Showing posts with label बाढ. Show all posts
Showing posts with label बाढ. Show all posts
Monday, September 26, 2011
हर साल कंही बाढ के कहर की तो कंही सूखे की खबरें दिल दहलाती है।क्या देश के ठेकेदार बाढ और सूखे जैसी आपदाओं का स्थाई निदान नही चाह्ते?
हर साल कंही बाढ के कहर की तो कंही सूखे की खबरें दिल दहलाती है।बाढ का तांडव तो अब लाईव नज़र आ जाता है।क्या ये सब हमारे देख के ठेकेदारों को नज़र नही आता?हर साल डिसास्टर मैनेजमैंट के नाम पर पता नही कितनी रकम डकार जाते हैं,एक्स्पर्ट?खाने में बचाने में नही।दोनो ही प्राकृतिक आपदाओं का कारण है पानी।क्या इस देश में आज़ादी के बाद से नदी जल के मैनेजमेंट पर सोचने के लिये किसी के पास समय नही है?क्या देश के ठेकेदार बाढ और सूखे जैसी आपदाओं का स्थाई निदान नही चाह्ते?
Labels:
draught,
flood,
natural disaster management,
आपदा प्रबंधन,
बाढ,
सूखा
Monday, June 29, 2009
तुम तो नेताओं को भी मात दे रहे हो
कोरा आश्वासन देने,गरीबों पर अत्याचार करने और धोखेबाज़ी मे नेताओं को कौन टक्कर दे सकता है?इस सवाल का जवाब बड़ा कठिन लगता है।तीनो ही गुणों पर तो सिर्फ़ और सिर्फ़ नेताओं का एकाधिकार नज़र आता है और उस एकाधिकार को न केवल तोड़ना बल्कि उन गुणों मे श्रेष्ठता भी साबित करने वाले को ढूंढते नज़रें थक़ जाती है।सच पूछो तो इस मामले मे कोई उनकी बराबरी तक़ नही कर सकता।फ़िर कौन हो सकता है उन्हे मात देने वाला?सोचो?सोचो,सोचो?नही सोच पाये ना?तो सुनो उन्हे मात दे रहा है,बादल।
बहुत ध्यान से देखें त्तो बादल नेताओं का बडा भाई ही लगता है।जब नज़र आता है, नेताओं की तरह जनता, खासकर गरीब जनता की आस ही बढाता है।वह भी जब आता है नेताओं की तरह चिल्ला-चिल्ला कर सब कुछ ठीक कर देने का दावा करता नज़र आता है।नेताओ की तरह उसे लाऊडस्पीकर और भीड़ की ज़रुरत नही पड़ती,वो तो भारी गड़गड़ाहट के साथ मानो आकाशवाणी कर देता है कि वो आ गया है और उनकी मांगे वो पूरी कर देगा।ऐसा नही है वो हमेशा ही धोखा देता है या कोरे आश्वासन ही देता है।कभी-कभी चुनावी मौसम मे नेताओं द्वारा किये गये कार्यों की तरह उसके किये गये भी काम देखे जा सकते है।
ऐसा नही है कि वो नेताओं की तरह सिर्फ़ गरज़ता ही है,बरसता नही है।वो कभी-कभी बरसता भी है मगर उसके बरसने मे भी ऊंच-नीच या अमीर-गरीब का भेदभाव साफ़ नज़र आता है।उसका कोई भी काम नेताओं के कामो की तरह निश्पक्ष नज़र नही आता।वो भी अपने चाहने वालों को तो फ़ायदा पंहुचाता है और उस्का दुष्परिणाम गरीब ही भोगता है।वो जब बरसता है अमीर मौसम का मज़ा लेते है उअर गरीबों पर रोज़ी-रोटी का संकट कहर बरपा देता है।और जब नही बरसता तो भी अमीरो के लिये कम उत्पादन भारी मुनाफ़ाखोरी का कारण बन जाता है।और तो और वो तो भ्रष्टाचार के लिये नेताओं को हमेशा सुनहरा अवसर प्रदान करता रहता है।ज्यादा बरस कर बाढ और कम बरस कर सूखे के हालत राहत कामो के लिये ग्राऊंड बना देते है।फ़िर शूरू हो जाता है गरीबो की मदद के नाम पर अमीरो और नेताओं की तिज़ोरी भरने का काम।
कभी देखा है किसी गरीब को पहली बरसात मे स्काच का पैग हाथ मे लिये चिकन/मटन या गर्म भजिये का मज़ा लेते हुये?कभी देखा है किसी गरीब को छत पर भीगते हुये?हां याद आया गरीब तो हमेशा छ्त के नीचे टपकते हुये पानी को इकट्ठा करते हुये भीगता है।वो भी रेन डांस करता है मगर छत के नीचे के बरतनो को इधर से उधर सरकाने के लिये।ये साला बादल कभी भी झुग्गी-झोपड़ी और पाश कालोनी मे फ़र्क नही करता।बिल्कुल नेताओं की तरह सबको वोट लेकर जीत जाने के बाद एक जैसे ही देखता है।
बादल तो साला बेशर्मी मे भी नेताओं को मात देता नज़र आता है।नेता तो पांच साल मे एक बार आते है ये तो साला हर साल चला आता है बिना नागा। हर बार कुछ न कुछ गड़बड़ करता ही है।कभी बाढ तो कभी सूखा।कभी यंहा अकाल तो कभी वंहा अकाल्।बिहार,उड़िसा,असम और राजस्थान तो पहले इसके प्रिय राज्य थे मगर आजकल ये कंही भी किसी को भी निपटा देता है।राजस्थान को सुखा-सुखा कर तंग करने के बाद अब बाढ से परेशान करने लगा है।मतलब वो भी नेताओ की तरह कभी यंहा से तो कभी वंहा से जुगाड़ कर अपनी सत्ता कायम करने का फ़ार्मूला सीख गया है।
बादल इस बार भी किसानो के साथ मज़ाक कर रहा है।उसने पहले नेताओ के चुनावी घोषणापत्र की तरह मौसम विभाग से अपना घोषणापत्र जारी करवा कर किसानो की उम्मीद बढा दी थी और अब वो अपने घोषणापत्र को नेताओं की तरह आश्वासन की पुडिया बांधने के काम मे ला रहा है।किसानो का दम टूट रहा है और नेताओं के सब्र का बांध्।उन्हे भी ज़ल्दि है किसान मरे तो कर्ज़ा मुक्ति के नाम पर बंदरबांट कर सके।साला कमीनेपन मे भी अच्छे अच्छों को मात दे रहा है ये बरखा का भाई बादल्।इसके पीछे रायपुर से अमरावती आ गया।साला पहले यंहा बरस रहा था रायपुर मे नही और जब मै यंहा आया हूं तो यहा से भाग के वंहा बरस रहा है।है ना धोखेबाज़ो का बेताज बादशाह्।
बहुत ध्यान से देखें त्तो बादल नेताओं का बडा भाई ही लगता है।जब नज़र आता है, नेताओं की तरह जनता, खासकर गरीब जनता की आस ही बढाता है।वह भी जब आता है नेताओं की तरह चिल्ला-चिल्ला कर सब कुछ ठीक कर देने का दावा करता नज़र आता है।नेताओ की तरह उसे लाऊडस्पीकर और भीड़ की ज़रुरत नही पड़ती,वो तो भारी गड़गड़ाहट के साथ मानो आकाशवाणी कर देता है कि वो आ गया है और उनकी मांगे वो पूरी कर देगा।ऐसा नही है वो हमेशा ही धोखा देता है या कोरे आश्वासन ही देता है।कभी-कभी चुनावी मौसम मे नेताओं द्वारा किये गये कार्यों की तरह उसके किये गये भी काम देखे जा सकते है।
ऐसा नही है कि वो नेताओं की तरह सिर्फ़ गरज़ता ही है,बरसता नही है।वो कभी-कभी बरसता भी है मगर उसके बरसने मे भी ऊंच-नीच या अमीर-गरीब का भेदभाव साफ़ नज़र आता है।उसका कोई भी काम नेताओं के कामो की तरह निश्पक्ष नज़र नही आता।वो भी अपने चाहने वालों को तो फ़ायदा पंहुचाता है और उस्का दुष्परिणाम गरीब ही भोगता है।वो जब बरसता है अमीर मौसम का मज़ा लेते है उअर गरीबों पर रोज़ी-रोटी का संकट कहर बरपा देता है।और जब नही बरसता तो भी अमीरो के लिये कम उत्पादन भारी मुनाफ़ाखोरी का कारण बन जाता है।और तो और वो तो भ्रष्टाचार के लिये नेताओं को हमेशा सुनहरा अवसर प्रदान करता रहता है।ज्यादा बरस कर बाढ और कम बरस कर सूखे के हालत राहत कामो के लिये ग्राऊंड बना देते है।फ़िर शूरू हो जाता है गरीबो की मदद के नाम पर अमीरो और नेताओं की तिज़ोरी भरने का काम।
कभी देखा है किसी गरीब को पहली बरसात मे स्काच का पैग हाथ मे लिये चिकन/मटन या गर्म भजिये का मज़ा लेते हुये?कभी देखा है किसी गरीब को छत पर भीगते हुये?हां याद आया गरीब तो हमेशा छ्त के नीचे टपकते हुये पानी को इकट्ठा करते हुये भीगता है।वो भी रेन डांस करता है मगर छत के नीचे के बरतनो को इधर से उधर सरकाने के लिये।ये साला बादल कभी भी झुग्गी-झोपड़ी और पाश कालोनी मे फ़र्क नही करता।बिल्कुल नेताओं की तरह सबको वोट लेकर जीत जाने के बाद एक जैसे ही देखता है।
बादल तो साला बेशर्मी मे भी नेताओं को मात देता नज़र आता है।नेता तो पांच साल मे एक बार आते है ये तो साला हर साल चला आता है बिना नागा। हर बार कुछ न कुछ गड़बड़ करता ही है।कभी बाढ तो कभी सूखा।कभी यंहा अकाल तो कभी वंहा अकाल्।बिहार,उड़िसा,असम और राजस्थान तो पहले इसके प्रिय राज्य थे मगर आजकल ये कंही भी किसी को भी निपटा देता है।राजस्थान को सुखा-सुखा कर तंग करने के बाद अब बाढ से परेशान करने लगा है।मतलब वो भी नेताओ की तरह कभी यंहा से तो कभी वंहा से जुगाड़ कर अपनी सत्ता कायम करने का फ़ार्मूला सीख गया है।
बादल इस बार भी किसानो के साथ मज़ाक कर रहा है।उसने पहले नेताओ के चुनावी घोषणापत्र की तरह मौसम विभाग से अपना घोषणापत्र जारी करवा कर किसानो की उम्मीद बढा दी थी और अब वो अपने घोषणापत्र को नेताओं की तरह आश्वासन की पुडिया बांधने के काम मे ला रहा है।किसानो का दम टूट रहा है और नेताओं के सब्र का बांध्।उन्हे भी ज़ल्दि है किसान मरे तो कर्ज़ा मुक्ति के नाम पर बंदरबांट कर सके।साला कमीनेपन मे भी अच्छे अच्छों को मात दे रहा है ये बरखा का भाई बादल्।इसके पीछे रायपुर से अमरावती आ गया।साला पहले यंहा बरस रहा था रायपुर मे नही और जब मै यंहा आया हूं तो यहा से भाग के वंहा बरस रहा है।है ना धोखेबाज़ो का बेताज बादशाह्।
Subscribe to:
Posts (Atom)