Showing posts with label भिखारी. Show all posts
Showing posts with label भिखारी. Show all posts

Saturday, January 28, 2012

अगर यु पी के लोग महाराष्ट्र में मज़दूरी करने की वजह से आपको भिखरी नज़र आये तो इटली में मज़दूरी करते पंजाबी लोग आपको भिखारी क्यों नही लगे?

वाह क्या कहना है आपका राहुल जी!मान गये आपको!अगर यु पी का आदमी रोज़गार के लिये महाराष्ट्र जाता है तो आप कहते है कि यु पी के लोग महाराष्ट्र में भीख मांग रहे हैं और जब आप को पंजाब के लोग इटली के खेतों में मज़दूरी करते नज़र आते है तो आप कहते हैं कि पंजाब के लोग इटली को चला रहे हैं.अगर यु पी के लोग महाराष्ट्र में मज़दूरी करने की वजह से आपको भिखरी नज़र आये तो इटली में मज़दूरी करते पंजाबी लोग आपको भिखारी क्यों नही लगे?एक ही काम के लिये आपके दो दो नज़रिये क्यों?एक ही काम के लिये आपकी दो दो परिभाषा क्यों?कंही इसलिये तो नही कि आप भी दो नस्लो के प्रतिनिधी हैं?कंही इसलिये तो नही कि इटली आपका ननिहाल है?आखिर क्यों फर्क़ है आपके नज़रिये में?क्या सिर्फ चुनावी नज़रिया है?पंजाब के लोगों की तारीफ और युपी के लोगो के ज़ख्मों को कुरेद कर उसपर मरहम लगा कर सिर्फ और सिर्फ वोट बटोरना ही आपका उद्देश्य है?

Monday, July 26, 2010

इंसान सबसे ज्यादा माफ़ी किससे मांगता है?

पेश है एक छोटी सी पहेली,छोटा सा सवाल या कह लिजिये छोटी सी पोस्ट।कल रात्रिकालीन सत्संग जब फ़ुलफ़ार्म में था तब अचानक मैंने सबसे एक सवाल पूछा।सवाल पूछते ही सबने छूटते ही जवाब देने शुरू कर दिये।सवाल तो आप समझ ही गये होंगे,जी हां बिल्कुल वही,इंसान सबसे ज्यादा माफ़ी किससे मांगता है।अब जो जवाब सामने आये वे सब आपके भी मन मे उमड़-घुमड़ रहे होंगे।इंसान सबसे ज्यादा माफ़ी भगवान से मांगता है,डाक्टर का जवाब आया,लक्ष्मण का जवाब था अपने-आपसे।मणी बापा-सत्येन्द्र ने कहा मां-बाप से तो राकेश भी अपने आप से का राग आलापने लगा।भगवान,मां-बाप और अपने-आप इसके अलावा तो इंसान किसी से कभी-कभार ही माफ़ी मांगता है।सबने अपने-अपने जवाब के सही होने की पुष्टी चाही मगर मैने सबके जवाब को गलत कह कर सबका दिमाग खराब कर दिया।तब सबने एकस्वर मे पूछा तो तू ही बता दे कि सही जवाब क्या है?मैने कहा बिल्कुल और जो जवाब बताया तो सबका दिमाग और खराब हो गया,।लिजिये आप को बता देते हैं सही जवाब क्या है?इंसान सबसे ज्यादा माफ़ी भिखारियों से मांगता है।है ना सही जवाब्।जैसे कोई भिखारी मांगने आता है तो पहला वाक्य यही निकलता है माफ़ करो बाबा।छुट्टे नही तो बाद मे आता है।तो बताईये सही जवाब है ना मेराओ गया ना आपका भी दिमाग खराब्।हा हा हा हा हा हा।मेरा भी हुआ था जब ये सवाल मुझसे मेरे दोस्त किशोर ने उसके शापिंग माल मे जाने पर पूछा था।तब मेरे भी जवाब वही थे जो मेरे दोस्तों के थे मगर मुझे किशोर ने बताया कि नही सही जवाब ये है।तब मैं भी चकरा गया था।तो कैसी लगी मेरी पहेली।

Monday, November 23, 2009

ये भगवान भी देखो एड्रेस गलत दे कर हम भक्तों को परख रहा है

रात्रिकालीन सत्संग का एड्रेस बदल गया था।होटल के बंद कमरो की बजाय सत्संग गोपाल के घर मे होना था।उसमे शिरकत करने आ रहे थे उसके व्यापारिक साथी और मित्र अशोक कुमार शर्मा।अरबो रुपये की कंपनी के वाईस प्रेसिडेंट हैं वो और हम सभी दोस्तों से दिन मे उनकी मुलाकात पहले भी हो चुकी है।रात्रिकालीन सत्संग मे उनसे पहली मुलाकात थी।गोपाल सींधी है और उसके घर मे बोतल खुलने मे कोई ऐतराज नही है।शर्मा जी के नाम पर जाम छलकने शुरू हुये और छलकते चले गये।

पीने-पीलाने के दौर मे बात निकल पड़ी शराब की तो एक से एक किस्से सामने आते चले गये।ऐसे मे दिल्ली के पंजाबी भाई शर्मा जी कंहा पीछे रहते।सो उन्होने भी शराब की तारीफ़ के पुल बांध दिये। शराब को लिगलाईज़ करने के लिये एक से बढकर एक उदाहरण दिये गये।डाक्टर सुबह ही पूना से कान्फ़्रेंस अटैण्ड करके लौटा था,सो वो सबसे पहले भाग निकलने का बहाना ढूंढने लगा।ये देखकर शर्मा जी भी डाक्टर से आग्रह करने लगे और दूसरे के बाद तीसरे पैग पर खतम करने कि बात कह कर उसे रोकने मे कामयाब हो गये।

इसके बाद हर कोई शराब के फ़ेवर मे अपना-अपना तर्क सामने रखता चला गया।इस पर शर्मा जी ने कहा कि भाई आप लोग सब बोल चुके हो तो मुझे भी मौका दे दो।सबने कहा शर्मा जी ये भी कोई पूछने की बात है।बोलिये आप जो कहना चाह्ते हैं।अब शर्मा जी शुरू हो गये।उन्होने कहा कि एक भिखारी बहुत परेशान होने के बाद एक मंदिर के सामने जा खड़ा होता है।बिल्कुल ही नये टाईप का टापिक सुनकर सब दोस्तों के कान खड़े हो गये और सबने कहा एक स्वर मे पूछा कि फ़िर क्या हुआ महाराज्।

महाराज शर्मा जी बोले मंदिर से बाहर निकलने वाले भक्त गण बाहर खड़े भिखारी के पात्र मे अट्ठन्नी,चवन्नी डालने लगे और उस रकम को जमा कर भिखारी अपना जीवन चलाने लगा।एक दिन जाने कैसे भिखारी मंदिर तक़ नही पहुंच पाया और उसने रास्ते मे देर हो जाने पर एक बार के सामने खड़े होकर अपना पात्र सामने रख कर भिक्षा मांगने लगा।थोड़ी देर तक़ बार से कोई भी बाहर नहि निकला और कुछ देर बाद अपने भाई लोग बाहर आने लगे।उसके बाद बाहर आने वाला हर मदिरा प्रेमी भाई उस भिखारी के पात्र मे पांच रुपया,दस रूपया,डालने लगा।थोड़ी देर मे ही भिखारी का पात्र नोटों से भर गया। नोटो से भरे पात्र को देखकर उसने सिर्फ़ इतना ही कहा कि भगवान भी देखो एड्रेस गलत दे कर हम भक्तों को परख रहा है।रहता यंहा है और एड्रेस मंदिर का दे रखा है।डिस्क्लेमर अगेन।किसी साथी को बुरा लगा हो तो एडवांस मे माफ़ी मांग लेता हूं उनसे,ये पोस्ट दिल्ली से आये बेहद ज़िंदादिल इंसान अशोक कुमार शर्मा को समर्पित है।आप ज़रूर बताईयेगा कैसी लगी ये पोस्ट्।समीर जी चीयर्स्।छत्तीसगढ के साथी आपका इंतज़ार कर रहे हैं।