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Thursday, October 30, 2008

मालेगावं,मालेगावं,मालेगावं।क्या मालेगावं के अलावा कहीं धमाके नही हुए?

मालेगावं,मालेगावं,मालेगावं।क्या मालेगावं के अलावा देश में कहीं और धमाके नही हुए?क्या दुसरे शहरों मे हुए धमाकों की जांच मे ये तेजी नज़र आई?क्या मालेगावं के धमाकों मे हिन्दूवादी संगठन से जुडे लोगों पर शक होने से बाकी शहरों में हुए धमाको का पाप धुल सकता है?मालेगावं की गल्ती क्या बाकी गल्तियों को कम साबित कर सकती है?क्या बाट्ला हाऊस काण्ड की न्यायिक जांच की मांग करने वालों को इस मामले मे जांच की जरुरत नज़र नही आती?क्या मालेगावं काण्ड का शक हिन्दू उग्रवाद जैसी धारणा बनाने के लिये काफ़ी है?अगर काफ़ी है तो फ़िर इस्लामिक उग्रवाद पर आपत्ति क्यों?मालेगावं धमाके की जांच को जितनी प्राथमिकता से सार्वजनिक किया जा रहा है,क्या अन्य धमाको की जांच को सार्वजनिक किया गया?क्या मालेगावं के धमाको के तार एक साध्वी से लेकर सेना के अफ़सर तक जोडने वाले एटीएस के अफ़सरो ने दूसरें शहरों के धमाको के तार सिमी के बाद आगे कहीं किसी से जोड कर दिखाये थे?इसका मतलब ये नही है कि मालेगावं के धमाके जायज हैं,वो भी उतने ही नापाक थे जितने दूसरे शहरों मे हुए धमाके।मगर दोनो धमाकों को अलग-अलग नज़रिये से देखने-दिखाने का षडयण्त्र बंद होना चाहिये।कुछ सवाल ऐसे है जिनके ज़वाब ढूंढना ज़रूरी है?वर्ना इस्लामिक उग्रवाद की उग्रता को कम करने के लिये हिन्दू उग्रवाद,मराठी अलगाववाद की तपिश को कम करने के लिये उल्फ़ा और हुज़ी और उल्फ़ा और हुज़ी को छिपाने के लिये पता नही किस-किस का सहारा लेना पडेगा?देशवासी सब देख रहे हैं और समझ रहे हैं,उन्हे नेता बहुत ज्यादा समय तक अंधेरे मे नही रख सकते हैं।

Friday, September 26, 2008

इलाज कराने आया एड्स पीड़ित, अस्पताल का बन गया माली

छत्तीसगढ़ के बड़े सरकारी अस्पताल में इलाज कराने आया था जांजगीर जिले के गांव कुर्रा का एक युवक। इलाज के दौरान पता चला कि वो एचआईवी पॉजिटिव है और उसके बाद उसके दुर्दिन शुरू हो गये। इलाज तो हुआ नहीं अब ये हालत है कि वो अस्पताल के बगीचे की साफ-सफाई कर वहीं गुजर बसर कर रहा है।

श्याम परिवर्तित नाम को पता नहीं था कि वो एचआईवी पॉजिटिव है। उसने जांजगीर जिले में इलाज करवाया और वहां फायदा नहीं होने पर उसे रायपुर रिफर कर दिया गया। यहां भी 700 बिस्तर वाले डॉ आम्बेडकर अस्पताल में उसका इलाज शुरू हुआ और कई दिनों बाद जांच में पता चला कि वो एचआईवी पॉजिटिव है। उसके बाद अस्पताल प्रबंधन का नजरिया एकदम-से बदल गया।

श्याम को भी पता नहीं चला कि क्या हुआ। तब तक उसकी हालत बिगड़ने लगी थी। उसका शरीर फटने लगा था और खून भी रिसने लगा था। श्याम असहनीय दर्द से परेशान था। उसमें डॉक्टरों से मिन्नतें की मगर उसे अस्पताल से चलता कर दिया गया। परेशान श्याम वापस घर भी जा नहीं सकता था। सो उसने वहीं भीख मांगना शुरू कर दिया। इस बीच डाक्टरों ने उसे घर वापस जाने की सलाह भी दी मगर श्याम ने रायपुर के सरकारी अस्पताल को ही अपना अंतिम बसेरा बना लिया।

इसी बीच उसने अस्पताल के बगीचे को अपना घर बना लिया और उसकी साफ-सफाई कर उसे व्यवस्थित करने लगा। वैसे भी अस्पताल में साफ-सफाई के नाम पर औपचारिकता ही होती थी, सो किसी ने श्याम के काम पर आपत्ति भी नहीं की।

इलाज न होने से परेशान श्याम ने मुख्यमंत्री से लेकर राजस्व मंत्री और अपने क्षेत्र के विधायक तक से गुहार लगाई मगर आश्वासन के सिवाय उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। हाँ एक बार जरूर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने उसे 5000 रूपये की आर्थिक सहायता दी थी। अब हालत ये है कि उसका इलाज आजतक शुरू नहीं हो पाया है। अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि यहां एड्स के निदान के तमाम उपाय किये जाते है और यहां कोई भी आकर इलाज करा सकता है। एक ओर डाक्टरों का ये दावा है तो दूसरी ओर उसी अस्पताल के बगीचे में घिसट-घिसटकर जिंदगी को ढो रहा श्याम है।
श्याम अब जिंदगी से तंग आ चुका है और उसका कहना है कि या तो उसका इलाज शुरू हो जाये या वो आत्महत्या कर ले। इसके अलावा उसके पास कोई और चारा भी नहीं है। ये हाल है राज्य की राजधानी के अस्पताल का। बाकी जिलों और तहसील मुख्यालयों के अस्पतालों का तो भगवान ही मालिक होगा।

Wednesday, September 3, 2008

अंधे को बनाया चौकीदार! है न अंधेर नगरी और चौपट राजा







छत्तीसगढ़ में जो न हो वो कम है। अब रायगढ़ जिले के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र को ही ले लीजिए। यहाँ की सुरक्षा व्यवस्था जिस व्यक्ति को सौंपी गई है वो खुद की देखभाल नहीं कर पाता है। दोनों ऑंखों की ज्योति खो चुके नेत्रहीन को यहाँ का चौकीदार बनाकर अफसरों ने ये साबित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में न केवल प्रशासन बल्कि शासन भी अंधा है।

ये चौंका देने वाला मामला सामने आया है रायगढ़ ज़िले के गाँव कोसीर का। यहाँ दोनों ऑंखों से लाचार नेत्रहीन को चौकीदार बनाकर अस्पताल की सरुक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी सौंप दी गई। अब जो खुद की देखभाल नहीं कर सकता, वो अस्पताल की देखभाल क्या करेगा ? इस बात को जानते-बूझते स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने मनमानी करते हुए नेत्रहीन चौकीदार की नियुक्ति कर दी।

ये अस्पताल सिर्फ नेत्रहीन चौकीदार के कारण ही नहीं पहचाना जाता है, बल्कि यहाँ के डॉक्टर और कम्पाउंडर भी कम फेमस नहीं है। डॉक्टर साहब तो महीने में 2-3 दिन ही अस्पताल आते हैं। कम्पाउंडर साहब भी डॉक्टर साहब से कम नहीं है। बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां.........। वैसे कभी-कभार पीने के बाद कम्पाउंडर साहब को अस्पताल की याद आती है तो पहुँच जाते हैं वो अस्पताल। गाँव के लोग उन्हें गाना गाते हुए इंजेक्शन लगाने में एक्सपर्ट मानते हैं।

इस बात की शिकायत इलाके के बीएमओ से कई बार की गई है। गाँव वालों का कहना है बीएमओ साहब भी कम नहीं है। वो अस्पताल से अच्छा ईलाज अपने घर में करते हैं। जिन मरीजों को शिकायत है उनसे पूछते हैं शिकायत करना ज़रूरी है ईलाज। और सब ज़रूरी ईलाज करवाने में लग जाते हैं।
ये हाल है छत्तीसगढ़ सरकार के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र का। नेत्रहीन उसकी सुरक्षा कर रहा है वैसे ही जैसे ऑंख वाले अंधे सरकारी अफसर और नेता राज्य की रखवाली कर रहे हैं। इससे ज्यादा क्या कहा जा सकता है ? टके सेर भाजी, टके सेर खाजा, अंधेर नगरी, चौपट राजा।

Sunday, August 31, 2008

मुख्यमंत्री की सभा में रिवाल्वर लेकर जा रहे है लोग

घोर नक्सलवाद से जूझ रहें छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था का हाल कैसा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी सभा में रिवाल्वर लेकर पहूँच गया था एक युवक। भला हो मुख्यमंत्री के सुरक्षा स्टॉफ का जिसने भीड़ में बैठे युवक को पकड़कर बाहर निकाल लिया।


हालांकि रिवाल्वर लायसेंसी था लेकिन रिवाल्वर लेकर सभास्थल तक पहूँच जाना और सामने की पंक्तियों में बैठ जाना मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिये काफी पुख्ता सबूत है। वैसे भी राजधानी रायपुर तक नक्सलवादियों की आवाजाही दर्ज हो चुकी है। ऐसे में पुलिस का सुरक्षा इंतजाम तगड़ा होना चाहिये लेकिन आज शाम हुई इस घटना ने पुलिस की चाक-चौबंद इमेज के चिथड़े उड़ा दिये।

पुलिस ने जितने इंतजाम मुख्यमंत्री की सुरक्षा के लिये नहीं किये उससे ज्यादा इस खबर को छिपाने के लिये किये। पहले ही लगातार चोरियों, हत्या, लूट जैसी वारदातों से राजधानीवासी परेशान और आंतकित थे। इस नये झमेले ने पुलिस व्यवस्था पर और कई सवाल खड़े कर दिये है।
मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति की सुरक्षा व्यवस्था किस तरह की जा रही है ये आज सामने आ गया है। वैसे भी नक्सलियों के खिलाफ तीखे तेवर अपनाने वाले और सलवा-जुडुम की जमकर वकालत करने वाले मुख्यमंत्री पहले ही नक्सलियों की आंख की किरकिरी बनी हुई है। ऐसे में उनकी सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगना पुलिस के लिये कलंक से कम नहीं है। ये तो गनीमत है कि वो युवक लायसेंसी रिवाल्वर लेकर पहूँचा था अन्यथा कोई अपराधी उसकी जगह होता तो होने वाले अनर्थ की कल्पना से ही रूह कांप उठती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ की पुलिस की बदनामी नहीं होगी तो क्या तारीफ होगी।

Friday, August 15, 2008

तिरंगा उल्टा है या सीधा ये तक नहीं जानते, दुर्भाग्य ही है




आज़ादी का जश्न मनाने वाले कुछ लोग ऐसे भी निकल जाते हैं, जिन्हें ये तक नहीं पता होता कि देश की शान तिरंगा उल्टा है या सीधा। अफसोस तो इस बात का है कि ऐसी गलती करने वाले मूर्ख नेता या भ्रष्ट अफसर नहीं बल्कि शिक्षा के मंदिर के पुजारी है।

इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाए कि साल में 2 बार तिरंगा फहराने वाले मास्टरों को (शिक्षक या गुरूजन कहने की हिम्मत मुझमें नहीं है) ये तक नहीं पता था कि वे तिरंगा उल्टा फहरा रहे हैं। और उससे भी ज्यादा अफसोस की बात ये है कि उस स्कूल के छात्रों को भी इस बात का पता नहीं चला। उल्टा झंडा फहरा दिया गया, मिठाईयाँ बाँटी गई, और आज़ादी के जश्न की सारी फार्मेलिटी पूरी कर ली गई। इसके बाद स्टॉफ इतमिनान से गप्पबाजी करता रहा।

बुरा हो राष्ट्रध्वज के सम्मान के लिए अभियान चलाने वाले ओपन मार्शल आर्ट अकादमी के सदस्यों का जिन्हें पता चल गया कि तिरंगे का अपमान हो रहा है। तत्काल सारे लोग स्कूल पहुँचे और उनका सामना हुआ स्कूल के रक्षक चौकीदार साहब से। जो सारी बात बताने के बावजूद उन्हें अंदर जाने से रोकता रहा। शायद वो अपने मास्टरों की गप्पबाजी में खलल नहीं चाहता था। इसके बाद तो वहाँ हंगामा शुरू हो गया।

बेशर्मी की हद देखिए स्कूल का स्टॉफ हंगामा करने वालों की बात सुनने की बजाय उनसे उलझ गया। गाली-गलौच का दौर शुरू हो गया। आखिर वे भी तो आज़ाद हैं और आज़ादी का मतलब वे भी जानते हैं। बस भिड़ गए अपनी गलती मानने की बजाय। तभी वहाँ लोकल मीडिया भी पहुँच गया और उसके बाद तो जैसे स्कूल वालों को साँप सूंघ गया। तत्काल तिरंगा उतारा और सीधा कर दोबारा फहरा दिया। इस दौरान उनकी हड़बड़ी में देश की आन-बान और शान तिरंगा उनके पैरों के करीब जमीन पर गिर पड़ा।
आप बताईए स्कूल में जहाँ हम कहते हैं कि देश का भविष्य गढ़ा जाता है, वहाँ अगर ऐसी गलती हो तो क्या कहा जा सकता है ? मान लीजिए धोखा हो भी गया तो भी गलती बताने वालों को गालियाँ देना, क्या आज़ाद होने का यही मतलब है। अब ये भी तो नहीं कह सकते कि मामला किसी छोटे-मोटे गाँव-देहात का है। वहाँ भी ऐसी गलती शायद ही हो क्योंकि वे शहरियों से ज्यादा देश प्रेमी होते हैं और कम से कम तिरंगे को तो अच्छे से पहचानते हैं। राजधानी के स्कूल का ये आलम है इसे दुर्भाग्य ही मान लें तो ज्यादा अच्छा है। न मास्टरों को दिखा, न प्रबंधन को और न अतिथियों को। जब खेले-खाए धाकड़ लोगों को पता नहीं चला तो बच्चों का क्या दोष। अब ओपन मार्शल आर्ट वाले कह रहे हैं कि एसपी से शिकायत करेंगे। होते रहेगी शिकायत, चलेगा जाँच का लंबा दौर, तब तक आ जाएगा गणतंत्र दिवस और उसके बाद फिर मनाएँगे हम आज़ादी का जश्न। पता नहीं तब तक किसी के खिलाफ कार्रवाई हो भी पाएगी या नहीं।

Wednesday, August 6, 2008

क्या भगवान सिर्फ नेताओं का ही भला करता रहेगा ?




भगवान सिर्फ नेताओं का भला कर सकता है। देश और गरीब का ठेका भगवान के पास नहीं है। ऐसा नहीं होता तो एक गरीब उजड़े मकान में बच्चे को जन्म नहीं देती और बिना देखरेख के बच्चा 4 दिन में ही नहीं मर जाता। एक तरफ नेता बेखौफ सरकारी बंगलों पर काबिज हैं तो दूसरी तरफ गरीब अपनी छत भी नहीं बचा पाता है।

सुप्रीम कोर्ट को जब ये कहते सुना कि देश का भगवान भी भला नहीं कर सकते, तो ऐसा लगा कि उसके पीछे एक वाक्य और छिपा हुआ है वो है भगवान सिर्फ और सिर्फ नेताओं का ही भला कर रहा है। दिल्ली समेत सारे देश में सरकारी आवासों पर नेताओं का अवैध कब्ज़ा है। सरकार से लेकर कोर्ट तक अवैध कब्ज़े हटाने की बात कहते आ रहा है। इस मामले में कल सुप्रीम कोर्ट ने जमकर नाराजगी जताई और कहा कि इस देश का भगवान भी भला नहीं कर सकता। कल रात से सारे न्यूज़ चैनल ये ख़बर दिखाते रहे। सुबह अख़बारों ने भी इसी ख़बर को प्रमुखता से प्रकाशित किया।

एक बहुत छोटी सी ख़बर राजधानी से महज 25 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसे गाँव तिरैया से भी आई। वहाँ कुछ दिनों पहले अवैध कब्ज़ा कहकर गरीबों की दर्जनों झोपड़ियाँ तोड़ दी गई थी। वहाँ धरना दे रहे लोगों में से 1 महिला ने 4 दिन पहले वहीं एक बच्चे को जन्म दिया था। खुले आसमान के नीचे नवजात बच्चा और जच्चा पड़े हुए थे बिना भगवान के सहारे । कल उस बच्चे ने इस निर्दयी दुनिया को देखने से पहले ही दुनिया को छोड़ देना बेहतर समझा और चला गया, कई सवाल छोड़कर ?

अब आप बताईए क्या बरसात के मौसम में अवैध कब्ज़े हटाए जाते हैं ? क्या बिना व्यवस्थापन किए किसी के भी मकान उजाड़े जाते हैं ? और अगर ये नियम गरीबों के लिए तो देश के नेताओं को उनसे छूट क्यों ? इससे तो साफ लगता है कि देश में भगवान से मदद का टेण्डर नेताओं का ही निकला है। जब ही तो उनके मामले में न बुल्डोजर चलते हैं न ही म्युनिसिपल वाले और न ही सरकार कोई कार्रवाई करती है। हाँ गरीब की झोपड़ियों पर उनके नियमाें का हथौड़ा पूरी ताकत से चलता है।

रायपुर से 20 कि.मी. दूर धरसींवा ब्लॉक के तिरैया गाँव के 36 परिवार के लोगों की तकदीर हिन्दुस्तान के नेताओं जैसी अच्छी नहीं थी। उन्हें न नोटिस मिली, और न ही कोई वैकल्पिक जगह। बस सरकारी अमला पहुँचा और तिनका-तिनका जोड़कर बसाए गए आशियानों को उजाड़ता चला गया। वहाँ अब 36 परिवारों के घर संसार की यादें ही दफन है। पीड़ित लोगों का कहना है कि उन्हें न रूपए पैसे हटाने का मौका दिया गया और न ही वे अपना अनाज हटा पाए, सब वहीं दफन हो गया। अब वे सब बैठे हैं अपने मकानों की कब्र पर धरना दिए कि शायद भगवान उन पर भी रहम की बरसात कर दे।

लेकिन वे तो गरीब हैं, भला उनकी मदद भगवान क्यों करेगा ? फिर जिसे खुद भगवान ने गरीब बनाया हो उसकी मदद इंसान भी नहीं करेगा ? तो फिर उनकी मदद कौन करेगा ? वैसे भी भगवान आजकल छप्पन भोग से ही प्रसन्न होते हैं, वो भी हाइजेनिक और ऑर्गेनिक हो तब। अब ये सब तो गरीब के घर तो मिलना नहीं है। ये मिलता है बड़े-बड़े उद्योगपतियों, नेताओं और अफसरों के यहां होने वाले हवन, पूजन में। सो भगवान भी लगता है वहीं बिजी हैं। अब उनसे फुरसत मिले तो भगवान देखे गरीबों की ओर। और इस देश में भ्रष्ट नेताओं और बड़े लोगों की संख्या इतनी हो गई है कि लगता है आने वाले कई साल भगवान के दरबार में गरीबों का नंबर लग ही नहीं सकता। और तब तक गरीब ऐसे ही उजड़ते रहेंगे, मरते रहेंगे सड़कों पर और भगवान की दया से नेता जमे रहेंगे सरकारी बंगलों में।

Friday, August 1, 2008

मुल्जिम वापस आ गया मगर सिपाही नहीं लौटे

छत्तीसगढ़ में जो न हो वो कम है। आमतौर पर पेशी पर जाने वाला मुल्जिम पुलिस को चकमा देकर भाग जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले में जो हुआ वो अपराधियों में ईमानदारी ज्यादा होने का सबूत है। मुल्जिम वापस लौटकर आ गया मगर सिपाहियों का अब तक पता नहीं।

ये मजेदार ख़बर मुझे दोपहर को मिली। रायगढ़ के पत्रकार विजय सिंह ने मुझे ये ख़बर बताई। पहले तो मैं जी भरकर हंसा फिर मुझे लगा कि ये मौका और भी लोगों को देना चाहिए, सो ब्लॉग पर आप लोगों के लिए ये मजेदार ख़बर दे रहा हूँ।

हुआ यूँ 29 जुलाई को रायगढ़ जेल में बंद देवलाल को आबकारी एक्ट के मामले में धरमजयगढ़ की अदालत में पेश करने के लिए भेजा गया। उसे 2 सिपाही जखरिया टिर्की और सुंदर टिर्की धरमजयगढ़ ले गए। 30 जुलाई की रात को देवलाल अकेला जेल वापस पहुँचा। जब उसने बताया कि वह पेशी से वापस लौट रहा है तो सब हक्के-बक्के रह गए। सबने पूछा कि तुम्हारे साथ गए सिपाही कहाँ है, तो उसके जवाब था कि मुझे पता नहीं।

इसके बाद सिपाहियों की खोज-ख़बर ली गई। और उनका पता नहीं चलने पर आखिकार एसपी रायगढ़ जयंत थोर्राट ने उन्हें निलंबित कर दिया। आप बताइए भला मुल्जिम की ऐसी ईमानदारी कहीं देखने मिलती है ? आज तक अक्सर यही होता आया है कि पेशी के लिए जाने वाला मुल्जिम सिपाहियों को चकमा देकर भाग जाता है। लेकिन यहाँ ठीक उल्टा हुआ है, मुझे भी लगा छत्तीसगढ़ में नेताओं और अफसरों के लिए ईमानदारी का ये एक अच्छा सबक हो सकता है।

Thursday, July 31, 2008

कुष्ठ रोगियों के प्रति नज़रिया नहीं बदला समाज का न डॉक्टरों का

कुष्ठ रोग को जड़ से मिटाना है। कुष्ठ छूत की बीमारी नहीं है। कुष्ठ रोग मुक्ति के लिए सरकार ऐसे विज्ञापनों पर करोड़ों रूपए खर्च करती है मगर स्थिति ठीक उल्टी है। ज़िला अस्पताल में कुष्ठ रोगी वृध्दा को बाहर बिठाकर रखा गया। ये नज़रिया डॉक्टरों का है तो आम जनता से क्या उम्मीद की जा सकती है ?

गंगा कुष्ठ सेवा समिति के थनवारिन बाई तेज़ बुखार से पीड़ित थी। उसकी हालत बिगड़ती देख समिति का ही अशोक उसे लेकर ज़िला अस्पताल गया। वहाँ थनवारिन बाई को लेकर अशोक लाइन में नंबर लगाने खड़ा रहा। नंबर आने पर जब वह थनवारिनबाई को लेकर डॉक्टर के पास पहुँचा तो उसे बाहर बैठने के लिए कहा गया। काफी देर इंतज़ार के बाद भी जब वृध्दा की जाँच नहीं हुई और उसकी हालत बिगड़ने लगी तो अशोक बिफर पड़ा। इस बीच ख़बर लगते ही मीडिया वहाँ पहुँच गया और तब जाकर वृध्दा का ईलाज शुरू हुआ।

वृध्दा को अस्पताल लाने वाला भी कुष्ठ रोगी ही था। उसके साथ अस्पताल गया अशोक भी कुष्ठ रोगी है और एक पैर से लाचार है। व्हील चेयर पर बिठाकर दोनों वृध्दा को लेकर काफी दूर स्थित कुष्ठ रोगी बस्ती से अस्पताल पहुँचे थे। डॉक्टरों का ये रवैया दिल दहला देने वाला था। रोगों को अच्छी तरह से समझने वाले और उसका ईलाज करने वाले ही अगर रोगी से दूर भागे तो आम जनता का डर अपने आप समझ आता है।

ऐसा नहीं है कि कुष्ठ का संक्रमण नहीं होता लेकिन वो होता है, एक खास स्टेज में। शुरूआती दौर में ये बीमारी छूत से नहीं फैलती, लेकिन तमाम सरकारी प्रचारों के बावजूद आम जनता में ये धारणा नहीं बन पाई है। आज भी कुष्ठ रोगी समाज से अलग-थलक अपनी एक बस्ती अपनी एक दुनिया बसाकर रहते हैं। ऐसे में याद आते हैं राजधानी रायपुर के पूर्व महापौर स्व। बलबीर जुनेजा। वे हमेशा जाते थे कुष्ठ बस्ती में और जितना हो सकता था उतना प्यार बांटते थे उन लोगों के साथ। बलबीर जुनेजा उनके लिए नेता नहीं परिवार के मुखिया के समान थे और उनके जाने के बाद ऐसा लगता है कुष्ठ रोगी समाज से परित्यक्त होने के साथ-साथ अनाथ भी हो गए हैं। बलबीर जुनेजा मस्त-मौला इंसान थे सदा हंसते-हंसाते रहते थे और कैंसर का दर्द उन्हें हंसते-हंसते ही झेला। ज़िला अस्पताल में कुष्ठ रोगी वृध्दा के साथ अनदेखी नहीं होती अगर बलबीर जुनेजा ज़िन्दा होते। प्रणाम करता हूँ उस नेता को जिसके दिल में समाज से उपेक्षित, तिरस्कृत कुष्ठ रोगियों के लिए बेपनाह मोहब्बत थी।

Thursday, July 24, 2008

अचानक कहां से पैदा हो जाते है गरीब।

छत्तीसगढ़ में गरीब अचानक ही बढ़ जाते है। पता नहीं कैसे और कहां से आ जाते है। पिछले दिनों इस बात को लेकर जमकर हंगामा भी हुआ और अकेले रायगढ़ जिले में 17 हजार से ज्यादा फर्जी गरीबों का पता चला। एक बार फिर गरीब बनाने वाली सरकारी दुकान खुल गई है। 3 रू किलों चावल, सस्ता नमक और तेल लेने के लिये फिर लोग गरीब बनने की कतार में खड़े हो गये है।

18 जिले है छोटे से छत्तीसगढ़ राज्य में। उनमें से आधे तो आदिवासी बहुल है। बाकी जिलों में जो गरीब बनने और बनाने का खेल चल रहा है वो हैरतअंगेज है। दो करोड़ की आबादी में से लगभग एक करोड़ तो जंगलों में ही रहते है, बाकी शहरों में। ठीक है छत्तीसगढ़ पिछड़ा प्रदेश है और यहां की धरती भले ही अमीर हो, लोग गरीब है। अब राशन कार्डों के जरिये जो गरीब नहीं है उनको भी गरीब बनाया जा रहा है और जो है ही नहीं या जिनका अस्तित्व नहीं है ऐसे गरीब कार्डों पर उतर आ रहें है।

रायगढ़ जिले में 45 हजार से ज्यादा गरीबी रेखा के नीचे वाले राशनकार्डों के फर्जी होने का मामला सामने आया था। इस मामले में विधानसभा में जमकर हंगामा भी हुआ और सरकार ने माना कि कुछ कार्ड फर्जी है। ऐसे 17 हजार कार्ड फर्जी पाए गये। ये हुआ एक अकेले छोटे से जिले रायगढ़ का हाल। अब इससे पूरे प्रदेश की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

फर्जी राशन कार्ड बनाने वाले दरअसल गरीबों के हिस्से में आनेवाला चावल, नमक और तेल मुफ्त में डकार रहें है। रोज चावल में कनकी याने चावल का चूरा मिलाने के मामले सामने आ रहे है। करोड़ों के वारे न्यारे करने वाले राइस मिलर्स गरीबों का कौर तक छीन कर खा रहें है। कोई बोलने वाला नहीं, कोई रोकने वाला नही, कोई टोकने वाला नहीं।

सरकार क्या कर रही है ये तो सरकार जाने लेकिन सरकारी पार्टी यानी भाजपा एक बार फिर वोट बैंक बढ़ाने की खातिर सरकारी शिविरों में अपने लोगों को गरीब बताने या बनाने के लिये ऐड़ी चोटी का जोर लगा रही है। हर शिविर हाउसफुल है। ऐसा लगता है कि नदियों में बाढ़ आने की बजाय शहरों में गरीबों की बाढ़ आ गई है। एक बार फिर गरीबी की आड़ में अमीर राशन दुकानदार करोड़ों की हेराफेरी का खेल में मशगुल हो गये है।

अब ऐसे में गरीबी बढ़ रही है या गरीब बढ़ रहे है या उनकी आड़ में रईस बढ़ रहें है ये सबको पता है। सरकार भी ऐसा नहीं है कि इससे वाकिफ न हो। कभी धान के कटोरे के नाम से जाना जाता था छत्तीसगढ़ जो अब चावल घोटालों के लिये मशहूर हो रहा है। जितनी उपज होती नहीं है उससे कई गुना ज्यादा धान कागजों में खरीदा जाता रहा है। मामले खुलते भी रहें है, एफआईआर भी हुई है, एक-दो राइस मिलर्स जेल भी गये है लेकिन उसके बाद लंबी खामोशी छाई हुई है। इस मामले में विपक्ष यानी कांग्रेस की खामोशी भी उसकी बदनियती की चुगली करती है।
बहरहाल एक बार फिर गरीब बनाने के कारखाने खुल गये है। इस कारखाने में बने गरीब पहले से ही अमीर राइस मिलर्स और राशन दुकानों को और अमीर बनाने के औजार बनेंगे। और जो वाकई गरीब है वो शायद और गरीब होते चले जायेंगे।

Tuesday, July 22, 2008

कौन जीता कौन हारा, पता नहीं पर लोकतंत्र ज़रूर नंगा हो गया

परमाणु करार पर इकरार और इनकार के बीच झूलते सांसदों की हरकतों को सारा देश देखता रहा। बापू , चाचा नेहरू, भगतसिंह या आज़ादी के लिए जान गंवा देने वाले शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों ने सपने में नहीं सोंचा होगा कि उनके देश की संसद में लोकतंत्र इस तरह नंगा होगा। उन्हें गर ये पता रहता तो शायद वे इस देश को आज़ाद ही नहीं कराते।
और फिर हुआ ही क्या है आज़ादी के बाद इस देश में ? बचपन से यही सुनते और पढ़ते आ रहे थे, भारत कृषि प्रधान देश है, भारत की 75 प्रतिशत जनता गाँव में रहती है। भारत गाँवों का देश है। क्या कभी ऐसा लगा है कि भारत कृषि प्रधान देश है ? अगर ऐसा होता तो कर्ज में डूबे हजारोेंं किसान भला आत्महत्या क्यों करते ? वे नेता, विधायक या सांसद की तरह बेशर्म तो नहीं हैं न। अगर वे सांसदों की बेशर्मी देख लेते और उनसे कुछ सीख लेते तो लोक-लाज के डर से अपने परिवार को बेसहारा छोड़ आत्महत्या नहीं करते।
ऐसी बेशर्मी तो शायद कहानी किस्सों में भी न सुनी होगी। संसद में एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते देश के भाग्यविधाताओं को अपराधियों का सहारा लेता देख शायद संसद में लगी सभी महापुरूषों की तस्वीरों से आंसूओं की धार बह निकली होगी। पर उसकी परवाह गली के कुत्तों की तरह लड़ने-झगड़ने वाले जनप्रतिनिधियों को कहां। कुछ के पास सरकार बचाने का ठेका था, तो कुछ के पास सरकार गिराने का। कुल मिलाकर देखा जाए तो वहाँ सांसद कम, ठेकेदार ज्यादा नज़र आए।
जब सरकार बचाने और गिराने के ठेके होने लगे, तो फिर इस देश में लोकतंत्र नाम की चिड़िया कहाँ मिलेगी। हमारी आने वाली पीढ़ी तो शायद हमें गाली बकने लायक भी न समझे। उससे भी गई गुजरी हरकतें सारा देश देखता रहा, बेबसी से। लोग कर भी क्या सकते हैं ? घर में विवाह के बाद आई बहू के झगाड़ालू या आवारा निकल जाने के बाद ठोक-बजाकर रिश्ता तय करने वालों की जो हालत होती है, कमोबेश वही हालत आमजनता की नज़र आ रही है।
इसके बाद भी जनता कुछ नहीं कर सकती क्योंकि उनके पास हथियार के नाम पर एक वोट होता है जिसकी कीमत संसद में हुए लोकतंत्र के नंगे नाच को देखकर समझ आती है। पुराने ज़माने की हेलन, बिंदू फरियाल, पद्मा खन्ना के कैब्रे या फिर नए ज़माने की मल्लिका शेरावत, राखी सावंत के हॉट सीन्स को फेल कर देने वाली फिल्म रही ''अविश्वास प्रस्ताव''। सब कुछ देखने के बाद जिस तरह लोग छिपते-छिपाते मल्लिका की फिल्म देखते हैं, उसी तरह जनता को लोकतंत्र में अपनी कला दिखाने वालों को मजबूरी में फिर से देखना होगा।
अफसोस इस बात है कि ये नंगे-लुच्चे कुछ महीने बाद फिर हमारे सामने हाेंगे और इलेक्शन के नाम पर हमें फिर उनमें से कुछ कम नंगों को चुनना पड़ेगा। एक बात समझ में नहीं आती कि इसे इलेक्शन क्यों कहते हैं ? आम जनता इसमें किसी को चुनती नहीं है वो तो बस उम्मीदवारों में से खराब को छोड़ देती है। मेरे हिसाब से तो अब इलेक्शन की बजाय इसे रिजेक्शन कहना ज्यादा अच्छा होगा। क्योंकि हम चुनाव लड़ने वालों में से एक को छोड़ सबकों रिजेक्ट करते है और वोट देना होता है, इसलिए किसी एक को वोट दे देते हैं। वो भी इसलिए कि लोग उंगली पर स्याही का निशान न देख लोग हमें गैर ज़िम्मेदार न ठहरा दे।
वोट देने के बाद उंगली पर स्याही तो लग जाती है लेकिन ऐसा लगता है कि वो उंगली पांच साल के लिए हमारा ही बेड़ा गर्क कर देती है। एक बार चुन लिए गए तो बस चुन लिए गए, कोई पूछे कि चुनाव में होने वाला करोड़ों रूपए का खर्च कहाँ से आता है। कैसे अच्छे लोग चुनाव से दूर हो रहे हैं ? क्यों शराब और कंबल साड़ियों में वोट बिकने लगे हैं। गरीब जनता अगर पांच साल में एक बार बिकती है तो हर हारने वाला उसे शराब और सौ रूपए में बिकने वाला करार दे देता है। लेकिन आज जो संसद में हुआ वो क्या उस बिकाउपन से कुछ कम है ?
खुद पर शर्म भी आती है और गुस्सा भी ! लेकिन करें तो क्या करें ? लोकतंत्र की मर्यादाओं में जकड़ा हुआ तो सिर्फ वोटर है। लीडर या डीलर पर शायद लोकतंत्र की मर्यादाएँ लागू नहीं होती। समझ में नहीं आता कि उनकी हरकतों को न केवल देश बल्कि सारा जहाँ देख रहा होता है। ऐसा नहीं होता तो अमेरिकी उपविदेश मंत्री अविश्वास प्रस्ताव पर वोट होने के पहले ही ये नहीं कह देते कि हम अल्पमत सरकार से भी करार कर सकते हैं। इससे हमारे बिकाउपन का अंतर्राट्रीय स्तर पता चल जाता है। खैर जाने दो गुस्से से होता ही क्या है। गरीब का गुस्सा उसे पिटवाकर छोड़ता है। जाने दीजिये, जिनको गालियाँ बक रहे हैं उनको पता चलता नहीं है, असर होना तो दूर की बात है। फिर अपना खून जलाने से फायदा ही क्या है ? लोकतंत्र तो कानखजूरा हो गया है। उसकी सैकड़ों टाँगें हैं, हमारे जैसी एक दो टाँग टूट भी जाए तो वो लंगड़ा नहीं होगा। चलता रहेगा कानखजूरा और लोकतंत्र का नंगा नाच।

Tuesday, June 24, 2008

डॉक्टर और सरकार की लड़ाई में पिसकर मरता मरीज

छत्तीसगढ़ की धरती जितनी अमीर है उतने ही गरीब यहां के लोग है। एक तो गरीबी दूसरे उनका समय खराब है। यहां के अमीर तो लगातर अमीर होते जा रहे है और गरीब उनका बस भगवान ही मालिक है। मानसून वैसे भी गरीबों के लिये मुसीबतों की बरसात लेकर आता है। उस पर बीमारियों के इस मौसम में पहले से बीमार चल रहे सरकारी अस्पताल के जूनियर डॉक्टर भी हड़ताल पर चले गए है। ऐसे में उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है।


जूनियर डाक्टरों की हड़ताल छत्तीसगढ़ के लिये नई बात नहीं है। इससे पहले भी उनकी हड़ताल हो चुकी है। उस समय छात्रवृत्ति बढाने और नियमितीकरण के लिये हुई हड़ताल के बाद सरकार से उनकी चर्चा हुई थी। सरकारी आश्वासन के बाद जूडो काम पर वापस लौटे थे लेकिन अब चुनाव नजदीक आने पर उन्हें याद आया है कि उनकी मांग पूरी नहीं हुई है सो वे फिर से हड़ताल पर चले गए है। जूनियर डॉक्टरों से पहले सीनियर डॉक्टर की हड़ताल भी छत्तीसगढ़ के मरीज झेल चुके है।


अब सवाल यह उठता है कि सरकार और जूनियर डाक्टरों की लड़ाई में मरीज क्यों भुगते ! अगर उन मरीजों के पास निजी अस्पताल में इलाज कराने के लायक रूपया होता तो वे सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के लिये भर्ती ही क्यों होते! मजबूरी में ही सरकारी अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों को अब जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के कारण जबरिया छुट्टी दी जा रही है।


पता नहीं सरकार कब जागेगी और जूनियर डॉक्टरों की बात सुनेगी। इधर जूनियर डॉक्टर अपनी मांग मनवाने पर अड़े है। दोनों के अड़ियल रवैये के बीच पिस रहे मरीज या तो अस्पताल में ही सड़ने पर मजबूर है या घर-बार बेचकर निजी अस्पताल में इलाज कराने!डाक्टरों की हड़ताल मांगे पूरी होने तक जारी रहेगी ऐसा दावा जूडो के अध्यक्ष डॉ।नरेन्द्र चंद्राकर कर चुके है। इधर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ।रमन सिंह अपने चार साल के कार्यकाल का लेखाजोखा लेकर विकास यात्रा पर निकले हुए है। वे जहां जा रहे है वहां थोक के भाव से शिलान्यास और घोषणाएं कर रहे है। मगर उन्हें जूनियर डाक्टरों की मांगों पर विचार करने की फुरसत नहीं मिल पा रहीं है और ऐसे में मरीज उनकी विकास यात्रा या जूडो की हड़ताल खत्म होने की कामना ही कर सकते है।