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Saturday, November 22, 2014

लगता है बाबा रामपाल नक्सलवाद से बडी समस्या है सरकार के लिये

बाबा रामपाल लगता है हमारे देश में नक्सलवाद से भी बडी समस्या थी,तभी तो उसे पकडने के लिये 30000 जवान लगा दिये थे।और बेचारे हमारे जवान जो आये दिन नक्सलियों के हाथों शहीद हो रहे हैं,उनके परिवारों को उजाडने वाले नक्सलियों के खिलाफ़ मैने आज तक ऐसी मुहीम नही देखी।इससे तो यही जाहिर होता है कि हमारे देश को नक्सलवाद से ज्यादा खतरा बाबाओं से हैं।नक्सली अब सेना के हेलिकाप्टर तक को निशाना बनाने लगे हैं,किसी दिन सर्विस फ़्लाईट पर निशाना लगा देंगे तो?क्या उनके हाथो बेवजह मारे जा रहे जवानो की जान की कीमत कुछ भी नही?कभी नक्सलियों के खिलाफ़ ऐसी कार्र्वाई होगी?कब मुक्त होंगे हम इस लाल आतंक से?क्या देश में भगवा ही आतंक का पर्याय है?

Tuesday, June 11, 2013

विद्याचरण शुक्ल को भूल नही पायेगा छत्तीसगढ

विद्या भैया हमारे बीच नही रहे.रह गई है उनकी यादें.वो कद्दावर नेता जिसने रायपुर को देश में अलग पहचान दी.मध्यप्रदेश को भी शुक्ल बंधुओं और उनके पिता स्व रविशंकर शुक्ल जी ने पहचान दी थी.सबसे कम उम्र में मंत्री बनने वाले गिने चुने लोगो मे से एक थे वे.विवाद भी उनके साथ बहुत रहे मगर 84 साल की उम्र में नक्सल प्रभावित क्षेत्र का दौरा करना ये बताता है कि उनमे अपने प्रदेश के लिये कितना प्यार था.जिस कांग्रेस में कथित हाईकमान के खिलाफ सोचना तक़ आत्महत्या के समान माना जाता है उसी हाईकमान को एक नही कई बार चुनौतियां दी थी उन्होनें.न वे कभी झुके थे और ना ही टूटे थे.समझौता उन्होने कभी नही किया था.छात्र जीवन से ही विद्या भैया के सैकडो किस्से सुनते आये थे.मुझे उनके समर्थको की सूची में लोग स्थान नही देते थे लेकिन ये तो मै ही जानता हूं कि वे मुझे पसंद करते थे या नही.उनके साथ खट्टे मिठे अनुभवों की लम्बी लिस्ट है.पर मन पता नही क्यों आज भर भर आ रहा है.दोपहर से सोचते सोचते अब जाकर लिखने की हिम्मत जुटा पाया हूं.कुछ दिन पहले ही उनके प्रिय वैभव मिश्रा ने भी मुझसे कहा था कि भैया विद्या भैया पर आपने कुछ नही लिखा,कुछ लिखिये,लोग जानना चाहते है.फिर उनके प्रवक्ता दौलत ने भी कहा पर मौत से जूझते अटल लडैया विद्या भैया पर लिखते समय उंगलिया कांप जाती थी.जितना ऊंचा उनका कद था भारतीय राजनीति में उतनी ही उंचाई वे नाप चुके थे.उनके जैसा ना हुआ है और ना होगा.एक समय भाजपा के ही एक सांसद ने कहा था कि विद्या भैया जैसी टावरिंग पर्सनालिटी हमारे साथ नही है.विद्या भैया को भूल पाना आसान न होगा.दिल से श्रद्धांजलि देता हूं उनको.पता नही 84 साल के बुज़ुर्ग को मार कर नक्सलियों को क्या मिल गया होगा.उनके साथ ही भारतीय राजनीति के एक स्वर्णीम अध्याय की समाप्ति हो गई.भैया आप अमर है,हम सब आपको भूल नही पायेंगे.

Thursday, December 1, 2011

महंगाई से निपटने के लिये विदेशी कम्पनी बुला रहे हो,तो आतंकवाद,नक्सलवाद,अलगाववाद से निपटने के लिये सीधे अमेरिका को ही ठेका दे दो.

देश में भयंकर बहस चल रही है.टीवी पर हो रही गर्मागरम बहस को सुनकर कल्लू पनवाडी और मटल्लू हलवाई भी अपने अपने हिसाब से और अपनी अपनी पसंद की साईड से ज़बरदस्त फिल्डींग कर रहे है.बाज़ार बंद है.सब फ्री होकर बहस में मारकाट करने पर उतर आये है.शुरु मे इस एफडीआई का विरोध करने के बाद बडे-बडे विद्वानो के तर्क़ और सरकार के अडियल रवैये को देख कर हम भी कन्फ्यूज़िया गये हैं.समझ में नही आ रहा है कि इससे असली फायदा किसको होगा.खैर अगर सरकार का एफडीआई के लिये ये तर्क़ है कि उस्के आने से महंगाई कम होगी.यानी महंगाई रोक पाने में अब तक़ असफल रही निकम्मी सरकार ये मानती है कि विदेशी ही इस समस्या से मुक्ति दिला सकते है तो फिर आतंकवाद,नक्सलवाद और अलगाववाद से निपटने में भी आज तक़ असफल ही रही सरकार को चाहिये कि वो देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को भी विदेशियों यानी अमेरिका को सौंप देना चाहिये.उस फैसले का विरोध होगा या नही पता नही मगर आये दिन के धमाको से,लाशों के लोथडे बिनने से,अनाथ होने वालों के आंसूओ से,फर्ज़ी सरकारी चेतावनियों और दहाडो से तो मुक्ति मिलने की गारंटी है.पर हां इसमें पूंजी और निवेश और घोटाले की तो कोई गुंजाईश ही नही है.कोई इसमे पार्टनरशीप भी नही मिलने वाली.शायद इसिलिये इस ओर ध्यान नही दे रही है सरकार.मरते रहे लोग धमाकों में.और फिर ये सरकार धीरे धीरे अलग अलग टुकडे-टुकडे में क्यों बेच रही है सरकार.सीधे सीधे देश को ही किसी विदेशी ताक़तवर देश के पास गिरवी क्यों नही रख देती.युनियन जैक के बाद अंकल सैम को सलाम कर लेंगे हम. (परम विद्वान साथियों से करबद्ध निवेदन है कि मेरे शब्दों पर नही मेरी भावनाओं की कदर करें.एफडीआई अब गली मुहल्ले.चौराहो पर हो रही बहस में कुतर्क़शास्त्रियों के मुखरविंद से अइसे ही धांसू-फांसू टाईप के आईडीया सामने आ रहे है.हर गली में अब हाईटेक सिंग मिल रहे है थोक के भाव में सरकार चाहे तो उनसे भी सलाह ले सकती है,फायदा हो या न हो,कम से कम ऎसी फज़िहत नही होने की सौ प्रतिशत गारंटी.)

Monday, January 24, 2011

नक्सलियों के मददगार डा विनायक सेन के मामले में युरोपिय यूनियन की दिलचस्पी?क्या दाल में काला होने का सबूत नही?

नक्सलियो की मदद करने और राष्ट्रदोह के मामले उम्र कैद की सज़ा पा चुके डा विनायक सेन ने हाई कोर्ट में उस फ़ैसले को चुनौती दी है।आज उस मामले की सुनवाई है और पैरवी के लिये राम जेठमलानी यंहा आ चुके हैं और साथ ही आया है युरोपिय यूनियन का एक प्रतिनिधी मण्डल भी।इस प्रतिनिधि मण्डल ने हाईकोर्ट मे मामले की सुनवाई के दौरान ओब्ज़र्वर के रूप मे उपस्थित रहने की अनुमति भी मांगी है।इस बारे में बताया जाता है कि भारत मे ओपन हाऊस होने की वजह से कोर्ट में सम्बंधित पक्ष का कोई भी व्यक्ति उपस्थित रह सकता है,वंही कुछ अधिवक्ताओं ने ओब्ज़र्वर जैसी व्यवस्था नही होने की बात कही है और इसे सीधे-सीधे मामले मे दबाव डालने का प्रयास बताया।राजधानी रायपुर में विमान से उतरते ही युरोपिय यूनियन के सदस्यों को नागरिक संघर्ष परिषद का विरोध झेलना पड़ा।

अब सवाल ये उठता है कि किसी भी देश की न्याय व्यवस्था में इस तरह ओब्ज़र्वर बन कर युरोपिय यूनियन के सदस्य कितनी बार गयें हैं?और किन-किन देशों मे गयें हैं?फ़िर ये भी सवाल महत्वपूर्ण है कि आखिर डा विनायक सेन के मामले मे उन्हे इतनी दिलचस्पी क्यों है?जबकि उनपर राजद्रोह का आरोप है तो क्या किसी देश के राजद्रोह के आरोपी के मामले मे दिलचस्पी लेना उस देश कि मुखालफ़त नही है?युरोपीय यूनियन डा सेन के अलावा नक्सलियों के हाथों मारे गये पुलिस जवानो के मामलों को जब इस देश की समस्या मान सकती है तो फ़िर डा विनायक सेन के मामलें मे इतनी दिलचस्पी क्यों?

समझ मे नही आता कि उन्हे यंहा तक़ आने ही क्यों दिया गया?क्या केन्द्र सरकार के लोग भी चाहते हैं कि वे छत्तीसगढ की न्याय प्रणाली को विदेशी देखें?सारे देश में छत्तीसगढ संभवतः पहला राज्य है जंहा भारी राजनैतिक,सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद नक्सल मामलों मे शामिल डा सेन और अन्य लोगों के खिलाफ़ कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की पहल की है।इस फ़ैसले का नक्सली जम कर विरोध कर रहे हैं जो इस बात की ओर इशारा करता है कि डा सेन से उन्हे हमदर्दी है।और अब युरोपिय यूनियन के सद्स्यो का इस मामले में दिलचस्पी लेना भी यही बताता है कि दाल में काला तो है ज़रूर्।

Monday, July 27, 2009

राजधानी मे बड़े बड़े विद्वान नक्सलवाद पर बहस कर रहे थे और बारसूर के जंगल मे जवान मौत से लड़ रहे थे!

राजधानी के सबसे बड़े होटल मे आज देश के जाने विद्वान कड़ी सुरक्षा मे नक्सलवाद पर बहस कर रहे थे।यंही बगल की धरमशाला मे कल ही शहीद एस पी विनोद चौबे को तेरहवी पर श्रद्धांजलि दी गई और शाम होते-होते खबर आई कि बारसूर के जंगल मे जवान मौत से लड़ रहे थे।नक्सलियो की बिछाई मौत ने उन्हे अपनी चपेट मे ले लिया था।सारे जवान ज़िंदा रहने के लिये ज़रूरी रोजमर्रा का सामान खरीद कर वापस लौट रहे थे।वो सामान जो अब उनके किसी काम नही आने वाला था।दो दर्जन से ज्यादा जवान नक्स्लियो के फ़ंदे मे फ़ंसे थे।

अब तो लगता है कि बस हम सब लाश गिनने वाले चीरघर के चौकीदार हो गये हैं।संजीत ने फ़ोन कर कहा कि भैया कुछ लिख रहे हो क्या?मैने कहा कि आखिर क्या होगा लिख कर भी?मुझे कल ,अब तो आज कहेंगे जबलपुर जाना है।संजीत ने ज़िद पकड़ ली कुछ तो लिखो।मैने कहा ठीक है,और इतना कहते ही बिजली गिल हो गई।बरसात शुरू थी।बेहद मनहूस और डरावना मौसम हो चला था।मैने फ़िर सजीत से फ़ोन कर कहा कि बिजली नही है।उसने कहा ठीक है जब आये तब लिख देना,मै सुबह पढ लूंगाऽब राके डेढ बजे बिजली आई है और मै लिखने बैठा हूं।सुबह ज़ल्दि उठना है और जबलपुर जाना है।घूमने का मज़ा अब कसैला सा हो गया है।

लिखने को बहुत कुछ है मगर हाथ कांप रहे है।अभी तेरह दिन पहले ही तो नक्सलियों ने तीन दर्ज़न से ज्यादा जवानो का शिकार किया थ।आज फ़िर दो दर्ज़न को निशाना बनाया है।गश्त करने वाले जवानो को पता ही नही चलता कब किस पेड की ओट से निकल कर मौत आ जाती है और उनका काम तमाम कर जाती है।हम रह जाते है स्तब्ध्।शहीद जवानो के लाश के लोथड़े बिनते और शहीदो की संख्या गिनते हुये श्रद्धांजलि सभा मे काले चश्मे के भीतर रोती हुई आंखो का नाटक करते हुये शहीदो की कुर्बानी व्यर्थ नही जाने देने का रटा रटाया डायलाग बोलने वाले मंझे हुये एक्टर की तरह।

क्या इस खून खराबे का कोई अंत है या किसी प्रधानमंत्री जैसे बड़े आदमी की शहादत के बाद आतंकवाद से निपटने का रिकार्ड दोहराने का इंतज़ार हो रहा है।रोज़ कोई मर रहा है किसी न किसी का बेटा खो रहा है तो किसी का सुहाग उजड रहा है,क्या ये सब उन नकसलियो को समझ मे नही आता या फ़िर उनके सीने मे दिल ही नही होता।आखिर किस अन्याय और शोषण की बात करते है वे।वे लोग जो कर रहे है क्या न्याय है?क्या ऐसे ही खून खराबे से बस्तर का विकास हो सकता है?पता नही आज बड़े बड़े नामधारी विद्वानो ने क्या -क्या कहा?मुझे भी जाना था लेकिन सुरक्षित कमरो मे बेसिरपैर की बक़वास सुनकर सिर्फ़ खून ही खौलता है,इस्लिये आज वंहा गया भी नही।सारे विद्वान अपने अपने विचार उंडेल कर शाम को और सुबह के हवाई जहाज से अपने शहर के लिये उड़ गये होंगे। अगले सेमिनार के लिये कुछ नये पाईंटस भी उन्हे यंहा मिल गय होंगे।उन्हे तो शहीद जवानो के घर ले जाना चाहिये।अंतिम यात्रा पर रवाना होने वाले जवानो का करूण क्रंदन उन्हे सुनाना चाहिये तब शायद वे अपना पक्ष ईमानदारी से रख सकें।पता नही सड़ी सड़ी बात पर मानवाधिकार के हनन का हल्ला मचाने वाले कंहा सो रहे हैं।शायद उनकी नींद किसी अल्पसख्यक या कश्मीर या फ़िर किसी पेज थ्री के प्रोटोकाल को मेंटेन कर रही है।बहुत रात हो रही है।लिखने को बहुत कुछ है।फ़िर कभी ,क्योंकि ये सिलसिला तो लगता है थमने वाला है नहीए प्रभू ण शहीदो को अपनी शरण मे लेना।उनके परिवार को इस असीम दुखः को सहने की शक्ति देना!

Monday, July 13, 2009

चिदंबरम के चश्मे का फ़र्क!लालगढ लाल दिखाई दिया मगर छतीसगढ नही?हां अगर ममता यंहा की होती तो और बात थी?

आये दिन छतीसगढ मे नक्सली हमले कर रहें है और पुलिस के जवान असमय काल के गाल मे समा कर शहीद हो रहे हैं।यही हाल उडीसा का भी है।मगर केन्द्र की यूपीए सरकार को ये सब नज़र नही आ रहा है।कल यंहा एस पी विनोद कुमार चौबे समेत 30 जवान नक्सली हमले मे शहीद हो गये तब चिदंबरम ने अपने चश्मे पर एसी कमरे से बाहर आने पर जमी नमी को थोडा साफ़ किया और उन्हे धुंदला सा कुछ नज़र आया और अब वे सीआरपीएफ़ के 600 जवान भेज रहे हैं हैं?क्या ये जवान विनोद चौबे और उनके साथ शहीद हुये तीस जवानो के परिवार का दुःख कम कर सकेंगे?क्या उनकी खुशियां लौटा सकेंगे?कया यंहा लालगढ की तरह कोई बडा आपरेशन नही चलाया जा सकता?क्या इसके लिये प्रदेश मे कांग्रेस या कांग्रेस के समर्थक दल की सरकार या उसका प्रभाव होना ज़रूरी है?

यूपीये कहिये या कांग्रेस उसकी नीयत पर तो सवाल उठना वाजिब है?जिस तरीके से लालगढ मे नक्सलियों के सफ़ाये के लिये अभियान चलाया गया,वो प्रशंसनीय है मगर जिस तरीके से भाजपा शासित छत्तीसगढ की नक्सली उत्पात के बावज़ूद उपेक्षा की गई वो भी सामने है।आम चुनावो मे ममता के साथ मिली ज़बरदस्त सफ़लता और आने वाले विधानसभा चुनाव मे सरकार बनाने की अपार संभावनाओं ने लालगढ के नक्सली गढ को ढहाने मे पूरी ताक़त झोंक दी और नतीज़ा भी शानदार सफ़लता के रूप मे सामने आया।

केन्द्र सरकार जब लालगढ का नक्सली आतंक खतम कर सकती है तो छ्त्तीसगढ का भी कर सकती है अगर वो चाहे तो?शायद इसिलिये कहा जाता है नक्सलवाद एक राजनैतिक समस्या है?जिसका हल राजनैतिक इच्छा शक्ति के बिना संभव ही नही है।यंहा भी अगर किसी चीज़ की कमी नज़र आती है तो सिर्फ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति की।इतने बडे हमले और हादसे के बाद भी यंहा सिर्फ़ 600 जवान भेजना कोई ठोस हल नही है।इसके लिये टुकडो मे नही पूरा ईलाज़ ज़रूरी है।ईलाका बडा और दुर्गम होने के कारण एक साथ नही सही मगर एक के बाद एक लगातार अलग अलग हिस्सों मे अभियान चला कर छतीसगढ को भी लालगढ जैसे ही मुक्त कराया जा सकता है।
सवाल फ़िर उसी बात का आता है कि छत्तीसगढ किस चश्मे से कैसा नज़र आता है?भाजपा के चश्मे से और कांग्रेस या चिदंबरम के चश्मे से जिस दिन एक जैसा नज़र आयेगा उस दिन ही छतीसगढ से नक्स्ल समस्या के अंत की शुरूआत हो जायेगी ?

Thursday, January 15, 2009

ऐसे मे कैसे सफ़ाया करोगे नक्सलियों का मंत्रीजी?

नक्सलियो ने बस्तर मे फ़िर पुलिस पार्टी पर हमला कर दो जवानो की जान ले ली।उन्होने दो निर्दोष ग्रामीणो को भी मार डाला। एक महिला कांस्टेबल लापता हैं। नक्सली दो बंदूक भी लूट ले गये। नक्सली हमले का मुंह्तोड जवाब देने की बजाय आपकी पुलिस के जवान जान बचाने के लिये जंगल मे भाग गये। और नये ग्रह मंत्री ननकी राम कंवर दावा कर रहे है प्रदेश से नक्सलियो का सफ़ाया कर देंगे। और दावा भी एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ के आधार पर जिसकी जांच के आदेश खुद उन्ही की सरकार के मुखिया रमन सिंह ने दिये है।मुक़ाबला करने की बजाय आपकी पुलिस जान बचाने के लिये भागना ज़रुरी समझने लगी है, ऐसे मे कैसे सफ़ाया करोगे नक्सलियों का मंत्रीजी?

बस्तर के पखांजूर इलाके मे वन मंत्री के दौरे के पहले दो मोटर सायकिलो पर रोड़ ओपनिंग के लिये निकली पुलिस पार्टी पर घात लगाकर बैठे नक्सलियो ने हमला कर दिया।एक जवान की वंही गोली लगने से मौत हो गई और बाकी पुलिस वाले अचानक हुये हमले का ज़वाब देना छोड़ जंगल मे भागे।उनमे से एक को जंगल मे नक्सलियो ने पकड़ लिया और उसकी हत्या कर दी।एक महिला कांस्टेबल लापता हो गई।बाकी जवान जंगल मे जान बचाकर वापस लौट आने सफ़ल हो गये।उनके भागने के पीछे कारण बताया जा रहा है कि नक्सली संख्या मे ज्यादा थे। अब सवाल ये उठता है कि भागने वालो को कैसे पता चला कि नक्सली ज्यादा है?और अगर ज्यादा भी थे तो उन्हे पुलिस की नौकरी लोगो की जान की रक्षा के लिये दी गई है या भाग कर अपनी जान बचाने के लिये?क्या नौकरी की शर्तो मे ऐसा कही लिखा है कि जब नक्सली संख्या मे कम हो तो लड़ो और ज्यादा हो तो भागो?क्या नक्सली पुलिस से उनकी संख्या पूछ कर हमला करने आयेंगे?

ऐसे और भी दर्ज़नो सवाल है मगर सबसे अहम सवाल है पुलिस के गिरते मनोबल का।जंगल मे जान जोखिम मे ड़ाल कर सालो वही सड़ रहे पुलिस वाले शहरो मे ठाट से गुज़र-बसर कर रहे पुलिस वालो के किस्से सुन-सुन कर टूट रहे है।अफ़सर और नेता लाख दावा करे पुलिस का मनोबल गिरा तो है,वरना लड़ने से पहले ही भागने की नौबत तो नही आती।

खैर इस पर पुलिस के शहर मे बैठे पुलिस के बड़े-बड़े साहबो और नेताओ का नज़रिया अलग हो सकता है।मगर दूसरी बार प्रदेश मे आदिवासियो के भरोसे ही चुन कर आई रमन सरकार के नक्सलियो को खतम करने के दावे का क्या होगा? एक कथित मुठभेड़ मे 17 लोगो को मर कर उनके नक्सली होने के दावे की हवा अब निकलती जा रही है।उस मुठभेड़ से उत्साहित होकर मंत्री ननकी राम ने तो यहां तक़ कह डाला की प्रदेश से नक्सलियो के खात्मे की शुरुआत है।अब उसी मुठभेड़ की जांच के आदेश खुद मुख्यमण्त्री ने दिये है। ऐसे मे प्रदेश से नक्सलियो के खात्मे के दावे ढपोरशंखी ही लग रहे हैं।

Friday, August 29, 2008

शर्म भी नहीं आती फेल सर्च ऑपरेशन को विश्व का सबसे बड़ा बताते हुए


बस्तर के जंगलों में गुम हेलिकॉप्टर की तलाश आखिर बंद कर दी गई है। पुलिस इस असफलता को स्वीकारने की बजाय बड़ी बेशर्मी से इसे दुनिया का सबसे बड़ा सर्च ऑपरेशन साबित करने पर तुली हुई है। और तो और अपनी असफलता को ढांकने के लिए दुनिया के सारे असफल सर्च ऑपरेशनों की दुहाई भी दे रही है। अब अफसोस नहीं होता है पुलिस की लाचारी पर बल्कि शर्म भी शर्माने लगी है।

हैदाराबाद से रायपुर आ रहे रेनबैक्सी की कंपनी रेन एयर के हेलिकॉप्टर बेल 430 के लिए हवाई सर्च अब बंद कर दी गई है। पुलिस के अनुसार 200 घंटे की उड़ान के बाद सर्च में लगी सारी एजेंसियों ने साफ कर दिया कि अब ऊँचाई से हेलिकॉप्टर का नज़र आना असंभव है। 3 अगस्त से जारी सर्च अभियान को पुलिस अब दुनिया का सबसे बड़ा सर्च अभियान साबित करने पर उतर आई है। डीजीपी विश्वरंजन के मुताबिक अब तक का रिकॉर्ड 15 दिनों तक इण्डोनेशिया में चला सर्च अभियान था। वहाँ अक्टूबर 2005 में गुम हेलिकॉप्टर की तलाश की गई थी।

पुलिस ये भी दावा कर रही है कि इस सर्च अभियान में 12 हज़ार से ज्यादा जवान लगाए गए थे और हज़ारों किलोमीटर जंगल को छाना गया, सेना के 2 एमआई 8 हेलिकॉप्टर ने भी हवाई सर्च किया। लगभग 18 हज़ार कि.मी. से भी ज्यादा फैला है दक्षिण बस्तर का जंगल। हालाकि पुलिस ये दावा करती है कि उसके जवानों ने जंगल में घुसकर हेलिकॉप्टर की तलाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन हेलिकॉप्टर के साथ लापता कर्मचारियों के परिजनों का कहना कुछ और है। उन्होंने साफ कहा है बस्तर के जंगलों में पुलिस तलाशी नहीं कर पा रही है। उनका यहां तक कहना है कि बस्तर की पुलिस जंगलों में घुसने से डरती है और कुछ इलाकों में तो वो गई ही नहीं।

पुलिस की बेशर्मी का नमूना ये भी है कि वो अब कह रही है कि हेलिकॉप्टर की तलाश की ज़िम्मेदारी एयरपोर्ट एथॉरिटी की होती है। तमाम नियम कानून और धाराओं के साथ वो ये साबित करने में जुटी है कि किसी एयरक्रॉफ्ट के दुर्घटनाग्रस्त होने पर उसकी तलाश की ज़िम्मेदारी एयरपोर्ट एथॉरिटी की होती है, पुलिस समेत अन्य एजेंसियों के सहयोग से। अब इसे क्या कहा जाए ? हेलिकॉप्टर तो तलाश नहीं पाए दुनिया भर के कानून कायदों की खाक छान कर ये धांसू आइडिया ढूंढ लाए कि हेलिकॉप्टर ढूंढना उनका नहीं एयरपोर्ट एथॉरिटी का काम है।

इतना ही नहीं पुलिस के एयरकंडिशन्ड किलाबंद मुख्यालय में बैठे अफसर दुनिया के तमाम बड़े फेल सर्च ऑपरेशन की लिस्ट बता रहे हैं। उन्हें सिर्फ फेल ऑपरेशन के बारे में ही जानकारी इकट्ठा करनी थी इसलिए फेल ऑपरेशनों की लिस्ट ही है उनके पास। सफल ऑपरेशन के बारे में पता करने का फायदा ही नहीं मिला इसलिए उधर टाईम खोटा नहीं किया। ठंडे कमरों में रहने वाले साहब का कहना है इण्डोनेशिया का हेलिकॉप्टर पापुआ में लापता हुआ था 15 दिन बाद जकार्ता के अफसरों ने जंगलों में उसकी तलाश बंद कर दी थी। चीन में भी सेना का हेलिकॉप्टर गुम गया था। जिसकी खोजबीन 7 दिनों में बंद कर दी गई थी। छत्तीसगढ़ सरकार का हेलिकॉप्टर मैना जुलाई 2007 में गुम हुआ था। इसकी तलाश मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर 4 दिन चली थी। पांचवें दिन हेलिकॉप्टर का मलबा और मारे गए लोगों के शव मिल गए थे काठमांडू नेपाल के पास भी गुम हुए हेलिकॉप्टर की तलाश 3 दिन बाद रोक दी गई थी। इसके अलावा न्यूज़ीलैण्ड, आस्ट्रेलिया और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए हादसों में गुम हेलिकॉप्टर की तलाश 1 सप्ताह से ज्यादा नहीं चल पाई थी।

इसका मतलब यही है कि जब दुनिया के जाने-माने देशों की सर्वसुविधायुक्त एजेंसियाँ गुम हेलिकॉप्टरों को तलाश नहीं पाती, तो हम किस खेत की मूली हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो हेलिकॉप्टर की तलाश बंद करने के लिए सारे बहाने और तर्क ढूंढने में पुलिस ने जितनी मेहनत की उतनी अगर ईमानदारी से हेलिकॉप्टर की तलाश में लगाई होती तो आज वे गर्व से कह सकते कि दुनिया का सबसे लंबा सफल सर्च ऑपरेशन उन्होंने पूरा किया। लेकिन लगता है गर्व से हमारा कोई नाता ही नहीं है। जब शर्म से नहीं है तो गर्व से क्या होगा ? हमको ये बताने में जरा शर्म महसूस नहीं होती कि दुनिया का सबसे बड़ा सर्च ऑपरेशन फेल हो गया।
हाँ ! अभी भी ये कहा जा रहा है कि हेलिकॉप्टर की तलाश अब सीधे जंगलों में घुसकर की जाएगी। यानि अभी तक जो हो रहा था वो था हवा-हवाई।

Saturday, August 23, 2008

सेना से मदद माँगने का मतलब हेलिकॉप्टर ढूँढना पुलिस के बस का नहीं


छत्तीसगढ़ पुलिस अब बस्तर के जंगलों में गुम हेलिकॉप्टर की तलाश के लिए सेना से मदद का इंतज़ार कर रही है। 20 दिन हो गए हैं हेलिकॉप्टर को गुम हुए। पुलिस लगता है तलाशते-तलाशते हताश हो चुकी है अब उसके पास सेना की मदद के अलावा और कोई सहारा नहीं है।

नक्सल प्रभावित दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा ज़िले के एसपी ने ये बात मानी है कि हेलिकॉप्टर की तलाश के लिए सेना से मदद माँगी गई है। उन्होंने इस मामले को पुलिस के बस का नहीं होने की बात को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि पुलिस अपने साधनों से जितना संभव हो पा रहा है सर्च कर रही है। अब उनकी बात पर भरोसा करें भी तो भी 20 दिनों में अभी तक कोई ठोस ख़बर जंगलों से निकलकर नहीं आई। गुम हेलिकॉप्टर के कर्मचारियों के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और वे मजबूरी में नक्सलियों तक से अपने परिजनों की रक्षा के लिए गुहार लगा चुके हैं।

ऐसी हालत में 20 दिनों तक हेलिकॉप्टर के बारे में कुछ भी पता नहीं चल पाना इस बात का भी संकेत है कि स्थानीय लोगों का पुलिस से संपर्क नहीं के बराबर है या फिर उन्हें पुलिस पर भरोसा ही नहीं है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो पुलिस का जंगल में सूचनातंत्र है ही नहीं। वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि हेलिकॉप्टर को गिरते किसी ने न देखा हो। या फिर ये भी कहा जा सकता है कि जंगल में नक्सलियों का आतंक इतना ज्यादा पसरा है कि उनके खौफ से कोई मुँह ही खोलना चाहता।

इन सब बातों से पुलिस भले ही इनकार करें, लेकिन सच तो ये है कि पुलिस जंगलों में अपनी पोस्ट के आसपास और देखेभाले इलाकों के अलावा अनजान इलाकों में जाने से थोड़ा घबराती या डरती न भी कहा जाए तो भी कह सकते हैं कि हिचकती ज़रूर है। अब नक्सलवाद पर दुनिया भर के लोग तरह-तरह के विचार व्यक्त कर सकते हैं और इस पर गरमा-गरम बहस भी हो सकती है, लेकिन यहाँ सवाल नक्सलवाद का नहीं है सवाल है चार लोगों का जो हेलिकॉप्टर के साथ जंगल में गुम हुए हैं। उनके परिवार वालों के ऑंसू सूख चुके हैं। आशा और निराशा के भंवर में गोते खाते-खाते थक चुके हैं। अब वे मुख्यमंत्री समेत सारे पुलिस अफसरों से मिलकर गुहार लगा चुके हैं। वे नक्सलियों तक से गुहार लगा रहे हैं। आखिर कुछ तो बात होगी बस्तर के जंगलों में जो एक हेलिकॉप्टर को खोज नहीं पा रहे हैं।
इससे पहले भी छत्तीसगढ़ सरकार का हेलिकॉप्टर 'मैना' नक्सल प्रभावित बालाघाट और राजनांदगांव ज़िले की सीमा पर पहाड़ियों और जंगलों में खो गया था। तब पुलिस ने उसे 5 दिनों में ही ढूंढ निकाला था। आखिर अब क्या हुआ ? कारण ये भी हो सकता है कि वहाँ के जंगलों से बस्तर के जंगल घने हैं ? ये भी हो सकता है कि उस इलाके में बस्तियां बस्तर की तुलना में ज्यादा है। या फिर ये भी तो हो सकता है कि वहाँ नक्सलियों का आतंक बस्तर के नक्सलियों से कम हो और नहीं तो फिर ये ज़रूर हो सकता है कि वहाँ की पुलिस से बस्तर की पुलिस जंगलों में जाने से ज्यादा डरती हो। ऐसा नहीं होता तो पुलिस को सेना से मदद मांगने की ज़रूरत ही नहीं होती।

Monday, August 18, 2008

क्यों नहीं जा रहें है पुलिस अफसर नक्सलियों के इलाके में

बस्तर में नक्सलियों का इतना आतंक है कि दर्जन भर से ज्यादा पुलिस अफसर वहां तबादला होने के बावजूद नहीं जा रहें है। महीने भर से वे गृह विभाग के तबादला आदेश के धज्जियां उड़ाने वाले अफसरों एसआई से लेकर एएसपी रैंक के अफसर शामिल है। कोई बीमार हो गया है तो कोई लंबी छुट्टी पर चला गया है, तो कुछ ने अदालत की शरण ले ली है।

सरकार चाहे जो भी दावा करे, इतना तो तय है कि बस्तर में नक्सलियों का अघोषित राज है। उनका आतंक कहें या दबदबा कि पुलिस भी उनके इलाके में जाने से घबराती है। ऐसा नहीं होता तो ट्रांसफर होने पर पुलिस अफसर तत्काल वहाँ ज्वॉइन करते। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, ट्रांसफर की पिछली लिस्ट निकले एक माह से ज्यादा समय हो रहा है, लेकिन अभी तक दर्जन भर से ज्यादा पुलिस अफसरों ने सरकार की परवाह न करते हुए वहाँ जाना ज़रूरी नहीं समझा। उन्होंने वहाँ जाने से ज्यादा अपना तबादला रूकवाना ज़रूरी समझा।

कुछ अफसर तो रिलीव होते ही अचानक गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं। कुछ मैदानी क्षेत्र से रिलीव कर दिए जाने के बावजूद बस्तर के जंगलों में जाने से अच्छा छुट्टी पर जाना ज्यादा अच्छा मानकर लंबी छुट्टी पर चले गए। पता नहीं मैदानी इलाके में अभी तक फिट रहे अफसर बस्तर का तबादला आदेश मिलते ही गंभीर रूप से बीमार कैसे हो गए ? अगर वे वाकई गंभीर रूप से बीमार हैं तो फिर उन्हें पुलिस की नौकरी में रखा ही क्यों जा रहा है ? इतना तो तय है कि वे तबादला आदेश रद्द होते ही तत्काल फिट हो जाएँगे।

सरकार के रहमो करम पर अब तक मैदानी इलाकों के बढ़िया मलाईदार थानों में पोस्टिंग का मज़ा लेने वाले कुछ अफसर बस्तर का तबादला आदेश मिलते ही सरकार के खिलाफ अदालत पहुँच गए। उन्होंने स्टे आर्डर लेकर सरकारी आदेश को ठेंगा दिखा दिया है।

इधर मैदानी इलाकों से ट्रांसफर पर बस्तर नहीं जाने वाले अफसरों के कारण उतने ही अफसर वहाँ अटक गए हैं। बस्तर से जब तक रिलीवर न आए किसी को भी रिलीव नहीं किया जाता, सो रिलीवर के इंतज़ार में वे अफसर बस्तर में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं।
अब बताईए भला कि सरकार के आदेश की कोई सरकारी कर्मचारी उपेक्षा कर सकता है ? ऐसा करना सीधा सरकार का विरोध करना है और इतना बड़ा रिस्क सरकार के जाबाज, धाकड़, धांसू अफसर इसलिए ले रहे हैं क्योंकि जान है तो जहान है। वे मैदानी इलाकों में तो सालों जमे रह सकते हैं लेकिन नक्सल इलाके में 1 रात गुजारना भी उनके बस का नहीं है। अब बताईए भला ऐसे में जहाँ पुलिस अफसर नक्सल इलाके में नौकरी करने से डरते हों, वहाँ के नागरिकों का क्या हाल होगा ? कैसे नक्सल समस्या से मुक्ति मिलेगी ?

Sunday, August 17, 2008

अब जाग रहा है केन्द्रीय गृह मंत्रालय

3 अगस्त से लापता हेलिकॉप्टर की खोज के लिये केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने अब जाकर भारतीय वायुसेना का एक एमआई-8 हेलिकॉटर भेजने की महान कृपा की है। हेलिकाप्टर के साथ लापता चार लोगो के परिवार वाले सरकारी खोजबीन से संतुष्ट नहीं है और उन्होंने अपना विरोध भी स्थानीय मंत्री के सामने प्रकट किया है।

हैदराबाद एयरबेस से भेजा गया ये हेलिकॉप्टर गुम हेलिकॉप्टर की तलाश करेगा। लगभग दो सप्ताह बाद भेजी जा रही इस केन्द्रीय मदद का क्या लाभ मिलेगा ये तो पता नहीं, मगर इस मामले में केन्द्र सरकार की लंबी खामोशी उसकी संवेदनशीलता पर जरूर सवालिया निशान लगाती है। मुझे अच्छी तरह से याद है पिछले साल राजस्थान में बाढ़ में फंसे एक आदमी को बचाने के लिये किस तरह चिल्ला-चिल्ली मची थी। और भी कई मामले हुए है जिस पर जमकर शोर मचा था। सारे राष्ट्रीय चैनल एक सुर में बचाओ राग आलाप रहे थे।

यहां छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में एक नहीं चार इंसान लापता है। पता नही क्यों उनके लिये हंगामा नहीं हो रहा। क्या उनकी जान सस्ती है ? या फिर सारा खेल टीआरपी का है? या छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्य की खबर नेशनल न्यूज नहीं हो सकती? क्या उन चार परिवार वालों के आंसु सिर्फ एनडीटीवी वालों को ही नजर आये? क्या उनका दर्द सिर्फ एनडीटीवी ही समझ सका? क्या सबसे ज्यादा पुरूस्कार जीतने का दावा करने वालों को ये सब नजर नहीं आया। यहां मेरा उद्देश्य एनडीटीवी की तारीफ या बाकी चैनल को गालियां बकना नहीं बल्कि ऐसे मामलों में कथित नेशनल न्यूज चैनल की असंवेदनशीलता सामने लाना है।

खैर शोर मचाने या हंगामा खड़ा करने से कुछ नहीं होता अगर लापता लोगों की तकदीर अच्छी है तो बिना शोर-शराबे के भी वे बच जायेंगे। लेकिन सवाल तकदीर का नहीं सवाल तरीके का है। जिस तरीके से उन्हें बचाने या खोजने की कोशिश की गई है या की जा रही है वो किसी भी सूरत में ईमानदार नहीं कही जा सकती। महज खानापूर्ति हो रही है। लापता लोगों के रिश्तेदारों की उम्मीदें रोज सुबह जागती है और रात होते होते मर जाती है।

थम गए है आंसु,
थक गई है आंखे भी,
नींद भी नहीं आती है रात भर,
कहीं से कोई आती नहीं अच्छी खबर।

Wednesday, August 13, 2008

अगर नेता सवार होते तो गुम हेलिकॉप्टर ढूंढ लेते




इसे गुम हुए हेलिकॉप्टर पर सवार कर्मचारियों का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि उनके साथ कोई वीआईपी नहीं बैठा था। अगर कोई वीआईपी उनके साथ लापता होता तो पुलिस को उन्हें और हेलिकॉप्टर को ढूंढने में 10 दिन नहीं लगते।

10 दिन हो चुके हैं छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की सीमा के जंगलों में एक हेलिकॉप्टर को गुम हुए। तब से आज तक उसकी खोज का काम जारी है, मगर अफसोस 10 दिनों के बाद भी उसका पता नहीं चल पाया। दरअसल उसमें कोई नेता सवार नहीं था, सिर्फ पायलेट और स्टॉफ था। लापता लोगों के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, और पता नहीं सरकार किसे खोज रही है ? और कैसे खोज रही है ? जो उसे आज तक कुछ नहीं पता चल सका है।

3 अगस्त को रैन एयरलाइंस का एक हेलिकॉप्टर ने आंध्रप्रदेश से रायपुर के लिए उड़ान भरी थी। हेलिकॉप्टर में 2 पायलेट और 2 तकनीकी कर्मचारी सवार थे। हेलिकॉप्टर आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर पहले पहाड़ियों और जंगलों में कहीं लापता हो गया। हेलिकॉप्टर राजधानी रायपुर से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रामविचार नेताम के सरगुजा दौरे के लिए किराए पर लिया गया था। इससे पहले राजनाथ सिंह और रामविचार उस पर सवार होते, हेलिकॉप्टर लापता हो गया।

इन 10 दिनों में पुलिस ने हवाई सर्वे से लेकर जंगल में सर्च के नाम पर लगातार अभियान चलाया है। डीजीपी विश्वरंजन का कहना है कि 25 थानों की पुलिस टीम सर्च में लगी हुई है। इसके बावजूद आज तक उनके पास कोई ठोस सूचना नहीं है। दरअसल हेलिकॉप्टर जिस इलाके में गुम हुआ है, वो पहाड़ी इलाका बेहद घने जंगलों से ढका है। वहाँ पहुँच पाना वाकई कठिन है। फिर बरसात और नक्सलियों के छिपे होने की आशंका दोनों ही राहत और खोज कार्य को प्रभावित करती है।

फिर भी एक सवाल तो सामने आता ही है। क्या अगर उस हेलिकॉप्टर पर कोई वीआईपी सवार होता तो क्या खोज की रफ्तार यही होती ? इससे पहले छत्तीसगढ़ सरकार का हेलिकॉप्टर ''मैना'' भी नक्सली क्षेत्र लॉजी की पहाड़ियों में गुम हो गया था। पायलेट स्टॉफ छत्तीसगढ़ सरकार के कर्मचारी थे। तब भी बरसात का ही मौसम था और बालाघाट-लॉजी इलाका भी घने जंगलों वाला है। तब सरकारी हेलिकॉप्टर और सरकारी कर्मचारी की खोज का नतीजा 5 वें दिन निकल आया था। 5 वें दिन हेलिकॉप्टर के मलबे तक पुलिस पहुँच गई थी।

इस बार भी मौसम वैसा ही है और इलाका भी वैसा। नक्सली समस्या भी दोनों जगह है मगर खोजने की रफ्तार पिछली बार जितनी नहीं है। इसका एक कारण यह भी माना जा सकता है कि हेलिकॉप्टर सरकार का नहीं है निजी कंपनी का है, कर्मचारी भी सरकारी नहीं निजी कंपनी के हैं। इसके अलावा ये भी माना जा सकता है कि उस पर कोई वीआईपी सवार नहीं था। भगवान न करे ऐसी दुर्घटना का कोई वीआईपी, या कोई भी आदमी शिकार हो। मगर ऐसा लगता है कि रैन एयरलाइंस के कर्मचारियों की खोज में हो रही देरी शायद नहीं होती अगर उनके साथ कोई वीआईपी सवार होता। हो सकता है सरकार के बड़े-बड़े सूरमा खुद बस्तर में कैंप करके खोज अभियान का जायजा लेते। मगर ऐसा हो नहीं रहा है।

बेहद आसानी और बड़ी बेशर्मी से संवेदनशीलता सरकार से निजी कंपनी की ओर ट्रांसफर होती नज़र आ रही है। गुम हेलिकॉप्टर पर सवार कर्मचारियों के रिश्तेदार कुछ दिन जगदलपुर में जमे रहे और रोते-रोते शायद उनके ऑंसू खतम होते आ रहे हैं। रोते-रोते इंतज़ार करते उनकी ऑंखें थक सी गई है। उम्मीद की किरण कभी टिमटिमाती है, तो कभी ऐसा लगता है कि अब सिर्फ अंधेरा ही बचा है।

अब आप ही बताईए भला अगर उस हेलिकॉप्टर पर कोई बड़ा नेता सवार होता तो क्या पुलिस के अभियान की रफ्तार यही होती ? पुलिस का एक सूचना के बारे में ये भी कहना है कि हो सकता है कि वह नक्सलियों की चाल हो। ठीक है पुलिस को सब कुछ ठोक-बजाकर करना चाहिए। मगर उस बयान के चंद घंटों बाद बस्तर के ही वरिप्ठ भाजपा नेता सांसद बलीराम कश्यप के काफिले पर नारायणपुर इलाके में नक्सली हमला हो जाता है। टिफिन बम के विस्फोट से सड़क पर 5 फीट गहरा गङ्ढा हो गया। गाड़ियों को जिधर रास्ता मिला उधर चली गई। क्या पुलिस को इस हमले की आशंका नहीं हुई ?
खैर निजी एयरलाइंस के कर्मचारी उतने खुश किस्मत नहीं है कि उनकी तलाश वीआईपी के समान हो पाए। इसे उनका नहीं देश का दुर्भाग्य माना जाना चाहिए कि यहाँ एक काम करने के 100 तरीके होते हैं। एक काम करने के लिए कई स्तर होते हैं और उनकी प्राथमिकताएँ भी प्रभावित व्यक्तियों के अनुसार बदलती रहती है। बहरहाल 10 दिनों तक एक गुम हुए हेलिकॉप्टर का पता नहीं चलना इस बात का भी सबूत है कि बस्तर के जंगल बहुत घने हैं और जंगलों में वन्यजीवों या सरकार का नहीं नक्सलियों का राज है।

Monday, July 28, 2008

मुखबिरी का ईनाम नक्सलियों की गोली

छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में नक्सलियों ने एक पूर्व सरपंच को गोली मारकर हत्या का खाता खोल दिया। पूर्व सरपंच पर नक्सलियों को पुलिस का मुखबिर होने का शक था और पूर्व सरपंच निराम सिंह ध्रुव मई महीने से पुलिस को अपनी जान खतरे में होने की बात कहता आ रहा था। 4 मई को पुलिस ने हार्डकोर नक्सली गोपन्ना और उसके 2 साथियों निराम सिंह के घर भोजन करते पकड़ा था। तब से नक्सलियों को उस पर मुखबिर होने का शक था। अब ऐसे में कोई भला पुलिस को नक्सलियों की सूचना कैसे देगा ? भला कैसे मजबूत होगा राज्य सरकार का खुफिया और सूचनातंत्र ?
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के हत्या करने का ये कोई पहली वारदात नहीं है, लेकिन रायपुर जिले के लिए ये पहली है। राजधानी रायपुर और उसके आसपास तक नक्सलियों के पहुँच जाने की ख़बरें पहले से ही थी। लेकिन जिले के गरियाबंद इलाकों में नक्सलियों ने पूर्व सरपंच को गोली मारकर लाल आतंक पसरा दिया है। नक्सलियों की उस इलाके में सक्रियता मई 2007 से गोपन्ना की गिरफ्तारी के बाद कम हो गई थी, और उसी के साथ कम हुई थी पुलिस की सक्रियता भी। उसी का नतीजा निराम सिंह ध्रुव की हत्या के रूप में सामने आ गया।
आखिर निराम सिंह की गलती क्या थी ? उसके घर नक्सली गोपन्ना और उसके 2 साथी 4 मई 2007 को पहुँचे और उन्होंने वहाँ भोजन किया। अगर निराम उनको भोजन नहीं कराता तो भी वो नक्सलियों के निशाने पर आ जाता। आखिर पुलिस को सूचना नहीं मिलती तो वो नक्सलियों की मदद के नाम पर पुलिस का निशाना बन जाता। ये मजबूरी अकेले निराम की नहीं है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र का हर आदमी इसी दोराहे पर खड़ा मिलता है वो पुलिस और नक्सली के बीच पिसकर मर रहा है, जैसे निराम सिंह।
निराम सिंह की हत्या के बाद उसका दामाद दिनेश ध्रुव लापता है। शनिवार की रात निराम सिंह आमागाँव के अपने घर में परिवार के साथ खाना खा रहा था तभी वर्दीधारी नक्सलियों ने घर को घेर लिया और परिवार के सारे सदस्यों को जान से मारने की धमकी देकर कमरे में बंद कर दिया। उसके बाद वे निराम सिंह को हाथ बाँधकर घर से बाहर ले गए और लाठियों से उसकी जमकर पिटाई की। उसके बाद उसे बिजली के खंभे से बाँधकर गोली मार दी गई।
पुलिस को रात डेढ़ बजे सूचना मृतक के पुत्र ने दी और उसके बाद पुलिस ने अपना रूटीन का काम शुरू कर दिया। एफआईआर दर्ज की, लाश का पंचनामा किया, पोस्टमार्टम करवाया और जंगलों में गश्त भी करवाई। लेकिन अब इन चीजों का कोई फायदा नज़र नहीं आता, क्योंकि निराम तो मर चुका है। मई महीने से जान बचाने की उसकी जद्दोजहद आखिर खत्म हो गई। पुलिस से वो बार-बार जान बचाने के लिए गुहार करता था। इस दौरान वो काफी समय गाँव से बाहर भी रहा।
निराम की हत्या के बाद नक्सलियों ने वहाँ पर्चे भी छोड़े हैं। पर्चे में उसके दामाद दिनेश को मृत्युदण्ड देने की घोषणा कर दी गई है, दिनेश भी अब लापता ही है। वारदात के बाद पूरे इलाके को जैसे लकवा मार गया है, सब खामोश हैं। सवाल सिर्फ एक हत्या का नहीं है, सवाल है इस बात का कि गोली खाकर कोई क्यों पुलिस की मुखबिरी या मदद करेगा ? ज़रूरत इस बात की है कि पुलिस अपने सोर्स को सुरक्षा दे। वैसे ये वारदात राजधानी के लिए भी खतरे का संकेत है। महज 100 किलोमीटर दूर रह गए हैं नक्सली राजधानी से। बस्तर और सरगुजा संभाग के बाद रायपुर संभाग के पहले जिले रायपुर के गरियाबंद इलाके में उनकी बढ़ती गतिविधियाँ पुलिस और सरकार के लिए चिंता का सबब तो होना ही चाहिये।

Sunday, July 27, 2008

क्या अब आपको नहीं लगता कि देश का सूचनातंत्र कमजोर है ?

उड़ीसा में नक्सली वारदात के बाद गृहराज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा था कि राज्यों का सूचनातंत्र कमजोर है। अब जबकि बैंगलोर और अहमदाबाद में धमाके हो चुके हैं और सूरत में बम मिला है, तो क्या वे इस बात को मानेंगे कि देश का सूचना तंत्र कमजोर नहीं खोखला है।
मलकानगिरी में नक्सलियों ने पिछले माह दो बड़ी वारदात की थी। 1 में 38 तो दूसरी में 20 जवान शहीद हुए थे। उसके बाद 18 जुलाई को कानपुर में एक प्रेस कांफ्रेंस में गृहराज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने बढ़ती नक्सली वारदातों पर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि उन पर अंकुश लगाने के लिए राज्यों की पुलिस को अपना सूचनातंत्र मजबूत करना पड़ेगा। उस बयान के बाद मैंने अपने ब्लॉग पर उनसे सवाल किया था कि इसका मतलब सूचनातंत्र कमजोर है ना मंत्री जी। संदर्भ था राज्यों की पुलिस का।
राज्यों के सूचनातंत्र की कमजोरी को तो बड़ी सहजता से हर कोई स्वीकार कर लेता है लेकिन क्या ये सोच का विषय नहीं है कि हमारे देश का सूचनातंत्र बेकार हो चुका है। सूचना या खूफिया एजेंसियों का इस्तेमाल राजनेता अपने व्यक्तिगत और पार्टिगत हितों के लिए कर रहे हैं। ऐसे में देश में कहाँ बारूद बिछाया जा रहा है ? कहाँ पलीते सुलगाए जा रहे हैं ? किसे पता चलेगा।
बड़ा आसान होता है केन्द्र सरकार के लिए राज्य सरकारों को कोसना। लेकिन अब जब देश के 2 बड़े शहरों में सीरियल ब्लॉस्ट हो चुके हैं और 1बड़ा शहर धमाकों का शिकार होते-होते बचा है, तब ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार के गृहराज्य मंत्री को अपने ही बयान फिर से पढ़ना चाहिए। एक नहीं कई बार पढ़ना चाहिये और उसके बाद सोचना चाहिए कि क्या ये बयान उनके अपने मंत्रालय के लिए शत-प्रतिशत फिट नहीं बैठता।
खैर क्या फर्क पड़ता है श्रीप्रकाश जायसवाल को, या शिवराज पाटिल को या मनमोहन सिंह को। उनके शहरों में नहीं हुए हैं ये धमाके। फिर इस देश को साम्प्रदायिक सौहाद्र का डोज देकर ऐसे धमाकों का दर्द झेलने की आदत डाल दी गई है, एडिक्ट हो गए हैं हम धमाकों के। इससे पहले भी मुंबई से लेकर हैदराबाद तक धमाकों की गूंज सुनी जा चुकी है। सभी उस दर्द को भूले नहीं हैं। दरअसल हमारे जैसे आम लोगों को आदत हो गई है दर्द सहने की। खास लोगों को तो दर्द सहे बिना सेक्रेटरी का लिखा-लिखाया बयान पढ़कर दर्द बयां करना आता है। दर्द सहना उनका नहीं आम लोगों का काम है और फिर दर्द न हो तो जीने का मतलब ही क्या है ? बरसात होती है तो छत टपकने का दर्द, गली-नाली भर जाने का दर्द, बीमारियाँ फैल जाने का दर्द और जाने कैसे-कैसे दर्द। बरसात नहीं हुई तो सूखे का दर्द, अकाल का दर्द, पलायन का दर्द, भूखमरी का दर्द और अगर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो फिर है हमारे लिए रेडिमेड बम धमाकों का दर्द। पता नहीं कब छुटकारा मिलेगा इससे। कब जागेगा हमारे देश का इंटेलिजेंस ब्यूरो, कब फुरसत मिलेगी हमारे सत्ताधारियों को। हो सकता है कि जब तक ये जागे तब तक हमें नया दर्द मिल जाए।

Saturday, July 19, 2008

इसका मतलब सूचनातंत्र कमजोर है मंत्रीजी।

केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल को अब ख्याल आ रहा है सूचनातंत्र को मजबूत करने का। अब जबकि सैकड़ों जवान इसी सूचनातंत्र की कमजोरी की वजह से असमय ही अपनी जान गंवा बैठे है। उनका ये बयान इस बात का सबूत है कि राज्य सरकारों का सूचनातंत्र कमजोर है।

देर से सही श्रीप्रकाश जायसवाल ने इस बात को खुलेआम कहा तो सही। कानपुर में उन्होंने माना कि नक्सल आंदोलन को कुचलने के लिये राज्य सरकारों को अपने खुफियातंत्र को चुस्त दुरूस्त रखना चाहियें और उसे और मजबूत करना चाहिये। बात तो सौ टके सही कही श्रीप्रकाश जायसवाल ने। लेकिन सूचनातंत्र क्या एक दिन में मजबूत हो सकता है। क्या राज्य सरकारों के पास कोई जादू की छड़ी है।

दरअसल सूचनातंत्र को मजबूत करने का मतलब है उसकी कमजोरी को मान लेना। और ये एकदम सही बात है कि राज्यों की पुलिस के सूचनातंत्र खोखले है। इसका सबूत उड़ीसा के मलकानगिरी और छत्तीसगढ़ के बस्तर में हाल में हुई नक्सल वारदात है। नक्सलियों की हलचल पुलिस को पता ही नहीं चलती और इस बात से अनजान पुलिस हमेशा उसके बिछाये जाल में फंसकर शिकार बन जाती है।

और फिर पुलिस का सूचनातंत्र मजबूत होगा भी कैसे। नक्सल क्षेत्रों में पुलिस की पोस्टिंग बतौर सजा या अनिवार्यता से होती है। उस इलाके में जाने वाला पुलिस अफसर या जवान अपनी पोस्टिंग रूकवाने में पूरी ताकत लगा देता है जो सफल नहीं हो पाता हो वो मजबूरी में वहां जाता है। और वहां से वापसी का जुगाड़ शुरू कर देता है। इस सारी कवायद में उसके पास राजनीतिक आकाओं और उनके चमचों की प्रदक्षिणा में ही समय गुजर जाता है। और जबतक वो उस इलाके से वाकिफ हो पाते है तब तक उनकी वापसी का समय हो जाता है।

ऐसे में पुलिस कब लोगों का विश्वास जीते और कब उसके अपने भरोसे के संपर्क या सूचना सूत्र बने। एक और सोचने वाली बात ये है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सली इलाकों में हल्बी और गोंडी बोली जाती है, जिससे मैदानी इलाकों के लोग वाकिफ नहीं होते। शहरी इलाकों से वहां फेंके जाने वाले पुलिस वाले हिन्दी बोलते है जो आदिवासियों को समझ नहीं आती और आदिवासियों की बोली पुलिस नहीं समझ पाती। ऐसे में एन्टी गुरिल्ला वारफेयर का महत्तवपूर्ण तथ्य विश्वास कैसे बनेगा।

लोकल सपोर्ट के बिना सूचनातंत्र को मजबूत कर पाने की बात सोचना भी बेमानी लगता है। जहां नौकरी मजबूरी में और समय काटने के लिये की जा रही हो वहां लोगों का विश्वास जीत पाना बहूत मुश्किल लगता है। एक बात और खासकर छत्तीसगढ़ में जो आदिवासी क्षेत्र के पुलिस वाले है उन्हें शहरों में पदस्थ कर दिया जाता है जहां उन्हें भी काम करने में दिक्कत ही आती है। ऐसे लोगों को जो नक्सल क्षेत्र के भूगोल, इतिहास, संस्कृति और भाषा से वाकिफ है उन्हें वहां रखने की बजाय उन सब तथ्यों से अनजान लोगों को वहां भेजकर नक्सल प्रभावित लोगों का विश्वास जीतना बड़ा अजीब-सा लगता है।

खैर ये मामला राज्य सरकारों का है और मजबूत सूचनातंत्र के दांवों की पोल एक नहीं कई बार खुल चुकी है।इस असलियत से उनके बड़े-बड़े अफसरों का तो पता नहीं लेकिन केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल जरूर वाकिफ हो गये है। अच्छा है कि इस गंभीर विषय पर एक मंत्री ने गंभीरता तो दिखाई है। जिस ईमानदारी से श्रीप्रकाश जायसवाल ने ये बात कही उसी ईमानदारी से उस पर अमल हो गया तो हो सकता है बहुत से बच्चे असमय अनाथ नहीं होेंगे, बहुत-सी सुहागिनों को वैधव्य का श्राप नहीं भोगना पड़ेगा। बहुत से बूढ़े मां-बाप अपने लाडले की झलक पाने के लिये नहीं तरसेंगे।बहूत से पुलिसवालों की तस्वीरों पर असमय फूलमालायें नहीं चढेंगी। बहुत से जवान बेमौत नहीं मारें जायेगे। अगर सबकुछ उतनी ही ईमानदारी से हुआ तो।

Thursday, July 17, 2008

क्या एक जवान की जान की कीमत सिर्फ 10 लाख रुपए है ?

उड़ीसा के मलकानगिरी में फिर नक्सलियों ने कहर बरपाया। इस बार 21 जवान शहीद हो गये। उड़ीसा के मुख्यमंत्री ने शहीदों के परिजनों को 10 लाख की सहायता की घोषणा कर दी है। क्या ये सरकारी औपचारिकता शहीद जवानों के परिवार के गम को कम कर खुशियां दे सकेगा।
असमय जान गंवा देने का मतलब होता है पूरे परिवार के भविष्य को अनिश्चय के भंवर जाल में छोड़ देना। आखिर मलकानगिरी में अपनी डयूटी पूरी कर रहें उन जवानों का दोष क्या है। क्यों उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। क्या सरकार की नौकरी करना पाप है। क्या कानून व्यवस्था को बनाए रखना गैर कानूनी है। क्या अन्याय के खिलाफ लड़ना अन्याय है। आखिर पुलिस वाले भी तो इंसान ही है। वे भी दूसरी कोई नौकरी नहीं मिलने की वजह से पुलिस में नहीं गये थे। उन्हें नौकरी मिली और रोजी-रोटी कमाकर अपने परिवार को पालने के लिये वे कामपर चले गये। जान गंवाने के लिये नहीं की थी उन्होंने नौकरी या शहीद होकर घर वालों को 10 लाख रूपये की सहायता कहियें या इनाम या फिर जान की कीमत दिलाने के लिये नौकरी नहीं की थी।

ये तो सरकार को सोचना चाहिये कि क्या 10 लाख रूपये में वे किसी जवान के असमय अनाथ हो रहे बच्चे को उसके पिता का प्यार दे सकती है। भरी जवानी विधवा होने वाली अभागन को सुहाग का सहारा दे सकती है। क्या 10 लाख रूपये में बूढ़े मां-बाप की आंखों का तारा उनका आखिरी सहारा लौटा सकती है। अगर 10 लाख रूपये में किसी परिवार की खुशियां लौट सकती है तो कोई भी हंसी-खुशी जान देने को तैयार हो जायेगा।

पता नही राज्य सरकार कहें या केन्द्र सरकार को जवानों के शहीद होने के बाद उनके परिवार पर टूटने वाले दु:खों का अहसास क्यों नहीं होता। उनकी शहादत के बाद परिवार के लालन-पालन का जिम्मा अनुकंपा नियुक्ति पर निर्भर हो जाता है। अनुकंपा नियुक्ति के नियमों की जटिलताओं पर बहस करने की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं है लेकिन इतना तय है कि एक इंस्पेक्टर के परिवार की जीवनशैली एक सिपाही के परिवार की जीवनशैली से अलग होती है और इंस्पेक्टर के शहीद होने पर उसकी पत्नी की नियुक्ति सिपाही के पद पर ही हो सकती है। एक अच्छी-खासी तनख्वाह वाले परिवार को अपने मुखिया को गंवाने के बाद कम तनख्वाह पर गुजर बसर करने पर मजबूर होना पड़ता है।

सरकारों को मैं सलाह नही देना चाहता लेकिन उन्हें चाहिये कि शहीद होने वालों के आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति समान पद और समान वेतन पर मिलनी चाहिये ताकि उनकी जीवनशैली कम तनख्वा हके कारण प्रभावित न हो।
खैर भगवान न करें फिर कोई शहीद हो और उनके परिवार के लोग अनुकंपा नियुक्ति और सहायता राशि लेने सरकार का मुंह देखें। सरकार को चाहिये नक्सल समस्या से निपटने के लिये ठोस कदम उठायें। ठोस माने शुद्व ठोस उनके एन्टी मांइस व्हीकल की तरह ठोस नहीं जो सिर्फ नाम का एन्टी मांइस हो। अब एन्टी मांइस व्हीकल की विश्वसनीयता पर भी बहस नहीं करनी चाहिये। यह पहला मौका नहीं है जब नक्सलियों ने लैण्ड मांइस से एन्टी मांइस व्हीकल उड़ाया हो। इससे पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी नक्सली एण्टी मांइस व्हीकल के परखच्चे उड़ा चुके है। सरकार को अपने सुरक्षा उपायों और हथियारों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर एक बार फिर से गौर फरमा लेना चाहिये।
मलकानगिरी नक्सलियों से कहर से पहली बार नहीं कांप रही है। पिछले 29 जून को भी नक्सलियों ने मलकान गिरी को थर्रा दिया था। तब विशेष रूप से प्रशिक्षित ग्रे-हाउंड पुलिस दस्ते को लांच से बांध पार करते समय हमलाकर बांध में ही डूबा दिया था। तब 38 जवान बेमौत मारे गये थे। उनकी शहादत को लोग भूल भी नहीं पाये कि गुरूवार 17 जुलाई को फिर 20 से ज्यादा शहीद हो गये। सरकार शायद इस बार भी 10 लाख रूपये की सहायता की घोषणा करने के बाद अगली वारदात के इंतजार में खामोश बैठ जायेगी। जवान मर रहें है और मरते रहेंगे क्योंकि वे जवान है, नेता नहीं ।

Wednesday, July 2, 2008

क्या पुलिस के 34 जवानों का लापता होना बड़ी खबर नहीं है ?

उड़िसा के मालकानगिरी इलाके के एक जलाशय में नक्सली हमले के बाद से 34 जवान लापता है उन जवानों को ढूंढने के लिए नौसेना, वायुसेना, पुलिस और ग्रेहाउंड पुलिस के 8 सौ जवान दिन-रात मेहनत कर रहे है। 28 जुन से लापता जवानों की सलामती के लिए अब सिर्फ दुआ ही की जा सकती है। इस हमले से एक बात साफ हो गई है कि नक्सलियों को तो पुलिस ऑपरेशन्स की खबर रहती है मगर पुलिस नक्सली मुवमेंट से अंजान होती है। नतीजतन आये दिन पुलिस के जवान नक्सली हमलों में शहीद हो रहे है।


वैसे इस हमले ने एक बात और साफ कर दी है। नेशनल न्यूज चैनल वालों की कथित संवेदनशीलता और जागरूकता की इस वारदात में पोल खोल कर रख दी। खुद की लापरवाही से बोरवेल के गढ्ढे मे गिरे बच्चे को बचाने के लिए हुये राहत कार्य को लाइव दिखाने वाले और बात-बात में सरकार की बखिया उधेड़ने वाले चैनल वालों के लिए शायद पुलिस के 34 जवानों की कीमत उतनी नही है। खैर उनकी अपनी मजबूरी है और अपनी प्राथमिकताएं भी। सैक्स, अपराध, राजनीति और खेल मे सिर्फ क्रिकेट से फुर्सत मिले तब ना। वैसे भी उनके लिए दिल्ली, मुंबई, उत्तरप्रदेश और गुजरात के दंगो के अलावा छत्तीसगढ़, उड़ीसा जैसे प्रदेशो की समस्याएं कोई मायने नही रखती। खैर जैसी उनकी मर्जी।


बहरहाल अब ये सरकारी तौर पर मान लिया गया है कि आंध्रप्रदेश और उड़ीसा की सीमा पर हुये नक्सली हमले के बाद से 34 जवान लापता है। आंध्रप्रदेश के गृहमंत्री ने भी इसकी पुष्टि की है। तीन जवानों की मौत हो चुकी है और दर्जनभर से ज्यादा घायल जवानों का इलाज जारी है। आंध्रप्रदेश पुलिस के विशेष रूप से प्रशिक्षित ग्रेहाउंड जवानों का दस्ता 28 जून की रात गश्त कर वापस लौट रहा था। उडीसा से आंध्रप्रदेश की ओर लौटते समय सीमा के करीब एक जलाशय को ये दस्ता मोटरबोट से पार कर रहा था। मोटरबोट जैसे ही एक उंची पहाड़ी के करीब पहुंची वहां पहले से ही घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने हमला कर दिया। उंचाई पर छिपे नक्सलियों के लिये मोटरबोट साफ्ट टारगेट थी। नक्सली पेड़ो के ओट से गोलियां बरसाने लगे इससे पहले जवान कुछ समझ पाते नक्सलियों का कहर मौत बनकर उनपर टूट पड़ा था। समाचार पत्रों के मुताबिक मोर्टार से भी गोले दागे गये और मोटरबोट डूबा दिये। जवानों ने तैरकर जान बचाने की कोशिश की कुछ तो सफल हो गये लेकिन 34 जवानों का अब तक अता-पता नही है।

दिल दहला देने वाली इस वारदात ने पुलिस के सूचना तंत्र की पोल तो खोली ही है उसकी गोपनीय कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिये है। इसके साथ ही एक बार फिर साबित हो गया कि पुलिस के सूचना तंत्र से नक्सलियों का सूचना तंत्र ज्यादा मजबूत है। काँम्बिंग गश्त से लौट रही पुलिस पार्टी को इस बात का रत्तीभर भी एहसास नही था कि वे ट्रेैप हो चूके है या ट्रैप हो रहे है। जबकि नक्सलियों का उस रास्ते मे सबसे उंची पहाड़ी पर घात लगाकर मोटरबोट का इंतजार करना इस बात का सबूत है कि उन्हे पता था पुलिस पार्टी वहीं से वापस लौटेगी। और फिर मोर्टार और रॉकेट लांचर से लैस टीम ये बता देती है कि पुलिस की स्ट्रैन्थ उन्हे मालूम थी।


इस वारदात में पुलिस ऑपरेशन्स की गोपनियता को भी सवालों के दायरे में ला दिया है। इसके साथ ही सबसे बड़ा सवाल उभर कर सामने आता है, वो है लोकल सपोर्ट का। गुरिल्ला पध्दति से काम करने वाले नक्सलियों को तो पूरा-पूरा लोकल सपोर्ट मिलता नजर आ रहा है, मगर पुलिस इस मामले में कमजोर दिखाई देती है। खैर ये गलती पुलिस की नही है लोकल सपोर्ट या स्थानीय लोगो का विश्वास जीतने का काम सरकार का होता है पुलिस का नही। बहरहाल दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ऐसा चलता ही रहेगा। जवान शहीद होते रहेंगे, सरकार समीक्षा करती रहेगी। घड़ियाली आंसू भी बहाये जाएंगे मगर जिनके परिवार का सदस्य बिछड़ेगा उसका दर्द वे ही बता पाएंगे जैसे लापता 34 जवानों के परिवार वाले।

Sunday, June 29, 2008

किसका दमन,कैसा दमन, किसका विरोध और कैसा विरोध

छत्तीसगढ़ में नक्सली दमन विरोधी अभियान मना रहें है। पता नहीं वे किस दमन की बात करते है। नक्सली दमन की बात करते है, सरकार लोकतांत्रिक अधिकारों की हनन की बात करती है। पुलिस जंगल में नक्सलियों के आतंक की बात करती है तो नक्सली जंगल के बाहर पुलिस की बात करते है। दमन और हनन के बीच पिसकर लगता है मर गया बस्तर का अमन।

नक्सलियों के दमन विरोधी सप्ताह में न केवल बस्तर बल्कि राजनांदगांव जिले के मानपुर, मोहला और चौकी इलाके में बंद को भरपूर सफलता मिल रही है। आवागनम के साधन, सड़कों से गायब रहे। और तो और बस्तर में रेल प्रशासन ने रात को रेल चलाना बंद कर दिया है। रातों को मालगाड़ियां नहीं चल रही है। अब इसको क्या कहा जा सकता है! नक्सली दमन का विरोध कर रहे है या रेल्वे का आतंक के बल पर दमन कर रहे है।

छत्तीसगढ़ में ना केवल नक्सली बल्कि राजनैतिक पार्टियां भी खुलकर चिल्ला रहीं है कि भाजपा सरकार में आम आदमी का शोषण हो रहा है। और सत्ता के रथ पर सवार भाजपा के लोग चार साल पहले कांग्रेस के कार्यकाल में चिल्लाते थे कि राज्य में सभी वर्गो का शोषण हो रहा है। इस लिहाज से देखा जाये तो छत्तीसगढ़ में सिर्फ शोषित ही बचते है, शोषक कोई नजर नहीं आता। जबकि हालात इसके ठीक उल्टा है । कांग्रेस जब सत्ता में थी तो उसने अपनी संपूर्ण सत्ता कायम रखने के लिये दमन के तमाम हथकंडे अपनायें और कमोवेश यही हालत भाजपा की है। व्यापारी शोषित, छात्र शोषित, पुलिस आतंकित , वनवासी भयभीत और फिर शेष बचता ही क्या है।

कभी कभी लगता है कि हीरों की खदानों वाले इस प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न राज्य का दुर्भाग्य है कि ये देश में मजदूरों की सबसे बड़ी मंडी बनकर उभरा है। हरियाणा के खेतों में, उत्तर प्रदेश के ईंट भट्टों में, मुबंई की निर्माणाधीन बड़ी-बड़ी इमारतों में, महाराष्ट्र की सड़कों पर पसीना बहाते मजदूर छत्तीसगढ़ के ही मिलते है। हॉ बरसात के इन चार महीनों में ही छत्तीसगढ़ की पूरी आबादी छत्तीसगढ़ में रहती है। और बरसात खत्म होते ही लाखों मजदूर अपने खून-पसीनें के साथ अपने परिवार की इज्जत आबरू ठेकेदारों के हाथ में गिरवी रखने पर मजबूर हो जाते है। शायद नक्सलियों की नजर में ये अत्याचार और दमन नहीं है। उनकी दमन की परिभाषा तो वे ही जाने लेकिन ऐसा लगता है कि उनका दमन विरोधी सप्ताह की जनता का दमन कर देता है।

छत्तीसगढ़ में कौन किसके हक के लिये लड़ रहा है। सब लड़ रहें है, सब ठेकेदार है, अंतिम पंक्ति के अंतिम आदमी को उसका हक दिलाने के लिये। उस अंतिम आदमी को जो बरसात खत्म होते ही रोटी के टुकड़ों के लिये न केवल अपना खून-पसीना बल्कि अपनी आत्मा, अपनी इज्जत आबरू सब कुछ बेचने परदेस जाने के लिये मजबूर हो जाता है। मध्यप्रदेश से जब छत्तीसगढ़ टूटकर अलग हुआ तो ऐसा लगा उसके दुर्दिन खत्म हुये है। पहली सरकार ने तो सिर्फ हीरें की खदानों के भरोसे ही राज्य को टैक्स मुक्त जोन बनाने की घोषणा कर दी थी। इस बात को आठ साल बीत चुके है। न हीरें की खदानों में खुदाई हुई है और न ही राज्य टैक्स मुक्त हो पाया है।
देवभोग, देवताओं को भोग लगने वाले दुबराज चावल उगाने वाले इलाके में एक नहीं हीरों के कई किम्बरलाईट पाईप मिले है । देवभोग के पायलीखण्ड और जांगड़ा इलाकों में मिली खदानों में आजतक वैद्यानिक रूप से भले ही खनन न हीे पाया हो लेकिन तस्करी जमकर हुई है। हीरों के विश्वविख्यात व्यापारी डी-बीयर्स समेत देश के जाने माने व्यापारियों ने हीरे की खदाने लेने की कोशिशें की। उनकी कोशिशों और सरकारी लालफीताशाही के बीच पिसकर मरता जरहु गोंड नजर आता है। वो जरहु गोंड जिसके खेतों में सबसे पहले हीरा मिलने की खबर सामने आई। जरहु सरकार द्वारा अधिग्रहित अपने ही खेतों की चौकीदारी की नौकरी मांगते थक गया लेकिन न उसे नौकरी मिली और न वो खेती कर पाया। अब हीरों की खदान के मालिक का बेहद गरीबी में जिंदगी गुजारना क्या दमन नहीं है। क्या रोजी रोटी के लिये लाखों मजदूरों का छत्तीसगढ़ छोड़कर सारे देश में खून-पसीना बेचना दमन नहीं है। अगर ये सब दमन नहीं है तो फिर बस्तर में किसका दमन हो रहा है, कैसे दमन हो रहा है, कौन दमन कर रहा है और कैसे दमन कर रहा है।

Thursday, June 26, 2008

क्यों अफसरों को अपने चेहरे पर खून नजर नहीं आता

बस्तर में बुधवार की शाम फिर तीन जवानों को नक्सली हमले में जान से हाथ धोना पड़ा । इस खबर के सामने आने के बाद उसके पीछे छिपा कर रखी गई एक और खबर सामने आई। बस्तर के ओरछा इलाके के लोग पखवाड़े भर से अंधेरे से त्रस्त थे। नक्सलियों ने वहां 5 खंभे गिरा दिये थे। उसी इलाके की बिजली सुधार कर वापस लौट रहे दल पर नक्सलियों ने हमला किया था जिसमें तीन जवान शहीद हो गये।

ओरछा के लोग अगर मंगलवार को अंधेरें से त्रस्त होकर चक्काजाम नहीं करते तो शायद बिजली बोर्ड उस ओर ध्यान ही नहीं देता क्योंकि पखवाड़ेभर तक उसने ये खबर बड़ी आसानी से छिपा थी। चक्काजाम के बाद सारी हकीकत सामने आ जाने के डर से बिजली सुधारने के लिये वहां टीम भेजी गई वो भी कड़ी सुरक्षा में। सुधार काम पूरा करके बिजली वाले सकुशल लौट गये मगर जिला पुलिस बल के जवान रतिराम सिन्हा, सशस्त्र बल के विष्ण्ाु कुर्रे और विजय कुमार यादव शहीद हो गये।

बिजली विभाग की टीम का पुलिस सुरक्षा में जाना ही इस बात का सबूत है कि जंगल में नक्सलियों का राज कायम है! उनकी मर्जी के बिना जंगल में पत्ता भी नहीं खड़कता है। और सरकार फिर भी दावा करने से नहीं हिचकती कि उनकी सत्ता वहां कायम है। सरकार की इस खोखले दावे को पूरा करने में पता नहीं अब तक कितने जवानों ने अपनी जान गंवा दी है।

जवानों के शहीद होने का सिलसिला बस्तर में जारी है और उसी के साथ जारी है शहीदों को आखिरी सलामी देने की औपचारिकता पूरी करने का सिलसिला भी। पता नहीं क्यों पुलिस मुख्यालय के एयर कंडिशन्ड कमरों में बैठे अफसरों को अपनी वर्दी पर जवानों के खून की छिटें नजर नहीं आते। नेताओं की तो बात करना ही नहीं चाहिये क्योंकि उनके कपड़े तो लगता है कि दाग प्रूफ होते है। पुलिस के अफसरों को तो न केवल अपनी वर्दी बल्कि अपने चेहरे भी शहीदों के खून से रंगे नजर आने चाहिये ।

दरअसल इसमें अफसरों का दोष नहीं है। ऐसा लगता है कि साल में दो बार परेड की रिर्हसल करने की तरह उन्हें अब सलामी देने की भी प्रैक्टिस हो गई है । उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अधिकांश शहीद अफसर नहीं जवान होते है और उनकी दूर-दूर तक उनसे रिश्तेदारी नहीं होती।
हाँ, जिनकी रिश्तेदारी होती है उन पर जरूर दु:खों का पहाड़ टुट पड़ता है ! अब सूरनहेली हरियाणा के विजय कुमार यादव के परिवार के दु:खों की कल्पना करना भी कठिन है। हरियाणा से अपने परिवार की रोजी रोटी के लिये सशस्त्र बल में बस्तर आये विजय कुमार सबको छोड़कर जा चुके है, कभी वापस नहीं लौटने के लिये। उनके परिवार वाले अब विजय का नहीं विजय के शव का इंतजार करेंगे। ऐसा ही कुछ गुजरेगा नवागांव दुर्ग निवासी रतिराम सिन्हा और परसदा बिलासपुर निवासी विष्णु कुर्रे के परिवारवालों के साथ। पर क्या फर्क पड़ता है। ये तो अब लगता है सरकार और पुलिस के लिये रूटीन की बात हो गई है।

पता नहीं किसकी नजर लग गई है बस्तर को !

लोहे के पहाड़ों, यूरेनियम, टिन, कोरंडम की खदानों, साल और सागौन के जंगलों के मालिक बस्तर को पता नहीं किसकी नजर लग गई है। घोर नक्सलवाद से जूझ रहे बस्तर में सीपीआई कहती है जिला दंतेवाड़ा बंद तो दंतेवाड़ा बंद हो जाता है। नक्सली एक आश्रम के रसोइये को मार डालते है तो गांव में सन्नाटा फैल जाता है। नारायणपुर इलाके में पेड़ काटकर सड़क पर डाल देते है तो आना जाना बंद हो जाता है। पता नहीं बंद से किसको फायदा मिलता है और कैसे फायदा मिलता है!


बंद का मायने सब कुछ बंद होता है। लोग दवा-दारू तक के लिये तरस जाते है। किसी को रिश्तेदारी में खुशी या गम में शरीक होना भी नसीब नहीं हो पाता। जिंदगी ठहर सी जाती है और ऐसा बस्तर समेत छत्तीसगढ़ इलाके में आये दिन होता है। छत्तीसगढ़ अब नक्सलियों के लिये बेहद सुरक्षित इलाका साबित हो रहा है। असमानता और अन्याय की खाद से नक्सलवाद की फसल जमकर लहलहा रही है और थोड़ी बहुत बची हुई कसर को पुलिस और सरकार का निकम्मापन पूरी कर देता है।


सीपाआई के दंतेवाड़ा बंद से खुश होकर पूर्व विधायक मनीष कुंजाम यह कहने से नहीं चूके कि उनके आंदोलन को ऐसी सफलता आज तक नहीं मिली। ये तो एक दिन का बंद थर्ा। जब नक्सली शहीद सप्ताह मनाते है तो पूरे सप्ताह बस्तर की सांसे थम जाती है। बस, ट्रक, टेक्सी तो दूर की बात है रेल तक नहीं चलती। इसके बावजूद सरकार मजबूरी में ये बात नहीं मानती कि बस्तर में नक्सलियों की समानांतर सत्ता स्थापित होती जा रही है।



बहरहाल दंतेवाड़ा के बंद ने एस्सार के कारखाने को करोड़ों रूपये का नुकसान पहुॅचाया। हम एस्सार की दलाली नहीं करते लेकिन इस बंद बंद के खेल से तंग आ चूके उन स्क्ूली बच्चों के बाल सुलभ सवालों से इत्तेफाक रखते है कि छुट्टी क्यों है! सात-आठ दिनों के ब्लैक आउट से ले देकर उभरे बस्तरिया लोगों को पता है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है। असल में बस्तरिया लोगों जैसे हिम्मत शायद ही देखने में आती है।


भारत के सबसे चौड़े जल प्रपात चित्रकोट की खूबसूरती, कांगेर घाटी की मनमोहक छटा, घोटुल की मादक मस्ती और सल्फी-ताड़ी की मस्ती, ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे मरती जा रही है। बस्तरिया लोगों को जबरिया उनका हक दिलाने पर तुले नक्सली या सरकार दोनों की ही कोशिशे बेमानी लगती है। ऐसा लगता है कि बस्तर को अगर सिर्फ बस्तरिया लोगों के भरोसे छोड़ दिया है तो कहा जा सकता है कि दुनिया में यदि स्वर्ग कहीं है तो वो बस्तर है।