Tuesday, July 22, 2008

कौन जीता कौन हारा, पता नहीं पर लोकतंत्र ज़रूर नंगा हो गया

परमाणु करार पर इकरार और इनकार के बीच झूलते सांसदों की हरकतों को सारा देश देखता रहा। बापू , चाचा नेहरू, भगतसिंह या आज़ादी के लिए जान गंवा देने वाले शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों ने सपने में नहीं सोंचा होगा कि उनके देश की संसद में लोकतंत्र इस तरह नंगा होगा। उन्हें गर ये पता रहता तो शायद वे इस देश को आज़ाद ही नहीं कराते।
और फिर हुआ ही क्या है आज़ादी के बाद इस देश में ? बचपन से यही सुनते और पढ़ते आ रहे थे, भारत कृषि प्रधान देश है, भारत की 75 प्रतिशत जनता गाँव में रहती है। भारत गाँवों का देश है। क्या कभी ऐसा लगा है कि भारत कृषि प्रधान देश है ? अगर ऐसा होता तो कर्ज में डूबे हजारोेंं किसान भला आत्महत्या क्यों करते ? वे नेता, विधायक या सांसद की तरह बेशर्म तो नहीं हैं न। अगर वे सांसदों की बेशर्मी देख लेते और उनसे कुछ सीख लेते तो लोक-लाज के डर से अपने परिवार को बेसहारा छोड़ आत्महत्या नहीं करते।
ऐसी बेशर्मी तो शायद कहानी किस्सों में भी न सुनी होगी। संसद में एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते देश के भाग्यविधाताओं को अपराधियों का सहारा लेता देख शायद संसद में लगी सभी महापुरूषों की तस्वीरों से आंसूओं की धार बह निकली होगी। पर उसकी परवाह गली के कुत्तों की तरह लड़ने-झगड़ने वाले जनप्रतिनिधियों को कहां। कुछ के पास सरकार बचाने का ठेका था, तो कुछ के पास सरकार गिराने का। कुल मिलाकर देखा जाए तो वहाँ सांसद कम, ठेकेदार ज्यादा नज़र आए।
जब सरकार बचाने और गिराने के ठेके होने लगे, तो फिर इस देश में लोकतंत्र नाम की चिड़िया कहाँ मिलेगी। हमारी आने वाली पीढ़ी तो शायद हमें गाली बकने लायक भी न समझे। उससे भी गई गुजरी हरकतें सारा देश देखता रहा, बेबसी से। लोग कर भी क्या सकते हैं ? घर में विवाह के बाद आई बहू के झगाड़ालू या आवारा निकल जाने के बाद ठोक-बजाकर रिश्ता तय करने वालों की जो हालत होती है, कमोबेश वही हालत आमजनता की नज़र आ रही है।
इसके बाद भी जनता कुछ नहीं कर सकती क्योंकि उनके पास हथियार के नाम पर एक वोट होता है जिसकी कीमत संसद में हुए लोकतंत्र के नंगे नाच को देखकर समझ आती है। पुराने ज़माने की हेलन, बिंदू फरियाल, पद्मा खन्ना के कैब्रे या फिर नए ज़माने की मल्लिका शेरावत, राखी सावंत के हॉट सीन्स को फेल कर देने वाली फिल्म रही ''अविश्वास प्रस्ताव''। सब कुछ देखने के बाद जिस तरह लोग छिपते-छिपाते मल्लिका की फिल्म देखते हैं, उसी तरह जनता को लोकतंत्र में अपनी कला दिखाने वालों को मजबूरी में फिर से देखना होगा।
अफसोस इस बात है कि ये नंगे-लुच्चे कुछ महीने बाद फिर हमारे सामने हाेंगे और इलेक्शन के नाम पर हमें फिर उनमें से कुछ कम नंगों को चुनना पड़ेगा। एक बात समझ में नहीं आती कि इसे इलेक्शन क्यों कहते हैं ? आम जनता इसमें किसी को चुनती नहीं है वो तो बस उम्मीदवारों में से खराब को छोड़ देती है। मेरे हिसाब से तो अब इलेक्शन की बजाय इसे रिजेक्शन कहना ज्यादा अच्छा होगा। क्योंकि हम चुनाव लड़ने वालों में से एक को छोड़ सबकों रिजेक्ट करते है और वोट देना होता है, इसलिए किसी एक को वोट दे देते हैं। वो भी इसलिए कि लोग उंगली पर स्याही का निशान न देख लोग हमें गैर ज़िम्मेदार न ठहरा दे।
वोट देने के बाद उंगली पर स्याही तो लग जाती है लेकिन ऐसा लगता है कि वो उंगली पांच साल के लिए हमारा ही बेड़ा गर्क कर देती है। एक बार चुन लिए गए तो बस चुन लिए गए, कोई पूछे कि चुनाव में होने वाला करोड़ों रूपए का खर्च कहाँ से आता है। कैसे अच्छे लोग चुनाव से दूर हो रहे हैं ? क्यों शराब और कंबल साड़ियों में वोट बिकने लगे हैं। गरीब जनता अगर पांच साल में एक बार बिकती है तो हर हारने वाला उसे शराब और सौ रूपए में बिकने वाला करार दे देता है। लेकिन आज जो संसद में हुआ वो क्या उस बिकाउपन से कुछ कम है ?
खुद पर शर्म भी आती है और गुस्सा भी ! लेकिन करें तो क्या करें ? लोकतंत्र की मर्यादाओं में जकड़ा हुआ तो सिर्फ वोटर है। लीडर या डीलर पर शायद लोकतंत्र की मर्यादाएँ लागू नहीं होती। समझ में नहीं आता कि उनकी हरकतों को न केवल देश बल्कि सारा जहाँ देख रहा होता है। ऐसा नहीं होता तो अमेरिकी उपविदेश मंत्री अविश्वास प्रस्ताव पर वोट होने के पहले ही ये नहीं कह देते कि हम अल्पमत सरकार से भी करार कर सकते हैं। इससे हमारे बिकाउपन का अंतर्राट्रीय स्तर पता चल जाता है। खैर जाने दो गुस्से से होता ही क्या है। गरीब का गुस्सा उसे पिटवाकर छोड़ता है। जाने दीजिये, जिनको गालियाँ बक रहे हैं उनको पता चलता नहीं है, असर होना तो दूर की बात है। फिर अपना खून जलाने से फायदा ही क्या है ? लोकतंत्र तो कानखजूरा हो गया है। उसकी सैकड़ों टाँगें हैं, हमारे जैसी एक दो टाँग टूट भी जाए तो वो लंगड़ा नहीं होगा। चलता रहेगा कानखजूरा और लोकतंत्र का नंगा नाच।

4 comments:

Sandeep Singh said...

बहुत अच्छा लिखा आपने लेकिन आगे भी गालियां देते रहें भले ही कम सुनी जाएं क्योंकि चुप्पी का मतलब होगा, कनखजूरे की एक और टांग का इजाफा।

Udan Tashtari said...

अफसोसजनक एवं दुखद ...

Manish said...

बिल्कुल सही, मेरी बात आपने सही तरीके से कह दी है


सुना है सरकार बच गयी

लेकिन इज्जत नही बची

राज भाटिय़ा said...

भडबे को भी कभी शर्म आती होगी अपने किये पर, लेकिन यह सब तो उस से भी गये गुजरे हे, ओर जिस करार के पीछे लगे हे, उस करार का रजल्ट भी जल्द सामने आ जाये गा.जो जीता वो अपना ईमान हारा, लोगो की नजर से गिरा.
आप का लेख बहुत अच्छा हे, अगर सभी ऎसी ही भाषा बोले तो शायद इन्हे कुछ शर्म आये.आप ने बहुत दिलो की बात अपने लेख मे लिख दी हे.
धन्यवाद.