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Saturday, May 26, 2012

क्या सच में गर्मी बहुत ज्यादा है या सुविधाओं ने हमें कुछ ज्यादा ही नाज़ुक बना दिया है?

क्या सच में गर्मी बहुत ज्यादा है? क्या इससे पहले कभी इतनी गर्मी नहीं पड़ी? क्या थर्मामिटर का पारा सूरज के कहर से पहले कभी नही थर्राया? क्या सच में गर्मी से जीना मुहाल हो गया है? इतना ही नहीं और भी कर्इ सवाल मेरे दिमाग में उमड़ घुमड़ रहे थे। जितनी गर्मी सच में पड़ रही है उससे ज्यादा समाचार देख कर लगने लगी है। क्या सच में वातावरण बहुत ज्यादा गर्म हो गया है या फिर हम जरूरत से ज्यादा नर्म हो गये हैं? 
मुुझे याद है नर्इ नर्इ नौकरी लगी थी। जवानी का जोश था और नर्इ नौकरी का भी कुछ असर था। तब भी सूरज इतना ही गर्म हुआ करता था और तब मेरे पास मोटर साइकिल हुआ करती थी। भरी दोपहरी में समाचारों के लिए भटकते समय ना ऊपर आसमान से बरसती आग जलाती थी और ना ही तेज गर्म हवाओं के थपेड़े ही झुलसा पाते थे। ना कपड़े से मुंह को लपेटने का फैशन था और ना ही एसी फेसी का जमाना था। अप्रैल,मर्इ,जून, में भी एैसे घूमते थे जैसे नवंबर दिसंबर का सुहावना मौसम हो।
और पहले के बाद कहूँ तो कालेज से लेकर बेरोजगारी के शानदार सुनहरा दौर में गर्मी सर्दी का फर्क ही नहीं पता चला। फेसबूकिया बल्लू उर्फ बलबीर भारज, चुन्नू उर्फ धनंजय सिंह और मै हम तीनों तीन सवारी स्कूटर पर सवार होकर निकलते थे तो सीधे रात को ही घर जाते समय अलग होते थे। बरसात सर्दी और गर्मी में बिना नागा तीनों अपनी अपनी प्रोबेबिलिटी के घरों के आस पास मंडराते थे। भरी दोपहरी एक्सट्रा क्लास और कम्बाइण्ड स्टडी के बहाने उस समय शहर से बाहर समझे जाने वाले सार्इस कालेज और उसके हास्टल में मटरगश्ती करने जाते थे तब भी आसमान पर सूरज एैसे ही आग उगलता था। पर तब उसकी तपन जलन का एहसास तक नहीं होता था।
और पहले की सोचूं तो बचपन और स्कूल के दिन याद आ जाते हैं। ननिहाल उसी विदर्भ में है जो आज भारत में सबसे ज्यादा गर्म बताया जा रहा है। तब गांवों में बिजली कभी कभार ही आती थी। पंखे दिखाने के भर होते थे। ऐसी फेसी का तो नाम ही नहीं सुना था। तब भी गर्मी एैसी ही कहर बरपाने वाली होती थी। ननिहाल में मौसी मामा और करीब के रिश्तेदारों के बच्चे छुटिटयां मनाने इकठठा होते थे। सारे बच्चों को एक बड़े कमरे में ठूस दिया जाता था। गर्मी से बचने के लिए मामा जी ने मकान के निचे बने फसल रखने वाले पत्थरों से बने तल घर को साफ करना शुरू कर दिया था। एसी की जरूरत ना पड़े इतना ठंडा हुआ करता था तल घर। पर हम सभी बच्चों को दोपहर में सोने से ज्यादा घर से लगी अमरार्इ में खेलना और अमरार्इ से लगी नदी में तैरना ज्यादा अच्छा लगता था। सबके सब दोपहर को मौका देखकर भाग जाते थे और भरी दोपहरी इतने ही तापमान में पेड़ों पर चढ़कर खेलते थे तो थककर नदी में तैरने का आनंद लिया करते थे। सूरज तब भी आग ही उगलता था और हम बच्चें आज की तुलना में कुछ ज्यादा कोमल हुआ करते थे। चेहरा लाल भभूका जरूर रहता था लेकिन खुशी उससे ज्यादा नजर आती थी। थक हार कर घर वालों ने दोपहर को खेलने पर लगी पाबंदी हटा दी सिर्फ जेब में प्याज रखकर बाहर निकलने की शर्त पर।
पता नहीं एक छोटा सा प्याज सूरज से जीत जाता था या खेलने का जुनून सूरज को हावी नहीं होने देता था। आम खूब खाते थे और उसके लिए भी सप्ताह में एक बार नीम की पतितयों का काढा पीना कंपलसरी होता था। ना कभी फोड़ा फुन्सी हुर्इ और ना ही घमौरियां ।ना ठंडा ठंडा कूल-कूल पाउडर था और ना तेल। तब भी गर्मी एैसी ही हुआ करती थी और पारा एैसे ही उछाल मारा करता था।
मुझे अच्छे से याद है कि हमारे दोस्त पवन झुनझुनवाला के घर नर्इ फिएट आर्इ थी। तब भरी गर्मी में पास के गंगरेल बांध पिकनिक मनाने गये थे हम सब। सब ठूस-ठूस कर कार में घुसे थे। पीठ सीट से चिपककर गिली हो जाती थी और अगल बगल भार्इ लोगों का पसीना आपस में मिलकर गंगाजमना का संगम हो जाता था। सीट से अलग होना, खिड़की से आधी बांह की कमीज के रास्ते गर्म ही सही हवा के झोंको से बगल के पसीने केे जरिए शरीर को ठंडा करने की कोशिश गर्मी को कभी हावी नही होने देती थी।
अब सब के पास बड़ी-बड़ी शानदार कारें हैं। दफ्तर कोल्ड स्टोरेज को मात दे इतने ठंडे। घर भी कम नहीं। कार भी फ्रिज से कम नही। घर से बाहर निकलकर कार में बैठते और दफ्तर पहुंच कर उतरते समय ही पता चलता है कि अभी गर्मी का मौसम है। इसके अलावा तो पता ही नही चलता कि बाहर सूरज महाराज पूरी ताकत लगाकर थर्मामिटर के पारे को 46 पार पहुंचा चुके हैं।
गर्मी के मौसम में संपादक की खास फरमार्इश सड़क पर पिघले डामर में फंसे रिक्शा या ठेले को खींचते पसीने से तरबतर मजदूरों की तस्वीर अब नजर ही नही आती। डामर ही नहीं डालते सड़कों पर तो पिघलेगा कहां से। अब दोपहर को भी सड़क के सुनसान होने का शाट लेने के लिए फोटोग्राफरों को घंटों इंतजार के बाद भी निराशा ही हाथ लगती है।
सोच-सोच कर परेशान हो गया हूँ कि आखिर एैसा क्या हुआ है जो गर्मी पर इतनी हाय तौबा मचार्इ जा रही है। आखिर मौसम तो प्र—ति की देन है। अभी गर्मी है तो गर्मी का रोना। मानसून का इंतजार। और मानसून के आने पर बाढ़ का रोना। फिर ठंड का इंतजार और ठंड में शीत लहर का प्रकोप। मौसम तो आएंगे जायेंगे ही। उनका जाना तो तय है। सवाल हाय तौबा मचाने का नहीं है सवाल है मौसम का मजा लेने का। बहुत सोचने पर इतना ही समझ में आया के सूरज पहले भी गर्म था और आग भी उगलता था बस सुविधाओं ने हमें कुछ नर्म या नाजुक कर दिया है।

14 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Ayodhya Prasad said...

शायद सुविधाओं की वजह से सहनशीलता कम हो गयी है |

संतोष का पुरस्कार

प्रवीण पाण्डेय said...

यह कोमलता हृदय में ही रहे, बाहर न आये।

anitakumar said...

मौसम तो आयेगें जायेगें ही और हम सब को अपने अपने मन पसंद मौसम का इंतजार रहता है। ये पसंद भी शायद उम्र के साथ बदल जाती है जैसे बचपन में गर्मियों की छुट्टियों का इंतजार रहता था, जैसा आप ने भी जिक्र किया है खूब खेलने को मिलता था पर आज कल के बच्चे तो शायद गर्मी की छुट्टियों से खौफ़ खाते हैं, मां बाप और क्लासेस जो लगा देते हैं खेलने को मिलता ही कहां है।
सुविधाओं के चलते हम शायद ज्यादा नाजुक हो गये हैं पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जिस तरह से पर्यावरण का हनन हो रहा है मौसम भी अपनी मासुमियत छोड़ रुद्र रूप धारण कर रहे हैं ।

Anonymous said...

समय तो बदला ही है लेकिन गर्मी भी शायद बढी ही है और उसके कई कारण हैं।

Reena Maurya said...

सुविधाओ की वजह से इन्सान जादा नाजुक हो गया है..
बेहतरीन पोस्ट :-)

कविता रावत said...

सूरज पहले भी गर्म था और आग भी उगलता था बस सुविधाओं ने हमें कुछ नर्म या नाजुक कर दिया है
.

Rajesh Kumari said...

सही कहा है जितनी सुविधाएं हो गई उतने ही हम कोमल शारीरिक रूप से कमजोर होते चले गए दूसरे बढती हुई आबादी और प्रदूषण ने मौसम पर अपना अधिक प्रभाव डाला है पर हाय तोबा करने से सूरज की आग कम नहीं हो जायेगी हर हाल में खुश रहना सीखो बहुत अच्छी सन्देश परक रचना

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

समसामयिक परिपेक्ष में बहुत सुन्दर विवेचना युक्त अभिलेख.

आशा जोगळेकर said...

सुविेंधाएँ तो नाजुक बनाती ही हैं कुछ उम्र भी । वरना स्कूल कॉलेज तो हम भी उतनी गर्मी में एक डेढ मील चल कर ही जाते थे ।

अजय कुमार झा said...

101….सुपर फ़ास्ट महाबुलेटिन एक्सप्रेस ..राईट टाईम पर आ रही है
एक डिब्बा आपका भी है देख सकते हैं इस टिप्पणी को क्लिक करें

अनूप शुक्ल said...

सुविधाओं वाली बात सही लगती है। :)

Raravi said...

I agree with you. Another reason is loss of traditional wisdom. To build new houses design and material are copied from western world, same is true for dress and to some extent for food.

Meenu Khare said...

very nice post.