Monday, July 13, 2009

चिदंबरम के चश्मे का फ़र्क!लालगढ लाल दिखाई दिया मगर छतीसगढ नही?हां अगर ममता यंहा की होती तो और बात थी?

आये दिन छतीसगढ मे नक्सली हमले कर रहें है और पुलिस के जवान असमय काल के गाल मे समा कर शहीद हो रहे हैं।यही हाल उडीसा का भी है।मगर केन्द्र की यूपीए सरकार को ये सब नज़र नही आ रहा है।कल यंहा एस पी विनोद कुमार चौबे समेत 30 जवान नक्सली हमले मे शहीद हो गये तब चिदंबरम ने अपने चश्मे पर एसी कमरे से बाहर आने पर जमी नमी को थोडा साफ़ किया और उन्हे धुंदला सा कुछ नज़र आया और अब वे सीआरपीएफ़ के 600 जवान भेज रहे हैं हैं?क्या ये जवान विनोद चौबे और उनके साथ शहीद हुये तीस जवानो के परिवार का दुःख कम कर सकेंगे?क्या उनकी खुशियां लौटा सकेंगे?कया यंहा लालगढ की तरह कोई बडा आपरेशन नही चलाया जा सकता?क्या इसके लिये प्रदेश मे कांग्रेस या कांग्रेस के समर्थक दल की सरकार या उसका प्रभाव होना ज़रूरी है?

यूपीये कहिये या कांग्रेस उसकी नीयत पर तो सवाल उठना वाजिब है?जिस तरीके से लालगढ मे नक्सलियों के सफ़ाये के लिये अभियान चलाया गया,वो प्रशंसनीय है मगर जिस तरीके से भाजपा शासित छत्तीसगढ की नक्सली उत्पात के बावज़ूद उपेक्षा की गई वो भी सामने है।आम चुनावो मे ममता के साथ मिली ज़बरदस्त सफ़लता और आने वाले विधानसभा चुनाव मे सरकार बनाने की अपार संभावनाओं ने लालगढ के नक्सली गढ को ढहाने मे पूरी ताक़त झोंक दी और नतीज़ा भी शानदार सफ़लता के रूप मे सामने आया।

केन्द्र सरकार जब लालगढ का नक्सली आतंक खतम कर सकती है तो छ्त्तीसगढ का भी कर सकती है अगर वो चाहे तो?शायद इसिलिये कहा जाता है नक्सलवाद एक राजनैतिक समस्या है?जिसका हल राजनैतिक इच्छा शक्ति के बिना संभव ही नही है।यंहा भी अगर किसी चीज़ की कमी नज़र आती है तो सिर्फ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति की।इतने बडे हमले और हादसे के बाद भी यंहा सिर्फ़ 600 जवान भेजना कोई ठोस हल नही है।इसके लिये टुकडो मे नही पूरा ईलाज़ ज़रूरी है।ईलाका बडा और दुर्गम होने के कारण एक साथ नही सही मगर एक के बाद एक लगातार अलग अलग हिस्सों मे अभियान चला कर छतीसगढ को भी लालगढ जैसे ही मुक्त कराया जा सकता है।
सवाल फ़िर उसी बात का आता है कि छत्तीसगढ किस चश्मे से कैसा नज़र आता है?भाजपा के चश्मे से और कांग्रेस या चिदंबरम के चश्मे से जिस दिन एक जैसा नज़र आयेगा उस दिन ही छतीसगढ से नक्स्ल समस्या के अंत की शुरूआत हो जायेगी ?

18 comments:

Suresh Chiplunkar said...

चश्मा तो एक ही है, बाई आँख पर भाजपा-विरोधी सेकुलर काँच का, और दाईं आँख पर लाशों द्वारा चुनावी फ़ायदा बटोरने के काँच वाला…। ये पक्का कांग्रेसी चश्मा है, आसानी से टूटने वाला नहीं है… क्योंकि इस चश्मे की दोनों डंडियाँ मानवाधिकारवादियों ने पकड़ रखी हैं… :)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इसी राजनीति के चलते तो आज 13 राज्यों की ये हालत हो गई है।

राज भाटिय़ा said...

क्या यह देश इन राजनीति वालो का इन कमीने नेताओ का है, यह तो कुत्ते से भी गये गुजरे है, गली के कुत्ते को भी रोटी ना डालो तो भी वो पुरी गली को अपना समझता है, ओर यह हरामी नेता, जहां जीतते है वहा भी ळुटते है, ओर जहा हारते है वहा दुसरो से लुटबाते है....

अजित वडनेरकर said...

समस्याएं किसी भी चश्में से नहीं दिखेंगी नेताओं को....

ताऊ रामपुरिया said...

सही कहा आपने.

रामराम.

बी एस पाबला said...

एक नज़र से देखने वाले बचे ही कहाँ हैं, दोनों ही …:-)

संजय बेंगाणी said...

क्या कहें? यही लाल गलियारा जब चीन आक्रमण करेगा उसे लाल सलाम ठोकेगा. अतः इसे जल्द से जल्द नष्ट कर देना चाहिए. मगर कैसे? हमने तो चश्में पहन रखे हैं....दुखद.

दिगम्बर नासवा said...

Bangaal.........Chatisgarh........Bihaar.........Jhaarkhand...... ye sab jagaayen bahoot hi happening jagah hain..... aaj kal sab ki nazar udher hi lagi huyee hai.... kabhi to Chidaamber saahab ki nazar bhi uthegi....

महामंत्री - तस्लीम said...

सही बात कहा आपने।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

जब तक वोटों के लिये यह नहीं त्यागा जायेगा, हर जगह यही होत रहेगा.

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

राजनीति के कारण ही देश की यह हालत है..

कार्टूनिस्ट अजय सक्सेना said...

वाकई ऐसा ही है ,,कांग्रेसी सीएम होता तो कुछ और नजारा होता ..यह भी लाल गढ़ जैसा नक्सली मुक्त राज्य होता ...यहाँ तो चाओर वाले बाबा और साहितियिक डीजीपी से कुछ होने वाला नहीं है ..

cmpershad said...

यही परिणाम होता है जब तुष्टिकरण की राजनीति अपनाई जाती है- पहले तो पुचकारा और अब??????? इसी लिए तो कहते है- निप इट इन द बड[NIP IT IN THE BUD]!

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

मैं तो इस घटना से दुखित हुआ हूं। राजनीति की क्या बात कहूं।

RAJ SINH said...

पूरे आलेख और अब तक की गयी सभी टिप्पणियों से सहमत .

डॉ .अनुराग said...

इस राजनीति में मोहरा बने बेचारे पुलिस वालो के परिवारों को कौन संभालेगा ...?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

लोग अनपढ़ नेताओं को रोते हैं, पढ़े-लिखों ने तो और भी दुखी किया है. कभी "ग्रो मोर" में भागीदारी रखकर, कभी काले धन को बढावा देने की गरज से चेक पर टैक्स लगाकर, कभी ...

अशोक पाण्डेय said...

इन राजनीतिज्ञों की आंख पर स्‍वार्थ का चश्‍मा चढ़ा हुआ है, जिससे अगर कुछ दिखता है तो सिर्फ पैसा।

नक्‍सली हमले में एसपी विनोद चौबे समेत तीस जवानों की मौत जैसी घटनाओं का असर हमारे यहां के पुलिसकर्मियों के मनोबल पर भी दिख रहा है। उनका साफ कहना है कि अब जांबाजी दिखाने का समय नहीं रहा।


शहीद एसपी स्‍व.विनोद चौबे का परिवार मूल रूप से हमारे बगल के भोजपुर जिले का ही रहनेवाला था। इस वारदात से हमारे इलाके के लोग भी अत्‍यधिक मर्माहत हैं।