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Sunday, August 23, 2015
यही हाल रहा महंगाई का तो घर की मुर्गी दाल बराबर नही,दाल से सस्ती कहलायेगी.
दाल के भाव जिस स्पीड से उपर उठ रहे है उससे लगता है कि"घर की मुर्गी दाल बराबर"इस मुहावरे में भी करेक्शन करना पड सकता है.हो सकता है किसी दिन दाल के भाव मुर्गी से ज्यादा हो जाये तब दाल बराबर तो नही रह जायेगी ना मुर्गी.तब कहना पडेगा कि घर कि मुर्गी दाल से सस्ती.बहुत कठीन दौर से गुज़र रही है बेचारी मुर्गी.पहले कब तक़ बचेगी मुर्गी कह कह कर लोग दुबला किये दे रहे थे और अब तो दाल से सस्ती कह कर इज़्ज़त का भी बंटाधार कर देंगे.मुर्गी खाने वाले भी बडी शान से कहा करते थे कि मुर्गी खा कर आ रहा हूं.अब अगर वि कंही खडा होकर टूथपिक से दांत कुरेदेगा तो हो सकता है बगल में खडा दालेरियन,वेजिटेरियन से दो ग्रेड उपर वाला ज़ोर से डकार ले और कहे कि अबे हम रोज़ दाल खाते है,समझा बे मुर्गी छाप.सच मुर्गी तो मुर्गी मुर्गी खाऊ चिकनेरियन भी अभूतपूर्व संकट के और से गुज़र रहे है़ं.इश्वर सरकार में बैठे लोगो को सद्बुद्धी दे कि वे मुर्गी की इज़्ज़त की खातीर,घर की मुर्गी दाल बराबर,इस मुहावरे पर छाये संकट को टालने के लिये ही सही दाल के दाम घटवा दे.जय हो मुर्गीटेरियन्ज़ की.
Thursday, July 30, 2009
कैसे चल रहा है काम-धंदा?चल रही दाल्…सारी अचार रोटी!
कल पुराने पडोसी पप्पी भैया घर आये।बातचीत मे उनसे पूछा कैसा चल रहा है गैरेज तो उन्होने कहा कि चल रही है दाल-रोटी।बस इसके बाद जो इस मुहावरे पर मैने उनकी खिंचाई की तो उन्होने हार के कहा ठीक है चल रही है अचार रोटी अब तो खुश!
पप्पी भैया और हम सालो अडोस-पडोस मे रहे।उस समय पूरे इलाके मे एक ही कार हुआ करती थी स्टैंडर्ड,जो उनके घर मे थी।ट्रांसपोर्ट का काम था।बस और ट्र्के भी थी। हम लोग बहुत छोटे थे उनके पापाजी अचानक चल बसे।फ़िर तरक्की की गाड़ी रूक गई लेकिन सम्पत्ती काफ़ी छोड़ गय्र थे इसलिये सघर्ष नही करना पड़ा।पप्पी भैया से मै काफ़ी छोटा था और उनका पिछलग्गू भी।उनकी कुशल ट्रेनिंग मे मैने सायकिल चलाना सिखा और पतंग उड़ाने से लेकर भौरा यानी लट्टू चलाना भी।अचानक हम लोगो को दूसरे घर शिफ़्ट होना पड़ा और कुछ समय बाद उन्होने भी घर छोड़ दिया।
घर भले ही दूर-दूर हो गये थे मगर रिश्तों मे दुरी नही आई थी।कल भी उसी रिश्ते के आधार पर घर आये और बोले यार तू अपने भतीजे का एडमिशन करवा ले वो मेरी जान खा रहा है।मैकेनिकल ब्रांच चाहिये और कालेज जो चाहे लेकिन पैसा कम लगना चाहिये।मैने हमेशा की तरह उन्हे छेड़ा क्या पप्पी भैया जब देखो रोते रहते हो।निकालो माल सब दबा कर बैठे हो,क्या ऊपर लेकर जाओगे।भैया का रिकार्ड कई साल से एक ही जगह अटका हुआ है और एक ही डायलाग रिपीट करता है।तेरे को हरा-हरा सूझ रहा है।मेरी हालत बहुत खराब है।मै समझ गया कि फ़िर सुई अटक गई है।मैने सब्जेक्ट बदला और पुछा गैरेज कैसा चल रहा है।सुदामा टोन पकड चुके पप्पी भैया ने आवाज़ को और ए के हंगल स्टाईल मे डाऊन किया बुरा हाल है।बड़ी मुश्किल से दाल रोटी चल रही है।
मैने पुछा रोज़ दाल रोटी खा रहे हो ना।वेबोले हां ।मैने कहा फ़िर कंहा से बुरा हाल है।उन्होने कहा तेरा दिमाग खराब हो गया है दाल का हाल से क्या लेना देना।मैने कहा है पप्पी भैया जिसकी हालत खराब हो वो रोज़ दाल खा ही नही सकता। अब तक़ उनकी समझ मे आ गया था कि दाल के भाव को लेकर ये घसीट रहा है।उन्होने कहा देख हमारे ज़माने तो ये ही मुहावरा था इस्लिये इस्तेमाल कर लिया अब अगर तुम लोगो ने कोई नया बनाया हो तो बताओ।मैने कहा दिल्ली सरकार को दाल सस्ती करके बेचना पड रहा है।दाल 80 रूपये किलो हो गई है और आप रोज़ दाल खा के कैसे गरीब हो सकते हो ये बताओ?वो बोले तू सही बोल रहा है।अब मै घर पर चाहे जो खाऊं मुझे बोलना क्या है ये तू ही बता दे।मैने कहा सब्जी-रोटी बोला करो।भैया बोले कभी गया है बज़ार?कभी खरीदी है सब्ज़ी?पता भी है दाल-आटे का भाव?मैने कहा देखा आ गये ना लाईन पर्।दाल सिर्फ़ हमारे ज़माने मे नही आपके ज़माने मे भी दुर्लभ चीज थी।उसका भाव हर किसी को नही मालूम था।जबरन हमारे ज़माने को कोस रहे है लोग्।वे बोले मेरा दिमाग मत खराब कर।सब्जी-रोटी भी नही अब कोई पूछेगा तो बताऊंगा चल रही है अचार-रोटी!बस अब खुश!वो सब छोड़ आज अपने भतीजे का एड़मिशन कन्फ़र्म करवा लेना।मै सीरियसली बोल रहा हूं हालत बहुत खराब है बड़ी मुश्किल से दाल नही नही अचार रोटी चल रही है!
Friday, July 3, 2009
क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को उत्पात!
गरीब छोटे घर किंतु बडे दिल वाला होता है।इतने बड़े दिल वाला कि आप उसे एक नही कई थप्पड़ मारिये वो गाल हटायेगा ही नही।हटायेगा क्या हटाने लायक रहता ही नही, और फ़िर उसे मालूम है कि गाल हटायेगा तो उससे ज्यादा ज़ोर से कंही और लात पड़ेगी।इसिलिये उसने तय कर लिया है सरकार को जो करना है करे उसे तो सरकार को माफ़ करते जाना है बस।वो सुबह शाम चिल्लाता है क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को उत्पात!
अब देखिये ना पेट्रोल चार रूपये महंगा हो गया वो कुछ बोला क्या?क्या कहा,गरीब को पेट्रोल से क्या लेना?बात तो सही है,लेकिन पेट्रोल के दाम बढने से महंगाई बढते हैं ऐसा उन्होने सुना था।अब कहोगे कि सुनी सुनाई बात पे क्या भरोसा करना। अगर चार रूपये किमत बढने से महंगाई बढती तो टीवी वाले भैया लोग बताते नही क्या?वो तो सारे देश मे हंगामा कर देते गरीब कैसे जीयेगा?इसी बहाने थाली का बैग़न भी टी वी पर आ जाता?गरीबो के खाने मे ऐसा लगता है दाल तो है ही नही।सत्तर रूपये किलो दाम हो गये मगर कोई कुछ कह रहा है क्या?और फ़िर जब मीडिया नही कह रहा है तो कैसे मान ले महंगाई बढेगी?
अरे भैया पेट्रोल के दाम बढने पर राज्यसभा मे तक़ हंगामा हो गया।ट्रांस्पोर्टर मीटिंग कर रहे है।उन्के दाम बढेंगे तो सभी चीज़ों के दाम भी बढेंगे,तो फ़िर महंगाई कैसे नही बढेंगे?रहोगे न गरीब के गरीब?अरे टी वी नही देखा?किसी ने बताया क्या महंगाई बढेगी?नही ना। फ़िर काहे बकवास कर रहे हो।भैया उन लोगो को तो कल से लेकर आज तक़ समलैंगिको से फ़ुरसत नही मिल रही है।उन लोगो को गरीबों के बारे मे सोचने का वक़्त ही नही मिला होगा न्।फ़िर कितने गरीब टीवी देखते है?वे तो सुबह से घर-बार छोड़ कर रोजी-रोटी कमाने निकल जाता है।उसके पास ड्राईंग रूम डिस्कशन के लिये टेम ही कंहा होता।
पेट्रोल और ड़ीज़ल के दाम बढने की खबर तो ऐसे मर गई जैसे गरीब के घर मे बूढा बिना दवा के या बच्चा कुपोषण से मर जाता है।अडोसी-पडोसी को तक़ खबर नही होती और प्रभावित अपने रिश्तेदार को जैसे तैसे फ़ूंक-फ़ाक कर दूसरे दिन से ही रोज़ी-रोटी के जुगाड़ मे लग जाता है।उसके लिये समाज और धर्म के दूसरे कोई नियम लागू नही होते सिवाय रोज़ी-रोटी कमाने के।और उसका गरीब समाज भी उसे सामाजिक मान्यतायें तोड़ने पर भी क्षमा कर देता है क्योंकि क्षमा तो अब सिर्फ़ गरीब का आभूषण रह गया है।और फ़िर वो क्षमा नही करेगा तो कर भी क्या सकता है?वो तो समलैंगिको जितना भी खुशकिस्मत नही है जिसके लिये सारे देश मे हंगामा हो शोर हो।
एक बात है गरीब ने ज़िंदा रहने के लिये प्रकृति के अनुरूप ढलने के नियम को मज़बूरी मे ही सही पूरी-पूरी तरह स्वीकार कर लिया है और उसमे एक नियम है क्षमा का।क्षमा! चाहे कोई भी गलती करे,क्षमा गरीब ही करेगा।सरकार के मामले मे तो ये स्कूल कालेज के इम्तिहानो मे पूछे जाने वाले कमीने पहले सवाल की तरह अनिवार्य हो गया है।कुपोषण से लड़ने का दावा करती है सरकार,इन्फ़ैन्ट मोर्टेलिटी रेट नीचे लाने की बात करती है सरकार।क्या कभी सरकार ने बाज़ार जाकर दाल-आटे का भाव देखा है।कभी सुना करते थे एक मुहावरा दाल-आटे का भाव पता चलना।तब लगता था क्या दाल आटे की बार करते है लोग।पर अब पता चल रहा है कि दाल सत्तर रुपये किलो हो गई है।क्या गरीब रोज़ दाल खा सकता है?सरकार को तो चाहिये गरीबों को अपनी रानी या राजकुमार के फ़ोटो सहित दालो के पोस्टर बांट दे,जिन्हे देख कर सुखी रोटी और भात खायें और दाल का स्वाद और पौष्टिकता का भरपूर आनंद लें। और नही भी लेंगे तो क्या कर लेंगे सरकार को भी पता चल गया है गरीबो ने सुबह शाम यही भजन गाना शुरू कर दिया है,क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को……….………।
अब देखिये ना पेट्रोल चार रूपये महंगा हो गया वो कुछ बोला क्या?क्या कहा,गरीब को पेट्रोल से क्या लेना?बात तो सही है,लेकिन पेट्रोल के दाम बढने से महंगाई बढते हैं ऐसा उन्होने सुना था।अब कहोगे कि सुनी सुनाई बात पे क्या भरोसा करना। अगर चार रूपये किमत बढने से महंगाई बढती तो टीवी वाले भैया लोग बताते नही क्या?वो तो सारे देश मे हंगामा कर देते गरीब कैसे जीयेगा?इसी बहाने थाली का बैग़न भी टी वी पर आ जाता?गरीबो के खाने मे ऐसा लगता है दाल तो है ही नही।सत्तर रूपये किलो दाम हो गये मगर कोई कुछ कह रहा है क्या?और फ़िर जब मीडिया नही कह रहा है तो कैसे मान ले महंगाई बढेगी?
अरे भैया पेट्रोल के दाम बढने पर राज्यसभा मे तक़ हंगामा हो गया।ट्रांस्पोर्टर मीटिंग कर रहे है।उन्के दाम बढेंगे तो सभी चीज़ों के दाम भी बढेंगे,तो फ़िर महंगाई कैसे नही बढेंगे?रहोगे न गरीब के गरीब?अरे टी वी नही देखा?किसी ने बताया क्या महंगाई बढेगी?नही ना। फ़िर काहे बकवास कर रहे हो।भैया उन लोगो को तो कल से लेकर आज तक़ समलैंगिको से फ़ुरसत नही मिल रही है।उन लोगो को गरीबों के बारे मे सोचने का वक़्त ही नही मिला होगा न्।फ़िर कितने गरीब टीवी देखते है?वे तो सुबह से घर-बार छोड़ कर रोजी-रोटी कमाने निकल जाता है।उसके पास ड्राईंग रूम डिस्कशन के लिये टेम ही कंहा होता।
पेट्रोल और ड़ीज़ल के दाम बढने की खबर तो ऐसे मर गई जैसे गरीब के घर मे बूढा बिना दवा के या बच्चा कुपोषण से मर जाता है।अडोसी-पडोसी को तक़ खबर नही होती और प्रभावित अपने रिश्तेदार को जैसे तैसे फ़ूंक-फ़ाक कर दूसरे दिन से ही रोज़ी-रोटी के जुगाड़ मे लग जाता है।उसके लिये समाज और धर्म के दूसरे कोई नियम लागू नही होते सिवाय रोज़ी-रोटी कमाने के।और उसका गरीब समाज भी उसे सामाजिक मान्यतायें तोड़ने पर भी क्षमा कर देता है क्योंकि क्षमा तो अब सिर्फ़ गरीब का आभूषण रह गया है।और फ़िर वो क्षमा नही करेगा तो कर भी क्या सकता है?वो तो समलैंगिको जितना भी खुशकिस्मत नही है जिसके लिये सारे देश मे हंगामा हो शोर हो।
एक बात है गरीब ने ज़िंदा रहने के लिये प्रकृति के अनुरूप ढलने के नियम को मज़बूरी मे ही सही पूरी-पूरी तरह स्वीकार कर लिया है और उसमे एक नियम है क्षमा का।क्षमा! चाहे कोई भी गलती करे,क्षमा गरीब ही करेगा।सरकार के मामले मे तो ये स्कूल कालेज के इम्तिहानो मे पूछे जाने वाले कमीने पहले सवाल की तरह अनिवार्य हो गया है।कुपोषण से लड़ने का दावा करती है सरकार,इन्फ़ैन्ट मोर्टेलिटी रेट नीचे लाने की बात करती है सरकार।क्या कभी सरकार ने बाज़ार जाकर दाल-आटे का भाव देखा है।कभी सुना करते थे एक मुहावरा दाल-आटे का भाव पता चलना।तब लगता था क्या दाल आटे की बार करते है लोग।पर अब पता चल रहा है कि दाल सत्तर रुपये किलो हो गई है।क्या गरीब रोज़ दाल खा सकता है?सरकार को तो चाहिये गरीबों को अपनी रानी या राजकुमार के फ़ोटो सहित दालो के पोस्टर बांट दे,जिन्हे देख कर सुखी रोटी और भात खायें और दाल का स्वाद और पौष्टिकता का भरपूर आनंद लें। और नही भी लेंगे तो क्या कर लेंगे सरकार को भी पता चल गया है गरीबो ने सुबह शाम यही भजन गाना शुरू कर दिया है,क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को……….………।
Friday, May 29, 2009
भगवान न करे बीबी के हाथ का "वैसा" गरम पराठा खाने की नौबत आये!
पराठे तरह-तरह के होते हैं।पराठा शब्द की व्याख्या शब्दो के सफ़र के महान यात्री अजित वड़नेरकर ने भी की है।उन्होने जो बताया वो तो अलग था मै जो बताने जा रहा हूं वो एक्सक्लूसीव है।पराठे की इस किस्म का स्वाद, मेरा दावा है बहुतो ने चखा होगा मगर कोई बतायेगा नही। हां,हो सकता है ये वेरायटी कुछ लोगो के लिय नई हो,तो अब पता लगने के बाद वे कह सकते है कि भगवान न करे कभी बीबी के हाथ के वैसे गरम पराठे खाने की नौबत आये।
आज ज़रा मै जल्दी क्लब पहुंच गया था।क्लब मे काफ़ी भीड़ नज़र आई।भारी भीड़ देखकर मेरे मुंह से सालो पुराना हिट डायलाग निकला कि क्यों गिफ़्ट वाली कान्फ़्रेंस है क्या?कुछ सच्ची और कुछ कच्ची यानी खिसियानी हंसी के साथ सब ने कहा नही रोज़ जितने ही है।आज आप कुछ जल्दी आ गये ।अन्दर जाकर देखा तो गब्बर शुक्ला,शिशुपाल त्रिपाठी और प्रभुदीन गुप्ता की तिकड़ी कोने मे बैठी किसी गुंताड़े मे मगन थी।मै सीधा उनके पास पहुंचा और बिना फ़ार्मेलिटी के उनसे पूछा कि क्यों बे कमीनो किसकी वाट लगाने का इंतज़ाम कर रहे हो।तीनो एक साथ चिल्लाये आपको तो बस हरा-हरा सूझता है।यंहा सब परेशान है और आप्…………। अबे तुम लोग परेशान हो?साले तुम से तो सारा शहर परेशान है?तीनो फ़िर एक सुर मे बोले फ़िर वही बात।ये नही कि अपने छोटे भाईयो से पूछे कि क्या हाल है?सब ठीक तो है ना?तीनो मुझ पर चढने लगे थे।मैने सीधे अपने ट्रंप कार्ड़ का इस्तेमाल किया सालो सुबह-सुबह पीकर आ गये क्या?
अब क्या था तीनो दाना-पानी लेकर मुझ पर चढ दौड़े।तीनो की एकता देख कर मै थोड़ा घबराया और तत्काल उनमे फ़ूट डालने की स्कीम सोचने लगा।इधर तीनो का बड़बड़ाना जारी था।जब देखो पीकर आया है क्या बे?एक तो पिलाना-विलाना है नही और ऊपर से पिलाने वालो को गाली बकना,उनको बिदकाना और भगा देना।बस यही काम रह गया है।पूछना भी ज़रूरी नही समझते की क्या बात है भाई परेशान दिख रहा है?शिशुपाल का ये डायलाग तो मुझे अजीत अगरकर की शाटपीच बाल लगी और इस मौके को गवाये बिना ही मैने उसे हुक कर दिया।
तीनो मे फ़ूट ड़ालने का गोल्डन चांस हाथ लगा था और मैने उसे खराब होने नही दिया।मैने तत्काल सुर ढीले किये और कहा भाई शिशुपाल तू तो थोड़ा परेशान नज़र आ रहा है मगर गब्बर तो कंही से परेशान नज़र नही आ रहा है। चेहरा तो ऐसा चमक रहा जैसे बहु ने डेंटिंग-पेंटिंग करके भेजा है।वैसे इस मामले मे वो तुम दोनो से अच्छी तक़दीर वाला तो है।बस अब क्या था प्रभूदीन फ़ट पड़ा।उसका मुंह खुलते देख गब्बर बोला भी अबे ये लड़ाई करवा रहे हैं।मै बोला साले मै लडाई करवा रहा हूं, है ना?और तू उस दिन क्या बोल रहा था प्रभूदीन के बारे मे? बताऊं?
अब तो प्रभूदीन का पारा मौसम के पारे से भी ऊपर पहुंच गया।वो बोला ये क्या बतायेगा इसकी हालत जानते है हम लोग्।मै बोला लेकिन चेहरा तो चमक रहा है साले का। हूंह कहकर बुरा सा मुंह बनाया प्रभूदीन ने।मैने फ़िर से उसके नरम होते तेवर को हवा दी और कहा कि ये तो बता रहा था कि तेरे को आजकल ओव्हर टाईम भी करना पड़ रहा है।कहां?मैने कहा घर में?क्या?मै बोला ये बता रहा था काम वाली बाई तेरी हरक़तो से तंग आकर काम पर नही आ रही है तो भाभी ने उसकी ड्यूटी तेरे को दे दी है।
बस इतना सुनना था कि प्रभूदीन का ब्रेक फ़ेल हो गया।गब्बर के साथ-साथ शिशुपाल भी चिल्लाया मरवायेगा साले। आ गया ना इनके चक्कर में।पर तब-तक़ तो प्रभूदीन की गाड़ी स्पीड पकड़ चुकी थी।वो बोला आप कह रहे थे ना इसका चेहरा चमकते रह्ता है और तुम लोग फ़टीचर नज़र आते हो।तो सुनो इसके चेहरे के चमकने का राज़्।ये रोज़ सुबह गरम पराठा खाकर आता है।मैने शोले फ़िलिम का डायलाग याद करते हुये लोहा गरम देखकर चोट कर दी।मै बोला ये तो तक़दीर की बात है बे बीबी गरम-गरम पराठा खिलाये…॥मेरी बात को आधे मे ही काटते हुये वो बोला पूरा तो सुन लो गुरूजी।भगवान न करे वैसा पराठा खाने की नौबत आये।मै बोला पागल हो गया है क्या बे?एक तो बीबी गर्मागर्म पराठे खिलाये और्…वो बोला गुरूजी पूरी बात तो सुन लो।
अब प्रभूदीन गब्बर से बोला क्यों बेटा!बहुत पोक(लीक कर)रहा है आज कल।गब्बर और शिशुपाल एक साथ बोले अपन आपस मे निपट लेंगे इनके चक्कर मे मत आ।वो बोला भैया ये आज भी पराठा खाकर आया है।मै बोला क्या बड़बड़ा रहा है बे पराठा-पराठा।वही तो बता रहा हूं।ये रोज़ सुबह पराठा ही खाता है।रात को पीकर घर जाता है तो भौजी भड़क जाती और रात को खाना नही देती।सुबह रात की बची हुई सब्जी,दाल, चावल और रोटी सब को मिलाकर पराठा बनाती है और इसको देती है।बिना कुछ बोले मुंह फ़ुलाये।उसका चेहरा देखो तो समझ मे आ जाता हे जैसे कह रही हो ले खा,मर।
अब बताओ खाया है ऐसा पराठा।अब गब्बर भड़क ग़या साले सुनना है नही बस बक़-बक़ करना। अब ले,ये सारे शहर को घूम-घूम कर बतायेंगे गब्बर पराठा खाता है,गब्बर पराठा खाता है।वो बोला, तू क्यो बोला मै ओव्हरटाईम करता हूं। अबे मै नही बोला।तो शिशुपाल बोला होगा।शिशुपाल बोला भाई मै वैसे भी बहुत परेशान हूं मुझे तो बख्श दो।वो बोला अच्छा बेटा, अपना नम्बर आया तो मुझे बख्श दो।तेरे बारे मे बताऊं।मैने कहा बताओ प्रभूदीन इनसे डरने की ज़रूरत नही है।वो बोला डर और इनसे।बताऊं बे शिशुपाल्।ओरिजिनल शिशुपाल भी सौवी गलती करने के बाद इतना नर्वस नही हुआ होगा जितना ये कल्युगी नज़र आया।प्रभूदीन ने वो क्या खाता है क्या बताया, फ़िर कभी बताऊंगा।मगर आपको गब्बर के पराठे कैसे लगे बताईगा ज़रूर्।
आज ज़रा मै जल्दी क्लब पहुंच गया था।क्लब मे काफ़ी भीड़ नज़र आई।भारी भीड़ देखकर मेरे मुंह से सालो पुराना हिट डायलाग निकला कि क्यों गिफ़्ट वाली कान्फ़्रेंस है क्या?कुछ सच्ची और कुछ कच्ची यानी खिसियानी हंसी के साथ सब ने कहा नही रोज़ जितने ही है।आज आप कुछ जल्दी आ गये ।अन्दर जाकर देखा तो गब्बर शुक्ला,शिशुपाल त्रिपाठी और प्रभुदीन गुप्ता की तिकड़ी कोने मे बैठी किसी गुंताड़े मे मगन थी।मै सीधा उनके पास पहुंचा और बिना फ़ार्मेलिटी के उनसे पूछा कि क्यों बे कमीनो किसकी वाट लगाने का इंतज़ाम कर रहे हो।तीनो एक साथ चिल्लाये आपको तो बस हरा-हरा सूझता है।यंहा सब परेशान है और आप्…………। अबे तुम लोग परेशान हो?साले तुम से तो सारा शहर परेशान है?तीनो फ़िर एक सुर मे बोले फ़िर वही बात।ये नही कि अपने छोटे भाईयो से पूछे कि क्या हाल है?सब ठीक तो है ना?तीनो मुझ पर चढने लगे थे।मैने सीधे अपने ट्रंप कार्ड़ का इस्तेमाल किया सालो सुबह-सुबह पीकर आ गये क्या?
अब क्या था तीनो दाना-पानी लेकर मुझ पर चढ दौड़े।तीनो की एकता देख कर मै थोड़ा घबराया और तत्काल उनमे फ़ूट डालने की स्कीम सोचने लगा।इधर तीनो का बड़बड़ाना जारी था।जब देखो पीकर आया है क्या बे?एक तो पिलाना-विलाना है नही और ऊपर से पिलाने वालो को गाली बकना,उनको बिदकाना और भगा देना।बस यही काम रह गया है।पूछना भी ज़रूरी नही समझते की क्या बात है भाई परेशान दिख रहा है?शिशुपाल का ये डायलाग तो मुझे अजीत अगरकर की शाटपीच बाल लगी और इस मौके को गवाये बिना ही मैने उसे हुक कर दिया।
तीनो मे फ़ूट ड़ालने का गोल्डन चांस हाथ लगा था और मैने उसे खराब होने नही दिया।मैने तत्काल सुर ढीले किये और कहा भाई शिशुपाल तू तो थोड़ा परेशान नज़र आ रहा है मगर गब्बर तो कंही से परेशान नज़र नही आ रहा है। चेहरा तो ऐसा चमक रहा जैसे बहु ने डेंटिंग-पेंटिंग करके भेजा है।वैसे इस मामले मे वो तुम दोनो से अच्छी तक़दीर वाला तो है।बस अब क्या था प्रभूदीन फ़ट पड़ा।उसका मुंह खुलते देख गब्बर बोला भी अबे ये लड़ाई करवा रहे हैं।मै बोला साले मै लडाई करवा रहा हूं, है ना?और तू उस दिन क्या बोल रहा था प्रभूदीन के बारे मे? बताऊं?
अब तो प्रभूदीन का पारा मौसम के पारे से भी ऊपर पहुंच गया।वो बोला ये क्या बतायेगा इसकी हालत जानते है हम लोग्।मै बोला लेकिन चेहरा तो चमक रहा है साले का। हूंह कहकर बुरा सा मुंह बनाया प्रभूदीन ने।मैने फ़िर से उसके नरम होते तेवर को हवा दी और कहा कि ये तो बता रहा था कि तेरे को आजकल ओव्हर टाईम भी करना पड़ रहा है।कहां?मैने कहा घर में?क्या?मै बोला ये बता रहा था काम वाली बाई तेरी हरक़तो से तंग आकर काम पर नही आ रही है तो भाभी ने उसकी ड्यूटी तेरे को दे दी है।
बस इतना सुनना था कि प्रभूदीन का ब्रेक फ़ेल हो गया।गब्बर के साथ-साथ शिशुपाल भी चिल्लाया मरवायेगा साले। आ गया ना इनके चक्कर में।पर तब-तक़ तो प्रभूदीन की गाड़ी स्पीड पकड़ चुकी थी।वो बोला आप कह रहे थे ना इसका चेहरा चमकते रह्ता है और तुम लोग फ़टीचर नज़र आते हो।तो सुनो इसके चेहरे के चमकने का राज़्।ये रोज़ सुबह गरम पराठा खाकर आता है।मैने शोले फ़िलिम का डायलाग याद करते हुये लोहा गरम देखकर चोट कर दी।मै बोला ये तो तक़दीर की बात है बे बीबी गरम-गरम पराठा खिलाये…॥मेरी बात को आधे मे ही काटते हुये वो बोला पूरा तो सुन लो गुरूजी।भगवान न करे वैसा पराठा खाने की नौबत आये।मै बोला पागल हो गया है क्या बे?एक तो बीबी गर्मागर्म पराठे खिलाये और्…वो बोला गुरूजी पूरी बात तो सुन लो।
अब प्रभूदीन गब्बर से बोला क्यों बेटा!बहुत पोक(लीक कर)रहा है आज कल।गब्बर और शिशुपाल एक साथ बोले अपन आपस मे निपट लेंगे इनके चक्कर मे मत आ।वो बोला भैया ये आज भी पराठा खाकर आया है।मै बोला क्या बड़बड़ा रहा है बे पराठा-पराठा।वही तो बता रहा हूं।ये रोज़ सुबह पराठा ही खाता है।रात को पीकर घर जाता है तो भौजी भड़क जाती और रात को खाना नही देती।सुबह रात की बची हुई सब्जी,दाल, चावल और रोटी सब को मिलाकर पराठा बनाती है और इसको देती है।बिना कुछ बोले मुंह फ़ुलाये।उसका चेहरा देखो तो समझ मे आ जाता हे जैसे कह रही हो ले खा,मर।
अब बताओ खाया है ऐसा पराठा।अब गब्बर भड़क ग़या साले सुनना है नही बस बक़-बक़ करना। अब ले,ये सारे शहर को घूम-घूम कर बतायेंगे गब्बर पराठा खाता है,गब्बर पराठा खाता है।वो बोला, तू क्यो बोला मै ओव्हरटाईम करता हूं। अबे मै नही बोला।तो शिशुपाल बोला होगा।शिशुपाल बोला भाई मै वैसे भी बहुत परेशान हूं मुझे तो बख्श दो।वो बोला अच्छा बेटा, अपना नम्बर आया तो मुझे बख्श दो।तेरे बारे मे बताऊं।मैने कहा बताओ प्रभूदीन इनसे डरने की ज़रूरत नही है।वो बोला डर और इनसे।बताऊं बे शिशुपाल्।ओरिजिनल शिशुपाल भी सौवी गलती करने के बाद इतना नर्वस नही हुआ होगा जितना ये कल्युगी नज़र आया।प्रभूदीन ने वो क्या खाता है क्या बताया, फ़िर कभी बताऊंगा।मगर आपको गब्बर के पराठे कैसे लगे बताईगा ज़रूर्।
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