Thursday, October 16, 2008

हम तो सदियों से बेहोश हैं क्‍या बेहोशी दिवस मना रहे हो!

"हैण्‍ड वाशिंग डे" मनाकर चैन से हाथ-मुंह धो भी नहीं पाए थे कि पता चला आज विश्‍व बेहोशी (निश्‍चेतना) दिवस मनाया जा रहा है। नींद कहो या बेहोशी सुबह कहो या दोपहर जब टीवी पर समाचार देखना शुरू किया तो हमारे देश के ठेकेदार भैय्या लोग चिल्‍ला-चिल्‍लाकर कह रहे थे कि मंत्रियों को देश में क्‍या हो रहा है पता नहीं है। अब उनको कौन समझाए कि ये मामला आज का नहीं है, हमारे देश के ठेकेदार सदियों से बेहोश हैं। उन्‍हें कुछ पता नहीं क्‍या हो रहा है ? वे सोच रहे हैं देश तरक्‍की कर रहा है लेकिन देश गड्ढे में जा रहा है इसकी उन्‍हें ज़रा भी ख़बर नहीं है। ऐसी बेहोशी कहीं किसी ने देखी भी नहीं होगी। बेहोशी दिवस मना रहे हैं मूर्ख, वो भी उस देश में जहां लोग सदियों से बेहोश हैं।

पता नहीं ये अंतर्राष्‍ट्रीय दिवस कौन फिक्‍स करता है। हो सकता है ये उनके देश के लिए साल में एक बार मनाया जाने वाला त्‍यौहार हो, लेकिन उनके सारे दिवस तो हमारे देश में सालों बल्कि दशकों से लगातार हर दिन मनाए जा रहे हैं। कल हुए हाथ धोऊ दिवस को लीजिए! सारे लोग सदियों से बहती गंगा में हाथ धोते आ रहे हैं और ये लोग एक दिन मना रहे हैं। अब विश्‍व बेहोशी (निश्‍चेतना) दिवस को ही लीजिए! क्‍या आपको ऐसा लगता है इसे हमें बेहोश होकर एक दिन के लिए मनाना चाहिए। हर आदेश सदियों से बेहोश ही तो है। बापू ने अंग्रेजों से लड़-झगड़कर देश को गुलामी की जिन जंजीरों से मुक्‍त कराया वे जंजीरें तो हमारे देश के राज-महाराजाओं की लंबी बेहोशी के कारण ही भारत माता को जकड़ सकी थी। पृथ्‍वीराज गर बेहोश न रहते तो क्‍या गोरी दोबारा वापस आ सकता था। सिर्फ गोरी की क्‍या बात करें गजनवी से लेकर गोरे तक हमारे देश में हमारी बेहोशी के कारण ही तो आए। सिकंदर से लेकर बाबर और जाने कौन-कौन आते रहे, लूटते रहे यहां बसते रहे, यहां राज करते रहे और हम बेहोश ही तो रहे।

बताईए भला इतनी लंबी बेहोशी वाले इस देश में बेहोशी दिवस मनाने का कोई तुक है क्‍या ? बाबा आदम के ज़माने की बात को छोड़ भी दें तो भी क्‍या आज़ादी मिलने के बाद भी क्‍या हम होश में आए ? आज़ाद होते ही पाकिस्‍तान कश्‍मीर में घुस गया था। वो हमारी बेहोशी ही थी। तकदीर ने साथ दिया और उसे हमने बेहोशी में ही खदेड़ दिया। बेहोशी में ये पता ही नहीं चला कि वो पूरा वापस हो पाया है या नहीं। आधे में वो घुसा ही रहा और हम बेहोश ही रहे। ऐसा नहीं कि उसके बाद बेहोशी टूटी हो। एक नहीं 2 बार और पाकिस्‍तान ने हमारी बेहोशी का फायदा उठाकर देश में घुसने की कोशिश की। और उसके बाद से तो छुटपुट कोशिश पाकिस्‍तान करता ही आ रहा है। सिर्फ पश्चिम ही नहीं उत्‍तर से चीन ने भी हमारी बेहोशी का फायदा उठाकर अंदर घुसना चाहा। हमारी बेहोशी तब भी नहीं टूटी और वो एक हिस्‍से में जो जमा सो आज तक जमा हुआ ही है। पश्चिम और उत्‍तर से लात खाने के बाद भी हमारी बेहोशी पर कोई खास असर नहीं पड़ा था। पूर्व और पूर्वोत्‍तर में भी घुसपैठ होती रही और हम बेहोश ही रहे। दक्षिण से भी इट्टे-लिट्टे हमें लतियाते रहे और तो और हमारे देश के प्रधानमंत्री तक की जान ले डाली, मगर हमारी बेहोशी नहीं टूटी।

चारों ओर से लात खाने के बाद भी जो बेहोशी न टूटी हो वो भला मामूली सी बेरोजगारी के बढ़ने से क्‍या टूटती ? बापू ने देश को आज़ादी दिलाई। आज़ादी के जश्‍न में हम ऐसे बेहोश हुए कि पता ही नहीं चला कि बापू को हमसे कोई हमारे बीच से छीन ले गया। ये बेहोशी बापू के जाने के बाद भी नहीं टूटी। बापू के बाद इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी हमारी ऐसी बेहोशी में चले गए। बापू ने कुटीर उद्योग बढ़ाने की बात कही थी। हमें बेहोशी में उनकी बात का पता ही नहीं चला कि उनका कुटीर उद्योग का सपना कब चूर-चूर हुआ और उस पर बड़े-बड़े उद्योग सीना तानकर खड़े हो गए। बापू की बकरी, बापू की खादी, बापू की लाठी सब चोर ले गए तो भी हमें पता ही नहीं चला।

कुटीर उद्योग का सपना टूटा, मगर हमारी बेहोशी नहीं टूटी। इसके बाद किसानों के देश में खेती को सुधारने और बढ़ाने का सपना भी चूर-चूर हो गया। तो भी हमारी बेहोशी नहीं टूटी। बेरोजगारी बढ़ती रही, तो भी हम बेहोश रहे, अकाल पड़ते रहे तो भी हम बेहोश रहे। बाढ़ आती रही हम डूबते रहे, मरते रहे, मगर बेहोशी नहीं टूटी, बाढ़ आज भी आती है और हम आज भी बेहोश ही हैं। सिर्फ बाढ़ ही नहीं सूखा भी हमें सताता रहा, मगर हमने बेहोशी से बाहर आने की कोशिश भी नहीं की। भ्रष्‍टाचार बढ़ता चला गया और धीरे-धीरे वो शिष्‍टाचार हो गया। रोज हर पल हमको वो सता रहा है मगर मजाल है कि हमारी बेहोशी टूटे। बेहोशी के लिए तो हम सारे देश में विख्‍यात है जभी तो हमारे चौधरी साहब फिजी में लतिया देते रहे हैं और हम बेहोश ही रहते हैं। अफ्रीकी देशों से भी भगा देते हैं हमारे लोगों को और हम बेहोश ही रहते हैं। अमेरिका में डॉट बस्‍टर जब जागते हैं हमें निशाना बना देते हैं, मगर मजाल जो हम जागे। रशिया हमारी मदद करते-करते टुकड़े-टुकड़े हो गया मगर हमारी बेहोशी नहीं टूटी। बांग्‍लादेश भी कभी-कभी गरिया देता है और तेलियों के मामले में तो हम बेहोशी में भी अमेरिका के पीछे-पीछे ही चलते हैं।

सदियों से बेहोश इस देश में मीडियावाले कुछ मंत्रियों के बेहोश होने पर नाराज़ हो रहे थे वो भी विश्‍व बेहोशी दिवस पर। बताईए भला ये भी कोई बात हुई। मंदी से परेशान हो रहे हैं, 2 हज़ार आदमियों की नौकरी जाने से हलाकान हो रहे हैं। शेयर बाज़ार के गिरने पर घबरा रहे हैं और शोर मचा रहे हैं जैसे सारा देश जाग ही जाएगा। कोई पहली बार गिर रहा है क्‍या शेयर बाज़ार। सालों से गिरता-संभलता रहता है, लोग भी गिरते-संभलते हैं मगर जो बेहोश थे वो बेहोश ही हैं। उन पर कोई असर नहीं होता। राजठाकरे चिल्‍लाता है, अमरसिंह बकवास करता है, लालू यादव बड़बड़ करता है, ममता रोती है, माया धोती है, जया हंसती है, करूणा बेबस है, कृष्‍णा खामोश है, बुद्धदेव भौंचक्‍क है, नवीन हताश है, गुलाम, आज़ाद होकर भी गुलाम है। लोग होश में होकर भी बेहोश हैं। ऐसे में साल में सिर्फ एक दिन बेहोशी दिवस मनाना मुझे तो जायज नहीं लगता। आपको क्‍या लगता है बताईएगा ज़रूर।

17 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

राजठाकरे चिल्‍लाता है, अमरसिंह बकवास करता है, लालू यादव बड़बड़ करता है, ममता रोती है, माया धोती है, जया हंसती है, करूणा बेबस है, कृष्‍णा खामोश है, बुद्धदेव भौंचक्‍क है, नवीन हताश है, गुलाम, आज़ाद होकर भी गुलाम है। लोग होश में होकर भी बेहोश हैं। ऐसे में साल में सिर्फ एक दिन बेहोशी दिवस मनाना मुझे तो जायज नहीं लगता। आपको क्‍या लगता है बताईएगा ज़रूर।

अनिल भाई आपने धो डाला ! आपके साथ सहमत हूँ ! एक बार दुबारा से पढने आउंगा ये लेख ! बहुत बढिया लगा ! धन्यवाद !

COMMON MAN said...

BILKUL SAHI KAHA MAHARAJ, HAM LOG TO 24*7*365 BEHOSHI WALE HAIN

Suresh Chiplunkar said...

होश में लाने वाली "चिमटी"दार पोस्ट…

संगीता पुरी said...

लेकिन बेहोशी से जगाने के लिए चिल्लाना तो पड़ेगा ही .....अब कितने दिनो तक यह कहना मुश्किल है ....इस देश की हालत को देखते हुए।

Satyajeetprakash said...

बेहोश भी हैं, तुर्रा तो ये कि बेहोशी में भी दौरा आता है.

Gyandutt Pandey said...

बेहोश तो वह हो, जो कभी होश में रहा हो! :(

SA RE GA said...

BAHUT KHUB.
YEH ATAL H KI TALTA NAHI, ADVANI AAD MEIN SAB KE SAB BEHOSHI DIWAS HI MANYAEGE JAB AAP JIS PARKAR SE JAGATO HO LOG JARUR JAG JAYENGE.
RAMESH SACHDEVA
DIRECOTR
HPS SR. SEC. SCHOOL
MANDI DABWALI

PD said...

बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर दी आपके इस पोस्ट ने..

दीपक said...

आपने कल हाथ क्या धोया अब तो सब के पीछे हाथ धोकर पड गये है भई!!हा हा हा

राज भाटिय़ा said...

चलिये आप ने बता तो दिया की बेहोशी दिवस कोई नया नही हमारे लिये,राजठाकरे चिल्‍लाता है, अमरसिंह बकवास करता है, लालू यादव बड़बड़ करता है, ममता रोती है, माया धोती है, जया हंसती है, करूणा बेबस है, कृष्‍णा खामोश है, बुद्धदेव भौंचक्‍क है, नवीन हताश है, गुलाम, आज़ाद होकर भी गुलाम है। लोग होश में होकर भी बेहोश हैं।
क्या बात है मुझे तो लगता है आप आज धुलई दिवस भी साथ मै मना रहै है. बह्त सुन्दर
धन्यवाद

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

"कल हुए हाथ धोऊ दिवस को लीजिए! सारे लोग सदियों से बहती गंगा में हाथ धोते आ रहे हैं और ये लोग एक दिन मना रहे हैं। "
क्या खूब कही है अनिल जी.

दीपक का निम्न कथन भी मजेदार रहा:
"आपने कल हाथ क्या धोया अब तो सब के पीछे हाथ धोकर पड गये है भई!"

Tarun said...

ये जरूर आपके दिमाग की उपज होगी, हमने तो ऐसा दिवस ना सुना ना पढ़ा, नननन अब पढ़ लिया। लेकिन बेहोश नगर की बेहोशी बड़ी मदहोशी से सुनायी है, यही सच है।

Arvind Mishra said...

अब तो हर दिन ही कोई ना कोई विश्व दिवस होता है -मगर इन सब में असली वाला -विश्व खाद्य दिवस एक तरह से अचर्चित हे रह गया और विश्व दिवसों की होड़ में यह तो होना ही था .

संजीव तिवारी said...

सिर्फ एक दिन ???? सारे कुम्‍भकर्ण खफा हैं ...., अरे छ: माह तो करो अमरीका वाले आका जी ।


हा हा हा, बढिया बेहोश किया भईया ।

seema gupta said...

हैण्‍ड वाशिंग डे" मनाकर चैन से हाथ-मुंह धो भी नहीं पाए थे कि पता चला आज विश्‍व बेहोशी (निश्‍चेतना) दिवस मनाया जा रहा है।
राजठाकरे चिल्‍लाता है, अमरसिंह बकवास करता है, लालू यादव बड़बड़ करता है, ममता रोती है, माया धोती है, जया हंसती है, करूणा बेबस है, कृष्‍णा खामोश है, बुद्धदेव भौंचक्‍क है, नवीन हताश है, गुलाम, आज़ाद होकर भी गुलाम है। लोग होश में होकर भी बेहोश हैं। ऐसे में साल में सिर्फ एक दिन बेहोशी दिवस मनाना मुझे तो जायज नहीं लगता। आपको क्‍या लगता है बताईएगा ज़रूर।
'hmm baat to bde hee pttey kee khee hai, bhut jandaar sval, sirf ek din, sirf or sirf ek din...... sall ke 365 days mey se sirf ek din,kitna injustic hai..."

Regards

BrijmohanShrivastava said...

सर जी /आपकी अमीर धरती पर ये गरीब पहले भी आ चुका है /यह लिखकर कि मुझे ""गलतियाँ सूधारने का मौका दें""आपने अपनी महानता प्रर्दशित की है /जहाँ तक आज के लेख का सवाल है होश और बेहोशी की बात पढ़ते वक्त मुझे ऐसा लग रहा था कि लेख बहुत दुःख और गुस्से में लिखा गया है /देखिये अनिल जी जो वेहोश है उसको तो होश में लाने के बहुत उपाय हैं किंतु जो वेहोश होने का प्रदर्शन कर रहा है नाटक कर रहा है उसे होश में नहीं लाया जासकता /लेख की जितनी तारीफ की जाए कम है

डॉ .अनुराग said...

सन ४७ के बाद कुछ दिन जगे थे ....उसके बाद से बेहोश ही है......सही कहा आपने .