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Monday, October 6, 2008

थू है ऐसी राजनीति और नेताओं पर

आतंकवादियों से मुठभेड़ में शहीद हुए मोहनलाल शर्मा की शहादत पर सवाल उठाकर कुछ नेता हो सकता है एक बड़े वोट बैंक को संतुष्‍ट करना चाह रहे हो लेकिन ऐसा करके वे देश की सेवा और रक्षा में जुटे जवानों के हौसलों पर चोट कर रहे हैं। उन्‍हें अपनी तुष्टिकरण की नीति को जारी रखने के लिए ज्‍़यादा से ज्‍़यादा गिरफ्तार लोगों के बेकसूर होने की बात करनी चाहिए, ये कानून और इंसानियत का तकाजा हो सकती है। लेकिन 1 शहीद की शहादत पर सवाल उठाना कहीं से भी जायज नहीं कहा जा सकता। नेताओं की तो गैरत के बारे में नहीं कहा जा सकता, लेकिन मानना पड़ेगा अमर शहीद मोहनलाल शर्मा की विधवा के जज्‍़बे को जिसने अपने पति की शहादत पर सवाल उठाने वाले अमरसिंह के दिए हुए 10 लाख रूपए लौटाकर उनके मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया है। अगर थोड़ी बहुत शर्म बाकी बची हो तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों में तो उन्‍हें भी अपना बयान वापस लेना चाहिए।

अफसोस की बात है कि राजनीति के चलते एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले नेता अब शहीदों तक को नहीं छोड़ रहे हैं। शायद गंदगी उनकी तासीर हो गई है। इसमें कोई शक नहीं कि हर इंसान को अपनी बात कहने का हक है और स्‍वतंत्र भारत में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता है। लेकिन स्‍वतंत्रता का मायने ऑय-बॉय-शॉय बकना नहीं होता। आप बिल्‍कुल पैरवी कर सकते हैं, किसी की भी। चाहे वो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के हत्‍यारे हो या मुंबई बम ब्‍लॉस्‍ट के आरोपी। हर किसी को अपनी बेगुनाही साबित करने का हक है और उनकी बेगुनाही की पैरवी करने का भी लोगों को बराबर का हक है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मृतकों की मौत पर सवाल उठाए जाएं। मुंबई ब्‍लॉस्‍ट के आरोपियों की पैरवी करने वालों को ये कहने का कतई हक नहीं है कि बम धमाकों के समय लोग वहां मरने क्‍यों गए।

दरअसल हमारे देश में स्‍वतंत्रता की परिभाषा हर कोई अपने हिसाब से तय करता है, खासकर नेता। ये जो चाहे कह सकते हैं और कर भी सकते हैं। अपराधियों को पानी पी-पीकर गाली बकने वाले, गांधी की कसम खाने वाले चुनावों में टिकिट बांटते समय सब कुछ भूलकर बाहुबलियों को छांट-छांटकर टिकिट देते हैं। इस मामले में कोई भी पार्टी दूध की धुली नहीं है। क‍थनी और करनी का फर्क चुनाव में दिखाई देता है और भस्‍मासुरों के भरोसे चुनाव लड़ने और जीतने वाले बाद में भस्‍मासुर से बचते-भागते नज़र आते हैं।

बाहुबली और अपराधी इनके ताज़ा वोट बैंक हैं। जिस तरह से कुछ नेता इनकी पैरवी करते हैं उसे देखकर बहुत शर्म आती है। सालों से अल्‍पसंख्‍यकों और दलितों का दोहन करते आ रहे हैं यही लोग। अल्‍पसंख्‍यकों और दलितों के मसीहा बनने की कोशिश पर किसी को ऐतराज नहीं है पर क्‍या उनके पास इस बात का कोई जवाब है कि आखिर आज़ादी के बाद इतने सालों में उनकी हालत सुधरी क्‍यों नहीं। क्‍या वे इस बात का जवाब दे सकते हैं कि आख्रिर इसी देश में पैदा होकर पलने-बढ़ने वाला बच्‍चा जवान होकर इसी देश के खिलाफ हथियार क्‍यों उठा रहा है। क्‍या उनके पास इस बात का जवाब है कि जो लोग देश के बटवारे के समय कहीं और जाने के बजाय यहीं रहना बेहतर मानते थे उनके बच्‍चे दूसरे देश की ओर क्‍यों ताकने लगे। और भी बहुत से सवाल हैं अल्‍पसंख्‍यकों और दलितों के कथित मसीहा कहलाने का शौक रखने वाले ढपोरशंखी नेताओं के लिए।

मेरा सवाल ये भी है कि जितना तरफदारी ये नेता अल्‍पसंख्‍यकों या दलितों की करते हैं, उनके पिछड़ेपन या उनसे हो रहे दोयमदर्जे के सलूक की खिलाफत करते हैं उन नेताओं में से कितनों ने उन समाजों के साथ रोटी-बेटी का रिश्‍ता किया है। अल्‍पसंख्‍यकों की बेटी ब्‍याह कर लाना तो नामुमकीन है क्‍योंकि ऐसा होता है, तो उनका धर्म खतरे में आ जाता है इसलिए इस विकल्‍प को छोड़कर कम से कम ये बता दें कि अपनी बेटी को उस धर्म में कितने नेताओं ने ब्‍याहा है। इस बात पर तो अल्‍पसंख्‍यकों को ऐतराज भी नहीं रहता, फिर क्‍यों नहीं अल्‍पसंख्‍यकों के मसीहा बनने वाले नेता अपनी बेटियों का रिश्‍ता उनसे करते। कब तक ये नेता टुच्‍ची राजनीति की खातिर अल्‍पसंख्‍यकों और दलितों को इंसान समझने के बजाय वोट डालने वाले मशीन समझते रहेंगे।

उन्‍होंने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से कोई रोक नहीं रहा है। वे चाहे जैसी घटिया राजनीति कर सकते हैं लेकिन कम से कम उन्‍हें लाश पर रोटियां नहीं सेंकना चाहिए। उन्‍हें दिल्‍ली में पकड़े गए युवकों को आतंकवादी कहने पर ऐतराज जताने से कोई नहीं रोक रहा है। वे चाहे तो उन्‍हें पुरस्‍कृत भी कर सकते हैं और उन्‍हें महान देश सेवक भी बता सकते हैं, उन्‍ाका मुंह है वो चाहे जो बकें, लेकिन ये कतई बर्दाश्‍त नहीं किया जा सकता कि बीमार बच्‍चे को अस्‍पताल में भर्ती छोड़ ड्यूटी पर जान गंवाने वाले शहीद की शहादत पर सवाल उठाए। ऐसे सवाल उठाने वाले नेताओं पर थू है और ऐसी घटिया तुष्टिकरण की राजनीति पर भी थू है। शहीद मोहनलाल शर्मा की विधवा की बातों से कम से कम ऐसे नेताओं को सीख लेना चाहिए कि उनकी राजनीति देश की सेवा में लगे जवानों और उनके परिवारों के दिलों को कितना ठेस पहुंचा रही है।

14 comments:

आत्महंता आस्था said...

Aise netaon ki antaratma mrit ho chuki hai. Dashahare ke Ravan ki jagah inke he putle ka dahan kiya jana chahiye. Atyant hi sharmshar karne wali baat, jo desh me rajnitigyon ke star ko prakshepit karti hai.

श्रीकांत पाराशर said...

Anilji, aap amarsingh jaise logon se itni apeksha karte hain ? tustikaran ki rajniti jinka khana, peena, bichona ho gai. jo sans bhi usi men lete hain, sapne bhi usi ke dekhte hain.maje ki baat yah hai ki musalim bhai bhi inki asaliyat nahin samajh paa rahe. aaj mumbai police ne atankwadion ki ek poori khep pakadi hai, ab kya kahenge amarsingh. aise besharm netaon se desh ko kaise bachaya jaye, yah sawal important hai.

ताऊ रामपुरिया said...

लेकिन मानना पड़ेगा अमर शहीद मोहनलाल शर्मा की विधवा के जज्‍़बे को जिसने अपने पति की शहादत पर सवाल उठाने वाले अमरसिंह के दिए हुए 10 लाख रूपए लौटाकर उनके मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया है।

इस ताताम्य में मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा की आज के सांध्य दैनिक में मैंने पढा है ये जो १० लाख का चेक अमर सिंह द्वारा दिया गया था इसके बारे में उनके पिताजी श्री नवरतन शर्माजी ने बताया है की उस चेक पर दस्तखत मुलायम सिंह के थे और अंको में उस पर एक लाख और शब्दों में दस लाख लिखे थे ! क्या कमाल की जादूगरी है मतलब वाह वाही लूट लो
चेक तो वो चाहे तो भी क्लियर होना ही नही है ! असल वस्तुस्थिति क्या है ? ये तो आप ही पता करके पाठकों को बता सकते हैं !

वर्षा said...

राजनीति ने तो हर जगह सेंध लगा दी है। शर्मनाक है।

NIRBHAY said...

reliance ke DHADWE se kya apeksha rakhten hai, fat ke haath me aa gayi thi, political life dead ho gayi thi, mayawati ka danda na jane khan ghusa Amarsingh ke Sharir me, SONIA MATA KI JAI kahte aanchal me sharan le lee, BHADWAGIRI ka BADSHAH, abhi nuclear issue me KARODON khane aur congress ke liye GRAHAK phasane ke case me bhi AAROPEE hai, yeh BHADWA hindi ke lachhedar muhaware ka shoukin, ladkiyon ka shoukin, iske bolne se kya Suraj Black Hole ho jayega? is BHADWE ke dost ki picture ka ek dialogue yaad aata hai " GEHUN KO GEHUN NAHIN TO KYA JWARI KAHENGE, SHARABI KO SHARABI NAHI TO KYA JUARI KAHENGE" kuchh sikh le uske Mitra se. BHADWA police walon ko hee AATANKWADI kahta hai, lagta hai Mulayam Singh ne UP me aise hi Raaj kiya tha aur public ne laat mar kar hata diya.

राज भाटिय़ा said...

सुना है सुअर ही एक ऎस जानवर है जो पीछे से निकाल कर फ़िर खा लेता है, यह कमिने भी इस सुअर की ओलाद है,अब चाहिये इस देश को एक हिटलर जॊ यहुदियो की तरह से इन सुयरो को सीधा करे, यहुदी भी बहुत कमीने थे उस समय युरोप मे, लोग हिटलर को बुरा कहते है लेकिन जर्मन को सीधा उसी ने किया, ओर इन को भी उस का बाप चाहिये, हिटलर बस हां बस हां सुनन जानता था ना की जगह ..............
धन्यवाद

Udan Tashtari said...

कितनी घुटन होती है.

गुरतुर गोठ said...

आभार भाई साहब सुबह सुबह विचारोत्‍तेजक लेख पढने को मिला, कल आपको सुनने पाटन जाने का प्‍लान था पर संभव नहीं हो पाया, ब्‍लाग में ही मुलाकात सुन (पढ) लिये, पुन: आभार ।

seema gupta said...

लेकिन मानना पड़ेगा अमर शहीद मोहनलाल शर्मा की विधवा के जज्‍़बे को जिसने अपने पति की शहादत पर सवाल उठाने वाले अमरसिंह के दिए हुए 10 लाख रूपए लौटाकर उनके मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया है
" bhut accha kiya unhone, rajneete hai, kisee kee lash pr bhee roteeyan sekne se baaj nahee aayenge, ptta nahee kabhee sudhar hoga ya or jyada...'

regards

rakhshanda said...

सब सियासत है...ये सियासतदान किसी के मीत नही हैं...पहली बात तो ये की बगैर सच्चाई जाने, किसी को शहीद घोषित ही नही किया जाना चाहिए...कर दिया तो फिर उसकी इन्सुल्ट नही करनी चाहिए...लेकिन यहाँ यही सब होता है और होता रहेगा...

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

राजनीति हमेशा थू के काबिल ही रही है। आप जितना उसके अंदर घुसते जाते हैं, आपको उतनी ही घिन आने लगती है।

Shiv Kumar Mishra said...

राजनीति के मायने बदल दिए गए हैं. इस देश में राजनीति करने का मतलब यह रह गया है कि राजनेता जो चाहें कह सकते हैं और कर सकते हैं. अमर सिंह के बारे में क्या कहा जाए? और फिर वही क्यों, उनके ही न जाने और कितने भाई-बंधु हैं जो इस तरह का आचरण कर रहे हैं.

अपनी तो नहीं लेकिन आने वाली पीढियों की चिंता अवश्य होती है. क्योंकि हमारा मानना है कि भारत के टुकड़े होने में पचास साल का समय शायद ज्यादा है.

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

mai shri shiv kumaar ji mishra ji ki teep se sahamat hun ki rajaniti ke maaine badal gaye hai .

दीपक said...

राजनिती की तरकारी सड गयी है इन्हे उठाकर बाहर फ़ेकना ही पडेगा नही तो घर गंध से भर जायेगा!!