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Saturday, September 12, 2009

बैलगाडी के नीचे वाले कुत्ते,कभी न बदलने वाला सिस्टम और भ्रम मे जीते पत्रकार!

आज कुछ साथियों ने बड़े अख़बार की नौकरी छोड़ कर एक छोटे अख़बार मे नौकरी कर ली।उनमे से कुछ ने मुझसे सलाह भी ली थी और उनके इस फ़ैसले पर आज कुछ लोगो ने आश्चर्य जताया और कुछ ने नाराज़गी।कुछ ने तो मुझे ही जली कटी सुनाई और कहा कि आपने मरवा दिया उनको।मुझे समझ नही आया की छोटे अख़बार मे ज्यादा वेतन मिलना गलत है या ज्यादा बड़े अख्बार मे कम वेतन मिलना।

बेमतलब की बहस भी लगता है कि अब पत्रकारिता का हिस्सा हो गई है।या फ़िर लगता है कि आखिर पत्रकार अपने भीतर धधक रहे ज्वालामुखी को दबाये रखे भी तो कैसे?उसे अपना गुस्सा कंही न कंही उतारना होता है।घर मे तो बस चलता नही,दफ़्तर मे भी कमोबेश यही हाल है,खबर पर भारी विज्ञापन है और जब न घर और न दफ़्तर तो फ़िर बस एक ही जगह बचती है,वो दोस्तो की मह्फ़िल्।बस आज भी घर,बाहर और दफ़्तर से आये दबे-कुचले लोगो का गुस्सा फ़ट पड़ा था।

सबने मुझे घेरा और कहा कि आपने उन्हे रोका क्यों नही?क्या भविष्य है उस अख़बार का?मै भी अब तक़ भीतर के गुस्से को जुबां पर आने से रोकते-रोकते थक़ गया था।मेरा भी गुस्सा आखिर फ़ट पड़ा और मैने उनसे ही पूछा किसका भविष्य और कैसा भविष्य?पत्रकार साला सारी दुनिया मे हो रहे अन्याय के खिलाफ़ झंडा उठाये घूमता है और अपने लिये?क्या कर पाता है वो अपने और अपने परिवार के लिये?कुछ नही करता तो तुम लोग गाली बकते हो साला ईमानदारी मे मर गया और कुछ करने लगता है तो भी गालियां बकते हो साला दलाली मे मर गया।अब इन लोगो मे नौकरी छोड़ी तो तुम लोगो को तक़्लीफ़ की वर्षों की नौकरी क्यों छोड़ी ?और नही छोड रहे थे तो भी तुम लोगो को तक़्लीफ़ थी कि सालो से घिस रहे और जब देखो बाहर से लाकर सिर पर साहब बिठा दिया जाता है?

वेतन कम मिल रहा था तो भी तुम लोगों को तक़लीफ़ थी और अब ज्यादा वेतन मे दूसरी जगह गयें है तो भी तक़लीफ़ है।बात दरअसल वो नही है भैया,एक ने हिम्मत करके मुझे टोका।मैने पूछा तो क्या बात है?बात बड़े बैनर की है।बड़े बैनर की सुनवाई तो होती है,छोटे अख़बारो मे लिखी खबर का असर तो दूर उसका क्या हश्र होता…अच्छा तो ये बात है।मैने कहा कि कितने बड़े बैनरो ने सरकार के खिलाफ़ खुलकर लिखा है।फ़ुल पेज विज्ञापन के साथ-साथ हाफ़ पेज राईट-अप का पैकेज सुना है ना।अब तो संपादक भी जनसंपर्क विभाग की मरज़ी पर टिके हुये हैं।खबर पर विज्ञापन भारी है।और फ़िर किस बड़े बैनर के अख़बार के अलावा दूसरे धंदे नही है।किसी का कोल ब्लाक है,किसी का पावर प्लांट,किसी को रियायती मूल्य की जमीन पर कमर्शियल काम्प्लेक्स बनाना है तो किसी को बेहिसाब विज्ञापन चाहिये।

मालिक मोटी कमाई के पीछे लगा हुआ है।पत्रकार उसके लिये एक कलम से ज्यादा कुछ भी नही है।रूकी तो झटक कर देखता भी नही कि कंही कोई कचरा तो नही आ गया।तुरंत बदल देता है।मालिक प्रोफ़ेशनल है और तुम लोग यानी पत्रकार इमोशनल।ऐसे कैसे चलेगा?पत्रकार को अगर ज्यादा वेतन मिल रहा है तो उसे तत्काल अख़बार बदल लेना चाहिये।रहा सवाल गारंटी का तो वो तो ज़िंदगी की भी नही है।और बात बैनर की तो क्या बदला है आज तक़ इस देश मे।कब से निकल रहे हैं अख़बार्।ये तो गनिमत है कि आज़ादी की लड़ाई के समय आज के मालिको के अख़बार नही निकलते थे वरना सब के सब क्लेम कर देते की अंग्रेज़ बापू से नही उनसे डर कर भागे है। हर अख़बार अपनी खबर के असर का दावा करता।

सालो से अख़बार निकल रहे है,सब छप रहा है और सब कुछ वैसा का वैसा ही चल रहा हैं।न सडक बदली,न स्कूल और नही गरीबी हटी।सिस्ट्म जैसा था वैसा ही है और पत्रकार उसे तो लगता है भ्रम मे जीने की आदत पड गई है।ये बदल दूंगा,वो बद दूंगा,मोटर साईकिल के पुराने टायर तो बदल नही पाता और सिस्टम बदलने की बात करता है।एक बात जान लो जो कुछ होता है वो सिस्टम के मुताबिक होता है । बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते को देखा है ना उसे भ्रम रहता है कि बैलगाड़ी उसके दम पर चल रही है,मगर गाडी के आगे निकल जाने पर उसे हक़ीक़त का पता चलता है मगर हम लोगो को तो तब भी नही क्योंकी हम लोगो को भ्रम मे जीने की आदत पड़ गई है।

26 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप ने हकीकत बयान की है। फिर भी न समझें तो उन्हें कौन समझा सकता है?

A desk of An Artisan said...

aneel bhai,aaj ye hi ho rha hai,bade akhbaron se khabre gayab hai aur kaya bhara hai,ye aap jante hai,aj subah mai soch raha tha pahle har akhbar me "kavita" chhapti thi aur ham likh kar bhejte the,lekin ab jagah vigyapan ke liye hi nahi milti to ye kavitayen kahan se chhpengi,aur mene bhi akhbaron me kam kiya hai,lekin kuch sal bas,aapke sath mai lagbhag 6 mah sandesh bandu me bhi raha hun,
aapki bhadas sachchi hai.

वेद रत्न शुक्ल said...

बहुत खूब!

राज भाटिय़ा said...

आप से सच का आईना दिखा दिया, बहुत सुंदर लिखा अब लोग ना समझे तो चले बेल गाडी के नीचे ही.
धन्यवाद

अनिल कान्त : said...

aapne bilkul durust farmaya

Udan Tashtari said...

सच कह रहे हैं हम सभी भ्रम में जी रहे हैं. अच्छा आलेख.

संजय तिवारी ’संजू’ said...

आपकी लेखन शैली का कायल हूँ. बधाई.

Dr. Mahesh Sinha said...

विचित्र किन्तु सत्य

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

यह व्‍यवस्‍था की हकीकत है. पत्रकारों के निजी व्‍यक्तित्‍व और उनकी सोंच में हो रहे या हुए परिवर्तन की खुली किताब.

नये पत्रकारों के लिए एक संदेश भी है यह.

धन्‍यवाद भईया.

Vivek Rastogi said...

बिल्कुल सही अनिल भाई पर यह हालात केवल समाचार पत्र जगत की नहीं है, मैं सोफ़्टवेयर क्षेत्र में कई सालों से हूँ यहाँ भी वही हालात है, बड़ी कंपनियाँ पैसा देने में अचकचाती हैं वे कहती हैं कि हम तुम्हें ब्रांडनेम दे रहे हैं और क्या चाहिये पर छोटी कंपनियाँ पैसा ज्यादा देती हैं और जिम्मेदारी भी, तो कम से कम अपने को संतुष्ट रख सकते हैं।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

संवाददाता अब विज्ञापन संकलन कर्ता से ज्यादा नहीं

Ghost Buster said...

"खबर पर विज्ञापन भारी है।"

बिल्कुल यही बात है. बहुत अच्छे से खबर ली है आपने.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

अनिल जी खरा-खरा पर १००% सही बात कही है | बड़े बड़े मीडिया मालिकों ने इतना गंध फैला रखा है की अब बर्दास्त से बहार हो रहा है | इसीलिए बुद्धिमान लोग इन्टरनेट की सरन मैं आ रहे हैं |

ज़बरदस्त लेखन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |

cmpershad said...

मसिजीवी भ्रम में जीता है और भ्रम में ही मर जाता है। समाज को बदलने की बात करता हुआ संघर्षरत रहता है और जब कुछ नहीं बदलता तो....????

ताऊ रामपुरिया said...

भाई सोते हुये को तो जगाया जा सकता है पर जो जानबूझकर सोया हुआ हो, उसको कौन जगा सकता है?

रामराम.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

ताऊ रामपुरिया ठीक कह रहे हैं.

संजय बेंगाणी said...

सामने दर्पण धर देना वर्जित है...आप समझते ही नहीं....

jayanti jain said...

situations r same in life at other fields also

संदीप शर्मा said...

bilkul hakikat yahi hai...

प्रवीण शाह said...

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नहीं अनिल जी,

मैं इतना पेसिमिस्ट नहीं, कलम बदलती है बहुत कुछ, भले ही धीरे धीरे होता हो यह बदलाव...
देहात का गरीब आज भी अगर सुनवाई न हो तो स्थानीय पत्रकार के पास जाता है और अगर खबर छपी तो कुछ राहत तो मिलती ही है उसे...

एक बात और कहूंगा कि पत्रकार का काम अपने आंखों देखे को जस का तस लिखना है बिना तोड़े मरोड़े और बिना कोई वैचारिक या सैद्धान्तिक मिलावट के, सिस्टम बदलना हो तो राजनीति सही साधन है।

बी एस पाबला said...

एक कड़वी सच्चाई लिए भ्रम की दास्ताँ

बात तब बनेगी जब, इंटरनेट पर विज्ञापनों से कमाई शुरू होगी।

वो दिन आने ही वाला है :-)

बी एस पाबला

Anil Pusadkar said...

प्रवीण भाई मै एक सत्ता परिवर्तन की साजिश के भंडाफ़ोड़ का सूत्रधार रहा हूं लेकिन क्या हुआ सी बी आई ने उस महत्वपूर्ण केस को चलाने लायक समझा ही नही। अब इसे क्या कहेंगे?

Anil Pusadkar said...

पाब्ला जी आपके मुंह मे बीयर और रम।घी-शक्कार तो आजकल असली आ नही रही है इसलिये।वैसे कब हो रही है कमाई ब्लाग से बताईगे ज़रूर्।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...

cg4bhadas.com said...

" ये तो गनिमत है कि आज़ादी की लड़ाई के समय आज के मालिको के अख़बार नही निकलते थे वरना सब के सब क्लेम कर देते की अंग्रेज़ बापू से नही उनसे डर कर भागे है। हर अख़बार अपनी खबर के असर का दावा करता। " और अख़बार भी स्वतंत्रता संग्राम की सूचि में शामिल होते ? बहुत सही कहते है यह सच है की सब कुछ बदलने की हसरत से शुरवात होती है पत्रकारिता की , रुदाली सा जीवन और जन सम्प्रेष्ण का झंडा पर अंत भयावह ,

shubham said...

bhaiya pranam

bahut achha bhaiya