अब बताईये भला ऐसे मे अगर छत्तीसगढ मे गरीबो की नही सुनी जाती तो क्या गलत है।साले गरीब भी तो है अकल के अंधे।अमीरो को ही अपना प्रतिनिधी चुनते है तो उनकी सुनेगा ही कौन?तेईस विधायक एक करोड़ से ऊपर है और ये उनकी घोषित सम्पत्ति है और अगर अघोषित हो तो वो अलग है।
गरीबो की बदहाली का सबसे ज्यादा रोना ये लोग ही रोते हैं।गरीबी दूर करने का नारा देने वाली कांग्रेस के तो तेईस मे से सोलह विधायक हैं।आखिर गरीबी दूर करने का ठेका तो उनके पास आज़ादी के बाद से है और इस खानदानी धंदे मे अगर उसके ज्यादा अमीर हो गये तो इसमे नाराज़ होने वाली कोई बात नही होनी चाहिये।भाजपा भी उन्से बहुत पिछे नही है उसके भी सात विधयक है यानी आधे से कुछ कम है ।खैर उनको राजनीति मे आये कांग्रेस से कम समय मिला है।दे देंगे वे भी टक्कर,जिस स्पीड से चल रहे है उससे तो लगता है कि आगे भी निकल सकते हैर ॥और हां यंहा अल्पसंख्यको के पिछडेपन का रोना या उनके साथ अन्याय होने की फ़र्ज़ी बाते भी नही हो सकती।सारी तिस्ता,यंहा के चार मे से तीन अल्पसंख्यक विधायक करोडपती है यानी पचहत्तर प्रतिशत्।32 आदिवासी मे से सात करोडपती हो चुके है इसलिये उन्हे भी अति पिछडा नही कहा जा सकता।ये कहा जा सकता है कि वे विकास की मुख्यधारा से लगता है धीरे धीरे जुड रहे हैं।।
हमारे गणमान्य नब्बे विधायको मे से मात्र चार ऐसे है जिनहे पचास हज़ार से पांच लाख की श्रेणी मे रखा गया है।यानी ये भी लखपती है और ईश्वर ने चाहा तो दो चार बार और टिकट मिल जायेगी फ़िर ……………।पांच से पचास लाख वाले 41 है और पचास लाख से एक करोड वाले 11 ।खैर ये तो अच्छी बात है कभी कोई अमीरी पर डिंग हांके तो उसको टक्कर देने के लिये हम गरीब छत्तीसगढियों के पास भी वंडरफ़ुल रिकार्ड वालो का ग्रूप है।इस नय्र तथ्य के सामने आने के बाद लगता है अपने ब्लाग का नाम बदलकर अमीर धरती अमीर विधायक या अमीर लोग रख लूं।क्यों कैसा रहेगा ,अपनी राय ज़रूर दिजियेगा।