Friday, August 15, 2008

तिरंगा उल्टा है या सीधा ये तक नहीं जानते, दुर्भाग्य ही है




आज़ादी का जश्न मनाने वाले कुछ लोग ऐसे भी निकल जाते हैं, जिन्हें ये तक नहीं पता होता कि देश की शान तिरंगा उल्टा है या सीधा। अफसोस तो इस बात का है कि ऐसी गलती करने वाले मूर्ख नेता या भ्रष्ट अफसर नहीं बल्कि शिक्षा के मंदिर के पुजारी है।

इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाए कि साल में 2 बार तिरंगा फहराने वाले मास्टरों को (शिक्षक या गुरूजन कहने की हिम्मत मुझमें नहीं है) ये तक नहीं पता था कि वे तिरंगा उल्टा फहरा रहे हैं। और उससे भी ज्यादा अफसोस की बात ये है कि उस स्कूल के छात्रों को भी इस बात का पता नहीं चला। उल्टा झंडा फहरा दिया गया, मिठाईयाँ बाँटी गई, और आज़ादी के जश्न की सारी फार्मेलिटी पूरी कर ली गई। इसके बाद स्टॉफ इतमिनान से गप्पबाजी करता रहा।

बुरा हो राष्ट्रध्वज के सम्मान के लिए अभियान चलाने वाले ओपन मार्शल आर्ट अकादमी के सदस्यों का जिन्हें पता चल गया कि तिरंगे का अपमान हो रहा है। तत्काल सारे लोग स्कूल पहुँचे और उनका सामना हुआ स्कूल के रक्षक चौकीदार साहब से। जो सारी बात बताने के बावजूद उन्हें अंदर जाने से रोकता रहा। शायद वो अपने मास्टरों की गप्पबाजी में खलल नहीं चाहता था। इसके बाद तो वहाँ हंगामा शुरू हो गया।

बेशर्मी की हद देखिए स्कूल का स्टॉफ हंगामा करने वालों की बात सुनने की बजाय उनसे उलझ गया। गाली-गलौच का दौर शुरू हो गया। आखिर वे भी तो आज़ाद हैं और आज़ादी का मतलब वे भी जानते हैं। बस भिड़ गए अपनी गलती मानने की बजाय। तभी वहाँ लोकल मीडिया भी पहुँच गया और उसके बाद तो जैसे स्कूल वालों को साँप सूंघ गया। तत्काल तिरंगा उतारा और सीधा कर दोबारा फहरा दिया। इस दौरान उनकी हड़बड़ी में देश की आन-बान और शान तिरंगा उनके पैरों के करीब जमीन पर गिर पड़ा।
आप बताईए स्कूल में जहाँ हम कहते हैं कि देश का भविष्य गढ़ा जाता है, वहाँ अगर ऐसी गलती हो तो क्या कहा जा सकता है ? मान लीजिए धोखा हो भी गया तो भी गलती बताने वालों को गालियाँ देना, क्या आज़ाद होने का यही मतलब है। अब ये भी तो नहीं कह सकते कि मामला किसी छोटे-मोटे गाँव-देहात का है। वहाँ भी ऐसी गलती शायद ही हो क्योंकि वे शहरियों से ज्यादा देश प्रेमी होते हैं और कम से कम तिरंगे को तो अच्छे से पहचानते हैं। राजधानी के स्कूल का ये आलम है इसे दुर्भाग्य ही मान लें तो ज्यादा अच्छा है। न मास्टरों को दिखा, न प्रबंधन को और न अतिथियों को। जब खेले-खाए धाकड़ लोगों को पता नहीं चला तो बच्चों का क्या दोष। अब ओपन मार्शल आर्ट वाले कह रहे हैं कि एसपी से शिकायत करेंगे। होते रहेगी शिकायत, चलेगा जाँच का लंबा दौर, तब तक आ जाएगा गणतंत्र दिवस और उसके बाद फिर मनाएँगे हम आज़ादी का जश्न। पता नहीं तब तक किसी के खिलाफ कार्रवाई हो भी पाएगी या नहीं।

19 comments:

Anwar Qureshi said...

बड़े ही अफ़सोस की बात है लेकिन ये सच है ...आप को याद होगा ... वन्देमातरम गाने या ना गाने के विवाद में छत्तीसगढ़ के मंत्रियों से जब पुछा गया के क्या आप को वन्देमातरम गाना आता है एक आद को छोडके किसी को भी नहीं आता था और तो और हमारे देश के माहान सांसदों को भी राष्ट्र गीत और गान में कोई फर्क समझ ने नहीं आता है ... जब देश के जनप्रतिनिधियों का ये हाल है तो देश का क्या हाल होगा ? ...

Udan Tashtari said...

अफ़सोस की बात!!

स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

Gyandutt Pandey said...

ओह, बहुत डीग्रेडेशन आया है शिक्षकों के स्तर में। और नयी पीढ़ी को तैयार करने में इनकी सबसे बड़ी भूमिका है।
शायद हम सब को डा. कलाम की तरह बच्चॊं से बहुत सम्पर्क कर उन्हे जीवन मूल्यों की बात बतानी चाहिये।

Suresh Chiplunkar said...

अरे साहब ये क्या ले बैठे आप, जरा इन मास्टरों से बिना कहीं अटके या रुके, "अ" से "ज्ञ" तक की वर्णमाला ही पूछ लीजिये… सबकी पोल खुल जायेगी चाहे वह पीएचडी धारक ही क्यों न हो… देश के प्रतीकों के बारे में ज्ञान तो इसके बाद ही लिया होगा ना…

अशोक पाण्डेय said...

जब अंग्रेजों का शासन था, तमाम संघर्षों के बावजूद बापू का जीवन सुरक्षित रहा। आजाद भारत में उनके ही शिष्‍य जब उन राष्‍ट्रपिता की हिफाजत नहीं कर सके तो और क्‍या आशा की जा सकती है। खैर, स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई।

अनुराग said...

दुखद है...वाकई दुखद है.....

दिनेशराय द्विवेदी said...

दुर्भाग्यपूर्ण!

आजाद है भारत,
आजादी के पर्व की शुभकामनाएँ।
पर आजाद नहीं
जन भारत के,
फिर से छेड़ें, संग्राम एक
जन-जन की आजादी लाएँ।

Arvind Mishra said...

हर वर्ष यह होता है कहीं ना कहीं -क्या सचमुच स्वतंत्रता के ६१ वर्ष बीत गए ......

P. C. Rampuria said...

वंदे मातरम्

स्कुल से बच्चों में राष्ट्रिय ध्वज के प्रति निष्ठा
और प्रेम उत्पन्न होता है ! पहले तो स्कूलों
में शुरू से ही इसकी जानकारी दी जाती थी !
आज पता नही हमारे मूल्य इतने क्यूँ
गिर गए है ? इतना अक्षम्य अपराध करके
भी सीनाजोरी कर रहे हैं ? जबकि माफी
मांग कर ग़लती सुधारी जाना चाहिए थी !
जांच में क्या होगा ? ये बताने की शायद
जरुरत ही नही है !

संजीव तिवारी said...

वंदेमातरम !

बधाई व सम्‍मान के पात्र हैं फाईटर टीम के सदस्‍य ।

Nitish Raj said...

बहुत ही अफसोस की बात है इसमें एक बात और आप किसी फौजी को देखें की जब वो झंडे को फहराने की तैयारी करते हैं तो उसे जमीन में नहीं लगने देते पर यहां तो ये गलती भी है।

संगीता पुरी said...

उल्टा झंडा फहरा दिया गया, मिठाईयाँ बाँटी गई, और आज़ादी के जश्न की सारी फार्मेलिटी पूरी कर ली गई। इसके बाद स्टॉफ इतमिनान से गप्पबाजी करता रहा।ऐसा भी हो सकता है ,हमारे देश में । दुखद घटना।

डा० अमर कुमार said...

शुभकामनायें... केवल शुभकामनायें ही, इससे आगे...
और हम कूश्श नेंईं बोलेगा ।
जैसे अब तक काम चलाते आये हैं,
वैसे ही सिरिफ़ शुभकामनाओं से अपना काम चलाइये नऽ !
ऒईच्च..हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है,
ईशलीए हम कूश्श नेंईं बोलेगा ...
शुभकामनायें... केवल शुभकामनायें ही, इससे आगे...
और हम कूश्श नेंईं बोलेगा ।
जैसे अब तक काम चलाते आये हैं,
वैसे ही सिरिफ़ शुभकामनाओं से अपना काम चलाइये नऽ !
ऒईच्च..हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है,
ईशलीए हम कूश्श नेंईं बोलेगा ...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है.

हरि said...

सिर्फ अफसोस ही किया जा सकता है इस व्यवस्था में।

योगेन्द्र मौदगिल said...

अक्लमंदों की अक्ल मंदी होती है भाई साहब..

निरंतर said...

बड़े ही अफ़सोस की बात है.

स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं,,,

सीधा-सादा विजय said...

सबसे पहले स्कूल में झंडा बनाना सिखाया जाता है
झंडे के कौनसे रंगा हैं बचपन में बताया जाता है
ये शिक्षक नहीं बुद्धी इनकी डंडा है
केवल इतना ही जानते तीन रंग का सीधा हो या उल्टा बस तिरंगा है
इन रंगों का महत्व इन्हें कौन समझाएगा
इनसे पढ़ बच्चा न जाने क्या बन पाएगा ।।

राज भाटिय़ा said...

आप की नजर की दाद देनी पडेगी, आप ने लेख बहुत सही लिखा हे, ऎसा हादसा एक बार मेरे सामने हुआ था , लेकिन मॆ बहुत छोटा था, लेकिन भुला नही, धन्यवाद