Friday, March 12, 2010

थानेदारों को भ्रष्ट कहना आपकी ईमानदारी नही बेबसी का सबूत है गृहमंत्री जी!

छत्तीसगढ के ग़ृहमंत्री ने विधानसभा में ये कह कर सब को चौंका दिया कि थानेदारों को दस हज़ार रूपया महिना बंधा है।वे अवैध शराब की बिक्री को संरक्षण दे रहे हैं।अब बताईये भला ये बयान क्या काफ़ी है।बात तो होती जब गृह मंत्री भ्रष्ट थानेदारों की सूची या एकाध नाम सामने रखते और उनहे सज़ा देकर बाकी लोगों को सुधरने की चेतावनी देते।

अफ़सोस ऐसा नही किया मंत्री ने।वे तो बस बोले चले गये और बात-बात पे हंगामा करने वाला विपक्ष भी उनकी बात को सुनता रहा और सब मिलकर तालियां बज़ाते रहे।किसलिये कि प्रदेश में भ्रष्टाचरियों का बोलबाला है?किसलिये,कि गृहमंत्री भी भ्रष्ट थानेदारों तक़ का कुछ नही बिगाड़ सकती?

अपने क्षेत्र मे अवैध शराब की बिक्री न होने की घोषणा मंत्री ने बड़े गर्व से की।तो क्या वे सिर्फ़ अपने विधानसभा क्षेत्र के ही मंत्री हैं?क्या प्रदेश के अन्य हिस्सों से उन्हे कोई लेना-देना नही है?मेरा ये सवाल है कि अगर आप अपने क्षेत्र को सुधार सकते हो तो दूसरे क्षेत्र को भी ठीक कर सकते हैं।अगर आप ऐसा नही कर रहे हैं तो ये आपकी अक्षमता ही मानी जायेगी ना कि ईमानदारी।
मंत्री जी अगर आप ये मान रहे हैं कि थानेदारों का महिना बंधा है और अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नही हो रही है तो ये भी अपने आप मान लिया जायेगा कि वे भी कंही न कंही महिना दे रहे हैं।लेने वाला कोई भी हो सकता है?अगर आप कहें कि मैं नही लेता,अगर लेता तो उन्हे गालियां कैसे देता?तो मान भी लेंगे कि आप नही लेते।मगर कार्रवाई क्यों नही करते ये सवाल तो खड़ा ही है ना?आप नही लेते होंगे? तो भाई-भतीज़े लेते होंगे? नही तो दूसरे मंत्री लेते होंगे?,नही तो बड़े अफ़सर लेते होंगे?कोई ना कोई तो लेता ही होगा वर्ना मंत्री को पता होने के बाद भी कार्रवाई क्यों नही हो रही है?

खैर आप और आपके साथी तो सरकार में है उनकी खामोशी समझ मे आती है मगर विपक्ष का इतने बड़े मामले मे ख्जामोश रहना समझ से परे है?सड़ियल रिपोर्टों के आधार पर सरकार पर भ्रष्टाचार का आये दिन आरोप लगाने वाले विपक्ष यानी कांग्रेस का खामोश रहना इस बात का संकेत तो देता है कि मंत्री के अनुसार महिना लेने वाले थानेदार कुर्सी पर बने रहने के लिये न केवल सत्तापक्ष और अफ़सरों को बल्कि विपक्ष को भी सेट करके रखे हैं।

वैसे थानेदारों के अलावा आपको कोई और भ्रष्ट क्यों नज़र नही आया ये भी समझ मे नही आया मुझ नासमझ के?आप तो सहकारिता और जेल मंत्री भी हैं।सहकारिता मे तो इंस्पेक्टर राज ही चलता है।फ़िर एक सहकारिता निरीक्षक को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ाने के बाद भी क्यों फ़िल्ड़ मे पोस्टिंग दी गई?चलिये व्यक्तिगत सवाल नही।क्या जेल मे सब ठीक चल रहा है।आपको वंहा जैमर तक़ लगवाने पड़े।वंहा से आज भी अपराधी अपना कारोबार मोबाईल पर चला रहे हैं।वंहा औरत छोड़ कर सारी सुविधायें बिकती है।बैरकों की नीलामी होती है?अस्पताल के बहाने बाहर की हवा खाने की कीमत अलग तय है।सब तो जान्ते हैं आप्।फ़िर उन मामलों मे वही बेबाकी क्यों नही?वही स्वीकारोक्ति क्यों नही?
खैर जाने दीजिये कहने को बहुत कुछ है वो फ़िर किसी दिन मगर मेरा ये मानना ह कि अगर आप विपक्ष मे होते और आपकी पार्टी भी तो क्या दूसरी पार्टी के मंत्री के ऐसे बयान पर खामोश रहते?क्या आप उससे नैतिकता की दुहाई देकर इस्तीफ़ा नही मांगलेते?वैसे नैतिकता की बात अगर राजनीति सिर्फ़ बयानबाज़ी के अलावा सच मे ज़िंदा है तो इसका थोड़ा बहुत असर तो होना चाहियें।इस्तीफ़ा ना सही कम से कम भ्रष्ट अफ़सरों को ठीक करने का एलान तो हो जाना चाहिये।फ़िर ये तो छत्तीसगढ है जंहा नकसल प्रभावित बस्तर का नाम ही अच्छे-अच्छे सुधर जाते हैं।आप मंत्री है चाहे तो सुधार सकते है और अगर नही तो किसी को भ्रष्ट कहने से पहले सोचियेगा कि कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी।

22 comments:

अरूण साथी said...

जो हो पर उन्होंने सच को स्वीकार तो किया और सच भी यही है।

महेन्द्र मिश्र said...

आपके विचारो से सहमत हूँ ये एक तरह की विवशता तो ही है ....

जी.के. अवधिया said...

"मंत्री जी अगर आप ये मान रहे हैं कि थानेदारों का महिना बंधा है और अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नही हो रही है तो ये भी अपने आप मान लिया जायेगा कि वे भी कंही न कंही महिना दे रहे हैं।"

सौ बात की एक बात!

Arvind Mishra said...

सच कहा आपने गृह मंत्री ऐसा कैसे कह देते हैं और क्या वे अपने जिम्मेदारी से मुक्त हुए ?

ललित शर्मा said...

Anil bhai,
je huyi na koi baat,
khari khari sidhi bat.

mantriji visvash hai.
parbas hain..........

paradhin sapnehu sukh nahi.

achchhi post hamesha ki tarah

aabhar.

Mithilesh dubey said...

सही कहा आपने अनिल भईया जब हम अपना क्षेत्र सुधार सकते हैं तो औरो का क्यों नहीं ।

राज भाटिय़ा said...

आप की बात से सहमत हू

राज भाटिय़ा said...

आप की बात से सहमत हुं जी

ताऊ रामपुरिया said...

बिल्कुल सौ प्रतिशत खरी कही आपने.

रामराम.

प्रवीण पाण्डेय said...

जिनसे आप सहायता की आस लगायें, वो असहायता की खींसे निपोरें तो मन में जो भाव उबाल लें, वह अवर्णनीय हैं ।

shikha varshney said...

.१६ आना सही ..दो टूक बात.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अच्छा लगा पढ़कर कि अब पुलिसिये नेताओं को अपने घुटने के नीचे रखने लगे हैं. भला जब थानों की बाकायदा निविदा मंगाकर बोली उठाई जाएगी तो ये किस मुंह से उनके ख़िलाफ़ कुछ कर पाएंगे.

भारतीय नागरिक said...

इंस्पेक्टर राज नहीं, अधिकारी राज चलता है. यदि इंस्पेक्टर नहीं होगा तो कोई और होगा, किसी और पदनाम से होगा. मशीनरी ही भ्रष्ट है, क्या किया जाये. किस अधिकारी और नेता को चौराहे पर वसूली दिखाई नहीं देती. मंहगाई, भ्रष्टाचार, वोटों की फसल काटने की बेताबी, बढ़ती जनसंख्या सब एक ही सिक्के के पहलू हैं.

सतीश सक्सेना said...

बहुत ठीक कहा अनिल भाई

Ajay Tripathi said...

कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी मंत्री पर आपकी तिपनी जायज है साथ में विरोधी दल को भी आइना दिखा दिया साधुवाद

Ajay Tripathi said...

कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी मंत्री पर आपकी तिपनी जायज है साथ में विरोधी दल को भी आइना दिखा दिया साधुवाद

Ajay Tripathi said...

कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी मंत्री पर आपकी तिपनी जायज है साथ में विरोधी दल को भी आइना दिखा दिया साधुवाद

शरद कोकास said...

कितने विनम्र अन्दाज़ में सत्य कहा है आपने ..।

दीपक 'मशाल' said...

Aapne jis tarah in sabko katghare me khada kar diya wo sab bahut prashansneeya hai bhaia.. lekin kahin na khain to aap aur hum bhi jimmewar hain..
Jai Hind...

rajat said...

सच कहो तो साहब ये पूरा सत्ता का खेल है.......जब भी कोई मंत्री या आधिकारी उस सत्ता पर बैठ जाता है....तो सिर्फ अपने और अपने परिवार वालो का सोचता...है...आम जनता मरे या जिए कोई मतलब नहीं....ये सब जो उन होने बोला है ये सब तो करना ही पड़ता है अगर नहीं....करेंगे तो नेता कैसे होगे....

rajat said...

सच कहो तो साहब ये पूरा सत्ता का खेल है.......जब भी कोई मंत्री या आधिकारी उस सत्ता पर बैठ जाता है....तो सिर्फ अपने और अपने परिवार वालो का सोचता...है...आम जनता मरे या जिए कोई मतलब नहीं....ये सब जो उन होने बोला है ये सब तो करना ही पड़ता है अगर नहीं....करेंगे तो नेता कैसे होगे....

डॉ महेश सिन्हा said...

क्या कोई न्यायालय इसका संज्ञान लेगा , गृह मंत्री का बयान है वो भी विधान सभा में ?