Sunday, July 6, 2008

बैंक था मालामाल, खातेदार हुये कंगाल,फिर कहां गया माल ?

छत्तीसगढ़ की राजधानी में लगभग दो साल पहले एक बैंक का भट्ठा बैठ गया। तब तक बैंक मालामाल था। बैंक बंद होने से 28 हजार खातेदार कंगाल हो गए। इस मामले में पुलिस ने 13 डायरेक्टर और मैनेजर के खिलाफ अपराध दर्ज किया। मैनेजर तो तब से जेल में है लेकिन कांग्रेसी नेताओं की पत्नियां जो बैंक की डायरेक्टर थी मजे से शहर मे घूम रही है। हां एक डायरेक्टर जिसकी राजनीतिक पहुंच बहुत ज्यादा नही थी पुलिस के गिरफ्त में आई और लगभग एक साल जेल काटकर जमानत पर बाहर निकली। अब सवाल ये उठता है कि क्या पुलिस को शहर में घूम रही नेताओं की पत्नीयों के बारे मे पता नही या भाजपा के राज में पुलिस कांग्रेस के नेताओं का कहना मान रही हैं।

1 अगस्त 2006 को अखबारों में इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक की हालत खराब होने की खबर छापी थी। उसके बाद तो जैसा भूचाल आ गया। सारे खातेदार बैंक पहुंच गये। ये एक महिला सहकारी संस्था का बैंक था जिससे कांग्रेस के नेताओ की पत्नियों ने शुरू किया था। 1994 से शुरू हुआ बैंक बहुत जल्द मुनाफा कमाने लगा और उसकी साख बढ़ती चली गई। लेकिन उपभोक्ताओं को पता नही था कि उनके गाढ़े पसीने की कमाई पर सफेदपोश ठगों की नजर लगी हुई है। रीता तिवारी के अध्यक्ष बनने के बाद बैंक में गड़बड़ी शुरू होने का आरोप खातेदारों ने लगाया।

23 हजार 8 सौ खातेदारों वाले इस बैंक में डेढ़ हजार रिकरिंग खाते और एफडीआर रखने वाले लोग भी हितग्राही थे। बैंक में घोटाले की खबर जैसे सामने आई सारा छत्तीसगढ़ हिल गया। छत्तीसगढ में अमुमन अपराध परिस्थिती जन्य होते है। ये अपराध सुनियोजित षड़यंत्र के तहत हुआ था। जब खातेदार थाने पहुंच गये तो मामला कोतवाल के बस का नही रहा। सारे बडे अफसर वहां पहुंचे और खातेदारो की ओर से एक खातेदार शिवसोनी की शिकायत पर अध्यक्ष रीता तिवारी उपाध्यक्ष सविता शुक्ला समेत 13 डायरेक्टरो व बैंक मैनेजर उमेश सिन्हा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई।

पुलिस ने आनन-फानन में सबसे छोटी मछली बैंक मैनेजर उमेश सिन्हा को गिरफ्तार कर लिया। उससे पूछताछ होते रही और डायरेक्टरों से पुलिस ने उस वक्त पूछताछ करना जरूरी भी नही समझा। बैंक मैनेजर उमेश सिन्हा थर्डडिग्री से लाई डिटेक्टर की जांच से भी गुजरा। उमेश सिन्हा को पुलिस मुख्य आरोपी बनाने की कोशिश करती रही और उसे उसी आधार पर जेल मे ठुस दिया गया। जहां वो आज तक सड रहा है।

पुलिस को डायरेक्टरो के खिलाफ कार्यवाही नही करता देख खातेदारों ने नेताओं को घेरना शुरू किया और धरना प्रदर्शन शुरू हुये। ये छत्तीसगढ़ में बैंक लूटने का पहला मामला था। शांत और सीधे-साधे लोगो के प्रदेश में इतना बड़ा षड़यंत्र लोगो के गले नही उतर पाया। बैंक के डायरेक्टरों में अधिकांश ताकतवर कांग्रेसी नेताओं की पत्नियां थी। जब पुलिस पर डायरेक्टरों के खिलाफ कार्यवाही के लिए दबाव बढ़ा तों उसने डायरेक्टरों मे सबसे कमजोर सुलोचना आडिल को गिरफ्तार कर लिया। लगभग एक साल जेल मे रहने के बाद उसे जमानत मिली।

यहां ये बताना गैर जरूरी नही होगा कि कोतवाली से चंद कदमों की दूरी पर बैंक की उपाध्यक्ष सविता शुक्ला का निवास हैं। पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने का एक बार नही कई बार दिखावा किया। बाद में उसे फरार बता दिया गया। सविता शुक्ला कांग्रेस की जिलाध्यक्ष रह चूकी है। यही हाल बैंक की अध्यक्ष रीता तिवारी के साथ हुआ। वह भी पुलिस को कभी नही मिली। अन्य पदाधिकारियों में पूर्व विधायक और बड़े नेताओ की पत्नियां शामिल है। पुलिस दो साल बीतने तक उनको गिरफ्तार नही कर पाई।

बैंक से इतने नियोजित ढंग से रूपया निकाला जाता रहा जिसकी कल्पना करना भी कठिन है। बिना रूपया जमा कराये फर्जी ड्राफ्ट जारी होते रहे। जांच में जब ये घोटाला सामने आया तो पुलिस ने एक नामी चाटर्ड एकाउंटेण्ट के भतीजे नीरज जैन को गिरफ्तार किया। नीरज के पिता भी चाटर्ड एकाउंटेण्ट है। जगदलपुर निवासी नीरज जैन को गिरफ्तारी के बाद बिना किसी ठोस पूछताछ के जेल भेज दिया गया जहां से वो कुछ ही दिनों में जमानत पर छुट गया। नीरज पर 18 करोड़ की हेरा-फेरी का आरोप है। उसके बाद दुर्ग निवासी चाटर्ड एकांउण्टेट मनीष अग्रवाल को पुलिस ने पकड़ा इन शरीफ पर 80 लाख रूपए के फर्जी ड्राफ्ट बनाने का आरोप है।

दरअसल बैंक के अंदर चल रहा घोटाला बाहर ही नही आता अगर बैंक की एक डायरेक्टर को अध्यक्ष की दौड़ से बाहर नही किया जाता। अरूनिमा निगम कांग्रेस की पदाधिकारी भी है ने इस मामले की शिकायत हर जगह करना शुरू कर दिया था। अरूनिमा निगम की शिकायतों की जांच शुरू होने के पहले मामला अखबार तक पहुंचा दिया गया और बैंक डूब गया। तब डायरेक्टरो ने बैंक की पूंजी 22 करोड़ बताई थी। जांच के बाद बैंक के पूंजी 42 करोड़ रूपए निकली। लेवाली 22 करोड़ है और नुकसान करीब-करीब 20 करोड़।

26 हजार खातेदारों के करोड़ो रूपए लोग फर्जी ड्राफ्ट के माध्यम से हड़पते रहे और बैंक मैनेजर समेत बैक के डायरेक्टर तमाशा देखते रहे। ये बात गले नही उतरती। इतना बड़ा गोलमाल बैक मैनेजर बिना पदाधिकारियों की मदद से कर सकता है ऐसा कोई भी नही मानेगा। और संभवत: इसी तथ्य को नजर रखते हुये पुलिस ने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष समेत 13 डायरेक्टरो के खिलाफ भी नामजद रिपोर्ट लिखी थी। दो साल बीत जाने के बाद भी पुलिस का डायरेक्टरो को गिरफ्तार नही करना उसकी भूमिका को शक के दायरे मे ला देता है। एक सवाल और भी उठता है बैक का मालामाल खातेदार हुये कंगाल तो फिर कहां गया माल ?

2 comments:

श्रद्धा जैन said...

hmmmmmm aise ghotale to aam baat ho gayi hai aajkal
pata nahi kya hoga is desh ka jab sab koi beimaan hain
aapki post main aapki vicharik dharthta aur lekhan ki pakdh mil rahi hai
shashakt lekhan ke liye badhayi

संजीव तिवारी said...

आश्चर्य और दुख होता है कि आरोपी कांग्रेसी है फिर भी विरोधी पक्ष के शासन के बावजूद इन पर आंच नहीं आई, यही राजनीति है चोर चोर मौसेरे भाई । पर बडे भाई साहब इसके लिए मीडिया नें भी कोई बडा वैचारिक आंदोलन नहीं खडा किया बल्कि समय समय पर सनसनीखेज समाचार बना कर इतिश्री कर ली ।