क्या आत्महत्या ही सारी समस्याओं का हल है?ये सवाल मेरे अकेले का नही है और ये अचानक़ ही मेरे दिल-दिमाग में उथल-पुथल नही मचा रहा है।पिछले कुछ दिनों से इस सवाल ने मुझे बैचैन कर दिया है।आखिर आत्महत्या से सारी समस्यायें खत्म कैसे हो सकती है?मेरे हिसाब से तो उसके बाद समस्यायें और बढ जाती है भले ये दिखने के लिये आत्मह्त्या करने वाला रहे या न रहे।
आत्मह्त्या,छोटा सा शब्द और छोटा सा ही मामला हम खबरचियों के लिये।कंही कोई फ़ालोअप नही कंही कोई पब्लिक इंट्रेस्ट नही।बस मरने वाले और उसके परिजनों,इष्टमित्रों तक़ सीमित रहता है ये मामला और बहुत ज्यादा तो हुआ तो दो-चार सेंटी टाईप के लोग च्च्च्च्च,च्च्च्च्च, करके अफ़सोस ज़ाहिर कर देते हैं बस।
इस आत्मह्त्या ने मुझे भी कुछ दिनों से विचलित कर रखा है।कल भी मैं इसी कारण अपनी सुनहरी यादों मे लौट नही पाया।कल फ़िर इंजीनियरिंग के एक छात्र ने आत्मह्त्या कर ली थी और एक बारहवीं की छात्रा ने भी।इसके पहले भी इंजीनियरिंग के दो छात्र जान दे चुके हैं और बारहवीं की एक छात्रा भी।लगातार आत्मह्त्या कंही न कंही ये सोचने को मज़बुर कर रही है कि इस पूरे मामले मे दोषी कौन है?आत्मह्त्या करने वाले या उसे ये कदम उठाने पर मज़बूर कर रहें हम लोग,यानी उनके परिजन?
आखिर ऐसी क्या वज़ह होती है जो उन्हे ये कदम उठाना पड़ता है।बारहवीं या इंजीनियरिंग के फ़र्स्ट ईयर का छात्र वयसंधी के मोड पर खड़ा हमारा उत्तराधिकारी होता है।वो दुधमुंहा बच्चा नही बल्कि समझदारी की दुनिया मे कदन रख चुका होता है।फ़िर उससे ऐसी बेवकूफ़ी की उम्मीद तो कोई नही कर सकता?तो फ़िर क्या वज़ह है कि वे ऐसा कठोर फ़ैसला ले लेते हैं जिसकी सज़ा वे अपनी जान देकर और पूरे परिवार को मरते दम तक़ सालते रहने वाला दुःख देकर भुगत लेते हैं।
देखने को तो ये बहुत मामली सी बात लगती है और खासकर तब जब मरने वाला कोई अपना ना हो।मगर जब कोई अपना होता है तो समझ मे आ सकता है,आत्महत्या का दर्द, मरने वाले से ज्यादा उसके जाने के बाद पीछे छूटे रिश्तेदार खासकर मां-बाप,भाई-बहन को होता है।
खैर इस बारे मे बहुत सी बातें पहले हुई होंगी और शायद होती ही रहेंगी तब-तक़,जब तक़ हम अपने बच्चों को उस स्थिती मे जाने के लिये ढकेलते रहेंगे।पता नही क्यों हम अपने बच्चों से ज़रूरत से ज्यादा अपेक्षा करने लगते हैं?क्यों हम उनसे हमेशा बेहतर और उससे भी बेहतर की उम्मीद करते हैं?मेरे भी घर मे दो बहुत ही छोटी क्लास के छात्र हैं।उनमे से एक क्लास थ्री की स्टूडेंट है मेरी भतीजी युति और दूसरा पी पी यानी के जी टू का स्टूडेंट है हर्षू।दोनो की ही मम्मी परीक्षा के समय बेहद तनाव मे रहती है और बच्चों को रिज़ल्ट खराब आया तो देखना,ये नही मिलेगा,वो नही मिलेगा कहकर धमकाते रहती है।मैने कई बार उन लोगों से कहा कि तुम लोग अपने मार्क्स बताओ फ़िर उनसे कुछ कहो।इस बात पर वे मेरे सामने तो कुछ नही कहती लेकिन बाद मे बच्चों को फ़िर से धमकी मिल जाती है बाबा को बताया ना तो देखना।
आखिर फ़र्स्ट आकर कर ही क्या लेगा बच्चा और अगर फ़ेल भी हो जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा।बहुत समय नही हुआ है जब यंही के एक कक्षा पांचवी की छात्रा को अप्रेल फ़ूल बनाने वालों ने फ़ेल बता दिया था और उस छोटी सी बच्ची ने आत्मह्त्या जैसा बड़ा कदम उठा डाला था।
पता नही मनोवैज्ञानिक इस मामले मे क्या कहतें हैं पर मुझे तो लगता है कि हमारी मह्त्वाकांक्षा,हमारी अपेक्षायें बच्चों को बेवज़ह तनाव मे रखती मे रखती है और जाने-अंजाने उनकी अपेक्षाओं पर खरी नही उतर पाने किस्थिति में उन्हे खुद को ही खत्म कर लेने जैसा कठोर कदम उठाने पर मज़बूर कर रही है।मैं समझता हूं अब भी बहुत कुछ नही बिगड़ा है हमे दूसरों के दुःख से सबक ले लेना चाहिये और अपने बच्चों को अपना स्टेटस सिंबल बनाने,अपने फ़्यूचर का जुगाड़ बनाने की बजाये उन्हे खुद अपना स्टेटस तय करने और अपना भविष्य बनाने के लिये स्वतंत्र कर देना चाहिये,वर्ना आत्मह्त्या विषाद का कारण बनती रहेंगी।
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Sunday, March 21, 2010
Thursday, March 18, 2010
सीज़न परीक्षा का,गैस पेपर और खूबसूरत यादें!
एक दिन अचानक़ एक स्कूटर आकर रुका और उसपर सवार दो युवतियों मे से एक ने पूछा कि दिलीप जी से मिलना है?जो स्कूटर चला रही थी वो तो बेहद साधारण थी लेकिन पीछे जो बैठी थी वो बला कि खूबसुरत थी।उस सूखे-तपते रेगिस्तान मे दोनो का आ जाना अमृत की बूंदो के समान सुखदायी था।दोनो अचानक़ सामने आ गई थी इसलिये प्लानिंग करके कुछ किये जाने की स्थिति मे ह लोग नही थे और इससे पहले कोई कुछ कहता मैने उन्हे रूखा सा जवाब दे दिया दिलीप नही आया है?कब आयेगा के सवाल का जवाब और भी रूखा था,पता नही!
पता नही उस रूखे और अक्खड जवाब मे उन दोनो को क्या नज़र आया वो मुझसे और बातें करन लगी।मेरा चेहरा थोडा बिगड़ने लगा था और इस बात को बाकी लोग भांप गये थे,उन्होने उन दोनो युवतियों को बगल की दिलीप की दुकान मे बिठा कर इंतज़ार करने कहा और वंही से दिलीप को फ़ोन कर दिया।तब सब के सब कुंआरे थे और उनमे से कुछ रोमियो टाईप के रोमेंटिक बाय ट्राई कर करके रोडियो यानी रोड छाप रोमियो हो गये थे मगर सफ़ल नही हो पाये थे।उन लोगों के लिये युवतियों का आना ही एक अच्छी खबर थी।जब तक़ दिलीप आता तब तक़ उनमे से एक को बाकी लोगों की भाभी बनाने के चक्कर मे सब एक दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगे थे।मैने उनसे कहा अबे हो सकता है वो लोग दिलीप की रिश्तेदार हों।मेरा इतना कहना ही सबको मेरा दुश्मन बना गया था।चुप बे जब देखो मनहूसियत फ़ैलाता रहता है।अच्छी बात तो मुंह से निकलती ही नही है,जब देखो अपशकुन।
वो आलस भरे मौसम की बात है।पढाई का दौर खत्म हो चुका था और सब अपने-अपने भविष्य की प्लानिंग मे लग गये थे।दिन मे पसीना तंग करने लगा था और शाम को उससे थोड़ी बहुत राह्त मिल जाया करती थी।शाम होते ही हम सब रायपुर की सबसे व्यस्त सड़क मालवीय रोड़ जिसे छात्र वर्ग माल रोड़ कहा करता था के किनारे अपने ठिकाने पर जमा हो जाया करते थे।कालेज के शुरूआती दिनो से शुरू हुये उस अड़ड़े पर हम सारे दोस्त बिना नागा सालों खड़े होकर खुबसूरत लड़की को आते-जाते देख कर सुनहरे सपने देखा और उसे चूर चूर किया करते थे।
ऐसे मे किसी लड़की का वंहा आकर रूकना और दिलीप के बारे मे पूछताछ करना बाकी लोगों के लिये फ़िर से सपने बुनने की जाब एपोर्चुनिटी ले आया था।दिलीप के बारे मे पूछने वाली को बिना किसी आब्जेक्शन के दिलीप को एलाट कर दिया गया था और उसके पीछे बैठी बेहद खूबसूरत लड़की को सभी एक-दूसरे की भाभी बनाने के नाम पर मरने-मारने पर उतारू हो गये थे।इधर तेरी भाभी नही तेरी भाभी को लेकर बह्स चल रही थी और ऊधर दोनो दुकान पर बैठे-बैठे बोर होने से बचने के लिये दोनो हमारे पास आगई।
सभी की ज़ुबान आग उगल रही ज़ुबान से अचानक़ शहद टपकने लगा और तू-तड़ाक करने वाले रायपुरिया टपोरी नवाबों को मात देने वाले लखनवी अंदाज़ मे आप-जनाब प उतर आये थे।मैंने इतना संजीदा उन लोगों को कभी नही देखा था सो मै पूछ बैठा क्या हो गया बे तुम लोगों को अचानक़?सबकी आंखों मे मई-जून का तपता सूरज उतर आया था जैसा।सबने मुझे घूरा और तत्काल नारम्ल होकर उन युवतियों से कहा दिलीप आता ही होगा,बताईये ना हम लोगों के लायक कोई सेवा हो तो?सेवा मैने इतना ही कहा था कि सभी एक साथ बोले हम लोग सभी दोस्त है और एक दूसरे का काम करने मे पीछे नही हटते।दिलीप और हममे कोई फ़र्क़ नही है,बताईये ना प्लीज़!हम लोगो का सौभाग्य होगा जो आपके काम आ सकें।
मेरा खून खौलने लगा था।साले लड़की आई तो सेवा,और कभी कोई भूल से किसी का पता पूछ ले तो बोर्ड लगे हैं ना,पढना आता है ना,तो खुद पढ लो और पता कर लो।किसी कटखने कुत्ते से कम नही गुर्राते हैं और लड़की देखी तो साले दुम हिला रहे हैं।तब तक़ उनमे से किसी को डाऊट हो गया था कि ये बजरंगी खेल बिगाड़ सकता है सो उनमे से एक ने पूछा तू जा रहा था ना प्रेस,निकल हम लोग आते हैं,उधर ही?मैने कहा थोड़ी देर से जाऊंगा तो सभी बोले कोई मतलब नही है यंहा रूककर ज़ल्दी जा और जल्दी काम निपटा,हम लोग आते है आज ढाबे चलेंगे पार्टी है।मैने पूछा किसकी पार्टी?तो बल्लू ने जवाब दिया आज बीसी है ना जिसकी निकलेगी वो देगा पार्टी समझा ना और अब तू निकल चल्।मैं समझ गया वो युवतियों को बीसी बता रहा था और मुझे टरका रहा था।
तभी दिलीप आ धमका!उनमे से एक ने दिलीप से कहा भैया ला कर रही हूं,मेरे पेपर ठीक नही जा रहे हैं,मुझे पता चला कि आपके पेपर आ जाते हैं।भैया सुनते ही दिलिप का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा ज़रुर था मगर उसके साथ की युवती की खूबसूरती ने उसे तुरंत ज़मीन पर ला दिया।हीरो बनने का मौका खोए बिना उसने कहा आते तो नही है लेकिन आप कहेंगी तो आ जायेंगे।जी मुझे चाहिये प्लीज़ मेरे लिये मंगवा दिजीये ना।मैं आ जाऊंगी।अबकी दिलीप बोला मैं यानी सिर्फ़ आपको चाहिये और इनको?नही ये तो मेरी छोटी बहन है।बी काम फ़ायनल मे है।उसके पेपर भी मिल जायेंगे,सब बेक साथ बोले मगर वो बोली मुझे नही चाहिये पेपर।दीदी को चाहिये बस उनको ही दे दिजिये।
इतनी देर मे वो पहली बार बोली थी।आवाज़ तो ऐसे थी जैसे मीठी गज़ल्।जितनी सुन्दर वो थी आवाज़ उससे ज्यादा और अंदाज़ तो जैसे सबका दिल लूट गया।मैं सब सुन रहा था।मैने तत्काल कहा बिल्कुल सही कह रही हैं आप।ये पेपर-वेपर का चक्कर सही नही है।पता नही उसे क्या लगा वो मुस्कुराई और मैने भी मुस्कुरा कर उसे जवाब दिया।मामले को डाईवर्ट होता देख दिलीप ने उससे कहा कि आप कल शाम आ जाईये मैं आपको पेपर ला दूंगा।जी कह कर दोनों ने थैंक्स कहा और वंहा से निकल गई।उसके बाद तो वंहा महाभारत शुरू हो गया।सबके सबको बीकाम वाली चाहिये थी।दिलीप से सबने कहा अबे तुझे तो भैया कहा था ना उसने,उसने नही बड़ी वाली ने कहा था।
लगता है स्टोरी लम्बी हो गई है।खैर आजके लिये इतना ही आगे का किस्सा कल बताऊंगा।ये कहानी नही हम लोगों की यादों के खज़ाने का अनमोल हीरा है।सच मे उन दिनों को याद करके ही वो सब कुछ मिल जाता है जिसे आज चाह कर भी नही पा सकते।
पता नही उस रूखे और अक्खड जवाब मे उन दोनो को क्या नज़र आया वो मुझसे और बातें करन लगी।मेरा चेहरा थोडा बिगड़ने लगा था और इस बात को बाकी लोग भांप गये थे,उन्होने उन दोनो युवतियों को बगल की दिलीप की दुकान मे बिठा कर इंतज़ार करने कहा और वंही से दिलीप को फ़ोन कर दिया।तब सब के सब कुंआरे थे और उनमे से कुछ रोमियो टाईप के रोमेंटिक बाय ट्राई कर करके रोडियो यानी रोड छाप रोमियो हो गये थे मगर सफ़ल नही हो पाये थे।उन लोगों के लिये युवतियों का आना ही एक अच्छी खबर थी।जब तक़ दिलीप आता तब तक़ उनमे से एक को बाकी लोगों की भाभी बनाने के चक्कर मे सब एक दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगे थे।मैने उनसे कहा अबे हो सकता है वो लोग दिलीप की रिश्तेदार हों।मेरा इतना कहना ही सबको मेरा दुश्मन बना गया था।चुप बे जब देखो मनहूसियत फ़ैलाता रहता है।अच्छी बात तो मुंह से निकलती ही नही है,जब देखो अपशकुन।
वो आलस भरे मौसम की बात है।पढाई का दौर खत्म हो चुका था और सब अपने-अपने भविष्य की प्लानिंग मे लग गये थे।दिन मे पसीना तंग करने लगा था और शाम को उससे थोड़ी बहुत राह्त मिल जाया करती थी।शाम होते ही हम सब रायपुर की सबसे व्यस्त सड़क मालवीय रोड़ जिसे छात्र वर्ग माल रोड़ कहा करता था के किनारे अपने ठिकाने पर जमा हो जाया करते थे।कालेज के शुरूआती दिनो से शुरू हुये उस अड़ड़े पर हम सारे दोस्त बिना नागा सालों खड़े होकर खुबसूरत लड़की को आते-जाते देख कर सुनहरे सपने देखा और उसे चूर चूर किया करते थे।
ऐसे मे किसी लड़की का वंहा आकर रूकना और दिलीप के बारे मे पूछताछ करना बाकी लोगों के लिये फ़िर से सपने बुनने की जाब एपोर्चुनिटी ले आया था।दिलीप के बारे मे पूछने वाली को बिना किसी आब्जेक्शन के दिलीप को एलाट कर दिया गया था और उसके पीछे बैठी बेहद खूबसूरत लड़की को सभी एक-दूसरे की भाभी बनाने के नाम पर मरने-मारने पर उतारू हो गये थे।इधर तेरी भाभी नही तेरी भाभी को लेकर बह्स चल रही थी और ऊधर दोनो दुकान पर बैठे-बैठे बोर होने से बचने के लिये दोनो हमारे पास आगई।
सभी की ज़ुबान आग उगल रही ज़ुबान से अचानक़ शहद टपकने लगा और तू-तड़ाक करने वाले रायपुरिया टपोरी नवाबों को मात देने वाले लखनवी अंदाज़ मे आप-जनाब प उतर आये थे।मैंने इतना संजीदा उन लोगों को कभी नही देखा था सो मै पूछ बैठा क्या हो गया बे तुम लोगों को अचानक़?सबकी आंखों मे मई-जून का तपता सूरज उतर आया था जैसा।सबने मुझे घूरा और तत्काल नारम्ल होकर उन युवतियों से कहा दिलीप आता ही होगा,बताईये ना हम लोगों के लायक कोई सेवा हो तो?सेवा मैने इतना ही कहा था कि सभी एक साथ बोले हम लोग सभी दोस्त है और एक दूसरे का काम करने मे पीछे नही हटते।दिलीप और हममे कोई फ़र्क़ नही है,बताईये ना प्लीज़!हम लोगो का सौभाग्य होगा जो आपके काम आ सकें।
मेरा खून खौलने लगा था।साले लड़की आई तो सेवा,और कभी कोई भूल से किसी का पता पूछ ले तो बोर्ड लगे हैं ना,पढना आता है ना,तो खुद पढ लो और पता कर लो।किसी कटखने कुत्ते से कम नही गुर्राते हैं और लड़की देखी तो साले दुम हिला रहे हैं।तब तक़ उनमे से किसी को डाऊट हो गया था कि ये बजरंगी खेल बिगाड़ सकता है सो उनमे से एक ने पूछा तू जा रहा था ना प्रेस,निकल हम लोग आते हैं,उधर ही?मैने कहा थोड़ी देर से जाऊंगा तो सभी बोले कोई मतलब नही है यंहा रूककर ज़ल्दी जा और जल्दी काम निपटा,हम लोग आते है आज ढाबे चलेंगे पार्टी है।मैने पूछा किसकी पार्टी?तो बल्लू ने जवाब दिया आज बीसी है ना जिसकी निकलेगी वो देगा पार्टी समझा ना और अब तू निकल चल्।मैं समझ गया वो युवतियों को बीसी बता रहा था और मुझे टरका रहा था।
तभी दिलीप आ धमका!उनमे से एक ने दिलीप से कहा भैया ला कर रही हूं,मेरे पेपर ठीक नही जा रहे हैं,मुझे पता चला कि आपके पेपर आ जाते हैं।भैया सुनते ही दिलिप का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा ज़रुर था मगर उसके साथ की युवती की खूबसूरती ने उसे तुरंत ज़मीन पर ला दिया।हीरो बनने का मौका खोए बिना उसने कहा आते तो नही है लेकिन आप कहेंगी तो आ जायेंगे।जी मुझे चाहिये प्लीज़ मेरे लिये मंगवा दिजीये ना।मैं आ जाऊंगी।अबकी दिलीप बोला मैं यानी सिर्फ़ आपको चाहिये और इनको?नही ये तो मेरी छोटी बहन है।बी काम फ़ायनल मे है।उसके पेपर भी मिल जायेंगे,सब बेक साथ बोले मगर वो बोली मुझे नही चाहिये पेपर।दीदी को चाहिये बस उनको ही दे दिजिये।
इतनी देर मे वो पहली बार बोली थी।आवाज़ तो ऐसे थी जैसे मीठी गज़ल्।जितनी सुन्दर वो थी आवाज़ उससे ज्यादा और अंदाज़ तो जैसे सबका दिल लूट गया।मैं सब सुन रहा था।मैने तत्काल कहा बिल्कुल सही कह रही हैं आप।ये पेपर-वेपर का चक्कर सही नही है।पता नही उसे क्या लगा वो मुस्कुराई और मैने भी मुस्कुरा कर उसे जवाब दिया।मामले को डाईवर्ट होता देख दिलीप ने उससे कहा कि आप कल शाम आ जाईये मैं आपको पेपर ला दूंगा।जी कह कर दोनों ने थैंक्स कहा और वंहा से निकल गई।उसके बाद तो वंहा महाभारत शुरू हो गया।सबके सबको बीकाम वाली चाहिये थी।दिलीप से सबने कहा अबे तुझे तो भैया कहा था ना उसने,उसने नही बड़ी वाली ने कहा था।
लगता है स्टोरी लम्बी हो गई है।खैर आजके लिये इतना ही आगे का किस्सा कल बताऊंगा।ये कहानी नही हम लोगों की यादों के खज़ाने का अनमोल हीरा है।सच मे उन दिनों को याद करके ही वो सब कुछ मिल जाता है जिसे आज चाह कर भी नही पा सकते।
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