Tuesday, April 7, 2009

कम से कम अदालत के फ़ैसले का तो सम्मान करिये अरुंधतिजी

जन-सुरक्षा कानून के तहत बाईस महिनो से जेल मे बंद डा विनायक सेन की रिहाई की मांग के लिये राजधानी रायपुर मे हर सोमवार को प्रदर्शन का कार्यक्रम चलाया जा रहा है।इसी के तहत कल अरुंधति राय यहां आई और सरकार को कोस कर वापस लौट गई।उन्होने जेल मे बंद करने वाली सरकार पर तो जमकर आरोप लगाये मगर डा सेन को अदालत ने जमानत पर रिहा करने की अर्जी को नामंज़ूर क्यों की ,इस पर कुछ नही कहा। डा सेन की रिहाई की मांग करने वाले ये तो कहते है कि सरकार के पास उनके खिलाफ़ कोई ठोस सबूत नही है,फ़िर उन्हे जमानत क्यो नही मिल पा रही इस बात का उनके पास कोई जवाब नही है।मानवाधिकारो की वकालत करने वालो के पास शायद इस सवाल का भी जवाब नही होगा कि अदालत के फ़ैसले का सम्मान करने की बजाये उसके खिलाफ़ जन आंदोलन खड़ा करना या धरना-प्रदर्शन और रैली करना क्या अदालत के काम-काज को प्रभावित करने की कोशिश नही है?क्या ये अदालत की अवमानना नही है?डा सेन को रिहा कराने के लिये अदालत छोड़ आंदोलन का सहारा लेना कितना सही है?क्या अदालत के फ़ैसलो का सम्मान नही किया जाना चाहिये?क्या अदालत के फ़ैसले जो पक्ष मे आते हैं,या सरकारों,खास कर गुजरात सरकार के खिलाफ़ होते है,सिर्फ़ वे सही है?क्या अदालत के फ़ैसलो का सम्मान नही किया जाना चाहिये?

डा सेन की रिहाई की मांग के समर्थन मे अरूंधति राय भी कल यंहा आई थी।हर लेखक को समाज सेवा करना चाहिये,और इस मुल्क मे जो भी चल रहा है उस पर लिखा जाना चाहिये,पत्रकारो को भी लिखना चाहिये।ये सब कहा अरुंधति राय ने।कल पत्रकारो से बातचीत मे उन्होने हर किसी को समाज सेवा करने की सलाह दे ड़ाली। अब समाज सेवा कैसी होनी चाहिये,कैसे करनी चाहिये इन सब बातो के बारे मे तो कुछ नही कहा और तो और अपने रायपुर आने के प्रयोजन के बारे मे भी बहुत से सवालो का जवाब दिये बिना ही उन्होने जाने मे ही भलाई समझी।शायद उनके पास समय नही था।बस टोकन अटेंडेंस ज़रूरी थी जिस आंदोलन के लिये उतना ही समय इन्वेस्ट करके वे लौट गईं।



अरुंधति राय रायपुर आई थी जन सुरक्षा कानून के तहत जेल मे बंद डा विनायक सेन को रिहा कराने के लिये चलाये जा प्रदर्शन कार्यक्रम मे हिस्सा लेने।इसी बीच आयोजको ने मुझ्से संपर्क करके अचानक प्रेस कान्फ़्रेंस लेने की अनुमती चाही।मैने आनन-फ़ानन व्यवस्था करवाई।प्रेस कान्फ़्रेंस मे एक विचारधारा से जुड़े हुये कहिये या समर्थक़ कहिये,लोगो ने विनायक सेन की रिहाई की मांग की।उनमे अरुंधति राय के साथ शामिल थे डा सुभाष गोहळेकर,डा अभय शुक्ला और अनुराधा तलवार समेत कुछ और समाज सेवी। अनुराधा तलवार ने तो यंहा तक़ कह ड़ाला कि छत्तीसगढ के लोग आवाज़ उठाने मे डरते हैं।शायद उनके आंदोलन को वैसा सपोर्ट नही मिल रहा है जैसा उन्होने सोचा था।

अरुंधति से जब पूछा गया कि जिस डा विनायक सेन की रिहाई की मांग वे लोग कर रहे हैं,उनकी ज़मानत अर्जी अदालत से खारिज हो चुकी है,क्या कानून विशेषज्ञों से भरी उनकी टीम अदालत मे अपना पक्ष सही ढग से नही रकह पाई?इस बात का जवाब किसी के पास नही था,सो सवाल को जैसे तैसे टाला गया।सरकार को कोसने और राजधानी रायपुर मे बैठे-बैठे आदिवासियो के नक्सल विरोधी आंदोलन सलवा-जुड़ूम को कोसना तो उनकी मज़बूरी थी क्योंकि वे जिस को रिहा करने की मांग कर रहे है उन्हे नक्सलियो से संबंध होने के आधार पर ही गिरफ़तार किया गया है।उनका समर्थन करना है तो उनके विरोधियो का विरोध करना ज़रूरी हो जाता है।

डा विनाय्क सेन दोषी है या निर्दोष मै इस विषय पर कुछ नही कहना चाहता क्योंकि ये काम अदालत का है।लेकिन मेरा सवाल ये है कि न्याय प्रक्रिया पर पूरा-पूरा विश्वास रखने वाले संगठन और न्यायपालिका से रिटायर विशेषज्ञो से ज़ुड़े संगठन उनकी अदालत से रिहाई कराने की बजाये धरना-प्रदर्शन और रैलियो का सहारा ले रहें है।मेरा एक सवाल ये भी है क्या अदालत के फ़ैसले के बाद उस फ़ैसले का सम्मान करने की बजाय उसके खिलाफ़ धरना-प्रदर्शन कर जन-आंदोलन खड़ा करना क्या अदालत पर दबाव बनाना नही है?क्या ऐसे मे उनकी रिहाई के लिये देश-विदेश से मांग उठना अदालत को प्रभावित करने के प्रयास नही माने जा सकते?क्या ये विरोध प्रदर्शन अदालत की अवमानना नही है?और भी बहुत से सवाल हैं जो मेरे मन मे उमड-घुमड़ रहे हैं,जिन्हे फ़िर कभी और रखूंगा आप लोगों के सामने।

16 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

अरंधुति राय के विचार और विक्षिप्ति में कोई अंतर नहीं है। एसे लोग....

Nitish Raj said...

मुझे ये भी लगता है कि टोकन एटेंडेंस के लिए शायद इन्हें टोकन अमाउंट भी मिलता होगा। देखिए अनिल भाई ये आप भी जानते कि इनका पूरा ये टूर स्पोंसर होता है। इन्हें सिर्फ आना है दो बातें कहनी हैं लोगों को उकसाना है और चले जाना है। यदि आप बात की सतह तक जाएंगे तो ये हत्थे से उखड़ जाएंगे। लेकिन दुख हुआ ये जानकर कि हम प्रोब्लम को सही ढंग से पेश नहीं करते और उसके हल भी सही ढ़ंग से नहीं सामने लाते।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बिल्कुल ठीक कह रहे हैं. लेकिन इन वाम-मार्गियों को कौन समझाये.

अनिल कान्त : said...

aapki baat mein dum hai ...yakeenan vicharneey vishay hai

Suresh Chiplunkar said...

अरुंधती रॉय की "समाज सेवा" का मतलब अब भी नहीं समझे आप? समझ तो गये होंगे, लेख के अगले भाग में खुलकर बताईये… और अब आप तो अरुंधती के पास बैठकर बतियाने का सौभाग्य(?) भी प्राप्त कर चुके…। प्रेस कांफ़्रेंस का विषय सिर्फ़ छत्तीसगढ़ ही था वरना निश्चित ही आप उन जैसी महान लेखिका से "कश्मीर" पर भी उनके सेकुलर विचार जान लेते… :)

Sanjeet Tripathi said...

बहुत सही बात।

एक बात और जो मैं हमेशा कहता आया हूं। इन समाजसेवियों (?) बुद्धिजीवियों (?) को क्या नक्सलियों की हरकतें ऐसी नहीं लगती कि उसके खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया जाए??

वैसे एक बात बताई जाए पुसदकर जी, अधिकतर कुर्ता पहनने वाला बंदा अरूंधति रॉय के आने की खबर सुनकर बकायदा शर्ट-पैंट और वह भी जेब में गॉगल रख के बैठा है वाह वाह जी क्या बात है ;)

सई है जी सई है। आंखों में आंखें डालकर बात आय हाय, क्या कैने जी क्या कैने ;)

Nirmla Kapila said...

aaj hamara desh aise logon ki vajah se hi peechhe rah gaya apna naam chamkaane ke liye ye log kuchh bhi kar dete hain apne sahi likha

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अनिल जी, इस मामले में आप से और सभी टिप्पणीकारों से असहमति है।

वास्तविकता यह है कि जिस विशेष अधिनियम का प्रयोग बिनायक सेन को बंद रखने के लिए किया गया है उस में अदालत को जमानत लेने का अधिकार नहीं है। इसलिए कोई अदालत जमानत पर विचार कर ही नहीं सकती। अदालत का निर्णय केवल सबूतों और गवाहियों के आधार पर ही होगा।

सुप्रीमकोर्ट का निर्णय बिनायक सेन के मामले में मेरिट पर नहीं है, केवल यह है कि अदालत इस मामले पर विचार ही नहीं कर सकती। इसलिए बिनायक सेन की रिहाई का कोई भी आंदोलन सिर्फ सरकार के विरुद्ध ही हो सकता है। उस से किसी अदालत का सम्मान और असम्मान नहीं हो सकता।

मेरे मत में इस तरह का कोई भी कानून एक जनतांत्रिक समाज के लिए अभिशाप है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सरकार की प्रशासनिक व राजनैतिक असफलता का प्रतीक। यह कानून इतना खतरनाक है कि सरकार बदल जाने पर वर्तमान मुख्यमंत्री को इस के तहत गिरफ्तार कर लिया जाए तो कोई भी अदालत उन की भी जमानत का आदेश नहीं दे सकेगी।

रौशन said...

दिनेश जी ने बात स्पष्ट कर दी है तो हमारे कहने के लिए कुछ बचा नहीं है.
वैसे हम नहीं मानते अनिल जी कि दिनेश जी ने जो कुछ कहा वो आपको पता नहीं था

Anonymous said...

क्या ये वही अरुंधती है जिन पर दिल्ली में जूते पड़े थे?
यदि हां तो वह सही ही हुआ था।

P.N. Subramanian said...

उस कानून के बारे में भी द्विवेदी जी बताते तो अच्छा रहता. क्या वह कानून राज्य शासन के द्वारा प्रायोजित था और था तो क्या उसके लिए केंद्र शासन की सहमति नहीं थी?

NIRBHAY said...

Dwidedi Sahab 100% sahi hai, mere muh ki baat chhin lee.

Baat agar is Act ke misuse ki hai toh Aandolan karna State ke viruddh hoga kyon ki yeh case state V "anyone" hee hoga. Agar is "anyone" ke liye National level ke social worker agiatate kar rahen hai jo kee Kanoon ke jankar hai, toh woh is-se Society/Jantantra ke virudh bane Act me Merrit dalne ka prayatna kar rahen hai likewise Jaise POTA kanoon hataya gaya tha.
....NAXALISM & COMMUNISM ek bahoot hee "KHATARNAK" rasta hai, jiski roots "JAD" buddhi ke logon ki paidaiesh hai, na yeh salon se chale aa rahe Religious thoughts & Religion ko mante hai na hee sahi mayne me Manav Samaj kee unnati jo kee Manav Samaj ke fertile brain kee upaj hai jis-se naye naye aadhunik avishkar hue aur aaj hum chand tak pahunch paye unko. Inka rasta "Dande" se bhi nahi Bandook aur "KHOON" baha kar uddeshya prapti karna hai, yeh thoughts Human being ke fundamental want & desire ke viprit jata hai aur baad me khud apne ko bhee sambhal nahi paata. Stability laane inko Bandook aur "daman" ka upyog karna padta hai.
Isko dabane ke liye kisi vishesh Act kee jarurat nahi hai, bus aap police ke hath khol do bahoot hai.

mai yehan par internet ke wikipedia se sabhar liya hua ek paragraph paste kar raha hun use padhiye kyon hataya gaya POTA woh uska karan bata raha hai, Kya Wkipedia par koi jurm darj hoga? ab aap log bata sakten hai. nimnanusar hai:-

"Once the Act became law there surfaced many reports of the law being grossly abused.[3] Claims emerged that POTA legislation contributed to corruption within the Indian police and judicial system.[4] Human rights and civil liberty groups fought against it. The use of the Act became one of the issues during the 2004 election. The United Progressive Alliance government of India committed to repealing the act as part of their campaigning. On October 7, 2004, the Union Cabinet approved the repeal of POTA.[5]. However, after the Bombay attacks of November 26, 2008 parliament enacted another anti terror law known as Unlawful Activities (Prevention) Act.[citation needed]"

बी एस पाबला said...

हम तो संजीत जी की बात को बढ़ाते हुए पूछ रहे हैं कि आप इतना नाराज़ क्यों दिख रहें हैं बतियाते हुए? क्या संजीत ने पहले ही कुछ कह दिया था?

विषय पर टिप्पणी इसलिए नहीं कि, द्विवेदी जी कह चुके वह बात्।

अल्पना वर्मा said...

aap ne likha-समाज सेवा कैसी होनी चाहिये,कैसे करनी चाहिये इन सब बातो के बारे मे तो कुछ नही कहा और --- बहुत से सवालो का जवाब दिये बिना ही उन्होने जाने मे ही भलाई समझी।शायद उनके पास समय नही था।-

--*-समय कैसे होगा ??सेलेब्रिटी जो हैं..[समाज सेविका???]

Anonymous said...

What a pity that you don't have the guts to publish true comments. You only have space for comments suiting your taste. अगर दम है तो कभी तो सच्चे लोगों को भी जगह दे अनिल जी...

PrashantSoni said...

hinsa hinsa ko badati hain...

naxalism agar ik samasya hain to ise isake sampoorn swaroop main dekhana hoga..
yah koi bahar se prayojit desh par hamala nahi hain..
aur mujhe lagata hain ki ik doctor se achhha pesha shayad hi koi ho gaon aur jangalo main rah kar vahan ki samasya ko first hand janana aur logon se milana..

ho sakata hainn ki Naxaliyon se bhi bate hui ho..par bahut se naxali gaon ke berojgar aadami hain .. yah to govt ka tucchhapan hain ki kuchh na kuchh to karana hain to Vinayak sen ko hi jel main dalo..
aise kanoon banao ki 1-2 sal tak poochhtachh chalatee rahe..

aur fir naxalism kahan hain kerala mainn to nahi ..vahan to log apane adhikar janate hain ..politically active hain, aur united hain, press active hain, ik barish main bahane vali sadako ki photo turant local news paper main aa jati hain, saraki engg.ka naam , contractor ka add. aur kitane karor ka project tha in sab details ke sath... aur rasta rok diya jata hainn..lal jhande , loud speaker aur lambi railly ..lagata hain ki chunav aa gaya...

Jharkhand, chhattisgarh, andhra, bihar yahin hain na naxalism...
sabase jyada garib, anpad aur seedhe log...aur sabase jyada resourceful...

truth is govt/politician/ppl with power, can easily supress, extract whatever last drop of resource and there is no guidance available for people ( loss of leadership) & this vaccume, alas, is getting filled by naxalism..

Now my question is if not vinayak sen ...who is more qualified /interested to be there and unnderstand what exactly is the problem..???

It is our duty to protect our basic rights..so that our next generation lives in a free n fare society..

to anil ji main dinesh rai diwedi ki bato se sahmat hoon..aur mudda agar arundhanti rai ka hain to ye to gair baat hui..