Sunday, December 14, 2008

साले कार में ब्रीफकेस तो ऐसा रखते हैं जैसे लाखों का माल हो

रात साढ़े 10 बजे मोबाईल की घंटी बजी दूसरी तरफ थे मेरे मित्र डॉ. शरद चाण्‍डक। मैं एक पल के लिए घबराया इतनी रात को अचानक उसका फोन कैसे। मैंने पूछा क्‍या बात है तो वो बोला तुम तत्‍काल वीआर मे‍डिकल पहुंचो, डॉक्‍टर सतीष राठी की कार से साइनस एण्‍डोस्‍कोप चोरी हो गया है। सतीष भी हम लोगों का मित्र ही है। मैं तत्‍काल वहां पहुंचा। बल्‍लू ऊर्फ डॉ चाण्‍डक का गुस्‍सा ऊफान पर था। बोला तुम लोग सर चढ़ा रखे हो नेताओं को। आम आदमी जी नहीं सकता। 15 साल से गाड़ी डिस्‍पेंसरी के बाजू खड़ी करते आ रहे हैं, पहली बार किसी ने कांच तोड़कर ब्रीफकेस निकाला है। कल मुख्‍यमंत्री को शपथ लेना है, चप्‍पे-चप्‍पे पर पुलिस है, हर आते-जाते की तलाशी ले रहे हैं और चोर मजे से हमारा सामान ले गया। मुझे लगा बल्‍लू का गुस्‍सा जायज है। फिर मैंने माहौल हल्‍का करने की गरज से कहा कि तुम जितना भड़क रहे हो, उससे ज्‍यादा तो चोर भड़क रहा होगा। इतना रिस्‍क उठाकर चोरी की और घर जाकर ब्रीफकेस खोलेगा तो क्‍या सोचेगा। इंस्‍ट्रुमेंट देखकर पक्‍का गाली बकेगा और कहेगा साले कार में ब्रीफकेस तो ऐसा रखते हैं जैसे लाखों का माल हो।

मेरी बात सुनकर बल्‍लू हंसा तो नहीं मगर सतीष जरूर हंसा। बल्‍लू का गुस्‍सा थोड़ा कम हुआ था। मैंने फिर उसे छेड़ा और करो नियम का पालन। साले हमारी कार के काले शीशे से तुमको चिढ़ है। हम काले काम करते हैं। हम नियम तोड़ते हैं। हमारी कार के शीशे से फिल्‍म नोंच लेनी चाहिए। क्‍यों, हुआ है आज तक हमारी कार से एक लिफाफा भी चोरी। अंदर क्‍या रखा है पता भी चलता है। और रखो सफेद शीशे। और करो नियमों का पालन। अंदर रखा ब्रीफकेस चोर देखेगा तो कांच नहीं तोड़ेगा तो क्‍या चुपचाप चला जाएगा। इसलिए कहता हूं कांच काले....... इससे पहले मैं अपनी बात पूरी कर पाता बल्‍लू फिर भड़क गया। बोला-रात को तुम्‍हारा उपदेश सुनने के लिए तुम्‍हें नहीं बुलाया है। नेतागिरी बंद करो और तत्‍काल पुलिस से बात करो। इंस्‍ट्रुमेंट वापस मिलना चाहिए समझे।

तब तक मेरा भी पारा चढ़ गया था। मैं बल्‍लू से बोला कि पुलिस हमारी क्‍यों सुनेगी। तुम्‍हारे दोस्‍त का भाई फिर चुनाव जीता है। मंत्री था इसलिए फिर मंत्री बनेगा। उसकी हमसे ज्‍यादा चलेगी। उसी को लगाओ वो ही दिलवाएगा तुम्‍हारा इंस्‍ट्रुमेंट। अब सतीष बोला अरे यार, तुम लोग मदद करने आए हो या लड़ने। मैंने कहा ठीक है और उसके बाद मोबाईल पर बिजी हो गया। तब तक डॉ. शरद यानि बल्‍लू भी मोबाईल पर लग गया था। मेरा फोन लगने के पहले उसका फोन लगा और हमारे एक दूसरे मित्र विजय के भाई के स्टॉफ पर बल्‍लू बरस पड़ा। बोला तमाशा है। डॉक्‍टरों का सामान चोरी हो रहा है। बीच बाज़ार से और तब जब शहर में हज़ारों पुलिसवाले तलाशी ले रहे हैं। इसीलिए वोट दिया है क्‍या तुम लोगों को। अनिल आ गया है। कल सारे अख़बार रंगवा दूंगा। अब बल्‍लू होने वाले मंत्री के पीए को हड़का रहा था।

मैं समझ गया डॉ. बल्‍लू का गुस्‍सा शांत होने वाला नहीं है, तब तक मेरा फोन क्राइम स्‍क्‍वाड के पुराने प्रभारी सत्‍येन्‍द्र पाण्‍डे से जुड़ गया था। सत्‍येन्‍द्र को मैंने कहा, कि डॉक्‍टर का सामान चोरी हो गया है। सारे पुलिस सुरक्षा-व्‍यवस्‍था में व्‍यस्‍थ है। तुम स्‍क्‍वाड के कुछ लोगों को यहां भेज दो। वो गाड़ी देखकर समझ जाएंगे और पुराने लिस्‍टेड लोगों को टटोल लेंगे। उसने घटनास्‍थल के बारे में पूछा और गाड़ी के बारे में। फिर उसने कुछ लोगों को भेजने की बात कही और हमसे वहीं रूकने के लिए कहा। थोड़ी देर बाद पुलिस का एक जवान जमील आया। वो मुझे पहचानता था। उसने गाड़ी को देखा। शीशे के टुकड़े देखकर बोला ये किसी नए आदमी का काम है। आसपास का ही होगा। मैं बस्‍ती में ढूंढ लेता हूं।

हम लोग सब अपने घर चले गए और दूसरे दिन शाम को डॉ. सतीष राठी का फोन आया कि एण्‍डोस्‍कोप मिल गया है। वहीं दिवाल के पास फेंक गया था चोर। तब तक जमील भी आकर बता गया था कि मिल जाएगा सामान। ब्रीफकेस नहीं मिला था। डॉ. सतीष ने मुझे धन्‍यवाद देना चाहा तो मैंने हंसकर टाल दिया। थोड़ी देर बाद डॉ. बल्‍लू का फोन आ गया। वो भी बोला यार अच्‍छा प्रेशर बना। साला चोर सामान फेंककर चला गया। तुम लोग का प्रेशर था तो सामान मिल गया। आम आदमी बेचारा थाने के चक्‍कर लगाते रहता। मैं थोड़ा भड़का और बोला देख बल्‍लू गलती तुम लोगों की है और नुकसान हुआ चोर का। उसने पूछा हमारी क्‍या गलती है। मैंने कहा सफेद शीशे वाली कार के अंदर चमचमाता ब्रीफकेस रखोगे तो नहीं चोरी करने वाला भी चोरी करने की कोशिश कर लेगा। उस चोर की सोच हज़ारों पुलिस की मौजूदगी में तुम लोगों की कार का शीशा तोड़कर उसने कितना बड़ा रिस्‍क लिया और उसे मिला क्‍या। एक ब्रीफकेस वो भी सामान निकालने के चक्‍कर में तोड़ दिया होगा। कार में ब्रीफकेस रखना ही है तो शीशे काले करो, वरना कोई चोर एकाध दिन रोककर गाली बकेगा साले कार में ब्रीफकेस ऐसा रखते हो जैसा लाखों का माल हो।

15 comments:

Gyan Dutt Pandey said...

चोर को वाजिब(?) मेहनताना शायद मिल गया चमचमाते ब्रीफ केस के रूप में!:)

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

सच है!!! और यही है भारत की कानूनी व सामाजिक व्यवस्था का सच!!!!!!........कड़वा सच!!!!!


प्राइमरी का मास्टर का पीछा करें

विष्णु बैरागी said...

रोचक वर्णन है । किन्‍तु यह भी सच है कि मामला किसी 'आम आदमी' का होता तो बात नहीं बनती । और हां, आपकी तरह मुझे भी चोर से ही सहानुभूति है । बेचारे का समय और श्रम व्‍यर्थ गया ।

Ratan Singh Shekhawat said...

थोड़ी देर बाद डॉ. बल्‍लू का फोन आ गया। वो भी बोला यार अच्‍छा प्रेशर बना। साला चोर सामान फेंककर चला गया। तुम लोग का प्रेशर था तो सामान मिल गया। आम आदमी बेचारा थाने के चक्‍कर लगाते रहता।

आम आदमी को पुलिस ही क्यों ये डाक्टर लोग भी क्या कम चक्कर लगवातें है अपने ऊपर गुजरती है तो इन्हे दुसरे विभागों का कर्तव्य तो याद रहता है लेकिन अपना कर्तव्य नही जानते | मेरी नजर में आजकल के डाक्टरों से पुलिस वाले फ़िर भी ठीक है उनसे बचा जा सकता है लेकिन डाक्टरों की लुट से नही | यदि डाक्टर सरकारी है तो आप इनकी बानगी सरकारी अस्पतालों में जरुर देखते होंगे और अस्पताल निजी है तो इनकी लुट आपको आसानी से दिख जायेगी जिस दिन आपका कोई जानकार निजी अस्पताल में भरती होगा |

गौतम राजरिशी said...

दिलचस्प वर्णन...नुकीले डायलाग

मजा आ गया पढ़कर

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

Anubhav bantane ke liye dhanyawad.

संगीता पुरी said...

रोचक वाकया और रोचक वर्णन भी।

राज भाटिय़ा said...

भाई अब बेचारे चोर को ढ्ढु कर थोडा मेहनताना तो दे देना चाहिये.

ताऊ रामपुरिया said...

बिल्कुल यही हालत है ! अगर जान पहचान है तो कोइ जमील आ जायेगा वर्ना तो सयानुसार केश दफ़न हो जायेगा !

राम राम !

PD said...

sahi hai ji..
mast kissa hai..
mere paas abhi to car nahi hai magar jis din car hogi us din main aage ka bhi shisha kaale me rangava lunga.. :D
abhi to bas apne papaji ko phone karne jaa raha hun ki apni car ko poora kala karva lijiye.. ;)

Arvind Mishra said...

बेचारा चोर - बद्दुआएं दे रहा होगा !

seema gupta said...

"ऐसा भी होता है!रोचक वर्णन "

Regards

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक है यह वाकया

COMMON MAN said...

किस्सा पढकर मजा आया, भाई रतन जी से पूरी तरह सहमत. बहरहाल, अब समझ में आ गया कि कैसे चोरी का सामान वापस मिल जाता है.

Rohit Tripathi said...

he he.. pahli baar suna ki chor saman chodkar briefcase mein hi khush ho gaya.. mazedar post

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