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Saturday, July 19, 2008

इसका मतलब सूचनातंत्र कमजोर है मंत्रीजी।

केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल को अब ख्याल आ रहा है सूचनातंत्र को मजबूत करने का। अब जबकि सैकड़ों जवान इसी सूचनातंत्र की कमजोरी की वजह से असमय ही अपनी जान गंवा बैठे है। उनका ये बयान इस बात का सबूत है कि राज्य सरकारों का सूचनातंत्र कमजोर है।

देर से सही श्रीप्रकाश जायसवाल ने इस बात को खुलेआम कहा तो सही। कानपुर में उन्होंने माना कि नक्सल आंदोलन को कुचलने के लिये राज्य सरकारों को अपने खुफियातंत्र को चुस्त दुरूस्त रखना चाहियें और उसे और मजबूत करना चाहिये। बात तो सौ टके सही कही श्रीप्रकाश जायसवाल ने। लेकिन सूचनातंत्र क्या एक दिन में मजबूत हो सकता है। क्या राज्य सरकारों के पास कोई जादू की छड़ी है।

दरअसल सूचनातंत्र को मजबूत करने का मतलब है उसकी कमजोरी को मान लेना। और ये एकदम सही बात है कि राज्यों की पुलिस के सूचनातंत्र खोखले है। इसका सबूत उड़ीसा के मलकानगिरी और छत्तीसगढ़ के बस्तर में हाल में हुई नक्सल वारदात है। नक्सलियों की हलचल पुलिस को पता ही नहीं चलती और इस बात से अनजान पुलिस हमेशा उसके बिछाये जाल में फंसकर शिकार बन जाती है।

और फिर पुलिस का सूचनातंत्र मजबूत होगा भी कैसे। नक्सल क्षेत्रों में पुलिस की पोस्टिंग बतौर सजा या अनिवार्यता से होती है। उस इलाके में जाने वाला पुलिस अफसर या जवान अपनी पोस्टिंग रूकवाने में पूरी ताकत लगा देता है जो सफल नहीं हो पाता हो वो मजबूरी में वहां जाता है। और वहां से वापसी का जुगाड़ शुरू कर देता है। इस सारी कवायद में उसके पास राजनीतिक आकाओं और उनके चमचों की प्रदक्षिणा में ही समय गुजर जाता है। और जबतक वो उस इलाके से वाकिफ हो पाते है तब तक उनकी वापसी का समय हो जाता है।

ऐसे में पुलिस कब लोगों का विश्वास जीते और कब उसके अपने भरोसे के संपर्क या सूचना सूत्र बने। एक और सोचने वाली बात ये है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सली इलाकों में हल्बी और गोंडी बोली जाती है, जिससे मैदानी इलाकों के लोग वाकिफ नहीं होते। शहरी इलाकों से वहां फेंके जाने वाले पुलिस वाले हिन्दी बोलते है जो आदिवासियों को समझ नहीं आती और आदिवासियों की बोली पुलिस नहीं समझ पाती। ऐसे में एन्टी गुरिल्ला वारफेयर का महत्तवपूर्ण तथ्य विश्वास कैसे बनेगा।

लोकल सपोर्ट के बिना सूचनातंत्र को मजबूत कर पाने की बात सोचना भी बेमानी लगता है। जहां नौकरी मजबूरी में और समय काटने के लिये की जा रही हो वहां लोगों का विश्वास जीत पाना बहूत मुश्किल लगता है। एक बात और खासकर छत्तीसगढ़ में जो आदिवासी क्षेत्र के पुलिस वाले है उन्हें शहरों में पदस्थ कर दिया जाता है जहां उन्हें भी काम करने में दिक्कत ही आती है। ऐसे लोगों को जो नक्सल क्षेत्र के भूगोल, इतिहास, संस्कृति और भाषा से वाकिफ है उन्हें वहां रखने की बजाय उन सब तथ्यों से अनजान लोगों को वहां भेजकर नक्सल प्रभावित लोगों का विश्वास जीतना बड़ा अजीब-सा लगता है।

खैर ये मामला राज्य सरकारों का है और मजबूत सूचनातंत्र के दांवों की पोल एक नहीं कई बार खुल चुकी है।इस असलियत से उनके बड़े-बड़े अफसरों का तो पता नहीं लेकिन केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल जरूर वाकिफ हो गये है। अच्छा है कि इस गंभीर विषय पर एक मंत्री ने गंभीरता तो दिखाई है। जिस ईमानदारी से श्रीप्रकाश जायसवाल ने ये बात कही उसी ईमानदारी से उस पर अमल हो गया तो हो सकता है बहुत से बच्चे असमय अनाथ नहीं होेंगे, बहुत-सी सुहागिनों को वैधव्य का श्राप नहीं भोगना पड़ेगा। बहुत से बूढ़े मां-बाप अपने लाडले की झलक पाने के लिये नहीं तरसेंगे।बहूत से पुलिसवालों की तस्वीरों पर असमय फूलमालायें नहीं चढेंगी। बहुत से जवान बेमौत नहीं मारें जायेगे। अगर सबकुछ उतनी ही ईमानदारी से हुआ तो।

5 comments:

सचिन मिश्रा said...

bahut accha likha hai

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

परिस्थियों का बहुत अच्‍छा चित्रण किया है भईया आपने । यहां तो हर पुलिस अधिकारी बस्‍तर जाने के नाम पर बीमार पड जाता है और जुगाड तोड कर के मैदानी इलाकों में पोस्टिंग करा कर और ज्‍यादातर समय छुट्टियों में बिताकर अपने कर्तव्‍यों की इतिश्री कर लेता है फिर शहरों में आकर मोटा माल, प्रापर्टी बडी अट्टालिकाओं के संचय में जुट जाता है ।

देश के मुख्‍य सूचनातंत्र के भुतपूर्व उपप्रमुख के डीजीपी होते हुए भी छत्‍तीसगढ में सूचनातंत्र कमजोर है इस बात का अफशोस होता है ।
डीजीपी के सिपहसालारों को ऐसे इंसपेक्‍टरों के अघोषित आय पर भी नजर डालनी चाहिये जो मैदानी इलाकों के अपराध के सौदों से निर्मित हो रही है ।

सिर्फ माओवादी ही नक्‍सली नहीं है यहां तो हर तरफ नक्‍सली ही नक्‍सली है । 'हर शाख पे उल्‍लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्‍तां क्‍या होगा'

अशोक पाण्डेय said...

आपकी बात सही है। लेकिन हमारे देश में जितनी आर्थिक असमानता बढ़ रही है, उसे देखते हुए नक्‍सलवाद पर नियंत्रण के लिये पुलिसिया उपाय को पर्याप्‍त नहीं माना जा सकता।
गैर-बराबरी शोषण को जन्‍म देती है और शोषण नक्‍सलवाद का कारण बनता है। शासनतंत्र और मीडिया द्वारा किसानों व आदिवासियों की उपेक्षा जारी रहेगी तो उनके सामने मरने-मारने के सिवा कोई विकल्‍प नहीं बचता।

अनुराग said...

सूचना तंत्र वाली बात में दम है ,हमारी पोलोस का मैनेजमेंट सिस्टम इतना गड़बड़ है की इन्हे सुधरने में भी वक़्त लगेगा

शहरोज़ said...

गर्व है हमें कि आपके ब्लॉग का लिंक हमारे hamzabaan पर है और इस बहाने सच को सच की तरह देखने का सुयोग मिल जाता है .
कभी उर्दू शायर और इलाहबाद के जज रहे आनंद नारायण मुल्ला ने इनकी हरकतों के सबब वर्दी वाला गुंडा कहा था.