Friday, April 30, 2010

आखिर समझ क्या रखा है अपने दर्शकों को,इन न्यूज़ चैनल वालों ने?

एक सवाल सामने रख रहा हूं,जो टीवी वाले के लिये तो बहुत छोटा सा हो सकता है मगर हम दर्शकों के लिये वो बहुत ज़रूरी है।आखिर समझ क्या रखा है अपने दर्शकों को,इन न्यूज़ चैनल वालों ने?जी हां,यही सवाल,मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचा गया,आज सुबह ठीक दस बजे।मुझे लगा कि अब चैनल वालों को पता चल गया है कि उसके दर्शक उन्हे देखने के लिये मज़बूर हो गये हैं,सो अब कुछ भी किया जाये कोई कुछ कहने वाला नही है।सुबह-सुबह देश-दुनिया का ताज़ा हाल जानने के लिये अपने को बड़ा बताने मे कोई कसर नही छोडने वाले चैनल की ओर चला गया।वंहा देखा तो शेर महाराज दहाड़ रहे हैं।मैने सोचा शेर बचाओ अभियान पर कोई विशेष कार्यक्रम होगा।विशेष शुरू हुआ तो मैं चौंका भारत की बजाये सीधे अफ़्रीका और बहादुरी के पर्याय शेर एक नही तीन-तीन शेरों की एक साथ दुर्गति।
मैं हैरान था कि दूसरे चैनल के शाटस को बेशर्मी से उठाकर कैसे विशेष स्टोरी बनाई जा सकती है।खैर वन्य जीवन के प्रति उत्सुकता होने के कारण मैं चैनल पर चिपका रहा।एक ही शाट को कई-कई बार दिखाने के साथ शब्दों की जादूगरी देख रहा था।लग रहा था कि चैनल वाले जादूगर से पहले कोई जमूरा डमरू बज़ा-बज़ा कर भीड़ इकट्ठी कर रहा है।
थोड़ी देर तक़ ही अफ़्रीका के जंगलो के चुराये हुये शाट्स देखने का मज़ा ले पाया था कि अचानक़ टीवी की स्क्रीन पर दृश्य बदल गया और अफ़्रीका के घने जंगलों से कैमरा घूम कर सीधे झारखंड़ के जंगलो मे पहुंच गया।स्क्रीन पर कुछ,वायज़ ओवर कुछ और और कुछ ही क्षणों मे असली शेरों की बजाये दिल्ली के रंगे-पुते शेर नज़र आ गये झारखंड़ की समस्या पर बखान करते हुये।
अब हमारी समझ मे आया कि झारखंड मसले पर प्रेस कांफ़्रेंस को लाईव करने से पहले थोड़ी देर के लिये दिखाने लायक कोई कार्यक्रम नही रहने के कारण,भाई लोगों को शेर की बेईज़्ज़ती करने की सूझ गई थी।फ़िर लगा कि भारत मे तो बहादुरों को लोग कहते हैं शेर की तरह जिया,या लड़ा।सो देश के शेरों को मिले बहादुरी के खिताब का खयाल रखते हुये उन्होने उन पर रहम किया और अफ़्रीका के शेरों की ऐसी की तैसी करना शुरू किया।तीन सौ वन भैंसों के झुंडो से लड़ने की बजाये भागते शेरों की जंग,जी हां यही शब्द का इस्तेमाल किया था जमूरे सारी जमूरी ने।बकायदा कितने मिनट चली जंग,कौन कितनी बार आगे आया,कितनी बार पिछे गया,बाकायदा केलकुलेट कर दिखा रहे थे चोरी के शाट्स्।
मगर बुरा हो झारखंड के लफ़्ड़े का।अचानक़ प्रेस कांफ़्रेंस शुरू हो गई और जब दूसरे चैनल पर वो दिखे तो फ़िर उससे पीछे कैसे रह सकते थे भाई लोग्।शेर को किनारे के कागज़ी शेरों के बयान जारी किये और आगे रहने की होड़ मे पोल-पट्टी खुल गई मदारियों की।शेर की बहादुरी की ऐसी की तैसी करने और वन भैंसो को उनसे बहादुर साबित करने का अभियान राजनितिक शेरों के कारण अधूरा ही रह गया।और अगर दिखा भी देते तो भी क्या कोई इस देश मे कह सकता था कि फ़लाना जिया तो शेर की तरह या फ़लाना लड़ा तो शेर की तरह?खैर शेरों की जाने दिजिये न्यूज़ चैनल वाले हम दर्शकों को क्या कहते होंगे अब थोड़ा-थोड़ा समझ मे आने लगा है।

16 comments:

संजय बेंगाणी said...

हम दर्शकों को क्या कहते होंगे अब थोड़ा-थोड़ा समझ मे आने लगा है।

हमें क्या कहते है, पता है. मगर सोचना नहीं चाहते. :(

Anonymous said...

ये तो कुछ भी नहीं अभी कुछ महीने पहले बादल में दिखने वाली एक आकृति को इंडिया टीवी वाले शैतानी आँख बताकर 3 घंटे बिता दिए .
इन पर लगाम लगाने की बात आती है तो ये ऐसा हल्ला मचाते है जैसे पत्रकारिता मर गयी हो और ये रुदालियाँ हो .
पता नहीं ये सब कैसे और कब बंद होगा

रंजन said...

हम तो बचे है.. केवल डीडी न्यूज आता है हमारे यहाँ...:)

SANJEEV RANA said...

इस रचना के लिये धन्यवाद
ऐसे लेखन कि ब्लोग जगत को आवयश्कता है

ali said...

मुद्दे कम हैं और व्यावसायिक प्रतियोगिता है गला काट ...उस पर तुर्रा ये कि बेरोजगार और अप्रशिक्षित नौजवानों की फ़ौज ...फिर स्लो मोशन क्लिपिंग्स और चीख पुकार से ज्यादा की उम्मीद क्यों ?
संवाद अदायगी की "हिचकोला शैली" में जबरन रहस्य पैदा करते लोग ...जो भी करे उनका हक़ है पर आप और मैं वहां न्यूज ढूंढें ? ....गलत बात !

sangeeta swarup said...

मिडिया जो कर रही है सो कर ही रही है..पर देखना तो ये है कि नेता क्या कर रहे हैं

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ये दर्शकों को बेवकूफ समझते हैं जो कि वह है नहीं।

लोकेश Lokesh said...

गनीमत है कि अपन बचे हुए हैं इन झमेलों से

'उदय' said...

लग रहा था कि चैनल वाले जादूगर से पहले कोई जमूरा डमरू बज़ा-बज़ा कर भीड़ इकट्ठी कर रहा है।
...बात में दम है, ... डमरू भी बजा, भीड भी इकट्ठा हुई मगर खेल टांय-टांय फ़िस्स !!!!

प्रवीण पाण्डेय said...

बेवकूफ समझते हैं, इसीलिये बनाते हैं ।

राज भाटिय़ा said...

हमारे यहां सिर्फ़ एक खबरो (हिन्दी) का चेनल आता है, बस उसे देख कर मै खुब गालियां देता हुं, क्योकि समाचार सारे दिन मै एक नही, नाचे गाने, कुते कुतियो की तरह से लडते यह फ़िल्म वाले, ओर बाकी समय मै बे तुकी बकवास. दो दिन लगा तार देखा एक समाचार नही, फ़िर मेने उस चेनल को अपने रसीवर से ही हटा दिया....खोटा सिक्का जेब मै रखने से नुकसान ज्यादा होता है, वो जाते समये अच्छॆ सिक्को को भी ले जाता है इस लिये पहले ही फ़ेंक दो

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

जो बिकता है वही बेच रहे है और हम लोग भी ना चाहते हुये भी झेल रहे है

डॉ महेश सिन्हा said...

इनके बारे में तो अब बात करना भी टाइम खराब करना है .
शायद इनको पता चल गया है की इनकी पोल खुल गयी है और दुकानदारी बंद होने वाली है क्योंकि अब लोग इंटरनेट का ज्यादा उपयोग कर रहे हैं समाचार जानने के लिए

योगेन्द्र मौदगिल said...

ये सब धंदेबाज हैं... खेल रहे हैं खेल..

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

आखिर समझ क्या रखा है अपने दर्शकों को,इन न्यूज़ चैनल वालों ने?

जमूरा! :)

शरद कोकास said...

भ्रम मे न रहें ये चैनल वाले शेर को भी दर्शकों की तरह जानवर ही समझते हैं ।