आज़ादी का जश्न मनाने वाले कुछ लोग ऐसे भी निकल जाते हैं, जिन्हें ये तक नहीं पता होता कि देश की शान तिरंगा उल्टा है या सीधा। अफसोस तो इस बात का है कि ऐसी गलती करने वाले मूर्ख नेता या भ्रष्ट अफसर नहीं बल्कि शिक्षा के मंदिर के पुजारी है।
इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाए कि साल में 2 बार तिरंगा फहराने वाले मास्टरों को (शिक्षक या गुरूजन कहने की हिम्मत मुझमें नहीं है) ये तक नहीं पता था कि वे तिरंगा उल्टा फहरा रहे हैं। और उससे भी ज्यादा अफसोस की बात ये है कि उस स्कूल के छात्रों को भी इस बात का पता नहीं चला। उल्टा झंडा फहरा दिया गया, मिठाईयाँ बाँटी गई, और आज़ादी के जश्न की सारी फार्मेलिटी पूरी कर ली गई। इसके बाद स्टॉफ इतमिनान से गप्पबाजी करता रहा।
बुरा हो राष्ट्रध्वज के सम्मान के लिए अभियान चलाने वाले ओपन मार्शल आर्ट अकादमी के सदस्यों का जिन्हें पता चल गया कि तिरंगे का अपमान हो रहा है। तत्काल सारे लोग स्कूल पहुँचे और उनका सामना हुआ स्कूल के रक्षक चौकीदार साहब से। जो सारी बात बताने के बावजूद उन्हें अंदर जाने से रोकता रहा। शायद वो अपने मास्टरों की गप्पबाजी में खलल नहीं चाहता था। इसके बाद तो वहाँ हंगामा शुरू हो गया।
बेशर्मी की हद देखिए स्कूल का स्टॉफ हंगामा करने वालों की बात सुनने की बजाय उनसे उलझ गया। गाली-गलौच का दौर शुरू हो गया। आखिर वे भी तो आज़ाद हैं और आज़ादी का मतलब वे भी जानते हैं। बस भिड़ गए अपनी गलती मानने की बजाय। तभी वहाँ लोकल मीडिया भी पहुँच गया और उसके बाद तो जैसे स्कूल वालों को साँप सूंघ गया। तत्काल तिरंगा उतारा और सीधा कर दोबारा फहरा दिया। इस दौरान उनकी हड़बड़ी में देश की आन-बान और शान तिरंगा उनके पैरों के करीब जमीन पर गिर पड़ा।
आप बताईए स्कूल में जहाँ हम कहते हैं कि देश का भविष्य गढ़ा जाता है, वहाँ अगर ऐसी गलती हो तो क्या कहा जा सकता है ? मान लीजिए धोखा हो भी गया तो भी गलती बताने वालों को गालियाँ देना, क्या आज़ाद होने का यही मतलब है। अब ये भी तो नहीं कह सकते कि मामला किसी छोटे-मोटे गाँव-देहात का है। वहाँ भी ऐसी गलती शायद ही हो क्योंकि वे शहरियों से ज्यादा देश प्रेमी होते हैं और कम से कम तिरंगे को तो अच्छे से पहचानते हैं। राजधानी के स्कूल का ये आलम है इसे दुर्भाग्य ही मान लें तो ज्यादा अच्छा है। न मास्टरों को दिखा, न प्रबंधन को और न अतिथियों को। जब खेले-खाए धाकड़ लोगों को पता नहीं चला तो बच्चों का क्या दोष। अब ओपन मार्शल आर्ट वाले कह रहे हैं कि एसपी से शिकायत करेंगे। होते रहेगी शिकायत, चलेगा जाँच का लंबा दौर, तब तक आ जाएगा गणतंत्र दिवस और उसके बाद फिर मनाएँगे हम आज़ादी का जश्न। पता नहीं तब तक किसी के खिलाफ कार्रवाई हो भी पाएगी या नहीं।
बुरा हो राष्ट्रध्वज के सम्मान के लिए अभियान चलाने वाले ओपन मार्शल आर्ट अकादमी के सदस्यों का जिन्हें पता चल गया कि तिरंगे का अपमान हो रहा है। तत्काल सारे लोग स्कूल पहुँचे और उनका सामना हुआ स्कूल के रक्षक चौकीदार साहब से। जो सारी बात बताने के बावजूद उन्हें अंदर जाने से रोकता रहा। शायद वो अपने मास्टरों की गप्पबाजी में खलल नहीं चाहता था। इसके बाद तो वहाँ हंगामा शुरू हो गया।
बेशर्मी की हद देखिए स्कूल का स्टॉफ हंगामा करने वालों की बात सुनने की बजाय उनसे उलझ गया। गाली-गलौच का दौर शुरू हो गया। आखिर वे भी तो आज़ाद हैं और आज़ादी का मतलब वे भी जानते हैं। बस भिड़ गए अपनी गलती मानने की बजाय। तभी वहाँ लोकल मीडिया भी पहुँच गया और उसके बाद तो जैसे स्कूल वालों को साँप सूंघ गया। तत्काल तिरंगा उतारा और सीधा कर दोबारा फहरा दिया। इस दौरान उनकी हड़बड़ी में देश की आन-बान और शान तिरंगा उनके पैरों के करीब जमीन पर गिर पड़ा।
आप बताईए स्कूल में जहाँ हम कहते हैं कि देश का भविष्य गढ़ा जाता है, वहाँ अगर ऐसी गलती हो तो क्या कहा जा सकता है ? मान लीजिए धोखा हो भी गया तो भी गलती बताने वालों को गालियाँ देना, क्या आज़ाद होने का यही मतलब है। अब ये भी तो नहीं कह सकते कि मामला किसी छोटे-मोटे गाँव-देहात का है। वहाँ भी ऐसी गलती शायद ही हो क्योंकि वे शहरियों से ज्यादा देश प्रेमी होते हैं और कम से कम तिरंगे को तो अच्छे से पहचानते हैं। राजधानी के स्कूल का ये आलम है इसे दुर्भाग्य ही मान लें तो ज्यादा अच्छा है। न मास्टरों को दिखा, न प्रबंधन को और न अतिथियों को। जब खेले-खाए धाकड़ लोगों को पता नहीं चला तो बच्चों का क्या दोष। अब ओपन मार्शल आर्ट वाले कह रहे हैं कि एसपी से शिकायत करेंगे। होते रहेगी शिकायत, चलेगा जाँच का लंबा दौर, तब तक आ जाएगा गणतंत्र दिवस और उसके बाद फिर मनाएँगे हम आज़ादी का जश्न। पता नहीं तब तक किसी के खिलाफ कार्रवाई हो भी पाएगी या नहीं।