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Monday, September 5, 2011

सरकार अब देश के अंदर बैठे दुश्मनों से निपटे या हेडली-फ़ेडली से निपटे।अब विकीलीक्स को कौन समझाये,किसे निपटाना जरूरी है

विकीलीक्स का बड़ा खुलासा!भारत सरकार हेडली के प्रत्यार्पण के लिये गंभीर नही थी!गलत बात!बिल्कुल गलत!भारत सरकार पर इस तरह के बेहुदे आरोप बर्दाश्त नही किये जा सकते!भारत सरकार तो पूरी ताकत लगा रही है भारत के सबसे बड़े दुश्मन अन्ना एण्ड कंपनी और रामदेव बाबा,ओम पुरी,कुमार विश्वास जैसे भ्रष्टाचार विरोधी लोगो को बुक करने के लिये।कोई बताये भला एक के बाद एक नोटिस और गिरफ़्तारी की कोशिश।सरकार अब देश के अंदर बैठे दुश्मनों से निपटे या हेडली-फ़ेडली से निपटे।अब विकीलीक्स को कौन समझाये,किसे निपटाना जरूरी है।

Sunday, August 28, 2011

।कोर कमेटी ने ऐसा कर ऐसा लगता है कि भ्रष्ट लोकतंत्र से मुक्ति दिलाकर पूंजीपतियों के जाल में ला पटका

चलो जनता की जीत हुई।अन्ना ने अनशन स्थगित कर दिया और अस्पताल चले गये।हम लोग भी लग गये अपने अपने काम से।पर एक सवाल फ़िर सामने आ गया है।क्या अन्ना को किसी फ़टिचर सरकारी अस्पताल में नही जाना चाहिये था।इसी बहाने उसका भी उद्धार हो जाता और मरीज़ों का भी भला हो जाता।अब वे भारत के सबसे महंगे फ़ाईव स्टार अस्पताल में गये है,जो खासकर विदेशी मरीज़ों को ध्यान में रख कर बनाया गया है।कोर कमेटी ने ऐसा कर ऐसा लगता है कि भ्रष्ट लोकतंत्र से मुक्ति दिलाकर पूंजीपतियों के जाल में ला पटका है।

Saturday, August 27, 2011

जीत का तो हमेशा जश्न ही होता है,समीक्षा हार की होती है,जय हो अन्ना,जय जनता जनार्दन की।

जीत का तो हमेशा जश्न ही होता है,समीक्षा हार की होती है।ऐसा ही कुछ हो रहा है टीम अन्ना के साथ और कांग्रेस के साथ।कल तक़ जो अन्ना के अनशन पर अंट-शंट बोल भी रहे है थे शायद जीत का झण्डा लेकर विजय जुलूस में शामिल मिले,बहुत से तो आज से ही चालू हो गये हैं।मगर तक़लीफ़ तो कांग्रेस कैम्प में होगी।क्या बहाने बनायेंगे,बडबोले क्राईसिस मैनेजर,एक से बढकर एक धांसू आईडिया सामने रखे थे,सब फ़ेल।अब करो समीक्षा,जीत ही गया,भ्रष्ट,जाहिल भगोड़ा हवलदार्।जय हो ,अन्ना।ज्नता जनार्दन की जय हो।

Wednesday, August 24, 2011

सरकारी नौकरी से रिटायर होकर बहुतों ने बहुत कुछ कहा,मगर नौकरी में रह्ते हुये खुले आम ऐलान,सलाम करता हूं,अजय पांडे को

तीस हज़ारी अदालत के जज अजय पांडे ने अन्ना के मंच पर खुल कर कहा कि न्यायपलिका को भी लोकपाल के दायरे में लाना चाहिये।उनकी आवाज़ शायद हर आम हिंदुस्तानी की आवाज़ है,भ्रष्ट व्यवस्था के फ़ंसा,भीतर ही भीतर सुलग रहे एक इमानदार सरकारी कर्मचारी-अधिकारी की आवाज़ है,असंतोष से लबालब युवा की आवाज़ है।सरकारी नौकरी से रिटायर होकर बहुतों ने बहुत कुछ कहा,मगर नौकरी में रह्ते हुये खुले आम ऐलान,सलाम करता हूं,अजय पांडे को उन्के जज़्बे को।

Tuesday, August 23, 2011

नक्सलवादियों से आतंकवादियों से,अलगाववादियों से,अलग कश्मीर मांगने वालों से और तो और पाकिस्तान से भी बात कर सकती है सरकार बस अन्ना को छोड कर?क्यों?

जिस तरीके से सरकार अन्ना के अनशन की अनदेखी कर समय टाल रही है उससे लगता है कि वो भ्रष्टाचार खतम करे या ना करे अन्ना को तो खतम करके ही रहेगी।ना रहेगा अन्ना और ना रहेगा फ़िर किसी अनशन-फ़नशन का टेनशन।बस समय काटो बयानबाज़ी में और तबियत खराब से और ज्यादा खराब करो को अन्ना की,और कुछ गड़बड़ हुई तो सारा दोष डाल दो उनकी टीम और मीडिया पर।सब मंज़ूर है बस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोई आवाज़ तक़ नही।

सरकार भ्रष्टाचार खतम करे या ना करे अन्ना और अनशन को तो खतम करके रहेगी,लगता है!

जिस तरीके से सरकार अन्ना के अनशन की अनदेखी कर समय टाल रही है उससे लगता है कि वो भ्रष्टाचार खतम करे या ना करे अन्ना को तो खतम करके ही रहेगी।ना रहेगा अन्ना और ना रहेगा फ़िर किसी अनशन-फ़नशन का टेनशन।बस समय काटो बयानबाज़ी में और तबियत खराब से और ज्यादा खराब करो को अन्ना की,और कुछ गड़बड़ हुई तो सारा दोष डाल दो उनकी टीम और मीडिया पर।सब मंज़ूर है बस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोई आवाज़ तक़ नही।

Monday, August 22, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे आंदोलन का विरोध करना क्या भ्रष्टाचार का समर्थन नही है?

अगर अन्ना या उनके आंदोलन का समर्थन करना, संसदीय प्रणाली,संसद,संविधान या लोकतंत्र की अवमानना है,उसका विरोध है,तो फिर क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे आंदोलन का विरोध करना या उसका समर्थन नही करना या तटस्थ रहना,भ्रष्टाचार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से समर्थन करना नही है?

Saturday, August 20, 2011

अन्ना सुझाव दे रहे हैं तो मानते नही और अब जनता से विज्ञापन के जरिये सुझाव मांग रही है!सबको मूर्ख समझ लिया है शायद।

जो सुझाव दे रहे हैं,सुझाव देने के लिये अनशन कर रहे हैं,उनकी तो सुन नही रही है सरकार!और अब पब्लिक से सुझाव मांग रही है स्टैंडिंग कमे्टी।मिल रहा है उसे कूड़े में फ़ेंक रहे हैं और विज्ञापन देकर मांगने का बहाना करके पब्लिक को गुमराह कर रहे हैं।आखिर चाह्ती क्या है सरकार,समझती क्या है सरकार जनता को?जनता सब समझ रही है।इस बात को कौन समझायेगा अड़ियल सरकार के आकाओं को।पता नही और क्या-क्या करना पड़े,सब करेगी सरकार बस जनलोकपाल की मांग को छोड़ कर्।

Sunday, August 14, 2011

यानी अब जो भी सरकार के खिलाफ बोलेगा,उसे या तो पीटा जायेगा,या उसे दुनिया भर के आरोप लगा कर भरे बाज़ार नंगा कर दिया जायेगा

 एक और छोटी सी पोस्ट.यानी अब जो भी सरकार के खिलाफ बोलेगा,उसे या तो पीटा जायेगा,या उसे दुनिया भर के आरोप लगा कर भरे बाज़ार नंगा कर दिया जायेगा.मतलब ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी.अच्छा हुआ अपुन ने कुछ नही बोला वर्ना स्कूल में पेंसिल,कापी,से लेकर टिफीन की रोटियां,टाफी,छोटे भाई-बहन के गुल्लक से चवन्नी-अट्ठनी चुराने के सारे किस्से सामने आ जाते.बच गया भाई.बाप रे बाप क्या सिस्ट्म है,सूचना एकत्रित करने का.साला जेम्स बाण्ड भी पांव पकड कर चेला बनाने कि चिरउरी करता.

Sunday, June 5, 2011

बचा क्या था,गोलिया चला देते!रामलीला मैदान को जलियांवाला बना देते!तब गोरे थे अब काले अंग्रेज़ हैं।

कल रात जो कुछ भी हुआ वैसा न कभी देखा गया था और ना ही कभी सुना गया था।एक आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ़ शुरू हुआ भी नही था कि उसे लाठियों के बल पर कुचल दिया गया।शायद ये स्वतंत्र भारत के इतिहास मे पहला मौका होगा जब आधी रात को आंसू-गैस के गोलों की बरसात की गई हो,लाठियां बेरहमी से बरसी हो और महिलाओं तक़ के साथ धक्का-मुक्की की गई हो।ये काला दिन बर्बरता के इतिहास के पन्नों मे सुनहरे अक्षरो से ही लिखा जायेगा।बस गोलियां नही चली थी वर्ना देश एक और जलियांवालां बाग देख लेता।फ़िर फ़र्क़ कुछ भी तो नही था तब और अब में।तब गोरे अंग्रेज़ यंहा का खज़ाना लूटने के लिये सब कुछ कर रहे थे और अब काले अंग्रेज़,हां काले अंग्रेज़ ही कहना चाहिये क्योंकि वे भी सुरक्षा मे लगे हुये हैं विदेशों मे जमा काले धन की।                                                                                                                                                        लाठी चार्ज़,आंसू गैस और फ़ोर्स का जमावाड़ा तो किसी आंदोलन के हिंसक होने पर ही किया जाता है।ऐसा क्या करने वाले थे रामदेव बाबा,चलो बाबा नही कहेंगे,और उनके समर्थक जो इतना कड़ा कदम उठाना पड़ गया दिल्ली सरकार को या यूपीऐ सरकार की कठपुतली को।क्या इससे पहले आंदोलन नही हुये हैं,इस देश में?अभी हाल ही में जाटों ने आंदोलन किया था अपनी मांगो के लिये।वे पटरी पर बैठ गये थे?रेल सेवायें ठप हो गई थी?तब क्या ऐसा ही किया था सरकार ने?जैसा कूटा भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वालों,क्या कभी वैसा कूटा गया है भ्रष्टाचार करने वालों को?                                                                                                                                               आखिर चाहती क्या है सरकार?भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोई आवाज़ ना उठाये?उसके खिलाफ़ कोई आंदोलन ना हो?सारे चोट्टे चैन से हरामखोरी करते रहें?उसी कमाई से चुनाव लड़े और देश की जनता का खून चूसते रहे?राजा,कलमाड़ी,कन्नीमोज़ी,चौहान जैसों की फ़ौज़ तैयार होती रहे?करोड़ो लोग एक वक़्त खाना,रात को पेट पीठ से बांध कर भूखे सोते रहें,खुले आसमान के नीचे?काला धन वालों की कोठियां सजती रही?गरीबी लड़कियों को कोठे तक़ पंहुचाती रही?भ्रष्टाचार के खिलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ को कुचला जाता रहे?हरामखोरी के सारे रास्ते साफ़ हो जाये,कोई भी अडंगा या रोड़ा बाकी ना रहे?आखिर क्या चाह्ती है सरकार?                                   फ़िर बात की जाती है लोकतंत्र की,राजनीति की।तो जो राज कर रहा है,वही राजनीति करता रहे?दूसरा कोई विरोध भी ना करे?सिर्फ़ उन्ही को हक़ है अपनी बात कहने का,या दूसरों की आवाज़ का गला घोटने का?ये कैसा लोकतंत्र है जंहा विरोध करने की,आंदोलन करने की भी स्वतंत्रता नही है।अच्छा हुआ बापू निकल लिये,वरना अगर वे इनके राज मे अनशन पर होते तो ये साले उन्हे भी कूटते और उनसे पूछते कि राजनीति क्यों कर रहे हो।भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर भी अगर जनता को आवाज़ उठाने से रोका जायेगा तो जनता जायेगी कंहा?                 सारी तिकड़में देख कर तो यही साबित होता है कि सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कुछ भी सुनना पसंद नही है?उसके खिलाफ़ जो आवाज़ उठेगी वो कुचल दी जायेगी।चाहे अन्ना हो या बाबा हो।किसी को नही बख्शा जायेगा।सब को पीटा जायेगा और कूटा जायेगा।पहले चर्चा करते हैं फ़िर प्र्स्ताव मांगते है,फ़िर सहमति का नाटक करते हैं और अंत मे क्या करते हैं,लाठियां चलाते हैं,वो भी आधी रात को।शर्म भी नही आती और राजनीति से चुक गये लोग आकाओं को खुश करने के लिये बर्बरता को जायज ठहराने में होड़ लगाते हैं।इससे अच्छा तो भ्रष्टाचार को वैध घोषित कर दो और जैसी कर चोरों को आय सरेंडर करके काले को सफ़ेद करने की छूट होतीहै वैसी इसमे भी दे दो।सरकार को कुछ प्रतिशत टैक्स दो और चूसो खून जनता का।और भविष्य मे कोई विरोध ना इसके लिये चलवा देना था गोलियां रामलीला मैदान पर,नई पीढी को भी परखने का मौका मिल जाता कि कौन ज्यादा एक्स्पर्ट है जनता को कुचलने में गोरे या काले अंग्रेज़।ये मेरे विचार हैं किसी का सहमत होना ज़रूरी नही है और जो असहमत हैं उन्हे कोई बात अगर बुरी लगी हो तो एडवांस मे माफ़ी मांग लेता हूं,क्या पता कब लाठियों की बरसात इस गरीब के सर पर भी हो जाये।