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Tuesday, April 7, 2009

कभी देखा है फ़ुलमालाओ को चलते हुये!

बहुत दिनो बाद कुछ पुराने दोस्तो से आज रात मुलाकात हुई।हाल-चाल पूछने की औपचारिकता पूरी किये बिना सभी ने कहा को कल यंहा आ जाना फ़लाने नेताजी के स्वागत का कार्यक्रम है।मैने कहा जब सुबह फ़लाने का स्वागत कर रहे हो तो शाम को ढिकाने का भी स्वागत कर दो।सब फ़ौरन तैयार हो गये फ़ौरन गज्जू उर्फ़ गजेन्द्र को 50 फ़ुलमाला के इंतजाम की जानकारी दे दी गई। मैने कहा इतने मे नही होगा।सबने कहा हो जायेगा।जब मै ज़िद पर उतर गया कि इतनी मालाओ मे काम नही चलेगा तो मेरे खास दोस्त जंयती ने कहा नही होगा ना तो माला चला देंगे।माला चला देंगे!मतलब।मेरे सवाल करते ही जयंती ने कहा कि कभी देखा है फ़ुलमालाओ को चलते हुये?नही ना कल आना और चलते हुये देख लेना।



अब तक़ मेरा दिमाग चकरा गया था।मै बोला जयंती साफ़-साफ़ बता ये चलने-चलाने का क्या चक्कर है?वो बड़ी सादगी से बोला कि हर स्वागत समारोह मे माला चल्ती है।ज़रा ध्यान से देखो तो माला को चल्ते देख सकते हो।मै अब तक़ चिड़चिड़ा गया था।इस बात को सब भांप गये थे।सब बोले!अबे माला कम पड़ती है तो पहनाने के बाद उतार कर रखी हुई माला को उठा कर पास कर देते हैं और वो माला कई हाथो से गुज़र कर वापस स्वागत के लिये तैयार लोगो को दे दी जाती है।ये सिलसिला चलता रहता है और इसी को कहते है कि फ़ुलमाला चलती है।समझा कुछ कि और डीटेल मे बताना पड़ेगा।



मै बोला समझ गया मगर यार उतरी हुई माला को दोबारा पहनाना,मुझे कुछ जमा नही।सब बोले क्यों?मै बोला उतरी हुई माला कोई किसी को पहनाता है क्या? सारे के सारे इतना सुनते ही मुझ पर टूट पड़े।बोले साले जेब से खर्च करके स्वागत करो उस पर भी हर आदमी ताज़ी माला पहनाये। चंदा-चकारी करके कार्यक्रम नही करवा रहे हैं,समझा।मै बोला फ़िर भी उतरी हुई……मेरी बात बीच मे ही काटते हुये गज्जू बोला कि ठीक है नही चलायेंगे माला,तू नेताजी से माला का खर्च दिलवा देना।मै बोला साले,मेरा क्या लेना-देना।तो वो बोला हमारा भी कोई लेना-देना नही हैं। नेताजी खुद डिमांड किये है कि यार तुम लोग चौक पर स्वागत करवा दो माहौल बन जायेगा।सम्झा खर्चा भी दे रहे थे मगर किसी ने लिया नही।इसिलिये माला चलायेंगे।



मैने आखिरी बार कोशिश की माला चलाने के तरीके का विरोध करने की मगर इस बार जयंती का गुस्सा फ़ट पड़ा।वो बोला ठीक है माला नही चलानी चाहिये मगर ये बता कि नेताजी कौन सा भगवान है बे?भगवान क्या वो तो ढंग का इंसान भी नही है।मेरा मुह मत खुलवा वो उतरी हुई फ़ुल्माला नही जूते की माला के लायक है।साले पूराने संबंधो और दोस्ती यारी के चक्कर मे माला से स्वागत कर रहे है सम्झा।जा जाकर बता देना चौक पर लड़के माला चलायेंगे आना होगा तो आयेगा,नही तो नही आयेगा। मामला बिगड़ते देख मैने फ़ौरन हथियार डाल दिये।मैने कहा अरे यार नाराज़ क्यो हो रहे मुझे मालूम नही था कि माला चलती है।सारे एक साथ बोले अब पता लग गया ना।मै बोला हां।सब बोले अबे सिर्फ़ अपने चौक या शहर का नही बल्कि सारे देश मे फ़ुलमाला चल्ती है,क्यो?क्योंकी पहनने वाले भी चालू टाईप के नेता ही होते हैं।

9 comments:

श्यामल सुमन said...

बहुत खूब। कहते है कि-

लोग जो दिल से उतर जाते हैं।
जिन्दा होते हुए भी मर जाते हैं।

और साथ ही -

मजबूरियाँ जम्हूरियत की देखो।
ताज को कातिल के सर पे रख दिया।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Arvind Mishra said...

अरे हाँ यह तो मुझे भी बहुत बुरा लगा भाई पर दुनिया बदल रही है -कूल डाऊन !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अनिल भाई, आजकल माला ही क्या बहुत कुछ चलता है। तमाशा घुस कर देखो तो सब पता लगता है।

ताऊ रामपुरिया said...

बिल्कुल गलत बात है ये.

रामराम.

परमजीत बाली said...

आज आपकी पोस्ट पढ कर एक पुरानी घटना याद आ गई।फिर कभी लिखूँगा।्वैसे इन नेताओ को जानना हो तो जरा किसी पार्टी का कार्य कर्ता बन कर देख ले। क्युंकि हम इस का अनुभव ले चुके हैं।इस लिए जानते हैं।सिर्फ माला नही अओर बौत कुछ भी चलता है।अच्छी व यथार्त पोस्ट लिखी है।बधाई।

डॉ .अनुराग said...

सब चलता है जी .......आज के ज़माने में.....नेता भी कल इस पार्टी में आज उस पार्टी में

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

मालाओं, बुके और मन्दिर में नारियल तो रीसाइकल होता ही है। उनके साथ भाव या श्रद्धा नये जुड़ते हैं या सब यन्त्रवत होता है - यह शोध का विषय है।

अनिल कान्त : said...

सब गोलमाल है ...सब गोलमाल है .....
सब चलता है :)

बी एस पाबला said...

सब चलता है अनिल जी!

इसीलिए सब कुछ रूका हुआ है!!