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Tuesday, July 15, 2008

वृध्दाश्रम बनते जा रहे हैं गाँव

गाँव अब गाँव नहीं रहे बल्कि वृध्दाश्रम बनते जा रहे हैं। ऐसा मुझे सोमवार को लगा जब मैं अपने ननिहाल गया । वहां जाकर ऐसा लगा कि गाँव को किसी की नज़र लग गई है। गांव में जिस भी घर में गया वहां बुजुर्गों के अलावा कोई नहीं मिला। बचपन के संगी-साथियों में से कोई रोजी-रोटी के लिए तो कोई बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के बहाने गाँव छोड़ चुका था।
एकदम अजनबी सा लगने लगा था मुझे अपना ननिहाल। छोटा सा गाँव धानोरा मेरा ननिहाल है महाराष्ट्र के अमरावती जिले में। बचपन से लेकर जवानी तक गर्मियों और दीपावली की छुट्टियाँ मैने वहीं बिताई थी। शहर के फुटबॉल, क्रिकेट को छोड़कर गांव की अमराइयों में, डाब-डुबली, (पेड़ों पर छूकर आऊट करने का खेल) और गिल्ली डंडा खेला करते थे। थक जाते तो पास में बहती छोटी सी खोलाट नदी के किनारों और कहीं-कहीं जमा पानी में तैरा करते थे। तैरना भी मुझे गाँव के ही दूर के मौसेरे भाई विनोद और अविनाश ने सिखाया था। खेल और तैरकर थक कर चूर होकर लौटते समय जिस घर में पहले खाना बना मिलता वहीं खा लेते थे। पता ही नहीं चलता था कब दिन निकलता था और कब रात होती थी। और फिर कब दूसरा दिन निकल आता।
गर्मियों के दो महीने की और दीपावली की एक महीने की छुट्टियाँ गाँव में ही बीतती थी। पूरे गाँव का भांजा था मैं। सभी घरों में आना-जाना, खाना और सभी से उतना ही प्यार मिलता था। एकदम शुध्द प्यार। कभी-कभी खेतों पर काम करने वालों के साथ भी खाना खा लेता था। वो तीखी मिर्च का ठेसा और ज्वार की रोटियों का स्वाद भूलाए नहीं भूलता। दीपावली की छुट्टियाँ खत्म होते ही गर्मियों का इंतजार रहता था और गर्मियाँ खत्म होते ही दीपावली का।
सब कुछ एकाएक बदला सा लगने लगा था। जब मैं सालों बाद कुछ दिनों के लिए गाँव में रूका। बगल में रहने वाली अनु मावशी (मराठी में मौसी को मावशी कहते हैं) के घर पर ताला लटका था पता चला कि वो जानवरों के लिए बने बाड़े में कमरा बनवाकर रहने लगी है। विनोद,प्रमोद के बारे में पूछा तो दोनों बगल के तहसील मुख्यालय में रहने लगे हैं। खुद गाँव में पढ़कर बड़े हुए प्रमोद और विनोद को अब गाँव का स्कूल पसंद नहीं आ रहा है। बच्चों की खातिर उस माँ को छोड़कर चले गए जिसने उन्हें पाल-पोसकर बच्चे से बड़ा बनाया। आगे निकलकर गाँव के जाने-माने मराठा परिवार के यहाँ गया, वहाँ भी वही हाल था। और यही हाल गाँव के आरेकर परिवार का था। परिवार के मुखिया मनोहर मामा नहीं रहे थे। उनका बड़ा लड़का जगदीश का गाँव का सरपंच बन गया था। सोचा उससे मुलाकात हो जाएगी। लेकिन वो भी वापस शहर जा चुका था। वो शहर से कुछ घंटों के लिए रोज गाँव आता है। दिवाकर से प्रभाकर और अनिल से सुनील पक्या (प्रकाश ) से मन्या (मनोहर) सभी रोजी-रोटी और बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए शहर में बस गए थे।
अनु मावशी से मिला तो दिमाग खराब हो गया। हमेशा हंसते-खिलखिलाते रहने वाली अनु मावशी खटिया पकड़ चुकी है। उनका सबसे बड़ा लड़का अत्री भाऊ जरूर उनके बगल में मकान बनाकर रहता है। मगर वो बंटवारे से नाराज चल रहा है। वीणा वहिनी (भाभी) का भी यही हाल है। भाऊ का कहना है छोटे भाईयों की पढ़ाई के लिए उन्होंने पढ़ाई छोड़ी थी। और अब जब बंटवारा हुआ तो भी छोटों को मन पसंद खेत और मकान दे दिए गए। वे यहाँ बाड़े में आ गए हैं। दोनों के बारे में मावशी की राय ठीक नहीं थी। और प्रमोद और विनोद के बारे में तो और गलत।
पुराने दिनों को याद कर अनु मावशी रो पड़ी थी रोते-रोते ही उन्होंने एक कड़वा सच भी कह दिया। उन्होंने कहा कि गाँव अब बूढ़े लोगों का बसेरा हो गया है। जवानों को तो शहर की हवा लग गई है। हम लोग यहाँ पुराने ढह रहे मकानों की चौकीदारी करते आखिरी सांस का इंतजार कर रहे हैं। उनसे मिलकर लौटते समय अच्छा नहीं लग रहा था। नदी की ओर गया तो छोटे से स्टाप डेम ने नदी को भी गाँव की महिलाओं की तरह बूढ़ी बना दिया था। अमराईयां अचानक बबूल के जंगलों की तरह नज़र आने लगी थी। रेखा मावशी से मिलकर जब वापस लौटने लगा तो मन और खट्टा हो चला था। उनके बाड़े में बहुत सी दीवारें उठ गई थी। दीवारें जो सिर्फ घरों को ही नहीं दिलों को भी बांट चुकी थी। गाँव में अब बड़े-बड़े बाड़े नहीं रह गए। बाड़े तो क्या अब गोठान भी नहीं रहा। वहाँ गोधुली बेला में अब धूल नहीं उठती। गाय-बछड़ों के गले की घंटियाँ लाजवाब संगीत नहीं छेड़ती। अब उठता है ट्रक, ट्रैक्टर या बसों के आने के बाद धूल का गुबार और घंटियों के सुमधुर संगीत के बजाय सुनाई पड़ते हैं कर्कश हॉर्न। अब गाँव के ग्राम पंचायत का रेडियो भी नहीं बजता। लोग रात को विविध भारती या ऑल इंडिया रेडियो के गानों का इंतजार नहीं करते।अधिकांश घरों में टीवी आ गया है। इसलिए शाम होने के बाद लोग ग्राम पंचायत भवन में इकठ्ठा भी नहीं होते। गाँव के बदल जाने का सदमा लिए मैं वापस लौट रहा था। गाँव से शहर आने के रास्ते में अंबापुर वाले मारूति के दर्शन किए। वहाँ मुझे अपने सगे मामा अरविंद के बाल सखा सुरेश मानकर मिल गए। बाकी कसर उन्होंने पूरी कर दी। मैने पूछा मामा यहाँ? गाँव......... बीच में मेरी बात काटते हुए उन्होंने कहा गाँव में रखा ही क्या है भांजे? बस अब बजरंगबली की सेवा करता हूँ। ये अच्छा है, इसके पास न छल है न कपट। मैं हक्का-बक्का था। धीरे से पूछा गाँव के लोग कुछ बदले से नज़र आए। अपनी आदत के अनुसार उन्होंने जोरदार ठहाका लगाया और गाँव के बदलने का महत्वपूर्ण कारण भी बता दिया। उन्होंने कहा कि पंचायत के चुनावों के बाद गाँव में कई पार्टियाँ बन गई है। और बाकी कसर दारू ने पूरी कर दी। अच्छा है तुम लोग शहर में रहते हो ,वहीं रहो ज्यादा अच्छा है। गाँव में अब कुछ नहीं रखा है। उनकी बातें मेरे कानों में अब भी गूँज रही है। अब जबकि मैं लगभग साढ़े 4 सौ किलोमीटर दूर वापस रायपुर आ गया हूँ। मुझे लगता है कमोबेश यही हालत हर गाँव की होती जा रही है।

8 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

वास्तव में आप ने जो बदलाव गाँव में देखा है वैसा ही कुछ हाल इधर राजस्थान के गाँवों का है। वास्तव में गाँव बरबाद हो रहे हैं।

Udan Tashtari said...

आपने तो बचपन की बहुत सी यादें ताजा कर दीं. वाकइ, अब गांवों की यही हालत है. शायद, मजबूरीवश.

photo said...

सबो जगा यही हाल हे जी काला अपन पिरा कहय का शहार का गाव आप बहूत कलम के धनी हो बहूत सुभ्-कामना

राज भाटिय़ा said...

मे अपने बच्चो को बताता था, की भारत के गाव मे भगवान बसता हे, मेने कई बार बचपन मे अपनी छुट्टियां गाव मे बिताई हे,जेसा आप ने अपने लेख मे लिखा हे पहले सभी जगह ऎसा ही होता था,मां के गाव मे सभी मामा, ओर नाना,या फ़िर मोसी ओर नानी ही होती थी, ओर अपने गाव मे दादा, चाचा,ताऊ या फ़िर दादी, चाची ओर तायी, आप के लेख से पता चला की अब गाव पहले जेसे नही रहे, मे तो वो बाजरे, ओर मक्की की रोटिया भी नही भुला,
आप के बांल्ग पर पहली बार आया ओर मन्त्र मुगध हो गया, धन्यवाद

Samrendra Sharma said...

वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी
कोई लौटा दे मुझे बचपन की रवानी....
आपके लिए इतना ही कह सकता हु।
इस बारे में आपसे एक सवाल है जिसका मैं जवाब भी चाहता हूं। एक समय ऐसा था जब आप गांव जाने के लिए दीपावली-दशहरे और गर्मियों की छुट्टियों का इंतजार करते थे, क्या गांव जाने वैसी ही बेसब्री आज होती है। क्या दिमाग में बगैर जोर डाले बता सकते हैं कि पिछली बार कब आपका गांव जाना हुआ था। सच है कि हम लोगों ने ही गांव से दूरियां बना ली है। आपको तो गांव जाने लंबा फासला तय करना पड़ता है, लेकिन मेरा गांव रायपुर से महज 50-60 किलोमीटर दूर है, लेकिन मुझे ठीक से याद नहीं कि कब वहां गया था। यह बात मुझे काफी खलती है। काफी दिनों से प्लानिंग कर रहा हूं कि रेगुलर गांव के टच में रहूंगा। अब आपके लिखने के बाद अपनी बेटी को भी गांव ले जाता रहूंगा।

अनुराग said...

जी हाँ आप किसी भी गाँव को उठा कर देखे अब वो उज्जवल छवि वाले न गाँव है ,नो भोले भाले मासूम गाँव वाले ....बचपन में कभी नाना नानी के यहाँ जाते थे ,जमीन जायदाद के झगडे ओर गाँव की राजनीती से मन इतना खिन्न हुआ की मुझे याद नही पड़ता पिता ने पिछले २० सालो में कभी गाँव चलने की इच्छा जतायी हो

मलखान सिंह said...

thanks for appriciate blog. i read yours blog, these r good. this is also very good. not even villeges small towns and kasbas r also going alone. they r going old.
its good thought... thanks

Sanjeet Tripathi said...

आक्रोशित जवान ( ?) को इस भूमिका में लिखते देखना सुखद लगा पर अफसोस भी हुआ क्योंकि लेख का शीर्षक ही सारी बात कह देता है, आज के हालात पर।