Sunday, June 29, 2008

किसका दमन,कैसा दमन, किसका विरोध और कैसा विरोध

छत्तीसगढ़ में नक्सली दमन विरोधी अभियान मना रहें है। पता नहीं वे किस दमन की बात करते है। नक्सली दमन की बात करते है, सरकार लोकतांत्रिक अधिकारों की हनन की बात करती है। पुलिस जंगल में नक्सलियों के आतंक की बात करती है तो नक्सली जंगल के बाहर पुलिस की बात करते है। दमन और हनन के बीच पिसकर लगता है मर गया बस्तर का अमन।

नक्सलियों के दमन विरोधी सप्ताह में न केवल बस्तर बल्कि राजनांदगांव जिले के मानपुर, मोहला और चौकी इलाके में बंद को भरपूर सफलता मिल रही है। आवागनम के साधन, सड़कों से गायब रहे। और तो और बस्तर में रेल प्रशासन ने रात को रेल चलाना बंद कर दिया है। रातों को मालगाड़ियां नहीं चल रही है। अब इसको क्या कहा जा सकता है! नक्सली दमन का विरोध कर रहे है या रेल्वे का आतंक के बल पर दमन कर रहे है।

छत्तीसगढ़ में ना केवल नक्सली बल्कि राजनैतिक पार्टियां भी खुलकर चिल्ला रहीं है कि भाजपा सरकार में आम आदमी का शोषण हो रहा है। और सत्ता के रथ पर सवार भाजपा के लोग चार साल पहले कांग्रेस के कार्यकाल में चिल्लाते थे कि राज्य में सभी वर्गो का शोषण हो रहा है। इस लिहाज से देखा जाये तो छत्तीसगढ़ में सिर्फ शोषित ही बचते है, शोषक कोई नजर नहीं आता। जबकि हालात इसके ठीक उल्टा है । कांग्रेस जब सत्ता में थी तो उसने अपनी संपूर्ण सत्ता कायम रखने के लिये दमन के तमाम हथकंडे अपनायें और कमोवेश यही हालत भाजपा की है। व्यापारी शोषित, छात्र शोषित, पुलिस आतंकित , वनवासी भयभीत और फिर शेष बचता ही क्या है।

कभी कभी लगता है कि हीरों की खदानों वाले इस प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न राज्य का दुर्भाग्य है कि ये देश में मजदूरों की सबसे बड़ी मंडी बनकर उभरा है। हरियाणा के खेतों में, उत्तर प्रदेश के ईंट भट्टों में, मुबंई की निर्माणाधीन बड़ी-बड़ी इमारतों में, महाराष्ट्र की सड़कों पर पसीना बहाते मजदूर छत्तीसगढ़ के ही मिलते है। हॉ बरसात के इन चार महीनों में ही छत्तीसगढ़ की पूरी आबादी छत्तीसगढ़ में रहती है। और बरसात खत्म होते ही लाखों मजदूर अपने खून-पसीनें के साथ अपने परिवार की इज्जत आबरू ठेकेदारों के हाथ में गिरवी रखने पर मजबूर हो जाते है। शायद नक्सलियों की नजर में ये अत्याचार और दमन नहीं है। उनकी दमन की परिभाषा तो वे ही जाने लेकिन ऐसा लगता है कि उनका दमन विरोधी सप्ताह की जनता का दमन कर देता है।

छत्तीसगढ़ में कौन किसके हक के लिये लड़ रहा है। सब लड़ रहें है, सब ठेकेदार है, अंतिम पंक्ति के अंतिम आदमी को उसका हक दिलाने के लिये। उस अंतिम आदमी को जो बरसात खत्म होते ही रोटी के टुकड़ों के लिये न केवल अपना खून-पसीना बल्कि अपनी आत्मा, अपनी इज्जत आबरू सब कुछ बेचने परदेस जाने के लिये मजबूर हो जाता है। मध्यप्रदेश से जब छत्तीसगढ़ टूटकर अलग हुआ तो ऐसा लगा उसके दुर्दिन खत्म हुये है। पहली सरकार ने तो सिर्फ हीरें की खदानों के भरोसे ही राज्य को टैक्स मुक्त जोन बनाने की घोषणा कर दी थी। इस बात को आठ साल बीत चुके है। न हीरें की खदानों में खुदाई हुई है और न ही राज्य टैक्स मुक्त हो पाया है।
देवभोग, देवताओं को भोग लगने वाले दुबराज चावल उगाने वाले इलाके में एक नहीं हीरों के कई किम्बरलाईट पाईप मिले है । देवभोग के पायलीखण्ड और जांगड़ा इलाकों में मिली खदानों में आजतक वैद्यानिक रूप से भले ही खनन न हीे पाया हो लेकिन तस्करी जमकर हुई है। हीरों के विश्वविख्यात व्यापारी डी-बीयर्स समेत देश के जाने माने व्यापारियों ने हीरे की खदाने लेने की कोशिशें की। उनकी कोशिशों और सरकारी लालफीताशाही के बीच पिसकर मरता जरहु गोंड नजर आता है। वो जरहु गोंड जिसके खेतों में सबसे पहले हीरा मिलने की खबर सामने आई। जरहु सरकार द्वारा अधिग्रहित अपने ही खेतों की चौकीदारी की नौकरी मांगते थक गया लेकिन न उसे नौकरी मिली और न वो खेती कर पाया। अब हीरों की खदान के मालिक का बेहद गरीबी में जिंदगी गुजारना क्या दमन नहीं है। क्या रोजी रोटी के लिये लाखों मजदूरों का छत्तीसगढ़ छोड़कर सारे देश में खून-पसीना बेचना दमन नहीं है। अगर ये सब दमन नहीं है तो फिर बस्तर में किसका दमन हो रहा है, कैसे दमन हो रहा है, कौन दमन कर रहा है और कैसे दमन कर रहा है।

2 comments:

ghughutibasuti said...

मेरे भाई, कोई किसी का नहीं है। इस संसार का नियम है या दमन करो या दमित बनो। चुनाव आपका है।
घूघूती बासूती

Anonymous said...

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
============

उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-ष्भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थानष् (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in