास्टरी रही है।सो अपने अन्दर बचपन से सो रहे, ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार को जगाया और महाराज से अपनी आवाज मे बोतल भर कर रूह अफ़्ज़ा ऊंडेल कर कहा नही सर ऐसी कोई बात नही है आपको क्न्फ़्यूज़न हो गय……क्या कहा कन्फ़्यूज़न और मुझे?साले ब्रूस ली और जेट ली से ज्यादा खतनाक स्पीड़ से अटैक कर रहा था और मुझे बता रहा है क्न्फ़्यूज़न्।मैने हथियार डालने की बजाये दुनिया की सबसे सटीक वी टू वी यानी वाईस टू वाईस मिसाईल चापलुसी 1000 निकाली और कहा कि सर आपकी अंग्रेजी तो बहुत बढिया है और प्रोनंसियेशन तो मानना पडेगा।
करिया बाबा के चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आये।उन्होने तत्काल कलाई मे बंधे घड़ीनुमा यंत्र मे कुछ खिट-पिट की और कहा कि तुम्हारे रिकार्ड मे ये तो है ही नही।अब मुझे गारंटी हो चली थी कि करिया और कोई नही यमराज ही है।साला पूरा रिकार्ड कम्प्यूट्राईज़ड करके आया है।मैने सोचा गये बेटा अनिल सारी इच्छाये मन मे लिये निकलना पड़ेगा।तभी अंदर छीपा पत्रकारिता का कीड़ा कुलबुलाया और मन मे बहुत से सवाल अंगड़ाई लेने लगे।एक तो डर भी लग रहा था कि ले दे कर कन्फ़्यूज़ कर पाया हूं करिया बाबा को अगर सवालो से सेम आईटम होना कन्फ़र्म हो गया तो गये काम से।इसके बावज़ूद रिस्क लेने की आदत ने मेरी जीभ मे खुजाल मचा दी।मैने किसी डाक्टर,अफ़सर निरीह बाबू-पटवारी से सवाल पूछने की बीरू स्टाईल को ड्राप करते हुये किसी अडियल मंत्री-संत्री को फ़ेंकी जानी वाली अंडर आर्म स्लो बाल की तरह सवाल फ़ेंका महाराज आपने वो बही खाते वाला स्टाईल छोड कर कम्प्यूट्….……एक मिनट कहकर बाबा ने फ़ि कलाई मे बंधे यंत्र मे ऊंगली की।मैने सोचा गये बेटा काम से अब उधर से कन्फ़र्म होता ही अपना रिटर्न टिकट्।मै सोच ही रहा था कि करिया बाबा बोले,अबे ये तो तेरा स्टाईल नही है?
मारे डर के मेरा बुरा हाल था।मैने अपने को और थोडा साफ़्ट करने की कोशिश की ठीक वैसे ही जैसे कभी अपने मालिक के सामने खडूस संपादक को बनते देखता था।वो आईडिया ऐसे आड़े वक़्त मे काम आयेगा सोचा भी न था।मैने कहा सर ये तो आपका बडप्प्न है वर्ना हम जैसो का कंहा कोई स्टाईल?स्टाईल तो आप जै………… मेरी बात आधे मे काट कर ही उन्होने कहा बेटा जितना चाहे ट्राई मार,मै गलत हो ही नही सकता।कन्फ़र्म करके आया हूं।मैने सोचा अब जाना तो है ही क्यों न अपनी ओरिजिनल स्टाईल मे ट्राई किया जाये।मैने ढेर सारे असाईंमेण्ट लेकर निकले फ़ोटोग्राफ़र की तरह करेले से भी कड़ुई आवाज़ मे पूछा ठीक है ठीक है जाना किसमे है उसी करिया भैंसे पर या कोई नया प्लेन ले लिया है।
प्लेन,भैंसा?ये क्या बडबडा रहा है बे।मैने कहा आपने कहा ना मैं कन्फ़र्म करके आया हूं।तो बाबा ने पूछा।तो क्या जब कन्फ़र्म हो ही गया है तो बिना ले जाये तो छोड़ोगे नही?हैरान-परेशान बाबा ने पूछा कंहा?मैने सवाल किया कंही ले जाना नही तो यंहा काहे को आया बे कालिया,आधी रात को नींद हराम करने।कालिया सुनते ही करिया बाबा के चेहरे धधकने लगा पर दूसरे ही क्ष्ण वे शांत हो गये।उन्होने फ़िर से यंत्र मे ऊंगली की और कहा कि तुम मुझे क्या समझ रहे हो।मैने चीढ कर कहा कि इतना खूबसुरत करिया इन्द्र तो हो नही सकता?उन्होने कहा कि बिल्कुल ठीक।मैने कहा क्या ठीक।उन्होने फ़िर कहा ठीक सम्झे मै इन्द्र नही हूं,तो,तुम बताओ।यमराज के सिवाय और कौन हो सकते हो?अबके करिया बाबा जोर से हंसे। ऐसा लगा कि मानसून पूर्व के अंधड़ो मे बिजली कड़क रही है।
करिया बाबा ने कहा कि जभी चिड्चिडा रहा है। अबे सुन बड़ा तीसमारखां समझता था अपने आप को।कैसे यूपीए की तरह हवा निकल गई।सुन मै यमराज नही भ्रष्ट्रराष्ट्र हूं।भ्रष्टराष्ट्र?ये कौन सा नये टाईप का देवता आ गया?मेरे मे मन मे उमड रहे शंका-कुशंकाओ के बादलो को कैसे करिया बाबा ने साफ़ किया और वे मेरे पास क्यों आये थे ये बताऊंगा अगली कड़ी मे।
सामने बर्फ़ सी सफ़ेद दाढी वाले कोयले से भी काले महाराज खड़े थे।पीले सोने के जेवरो से साऊथ के किसी मोटे रईस की तरह टाप टू बाटम ब्लैक एण्ड येलो।मै सहम गया फ़िर अचानक़ मुझे ख्याल आया अरे साला ये यमराज तो नही?कंही अपना आरएसी का टिकट कन्फ़र्म तो नही हो गया?कंही कोई क्म्प्लेन पर फ़ाईनल हियरिंग तो नही हो गई?अभी तो लाईफ़ शुरू भी नही और दी एण्ड?घबरा कर सीधे करिया(छत्तीसगढीमे काले को करिया कहते हैं) बाबा की ओर भागा।बाबा फ़ट से गायब्।मैने चैन की सांस ली और सोचा शायद डरावना सपना देख रहा हूंगा।पर ये क्या पीछे से आवाज आई लोग सही कहते थे तू मरखने सांड़ से कम नही हैं।सुबह फ़ोन लगाओ त्प गाली बकता है नींद से उठाओ तो चिड़चिड़ाता है मगर तू तो उससे भी ज्यादा खतरनाक निकला सीधे वार करने पर उतर आया।मेरे तो पैर के नीचे की टाईल्स,कांक्रिट उसके नीचे के फ़्लोर की टाईल्स और जाने क्या-क्या सब किसक गये।
मै बोला महाराज आप कन्फ़्यूस हो रहे है मै तो आपसे माफ़ी मांगने के लिये आ रहा था।करिया बाबा फ़िर गरजा,तू ढीठ है ये तो पता ही था मगर इतना ज्यादा होगा ये पता नही था। अब तक़ मै सम्भल चुका था स्कूल से भाग कर पकडाते समय गुरूजी लोगों के सामने चिरौरी करने मे कभी अपनी मास्टरी रही है।सो अपने अन्दर बचपन से सो रहे, ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार को जगाया और महाराज से अपनी आवाज मे बोतल भर कर रूह अफ़्ज़ा ऊंडेल कर कहा नही सर ऐसी कोई बात नही है आपको क्न्फ़्यूज़न हो गय……क्या कहा कन्फ़्यूज़न और मुझे?साले ब्रूस ली और जेट ली से ज्यादा खतनाक स्पीड़ से अटैक कर रहा था और मुझे बता रहा है क्न्फ़्यूज़न्।मैने हथियार डालने की बजाये दुनिया की सबसे सटीक वी टू वी यानी वाईस टू वाईस मिसाईल चापलुसी 1000 निकाली और कहा कि सर आपकी अंग्रेजी तो बहुत बढिया है और प्रोनंसियेशन तो मानना पडेगा।
करिया बाबा के चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आये।उन्होने तत्काल कलाई मे बंधे घड़ीनुमा यंत्र मे कुछ खिट-पिट की और कहा कि तुम्हारे रिकार्ड मे ये तो है ही नही।अब मुझे गारंटी हो चली थी कि करिया और कोई नही यमराज ही है।साला पूरा रिकार्ड कम्प्यूट्राईज़ड करके आया है।मैने सोचा गये बेटा अनिल सारी इच्छाये मन मे लिये निकलना पड़ेगा।तभी अंदर छीपा पत्रकारिता का कीड़ा कुलबुलाया और मन मे बहुत से सवाल अंगड़ाई लेने लगे।एक तो डर भी लग रहा था कि ले दे कर कन्फ़्यूज़ कर पाया हूं करिया बाबा को अगर सवालो से सेम आईटम होना कन्फ़र्म हो गया तो गये काम से।इसके बावज़ूद रिस्क लेने की आदत ने मेरी जीभ मे खुजाल मचा दी।मैने किसी डाक्टर,अफ़सर निरीह बाबू-पटवारी से सवाल पूछने की बीरू स्टाईल को ड्राप करते हुये किसी अडियल मंत्री-संत्री को फ़ेंकी जानी वाली अंडर आर्म स्लो बाल की तरह सवाल फ़ेंका महाराज आपने वो बही खाते वाला स्टाईल छोड कर कम्प्यूट्….……एक मिनट कहकर बाबा ने फ़ि कलाई मे बंधे यंत्र मे ऊंगली की।मैने सोचा गये बेटा काम से अब उधर से कन्फ़र्म होता ही अपना रिटर्न टिकट्।मै सोच ही रहा था कि करिया बाबा बोले,अबे ये तो तेरा स्टाईल नही है?
मारे डर के मेरा बुरा हाल था।मैने अपने को और थोडा साफ़्ट करने की कोशिश की ठीक वैसे ही जैसे कभी अपने मालिक के सामने खडूस संपादक को बनते देखता था।वो आईडिया ऐसे आड़े वक़्त मे काम आयेगा सोचा भी न था।मैने कहा सर ये तो आपका बडप्प्न है वर्ना हम जैसो का कंहा कोई स्टाईल?स्टाईल तो आप जै………… मेरी बात आधे मे काट कर ही उन्होने कहा बेटा जितना चाहे ट्राई मार,मै गलत हो ही नही सकता।कन्फ़र्म करके आया हूं।मैने सोचा अब जाना तो है ही क्यों न अपनी ओरिजिनल स्टाईल मे ट्राई किया जाये।मैने ढेर सारे असाईंमेण्ट लेकर निकले फ़ोटोग्राफ़र की तरह करेले से भी कड़ुई आवाज़ मे पूछा ठीक है ठीक है जाना किसमे है उसी करिया भैंसे पर या कोई नया प्लेन ले लिया है।
प्लेन,भैंसा?ये क्या बडबडा रहा है बे।मैने कहा आपने कहा ना मैं कन्फ़र्म करके आया हूं।तो बाबा ने पूछा।तो क्या जब कन्फ़र्म हो ही गया है तो बिना ले जाये तो छोड़ोगे नही?हैरान-परेशान बाबा ने पूछा कंहा?मैने सवाल किया कंही ले जाना नही तो यंहा काहे को आया बे कालिया,आधी रात को नींद हराम करने।कालिया सुनते ही करिया बाबा के चेहरे धधकने लगा पर दूसरे ही क्ष्ण वे शांत हो गये।उन्होने फ़िर से यंत्र मे ऊंगली की और कहा कि तुम मुझे क्या समझ रहे हो।मैने चीढ कर कहा कि इतना खूबसुरत करिया इन्द्र तो हो नही सकता?उन्होने कहा कि बिल्कुल ठीक।मैने कहा क्या ठीक।उन्होने फ़िर कहा ठीक सम्झे मै इन्द्र नही हूं,तो,तुम बताओ।यमराज के सिवाय और कौन हो सकते हो?अबके करिया बाबा जोर से हंसे। ऐसा लगा कि मानसून पूर्व के अंधड़ो मे बिजली कड़क रही है।
करिया बाबा ने कहा कि जभी चिड्चिडा रहा है। अबे सुन बड़ा तीसमारखां समझता था अपने आप को।कैसे यूपीए की तरह हवा निकल गई।सुन मै यमराज नही भ्रष्ट्रराष्ट्र हूं।भ्रष्टराष्ट्र?ये कौन सा नये टाईप का देवता आ गया?मेरे मे मन मे उमड रहे शंका-कुशंकाओ के बादलो को कैसे करिया बाबा ने साफ़ किया और वे मेरे पास क्यों आये थे ये बताऊंगा अगली कड़ी मे।
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Sunday, May 24, 2009
क्या संपादक श्रद्धांजलि देने लायक भी नही होता?
बहुत से सवाल मेरे दिमाग मे बवाल मचाये हुये हैं।बहुत सोचा इस मामले मे ना लिखूं।फ़िर लगा क्यों ना लिखूं।दूसरो को नंगा करने मे तो बड़ा मज़ा आता है,और जब अपनी बारी आई तो…………।इस उधेडबुन मे दो दिन गुज़र गये और आखिर मुझे लगा ये कड़ुवा सच भी सामने आना चाहिये कि अधिकांश पत्रकार एक मृत संपादक को श्रद्धांजलि देने लायक भी नही समझते?
कुमार साहू छत्तीसगढ के लिये नया नाम नही है।वे आज़ादी के साथ यानी सन 47 से पत्रकारिता से जुड़े थे।सीधे-सादे पत्रकार के साथ-साथ वे आम आदमी का भी प्रतिनिधित्व करते थे।पिछले साल बीमारी से लम्बे संघर्ष के बाद उन्होने इस दुनिया से मुंह मोड़ लिया था।उनकी पहली पुण्यतिथी पर उनके पुत्र अनुपम ने एक कार्यक्रम प्रेस क्लब मे करने की इच्छा जताई।मै उस समय खामोश रहा।मुझे पता था श्रद्धांजलि कार्यक्रम मे लोग आते नही है।फ़िर मैने अनुपम से कुछ लोगो को आप बुला लेना।उसने कहा हां। और कार्यक्रम तय हो गया।
फ़िर हुआ वही जिसका मुझे ड़र था।लोग नदारद थे।कुमार साहू अपने समय के जाने माने पत्रकार रहे हैं।उन्होने कईयों को कलम पकड़ना सिखाया,कईयों को नौकरी दी,कईयों की नौकरी बचाई और कईयों को पत्रकार बनाया।वे पत्रकारिता के स्कूल थे।उनकी भाषा पर जबरदस्त पकड़ थी और अच्छे साहित्यकारो मे भी उनकी गिनती होती थी।एक नही चार पुस्तके उनकी प्रकाशित हो चुकी हैं।कहने का मतलब ये कि वे नये नही थे और छत्तीसगढ के सबसे बड़े अख़बार नव-भारत के संपादक रह चुके थे।
इसके बाद उनकी श्रद्धांजलि सभा मे उंगली पर गिनने लायक पत्रकारो को देखा तो मुझे दूसरो से ज्यादा खुद पर अफ़सोस हुआ।उस समय लगा क्या वाकई हम लोग पत्रकार कहलाने लायक हैं।किसी नेता या बड़े व्यापारी या प्रभावशाली व्यक्ति की शवयात्रा मे ढेरो पत्रकार नज़र आ जाते हैं।उन लोगो की भी जिन्के परिजन उन्हे जानते तक़ नही और यंहा हमारे ही परिवार के बुज़ुर्ग कुमार साहू को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिये उनके पास समय नही।
वरिष्ठ पत्रकारो के नाम पर शंकर पाण्डेय,गिरिश पंकज भर बस मौजूद थे।मै तो अध्यक्ष होने के नाते था ही बाकी नज़र ड़ालो तो सब नये पत्रकार्।उनमे से भी आधे से ज्यादा इलेक्ट्रानिक मीडिया के।उनमे से अधिकांश ने कुमार साहू को देखा तक़ नही था।काम तो खैर मैने भी उनके साथ नही किया था लेकिन उनसे मेरा संबंध अच्छा था।प्रेस क्लब के एक कार्यक्रम मे मुख्यमंत्री से पत्रकारो की पेंशन योजना के बारे मे बात करने के बाद उन्होने फ़ोन कर मुझसे कहा था। हम लोगो को तो इसका लाभ नही मिलेगा लेकिन तुम इसे लागू करवाओ।बहुत से पत्रकारो की हालत बहुत खराब है।उनका भला हो जायेगा।उस समय वे बीमार थे और उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नही थी,मगर उनका दूसरे साथियो के बारे मे खयाल रखना उनकी अच्छाई का सबूत था।
श्रद्धांजलि सभा मे सभा मे अगर अनुपम के परिजन,साहूजी के कुछ पुराने गैर-पत्रकार साथी और नये नवेले पत्रकार नही होते तो शायद उससे शर्मनाक और कुछ नही हो सकता था। और नये पत्रकार भी किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यक्रम मे जुटाई गई भीड़ की तरह मैने डांट-डपट कर हाल मे इकट्ठा किये थे।सभा मे कौन क्या कह रहा था,मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था।मैने इशारे-इशारे मे लोगो की कम उपस्थिति पर नाराज़गी जाहिर ज़रूर की लेकिन मुझसे ज्यादा हिम्मत वाला निकला एहफ़ाज़ रशीद्।वैसे,जैसे ही वो बोलने के लिये आगे आया मुझे आशंका हुई थी कि वो ज़रूर उनके साथ काम करने वालो को घसीटेगा,मगर इस बार उसने बिना किसी का नाम लिये वो सब कह दिया जो कहना ज़रूरी था।कार्यक्रम के समापन पर आभार व्यक्त करते समय कुमार साहू के पुत्र अनुपम का गला एक नही दो-तीन बार भर आया और हम सब का मन भी।तब से सोच रहा था कि अपनी बिरादरी की इस बेरूखी को सबके साम्ने रखूं या नही और आखिर दिल नही माना तो मन को बेचैन कर रहे गुबार को आपके सामने रख रहा हूं।सही किया गलत मै समझ नही पा रहा हूं,आप को क्या लगा बताईयेगा ज़रूर्।
कुमार साहू छत्तीसगढ के लिये नया नाम नही है।वे आज़ादी के साथ यानी सन 47 से पत्रकारिता से जुड़े थे।सीधे-सादे पत्रकार के साथ-साथ वे आम आदमी का भी प्रतिनिधित्व करते थे।पिछले साल बीमारी से लम्बे संघर्ष के बाद उन्होने इस दुनिया से मुंह मोड़ लिया था।उनकी पहली पुण्यतिथी पर उनके पुत्र अनुपम ने एक कार्यक्रम प्रेस क्लब मे करने की इच्छा जताई।मै उस समय खामोश रहा।मुझे पता था श्रद्धांजलि कार्यक्रम मे लोग आते नही है।फ़िर मैने अनुपम से कुछ लोगो को आप बुला लेना।उसने कहा हां। और कार्यक्रम तय हो गया।
फ़िर हुआ वही जिसका मुझे ड़र था।लोग नदारद थे।कुमार साहू अपने समय के जाने माने पत्रकार रहे हैं।उन्होने कईयों को कलम पकड़ना सिखाया,कईयों को नौकरी दी,कईयों की नौकरी बचाई और कईयों को पत्रकार बनाया।वे पत्रकारिता के स्कूल थे।उनकी भाषा पर जबरदस्त पकड़ थी और अच्छे साहित्यकारो मे भी उनकी गिनती होती थी।एक नही चार पुस्तके उनकी प्रकाशित हो चुकी हैं।कहने का मतलब ये कि वे नये नही थे और छत्तीसगढ के सबसे बड़े अख़बार नव-भारत के संपादक रह चुके थे।
इसके बाद उनकी श्रद्धांजलि सभा मे उंगली पर गिनने लायक पत्रकारो को देखा तो मुझे दूसरो से ज्यादा खुद पर अफ़सोस हुआ।उस समय लगा क्या वाकई हम लोग पत्रकार कहलाने लायक हैं।किसी नेता या बड़े व्यापारी या प्रभावशाली व्यक्ति की शवयात्रा मे ढेरो पत्रकार नज़र आ जाते हैं।उन लोगो की भी जिन्के परिजन उन्हे जानते तक़ नही और यंहा हमारे ही परिवार के बुज़ुर्ग कुमार साहू को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिये उनके पास समय नही।
वरिष्ठ पत्रकारो के नाम पर शंकर पाण्डेय,गिरिश पंकज भर बस मौजूद थे।मै तो अध्यक्ष होने के नाते था ही बाकी नज़र ड़ालो तो सब नये पत्रकार्।उनमे से भी आधे से ज्यादा इलेक्ट्रानिक मीडिया के।उनमे से अधिकांश ने कुमार साहू को देखा तक़ नही था।काम तो खैर मैने भी उनके साथ नही किया था लेकिन उनसे मेरा संबंध अच्छा था।प्रेस क्लब के एक कार्यक्रम मे मुख्यमंत्री से पत्रकारो की पेंशन योजना के बारे मे बात करने के बाद उन्होने फ़ोन कर मुझसे कहा था। हम लोगो को तो इसका लाभ नही मिलेगा लेकिन तुम इसे लागू करवाओ।बहुत से पत्रकारो की हालत बहुत खराब है।उनका भला हो जायेगा।उस समय वे बीमार थे और उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नही थी,मगर उनका दूसरे साथियो के बारे मे खयाल रखना उनकी अच्छाई का सबूत था।
श्रद्धांजलि सभा मे सभा मे अगर अनुपम के परिजन,साहूजी के कुछ पुराने गैर-पत्रकार साथी और नये नवेले पत्रकार नही होते तो शायद उससे शर्मनाक और कुछ नही हो सकता था। और नये पत्रकार भी किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यक्रम मे जुटाई गई भीड़ की तरह मैने डांट-डपट कर हाल मे इकट्ठा किये थे।सभा मे कौन क्या कह रहा था,मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था।मैने इशारे-इशारे मे लोगो की कम उपस्थिति पर नाराज़गी जाहिर ज़रूर की लेकिन मुझसे ज्यादा हिम्मत वाला निकला एहफ़ाज़ रशीद्।वैसे,जैसे ही वो बोलने के लिये आगे आया मुझे आशंका हुई थी कि वो ज़रूर उनके साथ काम करने वालो को घसीटेगा,मगर इस बार उसने बिना किसी का नाम लिये वो सब कह दिया जो कहना ज़रूरी था।कार्यक्रम के समापन पर आभार व्यक्त करते समय कुमार साहू के पुत्र अनुपम का गला एक नही दो-तीन बार भर आया और हम सब का मन भी।तब से सोच रहा था कि अपनी बिरादरी की इस बेरूखी को सबके साम्ने रखूं या नही और आखिर दिल नही माना तो मन को बेचैन कर रहे गुबार को आपके सामने रख रहा हूं।सही किया गलत मै समझ नही पा रहा हूं,आप को क्या लगा बताईयेगा ज़रूर्।
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Monday, September 1, 2008
चाटुकारिता में पत्रकारों को मात दे दी नेताओं ने
हैरान हैं न आप सब। लेकिन ये सच है और ऐसा हुआ इतवार को अंग्रेजी दैनिक हितवाद के नए भवन के लोकार्पण समारोह में। सारे अतिथि नेता जब बोले तो ऐसा लगा कि देश में हितवाद के अलावा सच्चाई की राह पर चलने वाला और कोई अख़बार है ही नहीं। जिस शिद्दत से नेता हितवाद की तारीफ कर रहे थे, ऐसा लग रहा था कि इतनी तारीफ तो पत्रकार भी नेताओं की नहीं करते।
अंग्रेजी दैनिक हितवाद छत्तीसगढ़ में 8 साल पूरे कर रहा है और इन 8 सालों में उसने अपना भवन और अपनी प्रिंटिंग युनिट लगा ली। उससे पहले वो किराए के भवन में चल रहा था और दूसरे अख़बार की मशीन पर छप रहा था। सो हितवाद ने अपने लिए ऐतिहासिक इस समारोह को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के साथ-साथ कई बार केन्द्रीय मंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल को भी बुलाया। वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल और लोक स्वास्थ्य मंत्री केदार कश्यप भी विशिष्ट अतिथि थे। कुछ मंत्री पहुँच नहीं पाए। वैसे अतिथियों की लिस्ट काफी लंबी थी।
अपने अख़बार हितवाद की तारीफ करने में बनवारी लाल पुरोहित ने कोई कसर नहीं छोड़ी। ये उनका कर्तव्य भी था और अधिकार भी। लेकिन उसके बाद जो हितवाद की तारीफ का सिलसिला शुरू हुआ वो मक्खन बाजी की प्रतियोगिता जीतने की होड़ भी नज़र आई। हालाकि वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल बोलते-बोलते अख़बार को सेवा नहीं व्यापार कहने से नहीं चुके, लेकिन उसके साथ ही तत्काल ये भी कह दिया कि हितवाद एक अपवाद है।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण षुक्ल के तो हितवाद के परिवार से नागपुर से ही संबंध रहे हैं। उनके पिता स्वर्गीय पंडित रविशंकर शुक्ल सीपी एण्ड बरार के मुख्यमंत्री रहे हैं। इस बात का उल्लेख पुरोहित जी ने किया, तो विद्याचरण शुक्ल अपने पुराने संबंधों की खातिर हितवाद को ईमानदारी की राह पर चलने वाला एकमात्र अख़बार बता दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजों के खिलाफ जनता की आवाज़ उठाने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वो आज भी जारी है। धन्य हो शुक्ल जी। शुक्ल जी और तारीफ करते लेकिन उन्हें कहीं जाना था, सो मुख्यमंत्री से पहले बोलकर और इस बात के लिए क्षमा माँगकर अपने चेले-चपाटे के साथ निकल लिए।
लोक स्वास्थ्य मंत्री केदार कश्यप ने विद्याचरण शुक्ल को हितवाद की तारीफ करने में भरपूर टक्कर दी। उन्होंने तो यहाँ तक कह डाला कि वे अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए नियमित रूप से हितवाद पढ़ते हैं। वाह! ग़जब कर दिया गुरू। टाईम्स वाले हो सकता है अब हितवाद पढ़कर अंग्रेजी लिखें। तेज तर्रार वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने जब बोलना शुरू किया, तो ऐसा ज़रूर लगा कि अब हितवाद पुराण खत्म हुआ। उन्होंने पत्रकार और पत्रकारिता पर सीधे वार किया। उन्होंने कहा निगेटिव ख़बरें छापकर अख़बार समाज में निराशा फैला रहा है। सिर्फ स्याह पक्ष ही नहीं होता छापने के लिए, उजला पक्ष भी छापा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाज़ार वाद के इस दौर में अख़बार अब सेवा का माध्यम नहीं रहे, बल्कि विशुध्द रूप से व्यावसाय में बदल गए हैं। यहाँ तक ठीक था मगर ये क्या ? बृजमोहन जी भी अचानक कल्टी मार गए। वो भी चल पड़े पूर्व वक्ताओं की राह पर। तत्काल कहा कि हितवाद इसका अपवाद है। हितवाद हमेशा ईमानदारी से सच्चाई की राह पर चलता रहा है। आयें! ये क्या हो गया भैय्या। पहले तो कानों पे विश्वास ही नहीं हुआ, फिर बृजमोहन जी को उसी स्पीड से हितवाद पुराण वाचते देखा तो समझ में आया कि वे मक्खनबाजी में अपने से जूनियर केदार कश्यप से पीछे नहीं रहना चाहते थे।
आखिर में बोले डॉ. साहब! यानि मुख्यमंत्री रमन सिंह। उनको बुलाने के लिए जब उद्धोषक ने बोलना शुरू किया तो ऐसा लगा कि उनकी पार्टी का, उन्हीं के गुट का और उन्हीं के परिवार का सदस्य बोल रहा हो। आ.. हा .. हा ! देश के सबसे सफल मुख्यमंत्री, यहाँ तक तो ठीक था देश के सबसे खुबसूरत मुख्यमंत्री ! अब बताईए भला, है न रिकॉर्ड तोड़ मक्खनबाजी। खैर मुख्यमंत्री भी भला कैसे हार मान लेते पत्रकारों से, और अपने से पहले मक्खनबाजी में रिकॉर्ड बना चुके वक्ताओं से। वे तो नेता ही नहीं डॉक्टर भी हैं और समय की नब्ज़ अच्छी तरह जानते हैं। सो उन्होंने भी हितवाद को देश का एकमात्र ईमानदार और सच्चा अख़बार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
और क्या बताएँ आपको हितवाद पुराण। एक से बढ़कर एक महारथी, पूरी दमदारी और ईमानदारी से मक्खनबाजी में उन पत्रकारों को बीट कर गए, जो रोज उनको सरकार बढ़िया चल रही है कहकर मक्खन लगाने में वर्ल्ड रिकॉर्ड बना चुके हैं। हालाकि कुछ असंतुष्ट टाईप के पत्रकारों ने, जिनके हाथ थोड़े छोटे हैं और जिनके पास मक्खन थोड़ा कम हैं, मुझसे प्रोटेस्ट ज़रूर किया। मैं भी क्या कर सकता था ? सुनना और वो भी झूठ सुनना, अब लगता है अपनी डयूटी में शामिल हो गया है। नहीं जाओ तो विरोधी ठहरा दिए जाते हैं और जाओ तो चुप रहा नहीं जाता। अब लिख मारा है ब्लॉग में अगर किसी ने पढ़ लिया तो वो हरिराम (शोले फिल्म के जेलर का ख़बरी) ज़रूर हितवाद वालों को बता देगा। थोड़ी बहुत गुंजाइश एमरजेंसी में नौकरी की बची होगी तो वो भी खत्म। अब तो सिर्फ यही कहा जा सकता है जाने भी दो यारों।
अंग्रेजी दैनिक हितवाद छत्तीसगढ़ में 8 साल पूरे कर रहा है और इन 8 सालों में उसने अपना भवन और अपनी प्रिंटिंग युनिट लगा ली। उससे पहले वो किराए के भवन में चल रहा था और दूसरे अख़बार की मशीन पर छप रहा था। सो हितवाद ने अपने लिए ऐतिहासिक इस समारोह को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के साथ-साथ कई बार केन्द्रीय मंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल को भी बुलाया। वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल और लोक स्वास्थ्य मंत्री केदार कश्यप भी विशिष्ट अतिथि थे। कुछ मंत्री पहुँच नहीं पाए। वैसे अतिथियों की लिस्ट काफी लंबी थी।
अपने अख़बार हितवाद की तारीफ करने में बनवारी लाल पुरोहित ने कोई कसर नहीं छोड़ी। ये उनका कर्तव्य भी था और अधिकार भी। लेकिन उसके बाद जो हितवाद की तारीफ का सिलसिला शुरू हुआ वो मक्खन बाजी की प्रतियोगिता जीतने की होड़ भी नज़र आई। हालाकि वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल बोलते-बोलते अख़बार को सेवा नहीं व्यापार कहने से नहीं चुके, लेकिन उसके साथ ही तत्काल ये भी कह दिया कि हितवाद एक अपवाद है।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण षुक्ल के तो हितवाद के परिवार से नागपुर से ही संबंध रहे हैं। उनके पिता स्वर्गीय पंडित रविशंकर शुक्ल सीपी एण्ड बरार के मुख्यमंत्री रहे हैं। इस बात का उल्लेख पुरोहित जी ने किया, तो विद्याचरण शुक्ल अपने पुराने संबंधों की खातिर हितवाद को ईमानदारी की राह पर चलने वाला एकमात्र अख़बार बता दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजों के खिलाफ जनता की आवाज़ उठाने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वो आज भी जारी है। धन्य हो शुक्ल जी। शुक्ल जी और तारीफ करते लेकिन उन्हें कहीं जाना था, सो मुख्यमंत्री से पहले बोलकर और इस बात के लिए क्षमा माँगकर अपने चेले-चपाटे के साथ निकल लिए।
लोक स्वास्थ्य मंत्री केदार कश्यप ने विद्याचरण शुक्ल को हितवाद की तारीफ करने में भरपूर टक्कर दी। उन्होंने तो यहाँ तक कह डाला कि वे अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए नियमित रूप से हितवाद पढ़ते हैं। वाह! ग़जब कर दिया गुरू। टाईम्स वाले हो सकता है अब हितवाद पढ़कर अंग्रेजी लिखें। तेज तर्रार वनमंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने जब बोलना शुरू किया, तो ऐसा ज़रूर लगा कि अब हितवाद पुराण खत्म हुआ। उन्होंने पत्रकार और पत्रकारिता पर सीधे वार किया। उन्होंने कहा निगेटिव ख़बरें छापकर अख़बार समाज में निराशा फैला रहा है। सिर्फ स्याह पक्ष ही नहीं होता छापने के लिए, उजला पक्ष भी छापा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाज़ार वाद के इस दौर में अख़बार अब सेवा का माध्यम नहीं रहे, बल्कि विशुध्द रूप से व्यावसाय में बदल गए हैं। यहाँ तक ठीक था मगर ये क्या ? बृजमोहन जी भी अचानक कल्टी मार गए। वो भी चल पड़े पूर्व वक्ताओं की राह पर। तत्काल कहा कि हितवाद इसका अपवाद है। हितवाद हमेशा ईमानदारी से सच्चाई की राह पर चलता रहा है। आयें! ये क्या हो गया भैय्या। पहले तो कानों पे विश्वास ही नहीं हुआ, फिर बृजमोहन जी को उसी स्पीड से हितवाद पुराण वाचते देखा तो समझ में आया कि वे मक्खनबाजी में अपने से जूनियर केदार कश्यप से पीछे नहीं रहना चाहते थे।
आखिर में बोले डॉ. साहब! यानि मुख्यमंत्री रमन सिंह। उनको बुलाने के लिए जब उद्धोषक ने बोलना शुरू किया तो ऐसा लगा कि उनकी पार्टी का, उन्हीं के गुट का और उन्हीं के परिवार का सदस्य बोल रहा हो। आ.. हा .. हा ! देश के सबसे सफल मुख्यमंत्री, यहाँ तक तो ठीक था देश के सबसे खुबसूरत मुख्यमंत्री ! अब बताईए भला, है न रिकॉर्ड तोड़ मक्खनबाजी। खैर मुख्यमंत्री भी भला कैसे हार मान लेते पत्रकारों से, और अपने से पहले मक्खनबाजी में रिकॉर्ड बना चुके वक्ताओं से। वे तो नेता ही नहीं डॉक्टर भी हैं और समय की नब्ज़ अच्छी तरह जानते हैं। सो उन्होंने भी हितवाद को देश का एकमात्र ईमानदार और सच्चा अख़बार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
और क्या बताएँ आपको हितवाद पुराण। एक से बढ़कर एक महारथी, पूरी दमदारी और ईमानदारी से मक्खनबाजी में उन पत्रकारों को बीट कर गए, जो रोज उनको सरकार बढ़िया चल रही है कहकर मक्खन लगाने में वर्ल्ड रिकॉर्ड बना चुके हैं। हालाकि कुछ असंतुष्ट टाईप के पत्रकारों ने, जिनके हाथ थोड़े छोटे हैं और जिनके पास मक्खन थोड़ा कम हैं, मुझसे प्रोटेस्ट ज़रूर किया। मैं भी क्या कर सकता था ? सुनना और वो भी झूठ सुनना, अब लगता है अपनी डयूटी में शामिल हो गया है। नहीं जाओ तो विरोधी ठहरा दिए जाते हैं और जाओ तो चुप रहा नहीं जाता। अब लिख मारा है ब्लॉग में अगर किसी ने पढ़ लिया तो वो हरिराम (शोले फिल्म के जेलर का ख़बरी) ज़रूर हितवाद वालों को बता देगा। थोड़ी बहुत गुंजाइश एमरजेंसी में नौकरी की बची होगी तो वो भी खत्म। अब तो सिर्फ यही कहा जा सकता है जाने भी दो यारों।
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