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Sunday, August 11, 2013
जिसने भी बनाया,बहुत सोच समझ कर बनाया है टीवी का रिमोट
पहले पहल रिमोट को देखा तोम बडा अजीब सा लगा था.सालो साल उसकी उपयोगिता पर सवाल खडे होते रहे.उसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग तब दूरदर्शन के लोकप्रिय कार्यक्रमो के बीच आने वाले परिवार नियोजन के विग्यापन"इनकी खुशी का राज,डिलक्स निरोध"को बदलने के लिये होता रहा.तब सोचता था कौन मूर्ख है जो टीवी बनाने के बाद एकाध बार चैनल बदलने के लिये रिमोट का आविष्कार करने मे खोपडी खपाये रहा.पर आज पता चल रहा है रिमोट के आविष्कारक भैया तो दूरदर्शन से भी दूरदर्शी निकले.उन्हे पता था कि आने वाले समय में डिलक्स निरोध जैसे सुसंकृ्त विग्यापन की मां बहन एक करने वाले एक से बढ कर एक फ्लेवर्ड कण्डोम के विग्यापन आ जायेंगे.गनिमत है साले लाईव शो,या रियेल्टी शो की तर्ज़ पर लाईव विग्यापन नही दिखा रहे है.वे तो फिर भी रोजी रोटी के लिये सब बेच रहे है,इमान तक.मगर उससे भी ज्यादा नंगई पर तो न्यूज़ चैनल उतर आये है.रोटी के लिये तरस रही एक बडी आबादी के इस देश में वे लोग टोपी पर बहस करते है,रोटी पर नही!तो ऎसे में रिमोट ही तो है जो अधिकांश टीवी सेट को फूटने से बचा रहा है.और आज जब मेरे ग्यान चक्षु खुले तो समझ में आया कि रिमोट बनाने वाला मूर्ख नही परम विद्वान था जिसे हमारे यंहा के न्यूज़ चैनलो की मूर्खता का पहले से ही अंदाज़ा हो गया था.खटाक चैनल बदल लो भाई अगर मेरा चैनल पसंद नही है तो.हअहाहाहाहाहा
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Sunday, May 13, 2012
खुद जब स्टींग करके सांसदो को नंगा करते रहे तब.हमारा असर और अब जब टीम अन्ना या बाबा रामदेव कह रहे है तो नाईंसाफी?
संसद की पहली बैठक को आज साठ साल हो गये है.संसद में समारोह है और बाहर टीवी पर हमेशा की तरह समाचारो के अभाव में बहस शुरु हो गई है.किसी की बहस बडी है तो किसी की महा बहस है.बहस बस बहस है कोई खबर आ गई या दिन गुज़र जाने के बाद वो बहस वो मुद्दा भैंस बनकर चला जाता है पानी में.फिर कोई नई बहस न्या मुद्दा पकड लेते है भाई लोग.संसद की पहली बैठक के साठ साल पूरे होने पर बहस भी क्या हो रही है क्या संसद और सांसदो पर लगने वाले आरोप नाईंसाफी है?बताईये भला इन लोगो को संसद और संसदीय प्रणाली की विश्वसनीयता कि चिंता हो रही है?खुद जब स्टींग करके सांसदो को नंगा करते रहे तब.हमारा असर और अब जब टीम अन्ना या बाबा रामदेव कह रहे है तो नाईंसाफी?यानी जो कुछ आरोप लगाना है उसका ठेका सिर्फ राजनीति के नये दुकानदारो के पास ही रहना चाहिये.बह्स ही करनी थी तो करते इन साठ सालों मे संसद जनता की आशाओं पर कंहा तक़ खरी उतरी है.क्या इस देश में महंगाई,भूख,बेरोज़गारी और हिंसा बढने के लिये देश के कर्णधार नेता ज़िम्मेदार नही है?जनता की आवाज़ होने का खोखला दावा करने वाले ढोंगी,पाखण्डी लोग बहस भी कर रहे हैं तो जनता के नही सांसदो के हक़ में.पता नही क्या चाहते है ये बहसबाज़?
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