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Saturday, July 12, 2008

क्या तलवार परिवार की बदनामी के लिये सिर्फ पुलिस जिम्मेदार है?

देश की कथित सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री आरूषि हत्याकांड की गुत्थी सुलझ गई। जैसे ही सीबीआई ने आरूषि के पिता डॉ. राजेश तलवार के खिलाफ सबूत नहीं होने की बात कही, इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तत्काल नोयडा पुलिस के सिर ठिकरा फोड़ दिया। ठीक है नोयडा पुलिस ने गलती की थी, लेकिन उस गलती को एक नहीं सैकड़ों बार इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दुहराया। पुलिस की गलत कार्यवाही का, हो सकता है कुछ लोगों के अलावा किसी को पता भी नहीं चलता, उसे इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चिल्ला-चिल्ला कर सारे देश को बताया। वो भी बताया जो पुलिस ने कभी नहीं कहा और अब बेशर्मी से सारी दोष पुलिस के माथे मढ़ रहें है।

हो सकता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के ठेकेदारों और तरफदारों को ये बात बुरी लगी हो लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि यही सच है। तलवार परिवार को बदनाम करने में पुलिस से कई हजार गुना ज्यादा इलेक्ट्रानिक मीडिया का हाथ है। दरअसल एक दूसरे से तेज होने के चक्कर में वे लगता है समय से भी तेज चलने लगते है और यही कारण है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया बार-बार विवाद में आ रहा है।

आरूषि के मामले को ही ले तो इलेक्ट्रानिक मीडिया ने शुरूवात से ही इस मामले को, टीआरपी बढ़ाने वाले हथियार की तरह इस्तेमाल किया। सबने इसे देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी टीआरपी बढ़ाने वाली मुहिम आज शनिवार 11 जुलाई को डॉ राजेश तलवार की जमानत पर रिहाई के बाद भी जारी रही।

बेहद अफसोस की बात है कि तलवार परिवार की इज्जत सारे देश के सामने तार-तार करने वाला इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी भूमिका पर अफसोस जताने की बजाए तलवार दंपती से पुलिस के खिलाफ जहर उगलवाने में लगा रहा। लाइव होने के कारण आरूषि की माता के बयान को वे काट भी नहीं सके। बेबस परेशान होकर नुपुर तलवार ने कहा कि हमे अपना दु:ख बांटने के लिये छोड़ दीजिये। आप लोग समझते क्यों नहीं? तब सारा का सारा मीडिया नंगा हो गया है। अपने आप को सबसे ज्यादा समझदार और संवेदनशील समझने वाले पत्रकारों की जमात इसके बाद भी नही समझी और इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने स्वभाव के अनुरूप अपनी टीआरपी बढ़ाने वाली बाईट निकालने के लिये तलवार परिवार के सदस्यों के मुंह में माईक के साथ-साथ शब्द भी ठूंसने में लगे रहे।

डॉ.राजेश से लेकर नूपुर और डॉ के भाई पर सवालों की झड़ी लगी रही। अधिकांश की मंशा पुलिस वालों को दोषी ठहरवाने और उनके खिलाफ कार्यवाही करने का बयान रिकार्ड करना था। डॉ राजेश बार-बार दुहाई देते रहे कि वे अपनी बेटी को खोने का गम अपने परिवार वालों के साथ बांट भी नही पाए है उन्हे अपना गम बांटने जाना है। मगर इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले उनसे वकीलों की तरह जिरह करते रहे।

आखिर उनका मुर्गा जो बचकर निकल रहा था। लग रहा था कि उन्हें उसकी बजाए नया मुर्गा चाहिए था और उन्होंने नोएडा पुलिस को अपना नया शिकार तय कर लिया था।

ठीक है नोयडा पुलिस ने गलत कार्यवाही की। लेकिन उसके बाद खोजी पत्रकारिता के नाम पर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने जो किया, क्या वो सही था। बिना पूरी जांच-पड़ताल और कानूनी कार्यवाही के डॉ राजेश तलवार को हत्यारा ठहरा दिया। आरोपी शब्द तो जैसे इलेक्ट्रानिक मीडिया वालों को मालूम ही नहीं है। एक ने भी डॉ राजेश को हत्या का आरोपी नहीं कहा। सब के सबने उन्हें देश का सबसे कमीना, कसाई, जल्लाद, बर्बर, चरित्रहीन , ह्रदयहीन बाप साबित कर दिया था। बात डॉ. राजेश तलवार तक ही सीमित रहती थी तो ठीक थी। उन्होंने मृतक चौदह वर्षीय आरूषि को भी चरित्रहीन बता दिया। सिर्फ आरूषि को क्या पूरे परिवार को नौकर समेत सेक्स का पूजारी बताकर सारे देश में नंगा कर दिया। उनकी इज्जत नीलाम कर दी और अब जब सीबीआई ने डॉ राजेश के खिलाफ सबूत नहीं होने की बात कही है तो उसी मीडिया को उनके बिना कारण जेल में बिताए 50 दिनों के लिए जिम्मेदार आदमी की तलाश है। उन्हें डॉ को बिना कारण 50 दिनों तक जेल में बंद रहने पर बेहद अफसोस भी हो रहा है। उसी डॉ पर जिसे वे तरह-तरह के ग्राफिक्स और डमी अदालत बनाकर हत्यारा ठहरा रहे थे।

अगर उन्हें ईमानदारी से डॉ तलवार को 50 दिनों के लिए जेल भेजने के लिए जिम्मेदार शख्स की तलाश है तो उन्हें खुद अपने गिरेबा में झांकना चाहिए। क्या उन्हें नही लगता कि नोयडा में इस हत्याकांड की खबर मिलते ही उन्होंने जो हाय-तौबा मचायी थी उससे पुलिस दबाव में आ गई थी। क्या आपने इस हत्याकांड को देश का सबसे बड़ा हत्याकांड साबित करने की कोशिश में पुलिस को जल्द से जल्द कार्यवाही करने पर मजबूर नहीं कर दिया था। क्या आपको नहीं लगता पुलिस को निकम्मा और नालायक साबित करने की कोशिश ने पुलिस को बचाव के लिए आनन-फानन में गिरफतारी करने पर मजबूर कर दिया था। खैर पुलिस ने जो किया उसे तो किसी भी सूरत में माफ नहीं किया जा सकता। ऐसी गलती करने वालों को तो नौकरी में बने रहने का अधिकार नहीं है लेकिन अपनी चमड़ी बचाने के लिये की गई गलतियों से अपनी दमड़ी,टीआरपी बढ़ाने के लिये की गई गलतियां किसी भी सूरत में माफ करने लायक नहीं है।

हो सकता है कि मेरी बात कुछ लोगों को बुरी लगे। ऐसे लोगों से मैं क्षमा चाहता हूॅ लेकिन उनसे ये जरूर पूछना चाहूंगा कि क्या सीबीआई की टीम द्वारा डॉ तलवार के घर की तलाशी के बाद अपनी टीम से घर की छत पर जाकर वहां से नीचे उतरकर जांच कैसी होगी और जांच में क्या-क्या मिला होगा बताना जरूरी था। सिर्फ यही एक मामला नहीं है इससे पहले भी इलेक्ट्रानिक मीडिया के कर्ताधर्ता अपने स्टूडियों में बैठकर किसी भी एक्सपर्ट को बुलाकर किसी की भी इज्जत का जनाजा निकालते आए है।
दरअसल मामला सुलझने से पहले सुलझा लेने की कोशिश, खबर को खबर की तरह पेश करने की बजाए नतीजे पर पहूँच जाने का गुमान और पत्रकार की बजाए न्यायाधीश होने का भ्रम उसे गलतियों पर गलतियां करने पर मजबूर कर रहा है। एक दूसरे को पीछे छोड़ने या पछाड़ने की दौड़ में ये देश के पूर्व राष्ट्रपति के निधन से पहले ही उनके निधन की खबर दिखा सकते है तो उनसे जिम्मेदारी की उम्मीद करना ही बेकार लगता है।

2 comments:

सतीश पंचम said...

कई चैनलों पर तो बाकायदा डम्मी अदालत बनाकर मीडिया ट्रायल किया गया......अब वही राजेश तलवार के लिए उत्सवमय माहौल बनाकर अपनी ही खिल्ली उडा रहे हैं.

Anonymous said...

मित्र तुम्हे पता होना चाहिए की टी .वी की चकल्लस से ही ये मामला सी बी आई के पास गया है ,,