एक सवाल सामने रख रहा हूं,जो टीवी वाले के लिये तो बहुत छोटा सा हो सकता है मगर हम दर्शकों के लिये वो बहुत ज़रूरी है।आखिर समझ क्या रखा है अपने दर्शकों को,इन न्यूज़ चैनल वालों ने?जी हां,यही सवाल,मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचा गया,आज सुबह ठीक दस बजे।मुझे लगा कि अब चैनल वालों को पता चल गया है कि उसके दर्शक उन्हे देखने के लिये मज़बूर हो गये हैं,सो अब कुछ भी किया जाये कोई कुछ कहने वाला नही है।सुबह-सुबह देश-दुनिया का ताज़ा हाल जानने के लिये अपने को बड़ा बताने मे कोई कसर नही छोडने वाले चैनल की ओर चला गया।वंहा देखा तो शेर महाराज दहाड़ रहे हैं।मैने सोचा शेर बचाओ अभियान पर कोई विशेष कार्यक्रम होगा।विशेष शुरू हुआ तो मैं चौंका भारत की बजाये सीधे अफ़्रीका और बहादुरी के पर्याय शेर एक नही तीन-तीन शेरों की एक साथ दुर्गति।
मैं हैरान था कि दूसरे चैनल के शाटस को बेशर्मी से उठाकर कैसे विशेष स्टोरी बनाई जा सकती है।खैर वन्य जीवन के प्रति उत्सुकता होने के कारण मैं चैनल पर चिपका रहा।एक ही शाट को कई-कई बार दिखाने के साथ शब्दों की जादूगरी देख रहा था।लग रहा था कि चैनल वाले जादूगर से पहले कोई जमूरा डमरू बज़ा-बज़ा कर भीड़ इकट्ठी कर रहा है।
थोड़ी देर तक़ ही अफ़्रीका के जंगलो के चुराये हुये शाट्स देखने का मज़ा ले पाया था कि अचानक़ टीवी की स्क्रीन पर दृश्य बदल गया और अफ़्रीका के घने जंगलों से कैमरा घूम कर सीधे झारखंड़ के जंगलो मे पहुंच गया।स्क्रीन पर कुछ,वायज़ ओवर कुछ और और कुछ ही क्षणों मे असली शेरों की बजाये दिल्ली के रंगे-पुते शेर नज़र आ गये झारखंड़ की समस्या पर बखान करते हुये।
अब हमारी समझ मे आया कि झारखंड मसले पर प्रेस कांफ़्रेंस को लाईव करने से पहले थोड़ी देर के लिये दिखाने लायक कोई कार्यक्रम नही रहने के कारण,भाई लोगों को शेर की बेईज़्ज़ती करने की सूझ गई थी।फ़िर लगा कि भारत मे तो बहादुरों को लोग कहते हैं शेर की तरह जिया,या लड़ा।सो देश के शेरों को मिले बहादुरी के खिताब का खयाल रखते हुये उन्होने उन पर रहम किया और अफ़्रीका के शेरों की ऐसी की तैसी करना शुरू किया।तीन सौ वन भैंसों के झुंडो से लड़ने की बजाये भागते शेरों की जंग,जी हां यही शब्द का इस्तेमाल किया था जमूरे सारी जमूरी ने।बकायदा कितने मिनट चली जंग,कौन कितनी बार आगे आया,कितनी बार पिछे गया,बाकायदा केलकुलेट कर दिखा रहे थे चोरी के शाट्स्।
मगर बुरा हो झारखंड के लफ़्ड़े का।अचानक़ प्रेस कांफ़्रेंस शुरू हो गई और जब दूसरे चैनल पर वो दिखे तो फ़िर उससे पीछे कैसे रह सकते थे भाई लोग्।शेर को किनारे के कागज़ी शेरों के बयान जारी किये और आगे रहने की होड़ मे पोल-पट्टी खुल गई मदारियों की।शेर की बहादुरी की ऐसी की तैसी करने और वन भैंसो को उनसे बहादुर साबित करने का अभियान राजनितिक शेरों के कारण अधूरा ही रह गया।और अगर दिखा भी देते तो भी क्या कोई इस देश मे कह सकता था कि फ़लाना जिया तो शेर की तरह या फ़लाना लड़ा तो शेर की तरह?खैर शेरों की जाने दिजिये न्यूज़ चैनल वाले हम दर्शकों को क्या कहते होंगे अब थोड़ा-थोड़ा समझ मे आने लगा है।