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Thursday, September 30, 2010
जूते,लाठी,आज़ादी और हम!
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लोकतंत्र Democracy
Friday, July 9, 2010
क्या सच मे हम आज़ाद देश मे रह रहे हैं?
आज़ादी के मायने ये तो कदापी नही होते कि आप अपनी मर्ज़ी से कंही जा भी नही सके।और अगर हम अपनी मर्ज़ी से कंही आ-जा नही सकते तो क्या हमे आज़ाद देश का नागरिक कहलाने का हक़ है?इससे ज्यादा अफ़सोस की बात और क्या हो सकती है कि देश की सरकार उन लोगों की धमकियों के सामने घुटने टेककर बैठी है जिन्हे लोकतंत्र के हथियार बैलेट पर नही बुलेट पर भरोसा है।वे ज़रा भी धमकाते है और सरकार गीदड़ों की तरह शहर की ओर भगती नज़र आती है और शायद इसिलिये उन लोगों का जंगल पर साम्राज्य कायम हो चुका है।अब जब वे नही चाहते तब कोई उनके ईलाके से गुज़र नही सकता और सरकार खुद भी उस ईलाके से आने-जाने के साधने रेल सेवा तक़ का समय बदल देती है।अब बताईये भला ऐसे मे क्या हम कह सकते हैं कि हम आज़ाद देश के नागरिक हैं?बात छोटी सी ज़रूर है मगर है बहुत बड़ी।मुझे लगता है कि सरकार माओवादियों से लड़ने की बजाय बचने मे विश्वास कर रही है जो कंही ना कंही माओवादियों के हौसले बढा रहा है।
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