पिप्ली लाईव का हिरो नत्था।द रियल हिरो आफ़ सिल्वर स्क्रीन।नत्था यानी ओम्कार दास माणिकपुरी आज चर्चा का केन्द्र है।उसने अभिनय के झण्डे गाड़ दिये हैं।स्वाभाविक अभिनय क्या होता है दुनिया को बता दिया है नत्था ने।नत्था फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद छत्तीसगढ के प्रवास पर आया है।उसे सबसे पहले सम्मानित किया दैनिक अख़बार नेशनल लुक ने।नेशनल लुक के समारोह मे प्रदेश के मुख्यमंत्री डा रमन सिंह,विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक समेत मंत्रियों,महापौर ने गणमान्य नागरिको की उपस्थिति मे सम्मानित किया।मुख्यमंत्री रमन सिंह ने तो नत्था को एक लाख रू और नेशनल लुक के प्रधान संपादक राजेश शर्मा ने पचास हज़ार रूपये की सम्मान राशि भी दी।उसके बाद प्रेस क्लब मे मैंने भी अपने साथियों के साथ नत्था को सम्मनित किया।सच मानिये नत्था को सम्मानित करते समय मुझे ऐसा लगा कि मेरा सम्मान हो रहा है।
फ़िल्म के सुपर_डुपर हिट होने के बाद भी नत्था मे कोई बदलाव नही आया है।वो वही भोला-भाला छत्तीसगढिया है।सादगी की मूरत नत्था बात-बात पर आमीर खान के साथ-साथ हबीब तनवीर का शुक्रिया अदा करता हैं।हबीब तनवीर के नया थियेटर की देन नत्था अभी भी कहता है कि थियेटर नही छोडूंगा।उसे फ़िल्म और थियेटर मे बहुत ज्यादा अंतर नज़र नही आता।वो बेहद सादगी से बताता है कि दोनो मे ही डायलाग याद करने पड़ते हैं।थियेटर को कला पक्ष मे और फ़िल्मों को तकनीकी पक्ष मे ज्यादा मज़बूत मानता है नत्था।वैसे हर कलाकार कि तरह उसका भी यही कहना है फ़िल्मो मे रिटेक होता है और थियेटर मे रिटेक की कोई जगह नही होती।
नत्था का यंहा तक़ का सफ़र संघर्षपूर्ण रहा है।गरीबी से तो शायद उसकी जन्म-जन्म की रिश्तेदारी है।आज ग्लैमर की दुनिया की चकाचौंध के बीच भी उसे अपने जीवन की अनिश्चितता का भय सताता है।उसका कहाना है थिएटर से इतने पैसे नही मिलते की आराम की ज़िंदगी गुज़ार सके।हिंदी सिनेमा मे अचानक़ धूमकेतू की तरह चमके नत्था को फ़िलहाल तो लटके-झटको ने नही जकड़ा है और वो कहता भी है कि मैं वही सीधा-सादा,भोला-भाला छत्तीसगढिया हूं,चाहे मुझे ओंकार कहिये या फ़िर नत्था।