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Monday, July 26, 2010

इंसान सबसे ज्यादा माफ़ी किससे मांगता है?

पेश है एक छोटी सी पहेली,छोटा सा सवाल या कह लिजिये छोटी सी पोस्ट।कल रात्रिकालीन सत्संग जब फ़ुलफ़ार्म में था तब अचानक मैंने सबसे एक सवाल पूछा।सवाल पूछते ही सबने छूटते ही जवाब देने शुरू कर दिये।सवाल तो आप समझ ही गये होंगे,जी हां बिल्कुल वही,इंसान सबसे ज्यादा माफ़ी किससे मांगता है।अब जो जवाब सामने आये वे सब आपके भी मन मे उमड़-घुमड़ रहे होंगे।इंसान सबसे ज्यादा माफ़ी भगवान से मांगता है,डाक्टर का जवाब आया,लक्ष्मण का जवाब था अपने-आपसे।मणी बापा-सत्येन्द्र ने कहा मां-बाप से तो राकेश भी अपने आप से का राग आलापने लगा।भगवान,मां-बाप और अपने-आप इसके अलावा तो इंसान किसी से कभी-कभार ही माफ़ी मांगता है।सबने अपने-अपने जवाब के सही होने की पुष्टी चाही मगर मैने सबके जवाब को गलत कह कर सबका दिमाग खराब कर दिया।तब सबने एकस्वर मे पूछा तो तू ही बता दे कि सही जवाब क्या है?मैने कहा बिल्कुल और जो जवाब बताया तो सबका दिमाग और खराब हो गया,।लिजिये आप को बता देते हैं सही जवाब क्या है?इंसान सबसे ज्यादा माफ़ी भिखारियों से मांगता है।है ना सही जवाब्।जैसे कोई भिखारी मांगने आता है तो पहला वाक्य यही निकलता है माफ़ करो बाबा।छुट्टे नही तो बाद मे आता है।तो बताईये सही जवाब है ना मेराओ गया ना आपका भी दिमाग खराब्।हा हा हा हा हा हा।मेरा भी हुआ था जब ये सवाल मुझसे मेरे दोस्त किशोर ने उसके शापिंग माल मे जाने पर पूछा था।तब मेरे भी जवाब वही थे जो मेरे दोस्तों के थे मगर मुझे किशोर ने बताया कि नही सही जवाब ये है।तब मैं भी चकरा गया था।तो कैसी लगी मेरी पहेली।

Sunday, January 31, 2010

ये करो तो ऐसा है,वो करो तो वैसा है,आदमी बेचारा करे तो क्या करे?

एक छोटी सी मज़ेदार पोस्ट।बात निकली तो समझिये बस निकलती चली गई।आदमी को कल हमारे मित्र ड़ा अजय बेचारा साबित करने पर उतर आये थे।दो एक डीडी वन,दूरदर्शन वाला डीडी वन नही डीडी वन याने डऊकी(पत्नी) डरहा नम्बर वन,ने उनकी बातो का विरोध करने की कोशिश मगर जब डा ने अपने तर्क मे ये कहा तो सब खामोश रह गये।

डा ने कहा कि बताओ आदमी क्या कर सकता है,वो तो लाचार है,बेचारा है।
अगर वो बीबी पर हाथ उठाता है तो ज़ालिम कहलाता है,
अगर बीबी से पिट जाता है तो बुज़दिल,

औरत को किसी के साथ देख कर लड़ाई करे तो जलनकुकड़ा और अगर खमोश रहे तो बेगैरत,

घर से बाहर रहे तो आवारा और घर मे घुसा रहे तो नाकारा,

बच्चों को डांटे तो निर्दयी और न डांटे तो लापरवाह,

औरत को सर्विस करने से रोके तो शक्की और उसे काम करने दे तो उसकी कमाई खाने वाला।

उसके बाद डा बोला और बताऊ या इतना काफ़ी है।अब तक़ बाकी सब डीडी वन सरेंडर कर चुके थे।सब बोले यार डा बात तो ठीक है मगर क्या करें मज़बूरी है यार उधर का फ़ेवर भी तो करना पड़ता है ना।
ये सारा किस्सा दोस्तों की महफ़िल मे हंसी-मज़ाक के दौर का है।इसमे सीरियस होने जैसा कुछ भी नही है।ये किसी का मज़ाक उड़ाने के लिये नही कहा गया और ना ही यंहा किसी वर्ग विशेष को अच्छा या बुरा साबित करने की कोशिश है।हंसी-मज़ाक के दौर मे इसका केंद्र मैं भी था,मेरी शादी की बात को लेकर शुरू हुई बहस ने ये मोड़ ले लिया था।आपको क्या लगता है कि डा का कहना सही है या गलत?बताईयेगा ज़रूर।आपकी राय मुझे आगे का फ़ैसला लेने मे मदद करेगी।

करो तो ऐसा है,वो करो तो वैसा है,आदमी बेचारा करे तो क्या करे?