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Thursday, June 27, 2013
सरकारी माल बांटने के लिये लड रहे हैं.सेवा का इतना ही शौक है तो खुद का माल बांटते!
देश को लूटने,नोचने और खसोटने के लिये तो लडते रहे.देश की समृद्धी विदेशी बैंको में जमा करने मे भी कोई कसर नही छोडी.पर हैरानी की बात तो ये है कि सरकारी माल को बाप का माल बताकर लोटाने के लिये भी लड रहे हैं.सरकार का रुपया किसी पार्टी विशेष का कैसे हो सकता है?अगर दर्द होता तो अपने निजी एकाऊण्ट से बांटते.एक नही सैकडौ ऎसे जनप्रतिनिधी है जिन्हे सब जानते है कि वे क्या थे और क्या हो गये हैं?कुछ् ही सालों में लाखो से सैकडो करोडो की सम्पत्ति के मालिक कैसे बने ये सभी जानते है और कई गुना कमाई बढने का राज भी जगजाहिर है.उसमे से बांटते राहत तो लेते क्रेडिट.बांट रहे है सरकारी माल और उसका भी श्रेय लेने की होड.मारामारी तक पर उतर आये हैं.थू है सालो पर.
Monday, September 26, 2011
हर साल कंही बाढ के कहर की तो कंही सूखे की खबरें दिल दहलाती है।क्या देश के ठेकेदार बाढ और सूखे जैसी आपदाओं का स्थाई निदान नही चाह्ते?
हर साल कंही बाढ के कहर की तो कंही सूखे की खबरें दिल दहलाती है।बाढ का तांडव तो अब लाईव नज़र आ जाता है।क्या ये सब हमारे देख के ठेकेदारों को नज़र नही आता?हर साल डिसास्टर मैनेजमैंट के नाम पर पता नही कितनी रकम डकार जाते हैं,एक्स्पर्ट?खाने में बचाने में नही।दोनो ही प्राकृतिक आपदाओं का कारण है पानी।क्या इस देश में आज़ादी के बाद से नदी जल के मैनेजमेंट पर सोचने के लिये किसी के पास समय नही है?क्या देश के ठेकेदार बाढ और सूखे जैसी आपदाओं का स्थाई निदान नही चाह्ते?
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