मालेगावं धमाके पर कुछ सवाल मैने पिछ्ली पोस्ट में उठाये थे।एक युसूफ़ साब ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि बहुत बुरा लग रहा है ना?और भी बहुत कुछ कहा उन्होंने।मैं उन को ज़िक्र करने लायक नही समझता,मगर उन युसूफ़ साब को ये ज़रुर बताना चाहता हूं कि मैंने मालेगांव धमाकों को जायज नही ठहराया।सवाल खडे करने से कोइ किसी कौम का दुश्मन नही हो जाता,और मुस्लिमो की जो पैरवी कर रहे हैं,वे उनके हितैषी नही बल्कि असली दुश्मन हैं।दरसल मुसलमानों को इस बात पर गौर करना चाहिये कि जो कथित धर्मनिरपेक्ष नेता उनकी सलामती का झूठा रोना रो रहे हैं,वे जाने-अंजाने हिंदूओं के अंदर आक्रोश भडका रहें।उनकी पैरवी ही मुस्लिम विरोध की आग को हवा दे रहे हैं,जैसे युसूफ़ साब आप कर रहे हैं।
असल मे अब समय आ गया है जब हमे इस बारे मे इमानदारी से सोचना चाहिये।क्रिया और प्रतिक्रिया कोइ नये शब्द नही है,और ये सिद्धांत भी। अब अगर किसी धमाके के बाद उसमे शामिल लोगो की तरफ़दारी की बात सामने आती है तो उसका विरोध होना भी स्वाभाविक प्रक्रिया है।कायदे से इसमे जांच पूरी होने से पहले सभी राजनैतिक और सामाजिक लोगों को बयान देने पर रोक लगा देनी चाहिये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वक़ालत करने वालो को भी खामोश रहने की हिदायत मिलनी चाहिये।बेसिर-पैर की स्टोरियों पर भी रोक लगनी चाहिये।ये इसलिये ज़रुरी है,क्योंकी इन्ही सबके कारण प्रतिक्रियाएं जो सामने आती है,वे ही बवाल का कारण बनती है।इस तरह का प्रयोग महाराष्ट्र मे हुआ,वहां राज के बोलने पर पाबंदी लगी और सुलगता महाराष्ट्र शांत हो गया। हालांकी देश के सबसे बडे शुभचिंतक बनने वाले मीडिया ने राज की प्रेस कांफ़्रेंस मे बवाल मचाने वाले सवालों की बरसात ज़रुर की,मगर उनकी इच्छा पूरी नही हुई।वैसे नेताओं की बकवास पर रोक लगाने से पहले मीडिया की बकवास को संतुलन के नियम सिखाना बेहद ज़रुरी है।
वैसे भी मुसलमानों के खिलाफ़ सारे देश मे उतना माहौल नही है,जितना मीडिया बताता है।करीब-करीब यही स्थिति फ़र्जी धर्मनिरपेक्ष नेताओं की है।वे भी ज़रा सी बात पर आसमान सर पर उठा लेते हैं,और प्रतिक्रिया स्वरुप फ़र्ज़ी हिंदूवादियों और सालो से ये ढकोसला देख रहे करोडो हिंदूओं को इस बारे मे सोचने पर मज़बूर कर देता है।धीरे-धीरे ये ज़हर सारे देश मे फ़ैल रहा है।समय आ गया है जब इस पर रोक लगाना ज़रुरी है।
वोट बैंक की खातिर जिस कांग्रेस ने मुसलमानो को डरा कर तरक्की की राह पर सबसे पिछे रखा,इस पिछडेपन को भुनाने वाले मुलायम-अमर,लालू-रामविलास ने उनकी तरक्क्की के लिये क्या किया?पहले कंग्रेस उन्हे डरा कर सुरक्षा की गारटी के बदले अपना वोट बैंक मानती थी,अब ये काम आरजेडी और एसपी कर रही है।जितना डर मुसलमानो को नही है उससे ज्यदा ये बताते हैं और गुस्से से भरे कुछ हिंदू उनकी मंशा के अनुरूप वारदात कर अलगाववाद की आग को हवा दे देते हैं।
मुसलमानों को ये सोचना चाहिये कि उनका सच्चा हितैषी कौन है?उनकी सुरक्षा की गारंटी मांग कर उन्हे असुरक्षित खाई मे धकेलने वाले नेता या उनके डर और आशंका को बेचने वाले मीडिया वाले?इस मामले मे भी प्रधानमंत्री को पहल करना चाहिये,न्यायपालिका को भी। अनावश्यक बयानबाज़ी ,बकवास पर रोक लगनी क्यों ज़रुरी नही है?क्या ये मसला महाराष्ट्र के मसले से छोटा है?क्या सारे धर्मनिरपेक्ष लोगों को अलगाव की आंधी चलती नज़र नही आ रही है?और भी बहुत से सवाल है,मगर डर है युसूफ़ जैसे होशियार लोग इसे मुस्लिम विरोध मान लें।