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Sunday, June 21, 2009

तक़दीर वाला है यार वो, अपने नसीब मे ये सुख कंहा!

तक़दीर वाला है यार वो, अपने नसीब मे ये सुख कंहा!रात सब इक्कट्ठा हुये तो एक साथी बोला।मैने कहा क्या बात है।वो बोला महाराज आपके मतलब की बात नही है।मैने कहा तक़दीर और सुख,ये दोनो मेरे मतलब के नही है,ये क्या बकवास है।सब हंस पड़े बोले महाराज जाके पांव न फ़ंटी………वो सब मै जानता हूं डायरेक्ट बोलो डायरेक्ट,समझे।

और फ़िर जो बात सामने आई,मै सर पीट कर रह गया।तक़दीर वाला यार इसलिये अचानक तक़दीर वाला हो गया क्योंकी उसकी बीबी मायके चली गई थी,वो भी पूरे एक महिने के लिये।बस इसिलिये वो उसकी तक़दीर जाग गई थी सबकी नज़र में।मैने पूछा चलो मान लिया कि वो तक़दीर वाला है मगर अपने नसीब को तुम लोग क्यों कोस रहे हो।वो बोला काहे खाज़ को और खुजला रहे हो।मैने कहा नही क्लियर तो करना पड़ेगा। अबे यार तू पहले शादी कर ,फ़िर सब खुद ही समझ जायेगा।इस बार मैने भी पलट कर जवाब दिया कैंसर का इलाज करने के लिये कैंसर का मरीज तो नही होना पड़ता है ना।सारे के सारे एक साथ बोले काहे सब का मूड खराब कर रहा है,उसकी आज़ादी का जश्न मनाने चल रहे हैं उसके घर,वंही उससे पूछ लेना,वही बतायेगा तो ज्यादा ठीक रहेगा।

सब अपने दोस्त के घर पंहुचे।चोरी छुपे सिर्फ़ कम खुश्बू(बदबू कहुंगा तो सारे नाराज़ हो जायेंगे)वाली वोद्का के दो पैग मार कर दो बड़े-बड़े खुश्बुदार पान चबा कर घंटो इधर-उधर मटरगश्ती करने के बाद घर जाने वाला पहले से ही टुन्न हुआ बैठा है।मै हैरान था।मैने कहा महाराज क्या बात है आज तो गाड़ी फ़ुल स्पीड मे चल रही है।उसने ज़ोर से ठहाका लगाया और कहा आज स्पीड ब्रेकर भी तो नही है।आज अपुन आज़ाद हैं।इस्लिये तो घर पर ही जश्न मना रहे है।नही तो आप को मालूम ही है हाल हमारा। बीबी जी रहती है तो घर मे सरकार तो उन्ही की चलती है ना।तब यंहा पीना तो दूर पीकर आने से पहले कई बार सोचना पड़ता था।अबे ला बे,प्लेट-व्लेट,गिलास-फ़िलास ला।ज़ल्दि लाना बे,तेरी मालकिन का राज नही है समझा।सब हंसे बोले बहुत अकड़ के आर्डर दे रहे हो महाराज।ये स्टाइल तो सिर्फ़ दफ़्तर मे ही दिखाते थे। यंहा कभी-कभी मौका मिलता है।सब साले मैडम के चम्मच है हरामखोर महीने भर मे सब को ठीक कर दूंगा, अबे ला बे,मर गया क्या साले।

नौकर दौड़ता-गिरता-पड़ता सेवा मे लग गया।सबने पूछा देखा बे है ना अपना भाई तक़दीर वाला। अब महीने भर जब जिसको जी चाहे बिना पासपोर्ट और वीज़ा के यंहा आ सकता है।नो चेक पोस्ट,नो बैरियर,समझे।मैने कहा,वो तो मै देख ही रहा हूं।मगर तुम लोग की किस्मत क्या फ़ूटी हुई है जो रो रहे थे?अबे कभी जाते देखा है महिने भर के लिये मेरी बीबी को मायके।तो क्या हुआ? तू थोड़ा कम दिनों के लिये खुश होता होगा।अबे मूर्ख,तू तो जानता है ना मेरा ससुराल लोकल है।तो?तो क्या बे, सुबह जाती है मेरे दफ़्तर जाने के बाद और शाम को लौट आती है मेरे दफ़्तर से आने से पहले।क्यों?अबे ये भी क्या मैं बताऊं?तू तो आते जाते रहता है ना,देखा नही है क्या हमारे घर की कामवालियों को।वो अनुपमा नही बे?वो सब समझती है?वो नही चाहती है नज़र चुकी और एक और शाईनी तैयार्।

मै बोला साले कमीनो!अगर भाभी तुम लोगो पर नज़र रखती है तो किस्मत खोटी कहते हो। और मायके चली जाये तो खुद को आज़ाद कहते हो!इतना ही कष्ट था तो शादी ही क्यों की बे?इस बार डाक्टर बोला इसिलिये तो कह रहे है बे तू भी कर के देख ले।सब समझ मे आ जायेगा,लेकिन तेरी तो पहले से…अबे चुप।इसमे मेरी शादी का मामला कंहा से घुस आया।बेटा ये जो टांय-टांय करता रहता है न चौबीस घण्टे सब बंद हो जायेगा।बोलती बंद हो जाती है अच्छे अच्छों की।और घर जाने की हड़बड़ी करने वालो को जो तू कहता है ना अपन तो भैया जब मर्ज़ी तब घर जाते हैं किसी से डरते नही,ये डायलाग भूल जायेगा।साले हम तो ग्यारह बज़े तक़ टाईम निकाल लेते है तू तो दस बज़े भाग जायेगा।मैने कहा अबे मै तुम लोगो जैसा डरपोक नही हूं। अबे शुरू-शुरु मे सब भागते है घर की ओर बाद मे सब गीदड़ हो जाते हैं।

तभी महीने भर के लिये आज़ाद हुये साथी ने कहा यार ये किच-किच सुन कर तो ऐसा लग रहा है कि मेरी कोकिला घर पर ही है।अगर तुम लोगों को यही बकवास करके मुझे मैडम के डरावने सपने ही दिखाना है तो मुझे माफ़ करो मै अकेला ही पी लूंगा और जंहा चाहे लुड़क जाऊंगा।फ़िलहाल कोई प्राब्लम नही है।सब ने एक स्वर मे कहा इस मामले मे अब सिर्फ़ वही बात करेगा जिसकी शादी हो चुकी हो।फ़ाल्तू लोगों को इस सेंसेटिव्ह टापिक पर बात करने का कोई हक़ नही है।ये हुई ना बात।सब एक साथ चिल्लाये।अबे कंहा मर गया ज़ल्दी ला वीकनैस लग रही है,ला हमारा इलेक्ट्रोलाईट तो ला।मै सोच रहा था कि क्या वाकई बीबी का मायके जाना आज़ादी से कम नही होता।

14 comments:

परमजीत बाली said...

एक कुँवारे कि पीड़ा को अच्छा ब्यान किया है।शादिशुदा लोगो के बीच में उसे कैसे चुप करा दिया जाता है।अब तो यही उचित है कि उन की आजादी वाली बात चुपचाप मान ही ली जाए।:)
बढिया लिखा।बधाई।

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

भई, हमें तो जब बीवी और बच्ची घर में हो तो ही घर घर लगता है.

ali said...

गुलामी ? मित्रों की , स्वेच्छिक है , उन्होंने लपक कर खुद से ओढी थी और आगे भी प्रेम से करेंगे !

मसला आजादी का नहीं बल्कि रूटीन तोड़ने का है ! कुछ पुरानी यादों को ताज़ा करने का है जोकि गुलामी ? के ट्रेक में फिट नहीं बैठती ! रूटीन और मोनोटोनी इंसानों को रास नहीं आते इसलिए रूटीन टूटने से उन्हें आजादी का अहसास हो जाता है !

अनिल भाई अब आप भी रूटीन तोड़कर शादी करलें !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यह भी एक अजीब मानसिकता है। पता नहीं कैसा महसूस होता है जब पत्नी मायके चली जाती है। हमें तो ऐसा अवसर बरसों से नहीं मिला। हाँ जब वो जाती है तो हम भी अक्सर साथ ही होते हैं।

दिगम्बर नासवा said...

पत्नी के मायके जाने के बाद भी क्या सचमुच आजादी मिलती है............... मुझे तो लगता है शादी हुयी तो आजादी ख़त्म

Mahesh Sinha said...

भुट्टो ने कहा था " आदमी जब तक अकेला है तब तक ही इमानदार रह सकता है शादी के बाद ये संभव नहीं है " अब ये तो वही जाने किस ईमानदारी की बात कह गए . ::)))))))))))))

राज भाटिय़ा said...

अरे मै तो क्या मेरे बच्चे भी इस बात को सोच कर ही डर जाते है कि मां मायके जा रही है, या बिमार है, असल मै हम सब को मेरी वीवी ने अपनी इतनी आदत डाल दी कि उस के बिना हमे अपनी जिन्दगी सूनी सूनी सी लगती है, बस उस के बिना हम गुलाम है, ओर जब वो है तो सब बहुत आजाद है,
लेकिन आज तक जब से शादी हुयी हम कभी अकेले कही नही गये, बस दो बार को छोड कर, जब पिता जी गुजरे ओर पिछले महीने,
अब हमे आप वीवी का गुलाम भी कहले.
लेकिन आप की यह पोस्ट अच्छी लगी मित्रो की महफ़िल, ओर मजाक साथ मे वोदका ( इतनी गर्मी मै) बाप रे बाप.

धन्यवाद
मुझे शिकायत है
पराया देश
छोटी छोटी बातें
नन्हे मुन्हे

P.N. Subramanian said...

भाई मजा आ गया. हम लोगों की बैठक भी ऐसी ही होती है.

Arvind Mishra said...

मूड में है इन दिनों पुदसकर जी ! यह सख्यपन बना रहे और क्या चाहिए इस जिन्दगी में !

ताऊ रामपुरिया said...

भाई हमको तो बिना दो लठ्ठ खाये नींद ही नही आती और उसके अलावा और किसकी हिम्मत है कि हमको लठ्ठ मारे...अब आगे आप ही समझ लो..इसीलिये बार बार आपको समझाते रहते हैं:)

रामराम.

अन्तर सोहिल said...

अजी आदत डल जाती है गुलामी की भी, अब तो साल भर में जब कुछ दिन आजादी मिलती है तो बिल्कुल अच्छा नही लगता।
वैसे वहां से भी रोज फोन कर-कर के याद दिलाती रहती है कि मुसिबत टली नही, जल्दी वापस आने वाली है। हा हा हा हा
नमस्कार

Science Bloggers Association said...

100 प्रतिशत सहमत।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

PD said...

Malik... ab bhi der nahi hui hai... jaldi kijiye jo bhi karna hai.. :)

कार्टूनिस्ट अजय सक्सेना said...

भैय्या मेरी ससुराल तो भिलाई में है ..मेरी वाली तो सुबह जाती है शाम को आ जाती है ...बू ..हु ..हु ..हुहुहुहुहुहुहुहुहुहुहुहुहुहु