Showing posts with label अयोध्या. Show all posts
Showing posts with label अयोध्या. Show all posts

Thursday, September 30, 2010

जूते,लाठी,आज़ादी और हम!

कहने को बहुत कुछ है मगर आज ज्यादा कुछ कहने का मन नही है।आज़ादी के सालों बाद भी क्या हम आज़ादी का असली मतलब समझ पायें है?ये सवाल आज भी परेशान करता है।आज़ादी के बाद सारी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप मे स्थापित इस देश में अगर लोकतंत्र के ही एक स्तंभ न्यायपालिका के फ़ैसले पर सारे देश मे हाय-तौबा मचने लगे तो क्या फ़ायदा लोकतांत्रिक देश होने का।आज़ाद देश में अगर किसी मामले मे फ़ैसला आने मे साठ साल लग जाये और जब फ़ैसला आये तो सारे देश में गृह-युद्ध सी स्थिति बन जाये तो फ़िर क्या फ़ायदा हमारे आज़ाद होने का।मेरे शहर में आज़ादी का स्मारक जय स्तंभ जूते-लाठी के सायें मे नज़र आया।हो सकता है कुछ शहरों में लाठी की जगह बंदूक भ‍ि नज़र आई हो।अदालत का एक फ़ैसला और सारे देश में कर्फ़्यू,रेड एलर्ट,हाई एलर्ट,फ़्लैग मार्च, दफ़ा 144 और ना जाने क्या-क्या?बच्चों की स्कूलों मे छुट्टी और तमाम नेताओं की घड़ियाली अपील सारे देश मे एक सनसनी सी फ़ैला रहे हैं और सब के सब यही जानने मे लगे हैं कि कुछ होगा तो नही?कुछ यानी दंगा,कुछ यानी फ़साद?सबको अमन-चैन और शांति से ज्यादा अपने परिवार,जान और माल की चिंता है।देश जाये भाड़ में।और ये सब क्यों?बस इसलिये कि आज अदालत के गर्भ में साठ सालो से पल रहे एक मामले का फ़ैसला आने वाला है।अगर हम आज़ाद हैं,लोकतांत्रिक देश के नागरिक है तो फ़ैसले का सम्मान करने या कराने के लिये इतनी कड़ी सुरक्षा की ज़रूरत क्यों?शायद मेरे शब्दों से ज्यादा  अच्छी तरह से मेरे साथी कहें या छोटा भाई अनवर कुरैशी की ये तस्वीर मेरी भावनाओं को व्यकत कर रहा है।

Wednesday, September 29, 2010

"रामनामी" इन्हे ना राम चाहिये ना राममंदिर,इनके तो रोम-रोम मे रचे-बसे हैं राम!


बात-चीत मे राम-राम,सम्बोधन राम-राम,अभिवादन राम-राम,कपड़ों पर राम-राम,घर की दीवार-दरवाज़ों पर राम-राम और तो और जिस्म के हर हिस्से पर राम-राम।खुद को ये कहते भी हैं तो रामनामी,यानी इनकी जात भी राम के नाम की।इनसे बड़ा रामभक्त और कौन हो सकता है भला।इनका राम न मंदिर मे है ना मूर्तियों मे,इनका राम तो हर आदमी में है,हर प्राणी मे हैं,जीव-जन्तु मे हैं पेड़-पौधों मे हैं,प्रकृति मे है।हैरानी की बात है सारे देश मे जिस राममंदिर और रामजन्म भूमि को लेकर तनाव फ़ैला हुआ है उससे इन्हे कोई लेना-देना नही है।शायद बहुतो को इस बात पर विश्वास भी नही हो रहा होगा,मगर ऐसे लोगों से मेरा निवेदन है कि वे छत्तीसगढ आयें और खुद अपनी आंखों से देख लें यंहा के रामनामियों को।
छत्तीसगढ के जांजगीर ज़िले के छोटे से गांव चारपार के एक दलित युवक परशुराम ने 1890  मे इस सांप्रदाय की स्थापना की थी।ये उस समय के भक्ति आंदोलन से भी जोड़ा जाता है तो कुछ लोग इसे दलित या सामजिक आंदोलन की तरह देखते हैं।वैसे भी छत्तीसगढ मे भक्ति आंदोलन का व्यापक असर रहा है और खासकर दलित और अछूत समझे जाने लोगों मे ।रामनामी भी उनमे से हैं।
राममंदिर आंदोलन को अल्पज्ञानियों का आंदोलन मानते हैं रामनामियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष एम एल टंडन्।उनका कहना है कि जिस राम के नाम पर झगड़ा-फ़साद हो वो राम हमे नही चाहिये।सारी लड़ाई सत्ता और कुर्सी की है।उनका कहना है जिनकी आस्था राम नाम मे हैं उन्हे ना तो मंदिर की ज़रूरत है और ना मूर्ति की।इसिलिये रामनामी ना तो मंदिर जाते हैं और ना मूर्ती-पूजा करते हैं।निर्गुण संतो की आध्यात्मिक परंपरा मे रचे-बसे रामनामी नशे और व्यसनों से कोसों दुर है और हिंदु समाज की कुरीति दहेज के कट्टर विरोधी।अधिकांश रामनामी खेती करते हैं और बचे समय मे राम भजन का प्रचार।
साल मे एक बार इनका मेला लगता है जंहा नये रामनामी दिक्षा लेते हैं,सबसे अच्छी बात्त ये है कि इस सम्प्रदाय मे किसी भी धर्म,किसी भी जाति,लिंग और वर्ण का व्यक्ति दिक्षा ले सकता है।रहन-सहन और बातचीत मे राम नाम का अधिकाधिक उपयोग करने के अलावा रामनामी के लिये शरीर पर राम का नाम गुदवाना (टैटू) ज़रुरी होता है।माथे पर दो बार राम का नाम गुदवाने वाले को शिरोमणी,पूरे चेहरे पर रामनाम गुदवाने वाले को सर्वांग और पूरे शरीर पर रामनाम गुदवाने वाले को नखशिख रामनामी कहा जाता है।

शरीर के विभिन्न हिस्सों मे रामनाम गुदवाने के कारण ये लोग अलग से पहचान मे आ जाते हैं।सिर से लेकर पैर और जीभ और तलुवे तक़ पर स्थाई रूप से रामनाम खुदवाने वाले असली रामभक्तों पर शायद अब पहचान और अस्तीत्व का संकट मंडराने लगा है।ज़ाहिर है आधुनिकता ने रामनामियों की नई पीढी को भी प्रभावित किया है और अब वे पूरे शरीर पर राम नाम खुदवाने से बचने लगे हैं।सौंदर्यबोध और पश्चिमी सभ्यता के बढते प्रभाव से रामनामी भी अछूते नही रहे हैं।लोग अब धरम करम छोड़ कर दिखावे मे लग गये गयें हैं,ऐसे मे अस्तित्व का संकट और गहराता जा रहा है,ये मानना है समाज के बुज़ुर्ग लोगों का। हितवाद अख़बार के फ़ोटो जर्नलिस्ट रूपेश यादव के सहयोग के बिना पोस्ट लिखना संभव नही होता,आभारी हूं रूपेश का।सारे चित्र उनके खिंचे हुये है।

Thursday, September 23, 2010

अफ़सोस कुछ हो ना जाये इसलिये सारे देश मे हाय तौबा और इतना कुछ हो गया तो उफ़ तक़ नही!शर्म भी तो नही आती देश के ठेकेदारों को

सारे देश मे हाय-तौबा मची हुई है कि कंही कुछ हो ना जाये!क्या हो जायेगा और क्यों हो जायेगा इस पर कोई बात नही बस सारे के सारे एक ही राग आलाप रहे हैं कि कुछ होना नही चाहिये!और ऐसा करने वाले छोटे-मोटे लोग नही देश को चलाने वाले ठेकेदार लोग हैं।यानी प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और कलेक्टर से लेकर एस पी तक़्।सब के सब इसी चिंता मे दुबले हुये जा रहे हैं कि कुछ होना नही चाहिये।कमाल है अभी कुछ हुआ नही है और सारे देश मे सनसनी फ़ैला कर रख दी।कुछ हो ना जाये,कुछ हो ना जाये कह कर ऐसा लगता है कि ये ही लोग कुछ नही बहुत कुछ करवा देंगे।
अब इसे देश का दुर्भाग्य नही तो और क्या कहा जाये कि जब सालों से चले आ रहे एक विवादस्पद मामले का पटाक्षेप अदालत के ज़रिये होने जा रहा हो तब सारे के सारे लोगों का चिल्लाना कि अभी ये आखिरी फ़ैसला नही है।अभी और बड़ी अदालते हैं।अभी विचलित होने की ज़रूरत नही है।यंहा तो ठीक है लेकिन प्रधानमंत्री की तस्वीरों बाले केन्द्र सरकार के विज्ञापनों मे लोगो से किसी के भडकावे में न आने की अपील इस बात का सबूत है कि केन्द्र सरकार को आने वाले फ़ैसले के साथ-साथ भडकाने वाले लोगो के बारे में भी पूरी-पूरी जानकारी है।
अभी फ़ैसला आया भी नही और सारे देश मे फ़ैसले के आने का ह्ल्ला मच गया है।अभी कुछ भी नही हुआ है लेकिन शासन और प्रशासन इतना ज्यादा चुस्त और दुरूस्त नज़र आ रहा उतना मैं समझता हूं आज़ादी के बाद और कभी नज़र नही आया होगा।आज़ादी के बाद हुये पाकिस्तानी और चीनी हमलों के समय की बात उस समय के जानकार लोग जाने लेकिन जब से मैने होश सम्भाला है शासन-प्रशासन में ऐसी चुस्ती मैने कभी नही देखी थी।
ठीक है अच्छी बात है और इस बात की तारीफ़ ही होना चाहिये।इस बात की आलोचना करना,हमारे सडेले कुम्भकर्णी सिस्टम के जाग जाने का मज़ाक उड़ाना बेवजह की खुन्नस कहा जा सकता है लेकिन,अगर कोई ये कहे कि क्या इतनी चुस्ती इससे पहले जब देश मे बहुत कुछ हुआ तब दिखाई गई थी क्या?तो फ़िर इस सड़ेले सिस्टम के अचानक़ एक्टिव होने पर सवाल तो खड़े करता ही है।
क्या इससे पहले देश में ऐसे हालात पैदा नही हुये थे?बहुत दूर क्यों जायें।क्या कश्मीर मे जो हो रहा है या पिछले कुछ दिनो से जो चल रहा है उस पर भी ऐसी ही कुछ सख्ती-या चुस्ती नही दिखाई जानी चाहिये थी।क्या छत्तीसगढ के बस्तर,उडीसा के मल्कानगिरी और बंगाल के लालग़ढ मे जो हुआ उस पर ऐसी मुस्तैदी नही दिखाई जानी चाहिये थी?क्या पूर्वोत्तर के हालातों पर सारे देश मे ऐसी चिंता की लहरे नही उठना चाहिये थी?क्या विदर्भ और अन्य प्रदेशों मे किसानों के भूखों मरने,आत्मह्त्या करने पर सारे देश मे शासन-प्रशासन की चुस्ती-फ़ुर्ती दिखाई नही पड़नी चाहइये थी?क्या आरक्षण से झुलसते इलाकों मे सरकारों को इतना परेशान देखा गया है?क्या आनर किलिंग जैसे मामले मे सारे देश मे विचार मंथन हुआ है?क्या बेरोज़गारी और भुखमरी पर राज्य और केन्द्र सरकारो को एक साथ इतना चिंतित देखा गया है?क्या आंतकवाद और पाकिस्तानी घुसपैठ पर सरकारों मेइतनी घबराहट दिखाई दी है?क्या संसद तक़ को गोलियों और धमाकों से थरथरा देने के बाद सरकारे इतनी कंकपाती नज़र आई है?
मेरे ख्याल से सभी के सभी सवालों का जवाब एक ही होगा,नही।और अगर ऐसा है तो सरकारों और अफ़सरशाही का सिर्फ़ इस बात को लेकर सारे देश मे पैनिक क्रियेट करना उनकी अति सक्रियता को सवालों के घेरे मे खड़ा कर देता है।सारे देश मे तमाम हिस्ट्रीशीटरों की बुकिंग चल रही है।अकेले राजधानी मे इस बुकिंग का आंकड़ा 400 के आसपास पहुच गया है।तमाम रास्तों पर तैनात पुलिस और अर्ध सैलिक बलों को देखें तो ऐसा लगता है देश के बीचो-बीच बसे शांति के टापू छत्तीसगढ मे नही बल्कि घाटी यानी सुलगते कश्मीर के किसी शहर से गुज़र रहे हों।हर गाड़ी की चेकिंग,शस्त्रों के लाय्सेंस सस्पेंड करना,लायसेंसी हथियार थाने मे जमा करवाना,रोज़ सुबह-शाम मीटिंगों का दौर्।शांति  समितियों से लेकर पत्रकारों तक़ से मीटिंग।आखिर ऐसा हो क्या गया है?
अच्छा हुआ कुछ भी नही।ओहो हो होओने वाला है!क्या होने वाला है भई ज़रा हम भी तो सुने।अच्छा फ़ैसला आने वाला है!किसका?राम जन्मभूमि-बाबरी मस्ज़िद विवाद का।तो उसका असर सारे देश मे पड़ सकता है?सारे देश मे कुछ हो सकता है?कुछ भी ऐसा-वैसा नही होना चाहिये?इसलिये ये सारी मशक्कत हो रही है।काश इस देश के रहनुमाओं को,इस देश के कथित खेवैयाओं को,स्वयंभू ठेकेदारों को ये भी समझ मे आ जाये कि हर समस्या पर अगर इतनी ही जागरूकता दिखायें तो शायद वो दिन दूर नही होगा जब सारे विश्व मे फ़िर से भारत का डंका बज़े। अफ़सोस मगर ऐसा होगा नही,लोग बाढ मे बहते रहेंगे,बीमारियों से मरते रहेंगे,आतंकवादी धमाकों मे इंसानी मांस के लोथड़े उड़ते रहेंगे,नक्सलवादियों की गोलियों से जिस्म छलनी होतें रहेंगे,किसान आत्महत्या करते रहेंगे,बेरोज़गार अपराध के मुंह समाते रहेंगे मगर तब शायद सरकारें सोती रहेंगी क्योंकि तब इस देश की सबसे बड़ी समस्या मंदिर-मस्ज़िद विवाद पर फ़साद होने की आशंका नही रहेगी।
लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूं और गुस्सा भी गले तक़ भरा है मगर मैं चाहता हूं कि आप भी कुछ कहें।कहियेगा ज़रूर्।