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Monday, June 30, 2008

पिटते ही नहीं, पीटते भी हैं पत्रकार

आये दिन पत्रकार साथियों के पिट जाने पर प्रेस क्लब में आपात बैठक लेकर निंदा प्रस्ताव पारित करते-करते थक-सा गया था मैं। बैठक के बाद मुख्यमंत्री से मिलना, ज्ञापन देना और पुलिस अफसरों पर गुस्सा उतारना आदत-सी बन गई थी। पर आज ऐसा नहीं हुआ एक नेता पत्रकार साथियों से उलझा और पहली बार ऐसा लगा कि पत्रकार सिर्फ पिटते ही नहीं, पीटते भी है।

रविवार की दोपहर मैं खबरों से जूझ रहा था तभी मोबाइल घनघना उठा। उधर से आवाज आई भैया ये पी.आर. खूंटे बवाल मचा रहा है। गुस्से से मैं फट पड़ा और कहा कि क्या मेरे बिना तुम लोग किसी से निपट नहीं सकते! फोन मेरे प्रिय जूनियर ने किया था। उसने सिर्फ इतना कहा बाद मैं आप नाराज मत होना। उसके बाद फोन कट गया।

थोड़ी देर बाद फोन आया कि खूंटे को ठीक कर दिये है। गालियां बक रहा था और प्रेस क्लब को आग लगाने की धमकी दे रहा था। मैं भड़क गया और कहा आ रहा हूॅ। उधर से आवाज आई आज आपके आने की जरूरत नहीं हैं हम लोगों ने मामला खुद ही निपटा लिया है। मुझे ऐसा लगा कि प्रेस क्लब में मल्टी जिम लगवाना सार्थक हो गया है। मुझे मल्टी जिम के उद्धाटन पर दिया अपना ही भाषण ही याद आ गया। तब मैने खेल मंत्री और महापौर के सामने कहा था कि अब नहीं लगता कि मुझे पत्रकारों के पिटने पर निंदा प्रस्ताव पारित करना और ज्ञापन देने मंत्रियों के चक्कर लगाना पड़ेगा। उस समय सभी ने इसे मजाक में लिया था खुद मैं भी बोलते-बोलते हॅस पड़ा था। मैंने कहा था कि लगता है कि अब लोग पत्रकारों के खिलाफ ज्ञापन देंगे।
और हुआ भी वही। छत्तीसगढ़ विकास पार्टी का अध्यक्ष जो कभी कांस्टेबल हुआ करता था और बर्खास्त होने के बाद जो विधायक और सांसद भी बना, पत्रकारों के खिलाफ शिकायत करने पर मजबूर हो गया। पुलिस में रहते बलात्कार और नेता बनने के बाद रिश्वतखोरी के आरोपों से तरबतर नेता पी.आर.खूंटे को सौ से ज्यादा समर्थकों को प्रेस क्लब से हार कर भागना पड़ा। ये खबर आग की तरह राजधानी समेत पूरे छत्तीसगढ़ में फैल गई। मेरा मोबाइल लगातार घनघनाने लगा। पहले नेताओं और फिर पत्रकारों के फोन आने लगे। सबने बधाईयां ही दी, खासकर कोरबा प्रेस क्लब अध्यक्ष नौशाद खान, मनोज शर्मा समेत छत्तीसगढ़ के सभी छोटे-बड़े शहरों के पत्रकारों ने कहा कि ऐसी क्रांतिकारी शुरूवात आप ही के कार्यकाल में हो सकती थी। खैर अच्छा हुआ या बुरा मुझे नहीं पता लेकिन ये सोचकर मैं बहुत खुश हूॅ कि इस बार मेरे साथी पिटकर नहीं आये।

10 comments:

आशीष कुमार 'अंशु' said...

जानकारी किसी स्थानिय अखबार में भी प्रकशित हुई क्या?

Anonymous said...

lage rahiye. patrakar ke naam par koi shikayat bhi nahin kar sakta oopar se opositon waale andolan bhi karenge aapke paksh me. Katta pistal bhi baant dijiye patrakaro ko.
Aur boliye ki Veero ab samay aa gaya hai. Kalam chhodo aur talwar oothao.

Shiv Kumar Mishra said...

अनिल जी, कभी न कभी तो बेचारा पत्रकार भी पीटेगा ही. कितना पिटेगा?

दिनेशराय द्विवेदी said...

पत्रकार रोज ही तो पीटते हैं कलम से। पहली बार हाथ चले। वे तो चलने ही थे जब अस्मिता पर ही आ पड़ी तो।

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

खूंटा उखाड दिये भाई साहब ।
हा हा हा ।
लगता है अब हम भी आपकी बिरादरी को ज्वाईन कर ही लें ।

श्रद्धा जैन said...

hahahahaha sahi hai itni ghari baat bhi halke fulke andaaz main

kya baat hai aapki Anil ji
likhte rahiye aur haan ek baat aur
koi bhi kaam vayarth nahi jata
dekhiye na zym bhi aakhir kaam aa hi gaya
hahaahha

उमेश कुमार said...

पुसदकर जी आखिर यह नौबत क्यों आ जाती है की प्रेसक्लब मे लोग मारपीट करने को उतारू हो जाए।यह बिगडती कानून ब्यवस्था का प्रश्न है या कोई अन्य कमजोरी जिसकी वजह से लोग ऎसी हिम्मत करते है।इसतरह की घटनाओ से जो सन्देश प्रकट हो रहा वह खतरनाक है इसलिये आप तथा अन्य पत्रकार साथी चिन्तन करें।

उमेश सोनी,बिलासपुर
www.cgno.net

Anil Pusadkar said...

Patrakaron ki Meri Vakalat par aap sabhi ke vichaoron ka swagat hai

Anil Pusadkar said...

aap sabhi vidwanon ka mera blog padhne aur us par pratikriya karne ke liye dhanyawad.mera maksad bhi hungama khada karna nahi hai,meri bhi koshish hai ke surat badalni chhahiye

muskan said...

अनिल जी,
खूंटेजी में अकल होती तो वो पत्रकारों से पंगा ही नहीं लेते; अपनी नासमझी की वजह खूंटे ने पहले ही अपने राजनीतिक कैरियर को चौपट कर रखा है. भगवान उनको अकल दे और पत्रकारों से भीडने से बचाये