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Sunday, January 8, 2012
बिग बास अश्लीलता फ़ैला रहा है ये तेज़तर्रार न्यूज़ चैनल वालो को आखिरी दिन पता चला,गज़ब की जागरूकता है भाई!
'बिग बास'अश्लीलता फ़ैला रहा है,ये बात खबरों के मामले मे आगे रहने वाले देश के जाने माने न्यूज़ चैनल को कल पता चली।उसने आनन-फ़ानन में पैनलिस्ट बिठा कर गर्मागर्म बह्स भी करवा डाली।कब जब कुछ ही देर बाद उस कार्यकर्म का फ़ायनल होना था।बिग बास में क्या-क्या हो रहा है ये अपने कार्यक्रम में रोज़ दिखाने वाले न्यूज़ चैनल को अंतिम समय में पता चला कि वंहा अश्ल्लीलता परोसी जा रही है।है ना कमाल की पैनी निगाहें।आखिरी दिन भी वो बहस करवाकर पता नही उस कार्यक्रम के लिये शायद दर्शक जुटाने का ही कार्यक्रम रहा होगा।पेड़ न्यूज़ में जो चहे करवा लो।बस अफ़सोस ही कर सकते है,देश के स्व्यंभू ठेकेदारों की कथित जागरूकता पर।
Friday, April 30, 2010
आखिर समझ क्या रखा है अपने दर्शकों को,इन न्यूज़ चैनल वालों ने?
एक सवाल सामने रख रहा हूं,जो टीवी वाले के लिये तो बहुत छोटा सा हो सकता है मगर हम दर्शकों के लिये वो बहुत ज़रूरी है।आखिर समझ क्या रखा है अपने दर्शकों को,इन न्यूज़ चैनल वालों ने?जी हां,यही सवाल,मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचा गया,आज सुबह ठीक दस बजे।मुझे लगा कि अब चैनल वालों को पता चल गया है कि उसके दर्शक उन्हे देखने के लिये मज़बूर हो गये हैं,सो अब कुछ भी किया जाये कोई कुछ कहने वाला नही है।सुबह-सुबह देश-दुनिया का ताज़ा हाल जानने के लिये अपने को बड़ा बताने मे कोई कसर नही छोडने वाले चैनल की ओर चला गया।वंहा देखा तो शेर महाराज दहाड़ रहे हैं।मैने सोचा शेर बचाओ अभियान पर कोई विशेष कार्यक्रम होगा।विशेष शुरू हुआ तो मैं चौंका भारत की बजाये सीधे अफ़्रीका और बहादुरी के पर्याय शेर एक नही तीन-तीन शेरों की एक साथ दुर्गति।
मैं हैरान था कि दूसरे चैनल के शाटस को बेशर्मी से उठाकर कैसे विशेष स्टोरी बनाई जा सकती है।खैर वन्य जीवन के प्रति उत्सुकता होने के कारण मैं चैनल पर चिपका रहा।एक ही शाट को कई-कई बार दिखाने के साथ शब्दों की जादूगरी देख रहा था।लग रहा था कि चैनल वाले जादूगर से पहले कोई जमूरा डमरू बज़ा-बज़ा कर भीड़ इकट्ठी कर रहा है।
थोड़ी देर तक़ ही अफ़्रीका के जंगलो के चुराये हुये शाट्स देखने का मज़ा ले पाया था कि अचानक़ टीवी की स्क्रीन पर दृश्य बदल गया और अफ़्रीका के घने जंगलों से कैमरा घूम कर सीधे झारखंड़ के जंगलो मे पहुंच गया।स्क्रीन पर कुछ,वायज़ ओवर कुछ और और कुछ ही क्षणों मे असली शेरों की बजाये दिल्ली के रंगे-पुते शेर नज़र आ गये झारखंड़ की समस्या पर बखान करते हुये।
अब हमारी समझ मे आया कि झारखंड मसले पर प्रेस कांफ़्रेंस को लाईव करने से पहले थोड़ी देर के लिये दिखाने लायक कोई कार्यक्रम नही रहने के कारण,भाई लोगों को शेर की बेईज़्ज़ती करने की सूझ गई थी।फ़िर लगा कि भारत मे तो बहादुरों को लोग कहते हैं शेर की तरह जिया,या लड़ा।सो देश के शेरों को मिले बहादुरी के खिताब का खयाल रखते हुये उन्होने उन पर रहम किया और अफ़्रीका के शेरों की ऐसी की तैसी करना शुरू किया।तीन सौ वन भैंसों के झुंडो से लड़ने की बजाये भागते शेरों की जंग,जी हां यही शब्द का इस्तेमाल किया था जमूरे सारी जमूरी ने।बकायदा कितने मिनट चली जंग,कौन कितनी बार आगे आया,कितनी बार पिछे गया,बाकायदा केलकुलेट कर दिखा रहे थे चोरी के शाट्स्।
मगर बुरा हो झारखंड के लफ़्ड़े का।अचानक़ प्रेस कांफ़्रेंस शुरू हो गई और जब दूसरे चैनल पर वो दिखे तो फ़िर उससे पीछे कैसे रह सकते थे भाई लोग्।शेर को किनारे के कागज़ी शेरों के बयान जारी किये और आगे रहने की होड़ मे पोल-पट्टी खुल गई मदारियों की।शेर की बहादुरी की ऐसी की तैसी करने और वन भैंसो को उनसे बहादुर साबित करने का अभियान राजनितिक शेरों के कारण अधूरा ही रह गया।और अगर दिखा भी देते तो भी क्या कोई इस देश मे कह सकता था कि फ़लाना जिया तो शेर की तरह या फ़लाना लड़ा तो शेर की तरह?खैर शेरों की जाने दिजिये न्यूज़ चैनल वाले हम दर्शकों को क्या कहते होंगे अब थोड़ा-थोड़ा समझ मे आने लगा है।
मैं हैरान था कि दूसरे चैनल के शाटस को बेशर्मी से उठाकर कैसे विशेष स्टोरी बनाई जा सकती है।खैर वन्य जीवन के प्रति उत्सुकता होने के कारण मैं चैनल पर चिपका रहा।एक ही शाट को कई-कई बार दिखाने के साथ शब्दों की जादूगरी देख रहा था।लग रहा था कि चैनल वाले जादूगर से पहले कोई जमूरा डमरू बज़ा-बज़ा कर भीड़ इकट्ठी कर रहा है।
थोड़ी देर तक़ ही अफ़्रीका के जंगलो के चुराये हुये शाट्स देखने का मज़ा ले पाया था कि अचानक़ टीवी की स्क्रीन पर दृश्य बदल गया और अफ़्रीका के घने जंगलों से कैमरा घूम कर सीधे झारखंड़ के जंगलो मे पहुंच गया।स्क्रीन पर कुछ,वायज़ ओवर कुछ और और कुछ ही क्षणों मे असली शेरों की बजाये दिल्ली के रंगे-पुते शेर नज़र आ गये झारखंड़ की समस्या पर बखान करते हुये।
अब हमारी समझ मे आया कि झारखंड मसले पर प्रेस कांफ़्रेंस को लाईव करने से पहले थोड़ी देर के लिये दिखाने लायक कोई कार्यक्रम नही रहने के कारण,भाई लोगों को शेर की बेईज़्ज़ती करने की सूझ गई थी।फ़िर लगा कि भारत मे तो बहादुरों को लोग कहते हैं शेर की तरह जिया,या लड़ा।सो देश के शेरों को मिले बहादुरी के खिताब का खयाल रखते हुये उन्होने उन पर रहम किया और अफ़्रीका के शेरों की ऐसी की तैसी करना शुरू किया।तीन सौ वन भैंसों के झुंडो से लड़ने की बजाये भागते शेरों की जंग,जी हां यही शब्द का इस्तेमाल किया था जमूरे सारी जमूरी ने।बकायदा कितने मिनट चली जंग,कौन कितनी बार आगे आया,कितनी बार पिछे गया,बाकायदा केलकुलेट कर दिखा रहे थे चोरी के शाट्स्।
मगर बुरा हो झारखंड के लफ़्ड़े का।अचानक़ प्रेस कांफ़्रेंस शुरू हो गई और जब दूसरे चैनल पर वो दिखे तो फ़िर उससे पीछे कैसे रह सकते थे भाई लोग्।शेर को किनारे के कागज़ी शेरों के बयान जारी किये और आगे रहने की होड़ मे पोल-पट्टी खुल गई मदारियों की।शेर की बहादुरी की ऐसी की तैसी करने और वन भैंसो को उनसे बहादुर साबित करने का अभियान राजनितिक शेरों के कारण अधूरा ही रह गया।और अगर दिखा भी देते तो भी क्या कोई इस देश मे कह सकता था कि फ़लाना जिया तो शेर की तरह या फ़लाना लड़ा तो शेर की तरह?खैर शेरों की जाने दिजिये न्यूज़ चैनल वाले हम दर्शकों को क्या कहते होंगे अब थोड़ा-थोड़ा समझ मे आने लगा है।
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Tuesday, September 8, 2009
शादी-शुदा महिला को मंगलसूत्र छिपाते दिखाकर क्या बेचना चाह रहे है ये लोग?
टीवी पर मनोरंजक कार्यक्रम देखना तो पहले ही बंद कर चुका हूं और लगता है कि अब विज्ञापन भी देखना बंद करना पड़ेगां।नामी-गिरामी न्यूज़ चैनल मे ब्रेक के समय दिखाये जाने वाले एक विज्ञापन को देख कर जान जल गई।विज्ञापन एक गाड़ी का है जिसमे एक शादी-शुदा महिला को मंगलसूत्र छिपाते दिखाया गया है।आखिर ये सब दिखा कर क्या बेचना चाह रहे है ये लोग?
जिन्होने ये विज्ञापन नही देखा उन्हे मै बता दूं कि विज्ञापन मे बस स्टाप पर खड़ी एक महिला का पर्स छीन कर एक लफ़ंगा भागता है और तभी एक गाड़ी रूकती है उसका दरवाज़ा खुलता है लफ़ंगा दरवाज़े से टकरा जाता है पर्स हवा मे उछलता है जिसे गाड़ी से उतरता एक गबरू हवा मे ही कैच करता है और शान से अकड़ता हुआ सीधे महिला के पास जाता है और उसे पर्स लौटा कर ब्रेक लगाने से गाड़ी से गिरे भारी सामान को खुद उठाकर वापस लादता है।तब तक़ उसकी सुपरमैन स्टाईल हरक़तो को देख रही महिला मुस्कुराती है,फ़िर शरमा कर चुन्नी नीचे खींच कर मंगलसूत्र को छीपाने लगती है।
इस देश मे जंहा महिला को देवी माना जाता है,जंहा उसे सुहाग की रक्षा के लिये यमराज तक़ से लड़ने वाली माना गया है।जंहा उसे मां-बहन जैसे पवित्र रिश्तों से नवाज़ा गया है।जंहा उसके सद्चरित्र को लेकर कहानी किस्सों की भरमार है,वंहा उसी देश मे एक शादी-शुदा महिला को पराये मर्द को देख कर मंगलसूत्र छिपाते दिखाकर विज्ञापन बनाने वाले ने ये कैसे सोचा होगा कि इसे देख कर लोग गाड़ी खरीद ही लेंगे।अफ़सोस की बात तो ये है कि ये विज्ञापन शायद रोज़ दिखाया जा रहा है और इसका कंही कोई विरोध नही हो रहा है।विज्ञापनो मे अश्लीलता रोकने के लिये बीच मे कुछ प्रयास ज़रूर हुये थे और कुछ अश्लील विज्ञापनो का प्रदर्शन रोका भी गया था।इस विज्ञापन को लोग ये कह सकते हैं कि ये अश्लील नही है मगर ये भारतीय नारी का घोर अपमान हैं केवल ये विज्ञापन बल्कि अन्य विज्ञापनो मे भी उसकी भारतीय छबि को ऐसा लगता है कि खराब करने का षडयंत्र चल रहा है।
जंहा तक़ मै समझता हूं ऐसे फ़ुहड़ और भारतीय संस्कृति पर हमला करने वाले ऐसे सभी विज्ञापनो का विरोध होना चाहिये। हो सकता है कुछ प्रगतिशील लोगो को गंदगी उस विज्ञापन मे नही मेरी नज़र मे नज़र आये,तो ऐसे लोगो से मै एडवांस मे क्षमा मांग लेता हूं।मै स्त्री के आधुनिक होने का विरोधी नही हूं लेकिन इस बात का समर्थक भी नही सकता कि स्त्री किसी गैर मर्द के सामने सुहाग चिन्ह छिपाये।
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