Saturday, July 26, 2008

न बरसात हुई न बाढ़ आई मगर करोड़ों खर्च हो गए

छत्तीसगढ़ के करिश्माई अफसरों की बाज़ीगरी बेमिसाल है। अब आपदा प्रबंधन विभाग को ही ले लें, तो उसका कमाल मानना ही पड़ेगा। न तो प्रदेश में बरसात हुई है, न ही बाढ़ आई है और बाढ़ नियंत्रण के नाम पर करोड़ों रूपए खर्च भी हो गए हैं। अब बाढ़ तो आने से रही और सूखे के भी हालात बनते नज़र आ रहे हैं। यही विभाग आने वाले दिनों में सूखे से निपटने के लिए भी करोड़ों रूपए का बजट माँग लेगा।
मानना पड़ेगा सरकार के राजस्व विभाग को। एडवांस में 28 करोड़ रूपए सेंक्शन कर दिए बाढ़ नियंत्रण के लिए। बाढ़ से हुए नुकसान की मरम्मत और राहत के लिए साढ़े 16 करोड़ रूपए जारी कर दिए गए। अब मौसम का हाल देखें तो लगता है भगवान इंद्र गरीबों के इस प्रदेश से रूठे नज़र आ रहे हैं। अभी तक बरसात के आसार ठीक-ठाक नज़र नहीं आ रहे हैं। अभी से किसानों के माथों पर अकाल की काली छाया साफ नज़र आ रही है।
अब बाढ़ से निपटने के लिए खर्च किए गए करोड़ों रूपए कहाँ गए ? उन रूपयों से किनकों राहत मिली ? और कहाँ बाढ़ आई ? ये सारे सवाल उठना गैरज़रूरी नहीं है। लेकिन इन सवालों का जवाब देगा कौन। और भला इन सवालों को उठाएगा भी कौन ? छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस और भाजपा डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. के पहलवानों की तरह पहले से तय कुश्ती लड़ते नज़र आते हैं।
जिन तक राहत पहुँचनी चाहिए, उनको तो इस बार राहत की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, इसलिए सारी राशि सरकारी अफसरों ने अपने ही राहत कोश में जमा कर ली। आखिर उनको भी तो ट्रांसफर और पोस्टिंग पर भारी इन्वेस्टमेंट करना पड़ता है। आखिर उस खर्च को भी तो मैनेज करना पड़ता है और फिर राहत राशि का एक बड़ा हिस्सा या कोटा नेताओं के चुनावी मैनेजमेंट के लिए अरेंज करना पड़ता है। बहरहाल बाढ़ नियंत्रण के लिए मिले करोड़ों रूपए की बंदरबॉट तो हो गई है और अब दैवीय विपदा के अगले एपिसोड याने अकाल के इंतज़ार में लग गए हैं सरकारी अफसर। किसान जहाँ रोज पानी गिरने की आस में आसमान को ताक रहा है, और भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है, वहीं सरकारी अफसरों को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है। न उनके खेत हैं और न उनकी फसल उजड़नी है। उनकी तो फसल तब लहलहाएगी जब किसानों की फसल उजड़कर रह जाएगी। जितना बड़ा अकाल उतना बड़ा बजट। जितने प्रभावित किसान होंगे, उतने ही मालामाल होंगे नेता और अफसर। ये दुर्भाग्य नही ंतो और क्या है कि राज्य के लोग एक ही साल में बाढ़ और सूखा दोनों से एकसाथ पीड़ित हो रहे हैं।

2 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी बात कही हे,जनता को चाहिये पुछे अधिकारियो से कहा गया यह सब पेसा जिस पर जनता क हक हे.

Gyandutt Pandey said...

जल ग्रहण हेतु तालाब खोदना और मलेरिया बचाव में तालाब भाठना - यह तो राष्ट्रीय खेल है। फाइलों में खेला जाता है।