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Tuesday, January 25, 2011

बहादुर ऐसी कि कंही से नही लगे कि वे बच्चे हैं

प्रेस क्लब में राज्य वीरता पुरस्कार प्राप्त सात बच्चों को हर साल तरह सम्मानित किया गया।सभी बच्चों के बहादुरी के किस्से एक से बढ कर एक।पिछले साल की तरह इस साल भी राज्य के दो बच्चे राष्ट्रीय पुरस्कार के लिये चुने गये हैं।उन बच्चों मे से एक तो धूर नक्सली क्षेत्र की रहने वाली है जो नक्सलियों के चंगुल में फ़ंस गई थी।अंजली सिंह गौतम ने न केवल खुद को बल्कि अपने छोटे भाई को उनके चुंगल से बचाया था।

अध्यक्ष होने के नाते बच्चों को सम्मानित करने का मौका फ़िर मुझे मिला और उन्हे सम्मानित करना मेरे लिये सबसे बड़े सम्मान की बात थी।एक छोटी बच्ची शीतल साध्वी सलूजा से जब मैने उसके स्कूल और क्लास के बारे में पूछा तो वो मेरी भतीजी की क्लास में ही पढने वाली निकली।कक्षा चौथी की बहादुर बच्ची ने अपनी मम्मी की चेन खींचकर भाग रहे लुटेरे पर झपट्टा मारा उअर उसे भागने से पहले गिराने मे सफ़ल रही।
सबसे छोटे बच्चा भागवत यादव पहली रायपुर आया था।ग्रामीण परिवेश के भागवत और उसके भाई युवराज यादव ने दो बच्चों को डूबने से बचाया था।इसी तरह देवाशीष पाण्डेय ने अपनी जान पर खेल कर तीन छात्रों को बचाया थ और चौथे को बचाते-बचाते खुद भी बेहोश कर डूबने लगा था।उसने अंत तक उसे बचाने का प्रयास किया मगर वह उसे नही बचा पाया मगर उसने अपनी जान पर खेलकर तीन बच्चों की जान बचाई थी।जयदीप सिंह बैस और दुर्गेश ओट्टी की भी बहादुरी किसी से कम नही थी।

राज्य के उन जाबांज बच्चों की हिम्मत को हम सबने नमन किया और उनके पालको को भी प्रणाम किया।इस दौरान बच्चों के बारें मे बताते-बताते छत्तीसगढ बाल कल्याण परिषद के मोहन चोपड़ा भाव-विव्हल होकर रो पड़े थे।बच्चों के सेवा मे हमेशा की तरह हमारे पत्रकार साथी स्व्। कुलदीप निगम के अनुज राजेन्द्र निगम पुरी तन्मयता से लगे हुये थे।सच मे बहुत अच्छा लगा उन बच्चों का सम्मान करके।

Sunday, August 22, 2010

पिपली लाइव के हिरो नत्था का सम्मान करना सबसे बड़ा सम्मान है!

पिप्ली लाईव का हिरो नत्था।द रियल हिरो आफ़ सिल्वर स्क्रीन।नत्था यानी ओम्कार दास माणिकपुरी आज चर्चा का केन्द्र है।उसने अभिनय के झण्डे गाड़ दिये हैं।स्वाभाविक अभिनय क्या होता है दुनिया को बता दिया है नत्था ने।नत्था फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद छत्तीसगढ के प्रवास पर आया है।उसे सबसे पहले सम्मानित किया दैनिक अख़बार नेशनल लुक ने।नेशनल लुक के समारोह मे प्रदेश के मुख्यमंत्री डा रमन सिंह,विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक समेत मंत्रियों,महापौर ने गणमान्य नागरिको की उपस्थिति मे सम्मानित किया।मुख्यमंत्री रमन सिंह ने तो नत्था को एक लाख रू और नेशनल लुक के प्रधान संपादक राजेश शर्मा ने पचास हज़ार रूपये की सम्मान राशि भी दी।उसके बाद प्रेस क्लब मे मैंने भी अपने साथियों के साथ नत्था को सम्मनित किया।सच मानिये नत्था को सम्मानित करते समय मुझे ऐसा लगा कि मेरा सम्मान हो रहा है।
फ़िल्म के सुपर_डुपर हिट होने के बाद भी नत्था मे कोई बदलाव नही आया है।वो वही भोला-भाला छत्तीसगढिया है।सादगी की मूरत नत्था बात-बात पर आमीर खान के साथ-साथ हबीब तनवीर का शुक्रिया अदा करता हैं।हबीब तनवीर के नया थियेटर की देन नत्था अभी भी कहता है कि थियेटर नही छोडूंगा।उसे फ़िल्म और थियेटर मे बहुत ज्यादा अंतर नज़र नही आता।वो बेहद सादगी से बताता है कि दोनो मे ही डायलाग याद करने पड़ते हैं।थियेटर को कला पक्ष मे और फ़िल्मों को  तकनीकी पक्ष मे ज्यादा मज़बूत मानता है  नत्था।वैसे हर कलाकार कि तरह उसका भी यही कहना है फ़िल्मो मे रिटेक होता है और थियेटर मे रिटेक की कोई जगह नही होती।
नत्था का यंहा तक़ का सफ़र संघर्षपूर्ण रहा है।गरीबी से तो शायद उसकी जन्म-जन्म की रिश्तेदारी है।आज ग्लैमर की दुनिया की चकाचौंध के बीच भी उसे अपने जीवन की अनिश्चितता का भय सताता है।उसका कहाना है थिएटर से इतने पैसे नही मिलते की आराम की ज़िंदगी गुज़ार सके।हिंदी सिनेमा मे अचानक़ धूमकेतू की तरह चमके नत्था को फ़िलहाल तो लटके-झटको ने नही जकड़ा है और वो कहता भी है कि मैं वही सीधा-सादा,भोला-भाला छत्तीसगढिया हूं,चाहे मुझे ओंकार कहिये या फ़िर नत्था।

Wednesday, July 7, 2010

अफ़सोस अपने ही गुरू के सम्मान समारोह मे नही पंहुच पाया

गुरू का सम्मान हो और चेला उस कार्यक्रम में विशिष्ठ अतिथी हो,चेले के लिये इससे बढिया बात और क्या हो सकती है।मगर कहते है ना हर किसी की तक़दीर मे गुरू को सम्मानित करना लिखा नही होता और शायद इस मामले मे मैं भी दुर्भाग्यशाली ही रहा।मैं बात कर रहा हूं अपने ब्लाग गुरू संजीत त्रिपाठी के सम्मान समारोह की।जी हां सम्मान हुआ मेरी ही अध्यक्षता वाले प्रेस क्लब मे और उस समारोह का एक विशिष्ठ अतिथी मैं भी था।पर बुरा हो पापी पेट का जो मैं चाह कर भी उस कार्यक्रम मे जा नही पाया।इस बात का अफ़सोस मुझे हमेशा रहेगा।


संजीत मेरे लिये छोटे भाई जैसा और जब मैने उसे जनसत्ता मे अपने सहकर्मी के रूप मे देखा तो मुझे लगा इसमे बहुत कुछ धधक रहा है।वो मेरा जुनियर था और पत्रकारिता मे उसकी वो शुरूआत ही थी।अम्बरीष कुमार,अनिल सिन्हा और अनिल यानी मैं तीन इक्के उसके गुरू थे।उसने पत्रकारिता मे बढिया काम किया और एक दिन वो मुझे पकड कर अपने घर ले गया और उसने मुझे ब्लाग के बारे मे बताया।उसके बाद न केवल उसने मेरा ब्लाग बनाया बल्कि वो सब काम छोड़ कर मेरे आर्टिकल भी पोस्ट करता था।उसने मुझे ज़ोर देकर टाईप करना सिखाया और आज अगर मैं बिना किसी के मदद के पोस्ट करता हूं तो उसका श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ संजीत को ही जाता है।पता नही मैं पत्रकारिता में कुछ सीखा पाया या नही मगर उसने यकीनन मुझे ब्लाग लिखना सिखाया।मैं उसका गुरू हूं या नही ये कन्फ़र्म नही मगर वो मेरा गुरू है ये कन्फ़र्म है।

आज मैं बहुत दुःखी भी हुं और उतना ही खुश भी।दुःखी इसलिये कि उसे सम्मानित करने वाले पल का मैं साक्षी नही बन सका और खुश इसलिये हूं कि चलो मैं ना सही बड़े-बड़े लोगों के हाथो वो सम्मानित तो हुआ।संजीत का सम्मान हुआ है हिंदी ब्लागिंग के लिये और उसे सम्मानित किया है ब्लाग को प्रोत्साहित करने वाले साहित्यकार जयप्रकाश मानस के नेतृत्व वाले छत्तीसगढ के पहले वेब पोर्टल सृजन गाथा डाट काम ने।इसी सम्मान से संजीव तिवारी और खुद मैं भी सम्मानित हो चुका हूं इसलिये मुझे और अच्छा लग रहा है।अच्छा है संजीत खूब तरक्की करे ब्लाग जगत मे अपना और छत्तीसगढ का डंका बजाते रहे यही शुभाषिश है।ख्यातनाम लेखक विनोद कुमार शुक्ल,लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार श्रीप्रकाश मिश्र,जाने माने पत्रकार रमेश नैयर,गोविंदलाल वोरा,अनिल विभाकर,रवि भोई जयप्रकाश मानस के हाथों संजीत का सम्मानित होना अपने आप मे उपलब्धी है और मुझे तो ऐसा लग रहा है जिसे वो नही खुद मैं सम्मानित हुआ हूं,संजीत को बहुत बहुत बधाई।उसकी बेबाक कलम चलती रही हमेशा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।