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Monday, February 29, 2016
जिसने गरीबी देखी नही वो आम आदमी की बात करता है,गरीब की बात करता है,
बजट बजट बजट.हर तरफ बजट की चर्चा,गरीबो,आम आदमी व किसान के लिये बनाया गया बजट बनाया किसने?क्या गरीब ने,किसान ने,आम आदमी ने?जिसने गरीबी देखी नही वो आम आदमी की बात करता है,गरीबी की बात करता है,खेत जिसने देखे नही वो किसानो के हित की बात कर रहा है.हद है.
Sunday, December 18, 2011
पता नही इस देश के नेता लोग सिर्फ अपने ही सपने पूरे करने पर क्यों तुले हुये?क्या उन्हे बापू के सपने का भारत याद नही?
अभी पता चला कि गरीबों को कम दाम में अनाज़ मिलने का सपना किसी को दिखा?वैसे ये सपना कुछ राज्यों में पहले ही दिख भी चुका है और किसी किसी ने पूरा भी कर लिया है?पता नही इस देश के नेता लोग सिर्फ अपने ही सपने पूरे करने पर क्यों तुले हुये?क्या उन्हे बापू के सपने का भारत याद नही?क्या उन्हे नेहरु,शास्त्री और पटेल के सपने याद नही है?क्या उन्हे भगत सिंह,आज़ाद और बोस के सपने याद नही है?क्या उन्हे शिवाजी,महाराणा प्रताप और झांसी की रानी के सपने याद नही है?क्या उन्हे विवेकानंद,रामकृ्ष्ण परमहंस और दयानंद सरस्वती के सपने याद नही है?क्या उन्हे तिलक,गोखले और सावरकर के सपने याद नही है?क्या उन्हे सिर्फ अपने सपने ही याद है वो भी वोट दिलाऊ सपने?क्या उन्हे जनता के सपनों से कोई लेना देना नही है?क्या आम आदमी के सपने सच मे सपने ही रह जायेंगे?क्या सरकार के रुपये से वर्गभेद,वर्णभेद के बीज़ बोने वाले नेताओं के सपने ही पूरे होते रहेंगे?क्या सिर्फ नेताओं के ही सपने पूरे होते हैं इस देश में?पता नही मेरे सपनो का क्या होगा?सुकालू दुकालू,समारू,मंगलू और झंग्लू के सपनो का क्या होगा?क्या हम लोगों को सपने देखना बंद कर देना चाहिये?सिर्फ नेता ही सपने देखें और अपने हिसाब से उसे पूरा कर ले.
Wednesday, September 21, 2011
गरीबी तो कम नही कर पा रहे हैं,गरीबों की संख्या कम करने चले हैं,ज़रा जीकर दिखाये 32 और 26 रूपये रोज़ में शहर या गांव में?
योजना आयोग की विद्वान और मूर्धन्य टीम का कहना है कि शहर में रहने वाला वो शख्स जो 32 रूपये रोज़ और गांव मे रहने वाला वो शख्स जो छब्बीस रूपये रोज़ खर्च करता है वो गरीब नही हो सकता।मेरा सवाल तो ये है क्या इतने कम रूपये में कोई जी भी सकता है?गरीबों की संख्या कम बताने वाले आंकडो के इन जादुगरो को कम से कम एक साल तक़ उतने ही रूपये मे जीकर अपनी बात को सच साबित करने का मौका दिया जाना चाहिये।ये गरीबी की बजाये गरीब कम करने का खेल-तमाशा अब बंद होना चाहिये।
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Tuesday, August 11, 2009
गरीबों और पिछड़ों के प्रदेश मे एक बिरादरी ऐसी भी जंहा कोई भी गरीब नही है
छत्तीसगढ को पिछडा राज्य कहा जाता है।यंहा की ज़मीन रत्नगर्भा वसुन्धरा है।धरती जितनी अमीर है लोग उतने ही गरीब्।फ़िर भी इसी प्रदेश मे एक बिरादरी ऐसी है जिसमे कोई गरीब नही है। और मज़े की बात तो ये है कि गरीबो की समस्या का निदान उन्ही लोगो को करना है और गरीबो की दुर्दशा पर रोना भी वंही लोग रोते है।जी हां मै बिल्कुल सच कह रहा हूं।छत्तीसगढ की विधाय्क बिरादरी का एक भी सदस्य गरीब नही है।गरीबी से तो कोसो दूर है इस गरीब धरती के अमीर विधायक और उनमे से यानी यानी 90 मे से तेईस तो करोड़पति है।यानी पच्चीस परसेंट का तो गरीबी से दूर-दुर का रिश्ता नही है।एक विधाय्क 106 करोड़ के आसामी है।
अब बताईये भला ऐसे मे अगर छत्तीसगढ मे गरीबो की नही सुनी जाती तो क्या गलत है।साले गरीब भी तो है अकल के अंधे।अमीरो को ही अपना प्रतिनिधी चुनते है तो उनकी सुनेगा ही कौन?तेईस विधायक एक करोड़ से ऊपर है और ये उनकी घोषित सम्पत्ति है और अगर अघोषित हो तो वो अलग है।
गरीबो की बदहाली का सबसे ज्यादा रोना ये लोग ही रोते हैं।गरीबी दूर करने का नारा देने वाली कांग्रेस के तो तेईस मे से सोलह विधायक हैं।आखिर गरीबी दूर करने का ठेका तो उनके पास आज़ादी के बाद से है और इस खानदानी धंदे मे अगर उसके ज्यादा अमीर हो गये तो इसमे नाराज़ होने वाली कोई बात नही होनी चाहिये।भाजपा भी उन्से बहुत पिछे नही है उसके भी सात विधयक है यानी आधे से कुछ कम है ।खैर उनको राजनीति मे आये कांग्रेस से कम समय मिला है।दे देंगे वे भी टक्कर,जिस स्पीड से चल रहे है उससे तो लगता है कि आगे भी निकल सकते हैर ॥और हां यंहा अल्पसंख्यको के पिछडेपन का रोना या उनके साथ अन्याय होने की फ़र्ज़ी बाते भी नही हो सकती।सारी तिस्ता,यंहा के चार मे से तीन अल्पसंख्यक विधायक करोडपती है यानी पचहत्तर प्रतिशत्।32 आदिवासी मे से सात करोडपती हो चुके है इसलिये उन्हे भी अति पिछडा नही कहा जा सकता।ये कहा जा सकता है कि वे विकास की मुख्यधारा से लगता है धीरे धीरे जुड रहे हैं।।
हमारे गणमान्य नब्बे विधायको मे से मात्र चार ऐसे है जिनहे पचास हज़ार से पांच लाख की श्रेणी मे रखा गया है।यानी ये भी लखपती है और ईश्वर ने चाहा तो दो चार बार और टिकट मिल जायेगी फ़िर ……………।पांच से पचास लाख वाले 41 है और पचास लाख से एक करोड वाले 11 ।खैर ये तो अच्छी बात है कभी कोई अमीरी पर डिंग हांके तो उसको टक्कर देने के लिये हम गरीब छत्तीसगढियों के पास भी वंडरफ़ुल रिकार्ड वालो का ग्रूप है।इस नय्र तथ्य के सामने आने के बाद लगता है अपने ब्लाग का नाम बदलकर अमीर धरती अमीर विधायक या अमीर लोग रख लूं।क्यों कैसा रहेगा ,अपनी राय ज़रूर दिजियेगा।
Monday, July 6, 2009
अब पता चला कि गरीब की मदद क्यों नही करते हैं बड़े लोग?
हमारी मंडली बैठी ही थी कि एक अंजान शख्स आ टपका पता पुछते-पुछ्ते।आते ही उसने अपनी समस्या बताई और कहा कि मै मदद की गुहार लगाते-लगाते थक गया हूं।किसी ने बताया कि आप गरीबो की जी जान से मदद करते है सो आपकी शरण मे चला आया हूं निराश मत करना साब।मैंने उसे दूसरे दिन मिलने को कहा और वापस कुर्सी पर पसर गया।मेरी हालत देख कर सारे दोस्त समझ गये थे कि मामला गंभीर है।इससे पहले मै उन्हे कुछ बताता एक मित्र ने कहा कि तू अब ये लफ़ड़े छोड़ और चैन से जी और हमको भी जीने दे।मैने कहा यार वो गरीब है और उसका कोई भी नही है।तो उधर से जवाब आया तूझे पता भी है बे गरीब इस देश मे गरीब ही क्यों रहता है?कोई उसका उद्धार क्यों नही करता? पता भी है कि गरीब की मदद क्यों नही करते हैं बड़े लोग?
मै हैरान रह गया।मैने पूछा पता तो नही है अब विद्वान लोग हो आप ही बता दो तो मेरा भी ज्ञान बढ जाये।इस पर सबने कहा ये तो बहुत ज़रूरी है कि तुझे पता चले।अब अपोज़िशन की कमान ग्रुप के एक सरकारी अफ़सर ने संभाल ली।वो बोला तुम्हारी सुन-सुन कर पक गये है आज हमारी भी सुनो।मैने कहा सुनाईये।उसने पूछा कि ये बता तू आये दिन परेशान रहता है नही?मैने कहा,हां रहता तो हूं।उसने फ़िर पूछा कि पता है क्यों?मैने कहा हो सकता है तक़दीर मे लिखा हो।उसने कहा तक़दीर मे लिखा नही है बे तू खूद अपने हाथ से लिख रहा है?इस बार मैने पूछा,वो कैसे?
जवाब जो सामने आया उसने ऊपर से नीचे तक़ हिला कर रख दिया।उसने कहा कि साले जब देखो तब गरीबो की मदद करता है ना?मैने कहा,हां करता हुं और इसमे बुराई भी क्या है?उसने कहा बुराई है।जभी तो तू हमेशा परेशान रहता है।अगर गरीबो की मदद करने से पुण्य मिलता तो सबसे बडा पुन्यात्मा तो तू ही होता।और तू उन पुण्यो के बदले जी भर कर सुख भोगता।मगर ऐसा हो नही रहा है?है ना?मैने कहा बात तो सही है।वो बोला इसिलिये कहता हूं बे गरीबो की मदद मत कर वरना खुद गरीब हो जायेगा समझे।
मैने गुस्से मे कहा,नही समझा और मुझे समझना भी नही है।उसने कहा समझना तो तुझे पड़ेगा ही।मैने कहा कि अब सम्झा ही दो।वो बोला ये बता गरीब को गरीब किसने बनाया?मैने चिढ कर पूछा कि मुझे क्या मालूम?हो सकता है उसके तक़दीर मे यही लिखा होओ सकता नही बे यही सच है।उसकी तक़दीर मे लिखी किसने?भगवान ने ना?मैने कहा,काहे दिमाग खा रहा हे जो कहना है साफ़-साफ़ कह दे।वो बोला अबे सारी दुनिया जानती है तक़दीर भगवान लिखता है और जिसको भगवान ने गरीब बना कर भेजा अपने कर्मो की सज़ा भुगतने के लिये,साले तू उसकी मदद करके क्या साबित करना चाहता है?क्या तू भगवान से बड़ा है जो उसकी मुसीबत कम करने की कोशिश कर रहा है?तू साले आये दिन जो गरीबो की मदद करता है ना,जानता भी ऐसा करके तू डायरेक्ट भगवान से पंगा ले रहा है?जिसे खुद भगवान ने गरीब बनाया तू उसे अमीर बनाने की कोशिश करके भगवान को चैलेंज करता है?इसिलिये तेरी पोज़िशन हमेशा खराब रह्ती है।ज्यादा मदद करेगा ना तो साले एकाध दिन भगावान तेरे को भी गरीब बना देगा।
तूने क्या ठेका लिया है क्या बे गरीबो की मदद का?एक से एक बड़े-बड़े नेताओ ने कोशिश की है गरीबो की मदद की?क्या हुआ ?हुये कुछ कम गरीब?नही ना?अबे गरीबी हटाने वाले।गरीबो की मदद करने वाले तमाम कथित गरीबो के मसीहा चले गये गरीबो को जस का तस छोड़ कर।समझा कुछ या और समझाऊं।मैने सिर झुका कर कहा समझ गया महाराज,सब समझ गया।
मै हैरान रह गया।मैने पूछा पता तो नही है अब विद्वान लोग हो आप ही बता दो तो मेरा भी ज्ञान बढ जाये।इस पर सबने कहा ये तो बहुत ज़रूरी है कि तुझे पता चले।अब अपोज़िशन की कमान ग्रुप के एक सरकारी अफ़सर ने संभाल ली।वो बोला तुम्हारी सुन-सुन कर पक गये है आज हमारी भी सुनो।मैने कहा सुनाईये।उसने पूछा कि ये बता तू आये दिन परेशान रहता है नही?मैने कहा,हां रहता तो हूं।उसने फ़िर पूछा कि पता है क्यों?मैने कहा हो सकता है तक़दीर मे लिखा हो।उसने कहा तक़दीर मे लिखा नही है बे तू खूद अपने हाथ से लिख रहा है?इस बार मैने पूछा,वो कैसे?
जवाब जो सामने आया उसने ऊपर से नीचे तक़ हिला कर रख दिया।उसने कहा कि साले जब देखो तब गरीबो की मदद करता है ना?मैने कहा,हां करता हुं और इसमे बुराई भी क्या है?उसने कहा बुराई है।जभी तो तू हमेशा परेशान रहता है।अगर गरीबो की मदद करने से पुण्य मिलता तो सबसे बडा पुन्यात्मा तो तू ही होता।और तू उन पुण्यो के बदले जी भर कर सुख भोगता।मगर ऐसा हो नही रहा है?है ना?मैने कहा बात तो सही है।वो बोला इसिलिये कहता हूं बे गरीबो की मदद मत कर वरना खुद गरीब हो जायेगा समझे।
मैने गुस्से मे कहा,नही समझा और मुझे समझना भी नही है।उसने कहा समझना तो तुझे पड़ेगा ही।मैने कहा कि अब सम्झा ही दो।वो बोला ये बता गरीब को गरीब किसने बनाया?मैने चिढ कर पूछा कि मुझे क्या मालूम?हो सकता है उसके तक़दीर मे यही लिखा होओ सकता नही बे यही सच है।उसकी तक़दीर मे लिखी किसने?भगवान ने ना?मैने कहा,काहे दिमाग खा रहा हे जो कहना है साफ़-साफ़ कह दे।वो बोला अबे सारी दुनिया जानती है तक़दीर भगवान लिखता है और जिसको भगवान ने गरीब बना कर भेजा अपने कर्मो की सज़ा भुगतने के लिये,साले तू उसकी मदद करके क्या साबित करना चाहता है?क्या तू भगवान से बड़ा है जो उसकी मुसीबत कम करने की कोशिश कर रहा है?तू साले आये दिन जो गरीबो की मदद करता है ना,जानता भी ऐसा करके तू डायरेक्ट भगवान से पंगा ले रहा है?जिसे खुद भगवान ने गरीब बनाया तू उसे अमीर बनाने की कोशिश करके भगवान को चैलेंज करता है?इसिलिये तेरी पोज़िशन हमेशा खराब रह्ती है।ज्यादा मदद करेगा ना तो साले एकाध दिन भगावान तेरे को भी गरीब बना देगा।
तूने क्या ठेका लिया है क्या बे गरीबो की मदद का?एक से एक बड़े-बड़े नेताओ ने कोशिश की है गरीबो की मदद की?क्या हुआ ?हुये कुछ कम गरीब?नही ना?अबे गरीबी हटाने वाले।गरीबो की मदद करने वाले तमाम कथित गरीबो के मसीहा चले गये गरीबो को जस का तस छोड़ कर।समझा कुछ या और समझाऊं।मैने सिर झुका कर कहा समझ गया महाराज,सब समझ गया।
Friday, July 3, 2009
क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को उत्पात!
गरीब छोटे घर किंतु बडे दिल वाला होता है।इतने बड़े दिल वाला कि आप उसे एक नही कई थप्पड़ मारिये वो गाल हटायेगा ही नही।हटायेगा क्या हटाने लायक रहता ही नही, और फ़िर उसे मालूम है कि गाल हटायेगा तो उससे ज्यादा ज़ोर से कंही और लात पड़ेगी।इसिलिये उसने तय कर लिया है सरकार को जो करना है करे उसे तो सरकार को माफ़ करते जाना है बस।वो सुबह शाम चिल्लाता है क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को उत्पात!
अब देखिये ना पेट्रोल चार रूपये महंगा हो गया वो कुछ बोला क्या?क्या कहा,गरीब को पेट्रोल से क्या लेना?बात तो सही है,लेकिन पेट्रोल के दाम बढने से महंगाई बढते हैं ऐसा उन्होने सुना था।अब कहोगे कि सुनी सुनाई बात पे क्या भरोसा करना। अगर चार रूपये किमत बढने से महंगाई बढती तो टीवी वाले भैया लोग बताते नही क्या?वो तो सारे देश मे हंगामा कर देते गरीब कैसे जीयेगा?इसी बहाने थाली का बैग़न भी टी वी पर आ जाता?गरीबो के खाने मे ऐसा लगता है दाल तो है ही नही।सत्तर रूपये किलो दाम हो गये मगर कोई कुछ कह रहा है क्या?और फ़िर जब मीडिया नही कह रहा है तो कैसे मान ले महंगाई बढेगी?
अरे भैया पेट्रोल के दाम बढने पर राज्यसभा मे तक़ हंगामा हो गया।ट्रांस्पोर्टर मीटिंग कर रहे है।उन्के दाम बढेंगे तो सभी चीज़ों के दाम भी बढेंगे,तो फ़िर महंगाई कैसे नही बढेंगे?रहोगे न गरीब के गरीब?अरे टी वी नही देखा?किसी ने बताया क्या महंगाई बढेगी?नही ना। फ़िर काहे बकवास कर रहे हो।भैया उन लोगो को तो कल से लेकर आज तक़ समलैंगिको से फ़ुरसत नही मिल रही है।उन लोगो को गरीबों के बारे मे सोचने का वक़्त ही नही मिला होगा न्।फ़िर कितने गरीब टीवी देखते है?वे तो सुबह से घर-बार छोड़ कर रोजी-रोटी कमाने निकल जाता है।उसके पास ड्राईंग रूम डिस्कशन के लिये टेम ही कंहा होता।
पेट्रोल और ड़ीज़ल के दाम बढने की खबर तो ऐसे मर गई जैसे गरीब के घर मे बूढा बिना दवा के या बच्चा कुपोषण से मर जाता है।अडोसी-पडोसी को तक़ खबर नही होती और प्रभावित अपने रिश्तेदार को जैसे तैसे फ़ूंक-फ़ाक कर दूसरे दिन से ही रोज़ी-रोटी के जुगाड़ मे लग जाता है।उसके लिये समाज और धर्म के दूसरे कोई नियम लागू नही होते सिवाय रोज़ी-रोटी कमाने के।और उसका गरीब समाज भी उसे सामाजिक मान्यतायें तोड़ने पर भी क्षमा कर देता है क्योंकि क्षमा तो अब सिर्फ़ गरीब का आभूषण रह गया है।और फ़िर वो क्षमा नही करेगा तो कर भी क्या सकता है?वो तो समलैंगिको जितना भी खुशकिस्मत नही है जिसके लिये सारे देश मे हंगामा हो शोर हो।
एक बात है गरीब ने ज़िंदा रहने के लिये प्रकृति के अनुरूप ढलने के नियम को मज़बूरी मे ही सही पूरी-पूरी तरह स्वीकार कर लिया है और उसमे एक नियम है क्षमा का।क्षमा! चाहे कोई भी गलती करे,क्षमा गरीब ही करेगा।सरकार के मामले मे तो ये स्कूल कालेज के इम्तिहानो मे पूछे जाने वाले कमीने पहले सवाल की तरह अनिवार्य हो गया है।कुपोषण से लड़ने का दावा करती है सरकार,इन्फ़ैन्ट मोर्टेलिटी रेट नीचे लाने की बात करती है सरकार।क्या कभी सरकार ने बाज़ार जाकर दाल-आटे का भाव देखा है।कभी सुना करते थे एक मुहावरा दाल-आटे का भाव पता चलना।तब लगता था क्या दाल आटे की बार करते है लोग।पर अब पता चल रहा है कि दाल सत्तर रुपये किलो हो गई है।क्या गरीब रोज़ दाल खा सकता है?सरकार को तो चाहिये गरीबों को अपनी रानी या राजकुमार के फ़ोटो सहित दालो के पोस्टर बांट दे,जिन्हे देख कर सुखी रोटी और भात खायें और दाल का स्वाद और पौष्टिकता का भरपूर आनंद लें। और नही भी लेंगे तो क्या कर लेंगे सरकार को भी पता चल गया है गरीबो ने सुबह शाम यही भजन गाना शुरू कर दिया है,क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को……….………।
अब देखिये ना पेट्रोल चार रूपये महंगा हो गया वो कुछ बोला क्या?क्या कहा,गरीब को पेट्रोल से क्या लेना?बात तो सही है,लेकिन पेट्रोल के दाम बढने से महंगाई बढते हैं ऐसा उन्होने सुना था।अब कहोगे कि सुनी सुनाई बात पे क्या भरोसा करना। अगर चार रूपये किमत बढने से महंगाई बढती तो टीवी वाले भैया लोग बताते नही क्या?वो तो सारे देश मे हंगामा कर देते गरीब कैसे जीयेगा?इसी बहाने थाली का बैग़न भी टी वी पर आ जाता?गरीबो के खाने मे ऐसा लगता है दाल तो है ही नही।सत्तर रूपये किलो दाम हो गये मगर कोई कुछ कह रहा है क्या?और फ़िर जब मीडिया नही कह रहा है तो कैसे मान ले महंगाई बढेगी?
अरे भैया पेट्रोल के दाम बढने पर राज्यसभा मे तक़ हंगामा हो गया।ट्रांस्पोर्टर मीटिंग कर रहे है।उन्के दाम बढेंगे तो सभी चीज़ों के दाम भी बढेंगे,तो फ़िर महंगाई कैसे नही बढेंगे?रहोगे न गरीब के गरीब?अरे टी वी नही देखा?किसी ने बताया क्या महंगाई बढेगी?नही ना। फ़िर काहे बकवास कर रहे हो।भैया उन लोगो को तो कल से लेकर आज तक़ समलैंगिको से फ़ुरसत नही मिल रही है।उन लोगो को गरीबों के बारे मे सोचने का वक़्त ही नही मिला होगा न्।फ़िर कितने गरीब टीवी देखते है?वे तो सुबह से घर-बार छोड़ कर रोजी-रोटी कमाने निकल जाता है।उसके पास ड्राईंग रूम डिस्कशन के लिये टेम ही कंहा होता।
पेट्रोल और ड़ीज़ल के दाम बढने की खबर तो ऐसे मर गई जैसे गरीब के घर मे बूढा बिना दवा के या बच्चा कुपोषण से मर जाता है।अडोसी-पडोसी को तक़ खबर नही होती और प्रभावित अपने रिश्तेदार को जैसे तैसे फ़ूंक-फ़ाक कर दूसरे दिन से ही रोज़ी-रोटी के जुगाड़ मे लग जाता है।उसके लिये समाज और धर्म के दूसरे कोई नियम लागू नही होते सिवाय रोज़ी-रोटी कमाने के।और उसका गरीब समाज भी उसे सामाजिक मान्यतायें तोड़ने पर भी क्षमा कर देता है क्योंकि क्षमा तो अब सिर्फ़ गरीब का आभूषण रह गया है।और फ़िर वो क्षमा नही करेगा तो कर भी क्या सकता है?वो तो समलैंगिको जितना भी खुशकिस्मत नही है जिसके लिये सारे देश मे हंगामा हो शोर हो।
एक बात है गरीब ने ज़िंदा रहने के लिये प्रकृति के अनुरूप ढलने के नियम को मज़बूरी मे ही सही पूरी-पूरी तरह स्वीकार कर लिया है और उसमे एक नियम है क्षमा का।क्षमा! चाहे कोई भी गलती करे,क्षमा गरीब ही करेगा।सरकार के मामले मे तो ये स्कूल कालेज के इम्तिहानो मे पूछे जाने वाले कमीने पहले सवाल की तरह अनिवार्य हो गया है।कुपोषण से लड़ने का दावा करती है सरकार,इन्फ़ैन्ट मोर्टेलिटी रेट नीचे लाने की बात करती है सरकार।क्या कभी सरकार ने बाज़ार जाकर दाल-आटे का भाव देखा है।कभी सुना करते थे एक मुहावरा दाल-आटे का भाव पता चलना।तब लगता था क्या दाल आटे की बार करते है लोग।पर अब पता चल रहा है कि दाल सत्तर रुपये किलो हो गई है।क्या गरीब रोज़ दाल खा सकता है?सरकार को तो चाहिये गरीबों को अपनी रानी या राजकुमार के फ़ोटो सहित दालो के पोस्टर बांट दे,जिन्हे देख कर सुखी रोटी और भात खायें और दाल का स्वाद और पौष्टिकता का भरपूर आनंद लें। और नही भी लेंगे तो क्या कर लेंगे सरकार को भी पता चल गया है गरीबो ने सुबह शाम यही भजन गाना शुरू कर दिया है,क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को……….………।
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