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Monday, September 22, 2008

असली विजेता कौन, खिलाड़ी या शहीद

मोबाईल पर एसएमएस आया। खोलकर देखा तो सोचने पर मजबूर हो गया। मैसेज में शहीद मोहनलाल शर्मा को मिले 5 लाख रूपए के ईनाम और बीजिंग ओलंपिक में शूटर अभिनव बिंद्रा को मिले 1 करोड़ रूपए से ज्‍यादा मिले ईनाम की तुलना के साथ सवाल उठाया गया था कि असली विजेता कौन है। बात सौ फीसदी खरी थी। मैसेज को पढ़कर सोच ही रहा था कि दूसरा मैसेज आ गया और वो भी वही।

डॉ. अजय शंकर सक्‍सेना मुझे दिन में कई मैसेज करता है। अधिकांश हंसी ठट्टों से भरपूर रहते हैं। बड़ा ही जिन्‍दादिल है अजय। जि़न्‍दगी के हर पल को जीने में विश्‍वास रखता है। आज शाम अचानक उसका इस तरह का मैसेज आना, मुझे अटपटा लगा। अजय को भी ये मैसेज कहीं और से ही आया होगा। अजय के मैसेज के बाद भोपाल से रजनीश शर्मा का वही मैसेज आया। फिर गोपाल भाटिया का, लक्ष्‍मण जगवानी का, मणिभाई पटेल का वही मैसेज मुझे मिला। मुझे लगा कि सबको किसी एक ने एसएमएस किया है और सब इस एसएमएस को फैलाने में लग गए हैं।

बात वैसे गलत भी नहीं है। बिल्‍कुल सही सवाल उठाया गया। आखिर गोलियां बरसाते आतंकवादियों पर गोली बरसा रहे थे शहीद इंस्‍पेक्‍टर मोहनलाल शर्मा। उस गोलीबारी में मोहनलाल शहीद ज़रूर हुए लेकिन उससे पहले 2 आतंकवादी भी ढेर किए जा चुके थे। मोहनलाल की निशानेबाजी बंद कमरों में फिक्‍स्‍ड टार्गेट पर की जाने वाली निशानेबाजी से कहीं ज्‍यादा कठिन और खतरनाक थी। वहां तो सिर्फ मैडल दांव पर लगा था। मिलता तो ठीक, नहीं मिलता तो जीतने के कई मौके आते रहते। लेकिन मोहनलाल का मामला बिल्‍कुल अलग था। यहां जिन्‍दगी दांव पर लगानी थी और जिन्‍दगी आतंकवादियों से लड़ने के लिए दोबारा नहीं मिलनी थी। यहां कोई राउण्‍ड नहीं था। न ही क्‍वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल। जो कुछ था तो फ़ाइनल था। फुल एण्‍ड फाइनल।

इंस्‍पेक्‍टर मोहनलाल शर्मा ने जिन्‍दगी दांव पर लगाकर गोलियां चलाई थी। उन्‍होंने किसी तयशुदा मैडल को जीतने के लिए अपने आपको आगे नहीं किया था। उन्‍होंने ये जानते हुए कि सामने मौत के सौदागर हैं तो भी जान हथेली पर लेकर अपनी गोलियां उन पर दागी थी। आतंकवादी थे वो कोई फिक्‍स टार्गेट नहीं जो उधर से गोलियां नहीं आती। उधर से भी गोलियां आई और मोहनलाल शर्मा दिल्‍ली समेत सारे देश के लिए आतंकवादियों से लड़ते लड़ते शहीद हो गए।

5 लाख रूपए ईनाम घोषित किया गया उनके लिए। बस। यही है इस देश में 1 शहीद की जान की कीमत। कोई मैडल जीतकर आ गया तो करोड़ों रूपए की बरसात उस पर हो गई। आए दिन विवादों में फंसे रहने वाले क्रिकेटर कभी कोई कप जीतकर आ जाते हैं तो उन्‍हें ईनाम देने के लिए देश में होड़ मच जाती है। राज्‍य सरकारें तो जैसे बावली हो जाती है। कोई मकान देता है, तो कोई गाड़ी देता है, तो कोई नगद देता है, तो कोई सरकारी मेहमान का दर्जा देता है। सिर्फ सरकार ही नहीं निजी कंपनियां मरी जाती है क्रिकेटरों को ईनाम देने के लिए। ईनाम बांटने के लिए मरे जाने वाले देश में शहीद को ईनाम देने के लिए कोई सामने नहीं आया। इसे देश का दुर्भाग्‍य ही कहा जा सकता है। कि इस देश में खिलाड़ी के मैडल जीतने पर जितना जश्‍न मनाने पर खर्चा होता है, उसका एक हिस्‍सा भी शहीदों के लिए खर्च नहीं होता।

क्‍या इस देश में ये सवाल उठाना वाजिब नहीं है कि खिलाड़ी बड़ा है या शहीद। यहां सवाल उठाने का मकसद किसी खिलाड़ी की प्रतिष्‍ठा को ठेस पहुंचाना नहीं है, न ही उसकी उपलब्धि को कम आंकना है। सवाल सिर्फ तुलना के लिए उठाया जा रहा है। आख्रिर कहीं न कहीं किसी न किसी के दिल में ये बात उठी हो और फिर एसएमएस के ज़रिए ये बात देश में फैलने लगी होगी। ऐसा ही एसएमएस डॉ. अजय सक्‍सेना जैसे मस्‍त मौला को मिला और उसने उसे मुझे फारवर्ड कर दिया। आखिर उसने भी तो मुझसे सवाल ही किया था क्‍योंकि उससे किसी और ने ये सवाल पूछा था और शायद इसीलिए मैं ये सवाल आप सब के लिए छोड़ रहा हूं कि खिलाड़ी बड़ा है या शहीद।

17 comments:

अशोक पाण्डेय said...

वाजिब सवाल है।
वैसे कहीं न कहीं हम सभी दोषी हैं। सरकार में बैठे राजनीतिज्ञ जानते हैं कि हमारी किस भावना की कितनी कीमत हैं। वे पैसे बांटते हैं हमारी भावनाओं को भुनाने के लिए। यदि हमारी देशभक्ति की भावना की ओछी कीमत लग रही है तो कहीं न कहीं दोष हमारे अंदर भी है।

रंजन राजन said...

बात वैसे गलत भी नहीं है। बिल्‍कुल सही सवाल उठाया गया। आखिर गोलियां बरसाते आतंकवादियों पर गोली बरसा रहे थे शहीद इंस्‍पेक्‍टर मोहनलाल शर्मा।

ambrish kumar said...

nakli nishane ke karod aur asli ke panch lack

राज भाटिय़ा said...

दिल दुखता हे ऎसी घटना से लेकिन ... हां मे भी आशोक जी की बात से सहमत हू.ओर जिस देश मे एक आतंकावादी की फ़िक्र हो उस के बच्चो की फ़िक्र हो वोटो के लिये, वहां शहीद बेचारा ही तो हो गा.
धन्यवाद

Udan Tashtari said...

सही सवाल उठाया!!

सचिन मिश्रा said...

aap ka sawal bilcul sahi hai?

Gyandutt Pandey said...

बाजारवाद और शहादत में कोई तुलना ही नहीं! कितना हावी है ग्लैमर!

ताऊ रामपुरिया said...

सवाल चिंतनीय है !

seema gupta said...

क्‍या इस देश में ये सवाल उठाना वाजिब नहीं है कि खिलाड़ी बड़ा है या शहीद।
" ya rightly said, the question raised is very appropriate and a thought is required to be given. but again another question:- will there be any answer for this question???"

Regards

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कौन बड़ा है यह सोचने की समझ जिस दिन आयेगी उस दिन तक कहीं बहुत देर न हो चुकी हो. बहुत सही सवाल और उतना ही सही लेख.

COMMON MAN said...

andhon ke aage roye apne nain khoye, hindoo saudagar me badal chuka hai aur saudagar ko keemat dikhai deti hai.

दिनेशराय द्विवेदी said...

अनिल जी हमारे वर्तमान समाज का यही चरित्र है। उस खिलाड़ी में बाजार के माल को बेचने की क्षमता है, जो एक शहीद में नहीं। मौजूदा बाजारवादी समाज को बदले बिना मूल्यों में बदलाव संभव भी नहीं है।

योगेन्द्र मौदगिल said...

विसंगतियों के देश में रहते हैं हम...
इसीलिये ये प्रश्न है..?
सामयिक चिंता है भाई जी...
हमें इस पर चिंतन करना ही चाहिये....

डॉ .अनुराग said...

सच तो ये है अनिल जी की अब हम सोच बोलने से भी डरते है....एक ज़माना था जब बेटा कुछ ग़लत काम करता था तो बाप महीनो शर्म के घर में दुबका रहता था ...अब आतंक वादियों के बाप दो दिन बाद ही टी वी पर कहते है ...उन्हें फंसाया गया है ?लेप-टॉप पर फोटो .हथियार सब सबूत बकवास ....एक आदमी गोली से मर गया ...सब झूठ है....कई बार तो टी.वी न्यूज़ वालो पर मन खिन्न होता है की समाचार कौन संपादित करता है?
इस देश में कौन बड़ा है टी आर पी ? या देश ?

सतीश सक्सेना said...

सही सवाल है !

NIRBHAY said...

it was a damn lekuna of Delhi Police that they used Mr.M.C.Sharma with over confidence. There is difference between TERRORIST and local or inter state anti social elements. It is well known to everyone worldwide that the terrorists are using modern weapons and techniq, how the Delhi Police dared to send Mr. M.C.Sharma with only six round revolver and too without bullet proof jacket, not only he all the police personnels were without bullet proof jackets?
They were approching to terrorist not any Gundas who run away with the name of police officer and seeing Khaki Verdis.
Delhi Police is not taking its morale responsibility for that, and highlighting the case as a matter of Martyerism.
I ask one question to every one, if Mr.M.C.Sharma may had given order to his one of constable to do the same work and the result would have been the same then what Delhi Police might have done at this juncture. Answer is none other then the suspension of Mr. M.C.Sharma.
Now the people are very aware which news is Media's propoganda and which one is genuine one.
If Abhinav Bindra had insisted on indian ammunation, was it possible that he could be First Gold medalist. No and never.
If a person can not target the bullet in open area how can he target in crowdy area.

see some panic reaction of police in this case....
as soon as the terrorist attacked the officer all the policemen near the area came under the panic and started 22 rounds of firing only two terrorist were killed ok.. it is not a matter of points of game. what strategy Delhi Police had? to catch them alive and what happened due to this panic.
i. two terrorist were killed, and all the future terrorist attacks plans, their exposure to international terrorist organisations also got dead. now only can assume.
ii. this panic firing made it easier other two terrorists to escape that too with same result.

5 lacs to Police officer and 5 crore to Abhinav Bindra shows

how the people look to police?
how much faith they have in police?
when police acts? after incidents?

most suitably to say that the people of india is becoming more mature now, they are able to distinguish between genuine or propoganda news.

do all the Police, Para Military, Military personnels in india are Olympics champion in shooting?

दीपक said...

शहीद बडा है निश्चय ही !! एक बहुत बडा प्रश्न उठाया है आपने !!